चीन ताइवान के बीच बढ़ता तनाव और युद्ध की आशंका

अभिनय आकाश

ताइवान और चीन के बीच दशकों से तनाव है। चीन जबरन तरीके से ताइवान पर कब्जा करना चाहता है, ये हकीकत भी पूरी दुनिया को पता है। जिस तरीके से एक छोटे से मुल्क को चीन डराