जलियांवाला बाग नरसंहार और उधम सिंह की प्रतिज्ञा, ड्वायर पर दो गोलियां दाग दिया संदेश- अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी छोड़ा नहीं करते

अभिनय आकाश

13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह कैंथस्चन हॉल में एक मीटिंग में पहुंचे। मीटिंग खत्म होने को थी तभी ऊधम सिंह ने स्टेज की तरफ गोलियां चलाई। वो जलियांवाला बाग कांड के वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ’डायर और सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडियन अफेयर्स लॉरेंस को मारना चाहते थे।

एक अनाथ नौजवान यूरोपीय और अफ्रीकी देशों से होता हुआ लंदन जा पहुंचता है। मकान किराये पर लेता है, कार खरीदता है और साथ ही रिवॉल्वर भी। ताकि वो अपनी योजना को अपने सही अंजाम तक पहुंचा सके। लेकिन इससे पहले ही उसे ज्ञात होता है कि जिसे वो मारने आया वो पहले ही अपनी मौत मर गया। लेकिन अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए वो अपनी किताब से बंदूक निकालता है और नरसंहार का हुक्मनामा देने वाले के ऊपर दाग देता है दो गोलियां इस संदेश के साथ कि ”अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी छोड़ा नहीं करते”। लेकिन इस घटना को अंजाम दिए जाने के पीछे एक दर्दनाक और मानवता को शर्मशार करने वाली घटना छिपी है जिसे अंग्रेजी शासनकाल का एक काला अध्याय माना जाता है। 

परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।
मशहूर कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने पंक्तियां आज से 102 साल पहले जलियांवाला बाग में शहीद हुए लोगों की याद में लिखी थी। कुछ कहानियां वक्त पर ऐसे निशान छोड़कर जाती हैं कि दशक बीतते हैं, सदियां बीतती हैं। लेकिन हम हिन्दुस्तानियों के जेहन से नहीं उतरती हैं। ऐसी ही एक कहानी है उधम सिंह की जिन्हें हम साल दर साल याद करते हैं। उनकी पैदाइश के दिन उनकी शहादत के दिन। क्योंकि उधम सिंह ने हिन्दुस्तान के साथ हुई एक बड़ी नाइंसाफी का बदला लिया था। 

उधम सिंह बहुत सारे दस्तावेजों को नष्ट करते हैं, एक के ऊपर एक रखे पासपोर्ट  स्क्रीन पर आते हैं। हर पासपोर्ट पर अलग-अलग नाम हैं। पहला नाम है उदय सिंह, दूसरा नाम है फ्रैंक ब्राजील, तीसरा है शेर सिंह और अंतिम है उधम सिंह। पासपोर्ट पर उधम सिंह की लगी फोटो स्क्रीन पर दिखाई देती है। मैं बात कर रहा हूं शूजित सरकार के निर्देशन में बनी फिल्म सरदार उधम सिंह की। जो 16 अक्टूबर को अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है। जिसको लेकर इन दिनों चर्चा खूब हो रही है। लेकिन आज हम बात फिल्म की नहीं बल्कि उधम सिंह के वास्तविक जीवन की बात करेंगे। साथ ही आपको रूबरू करवाएंगे एक व्यक्ति बहुत से दर्द, एक मिशन की कहानी से। 
उधम सिंह का शुरुआती सफर
पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम में 1899 में जन्म लेने वाले उधम सिंह का नाम शेर सिंह रखा गया था।  उनके पिता सरदार तेहाल सिंह जम्मू उपल्ली गांव में रेलवे चौकीदार थे। उन्होंने अपने माता-पिता दोनों को बेहद ही छोटी कम उम्र में खो दिया। उधम सिंह ने अपने भाई के साथ अपना अधिकांश बचपन अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में बिताया। अनाथालय में ही उन्होंने और उनके बड़े भाई ने सिख धर्म में अपना लिया। अनाथालय में लोगों ने दोनों भाइयों को नया नाम दिया। शेर सिंह बन गए उधम सिंह और उनके भाई मुख्ता सिंह बन गए साधु सिंह। अपने बचपन और किशोरावस्था के दौरान ही वो सिख धर्म की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे। उधम सिंह के साहस के किस्से उनके गांव में सुनाए जाते हैं। एक प्रसिद्ध घटना उसके बारे में है कि वह एक तेंदुए से उनके भिड़ंत की है, जब बकरियों पर हमला करने के लिए तेंदुआ उनके घर में घुस गया था। हालांकि सिंह की शिक्षा के बारे में स्पष्टता की कमी है। इतिहासकार नवतेज सिंह ने उधम सिंह की जीवनी में कहा है कि एक ब्रिटिश रिकॉर्ड में कहा गया है कि उन्होंने अमृतसर के खालसा कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी। हालाँकि, उधम सिंह ने खुद कहा है कि उन्होंने कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की है। नवतेज सिंह के अनुसार कुछ रिकॉर्ड उन्हें एक इलेक्ट्रीशियन बताते हैं वहीं कुछ अन्य ने उन्हें एक इंजीनियर होने के रूप में प्रलेखित किया है। लेकिन यह निश्चित है कि वह उर्दू और अंग्रेजी में धाराप्रवाह लिख सकते थे। गुरुमुखी में भी काफी अच्छी पकड़ थी। इसके साथ ही धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने में भी सक्षम थे।  
जलियांवाला बाग हत्याकांड और उधम सिंह की प्रतिज्ञा
13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के उत्सव के अवसर पर, रौलट एक्ट के तहत कुछ कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों का एक बड़ा समूह इकट्ठा हुआ। उधम सिंह अपने साथियों के साथ अनाथालय से उपस्थित लोगों के बीच पानी बांटने के लिए वहां मौजूद थे।  शाम के करीब पांच बजे के आसपास अमृतसर की सड़कों से होते हुए दो बख्तरबंद गाड़ियां जलियांवागा बाग के सामने एक सकड़ी गली के सामने रूकी। ब्रिटिश सरकार ने अपने जल्लाद अफसर जनरल डायर को अमृतसर भेज दिया। उसके बाद जो कुछ होता है वो ब्रिटिश हुकूमत में उससे पहले कभी नहीं हुआ। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को गोलियां चलाने का आदेश दिया और चीखते, भागते निहत्थे बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों की भीड़ पर 10 से 15 मिनट में 1650 राउंड गोलियां चलवा दीं। लोगो अपनी जान बचान के लिए इधर- उधर भागने लगे थे। यहां तक की लोग गोलियों से बचने के लिए बाग में मौजूद कुएं में भी कूद गए थे। बताया जाता है कि कुएं से कई लाशें निकाली गई थी। जिसमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, पुरुष शामिल थे। अनाथालय के उसके अन्य सभी मित्र मर गए। अपने दोस्तों के मरने की दृष्टि और चौतरफा नरसंहार का 20 वर्षीय उधम सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने संकल्प लिया कि “जिस डायर ने क्रूरता के साथ मेरे देश के नागरिको की हत्या की है इस डायर को मै जीवित नही छोडूंगा और यही मेरे जीवन का आखिरी संकल्प है। जलियांवाला बाग की घटना के बाद उधम सिंह ब्रिटिश सरकार के प्रति घृणा से भर गए थे। जैसा कि सिकंदर सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “जब उधम सिंह जनरल डायर और उनके कार्यों के बारे में बात करते तो उनकी आंखें क्रोध से लाल हो उठती। वह एक समर्पित क्रांतिकारी थे, जो ब्रिटिश राज का अंत करने के लिए दृढ़ थे। 

शहीद भगत सिंह को मानते थे अपना गुरु 
भगत सिंह की गतिविधियों से गहराई से प्रभावित होकर, वे 1924 में ग़दर पार्टी में शामिल हो गए। अमेरिका और कनाडा में रह रहे भारतीयों ने 1913 में इस पार्टी को भारत में क्रांति भड़काने के लिए बनाया था। क्रांति के लिए पैसा जुटाने के मकसद से उधम सिंह ने दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा भी की। भगत सिंह के कहने के बाद वे 1927 में भारत लौट आए। अपने साथ वे 25 साथी, कई रिवॉल्वर और गोला-बारूद भी लाए थे। जल्द ही अवैध हथियार और गदर पार्टी के प्रतिबंधित अखबार गदर की गूंज रखने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें पांच साल जेल की सजा हुई। जेल से छूटने के बाद भी पंजाब पुलिस उधम सिंह की कड़ी निगरानी कर रही थी। इसी दौरान वे कश्मीर गए और गायब हो गए। बाद में पता चला कि वे जर्मनी पहुंच चुके हैं. बाद में उधम सिंह लंदन जा पहुंचे।
 ओ’डायर पर चलाई गोलियां
लंदन में जाकर उन्होंने एक होटल में वेटर का काम किया ताकि कुछ ओर पैसे इकट्ठे कर बंदूक ख़रीदी जा सके। उनको ये सब काम करने में पूरे 21 साल लग गये । फिर भी उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला कम नही हुयी थी। लेकिन उधम सिंह अपनी योजनाओं को अमली जामा पहना पाते, इससे पहले जनरल डायर अपनी मौत मर गया, पर हत्याकांड का हुक्मनामा जारी करने वाला उसका बॉस यानी लेफ्टिनेंट गर्वनर सर माइकल ओ’डायर ज़िंदा था।  अल्फ़्रेड ड्रेपर अपनी किताब ‘अमृतसर-द मैसेकर दैट एंडेड द राज’ मे लिखते हैं, “12 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह ने अपने कई दोस्तों को पंजाबी खाने पर बुलाया था। भोजन के अंत में उन्होंने सबको लड्डू खिलाए। जब विदा लेने का समय आया तो उन्होंने एलान किया कि अगले दिन लंदन में एक चमत्कार होने जा रहा है, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिल जाएंगीं। 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह कैंथस्चन हॉल में एक मीटिंग में पहुंचे। उन्होंने किताब के पन्नों को रिवॉल्वर के शेप में काट लिया था और बक्से जैसा बनाया था। उससे उनको हथियार छिपाने में आसानी हुई। मीटिंग खत्म होने को थी तभी ऊधम सिंह ने स्टेज की तरफ गोलियां चलाई। वो जलियांवाला बाग कांड के वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ’डायर और सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडियन अफेयर्स लॉरेंस को मारना चाहते थे। ओ’डायर को दिल पर गोली लगी और उसकी मौत हो गई लेकिन लॉरेंस बच गया। अफरा तफरी के बीच ऊधम सिंह नहीं भागे।

उधम सिंह पर सुनवाई
हत्या के बाद के दिनों में, उधम सिंह उर्फ ​​आजाद कौन था, इसका पता लगाने के लिए पुलिस ने गहन छानबीन की। दरअसल नाम और धर्म को लेकर कन्फ्यूजन था। शुरुआत में मुहम्मद सिंह आजाद के नाम पर आरोप लगाया गया। बाद में अंग्रेज अफसरों को पता चला कि पासपोर्ट में असल नाम उधम सिंह था। पुलिस को डर था कि उधम सिंह राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अदालत में मुकदमे का इस्तेमाल कर सकते हैं, शहीद के रूप में और भारत और विदेशों में भारतीयों को समान अपराध करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। नतीजतन, जितना संभव हो सके जांच और परीक्षण के मीडिया प्रचार को सीमित करने का निर्णय लिया गया। ट्रायल 4 जून 1940 को सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट ओल्ड बेली के नंबर 1 कोर्ट में शुरू हुआ। नवतेज सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “लंदन में यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष सावधानी बरती गई कि प्रेस ने उधम सिंह की ‘वीरता’ को ‘अनुचित महत्व’ नहीं दिया जाए। 2 अप्रैल 1940 की उस रिपोर्ट में कहा गया, ‘उस भारतीय का कहना है, मरने के लिए तैयार हूं… मैं अपने देश के लिए जान दे रहा हूं। मुकदमा चला और ऊधम सिंह ने जेल में 42 दिन की भूख हड़ताल की। ओ ड्वायर केस में सुनवाई महज दो दिनों में पूरी कर दी गई। 4 जून को सुनवाई शुरू हुई, 5 जून को खत्म हो गई। 5 जून को अभियोजन पक्ष ने उधम सिंह से जिरह की। जस्टिस एटकिंसन की अदालत में उधम सिंह से क्लर्क ने कहा, ‘तुम्हें हत्या का दोषी ठहराया गया है। 31 जुलाई, 1940 को 40 साल की उम्र में उधम सिंह को हत्या, राष्ट्रद्रोह आदि- सर्वाधिक संगीन मामलों में सज़ा-ए-मौत दी गई। जस्टिस एटकिंसन की अदालत में उधम सिंह से क्लर्क ने कहा, ‘तुम्हें हत्या का दोषी ठहराया गया है। यह अदालत कानून के मुताबिक तुम्हें मौत की सजा क्यों न दे, इसके बारे में तुम्हें कुछ कहना है?’ उधम सिंह ने जवाब दिया, ‘हां, मुझे कहना है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो। वहां शांति कायम हो। फिर पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई थी। जब उनके ताबूत पर मिट्टी का आख़िरी फावड़ा डाला गया तो अंग्रेज़ों ने सोचा कि उन्होंने इसके साथ ही उनकी कहानी भी हमेशा के लिए दफ़न कर दी है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 1974 में सौंपे गए अवशेष
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जब ऊधम सिंह के अवेशष को लिए विमान ने भारतीय ज़मीन को छुआ तो वहाँ मौजूद लोगों की आवाज़ विमान के इंजन की आवाज़ से कहीं अधिक थी। दिल्ली हवाई अड्डे पर उनका स्वागत ज्ञानी ज़ैल सिंह और शंकरदयाल शर्मा ने किया, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। संयोग देखिए कि 31 जुलाई को ही उधम सिंह को फांसी हुई थी और 1974 में इसी तारीख को ब्रिटेन ने इस क्रांतिकारी के अवशेष भारत को सौंपे। उनके अवेशष को कपूरथला हाउस ले जाया गया, जहाँ उनके स्वागत के लिए इंदिरा गांधी मौजूद थीं।देश के बाहर फांसी पाने वाले उधम सिंह दूसरे क्रांतिकारी थे। उनसे पहले मदन लाल ढींगरा को कर्ज़न वाइली की हत्या के लिए साल 1909 में फांसी दी गई थी।  2018 में जलियाँवाला बाग़ के बाहर ऊधम सिंह की मूर्ति लगाई गई। उसमें उनको अपनी मुट्ठी में ख़ून से सनी मिट्टी को उठाए हुए दिखाया गया है।

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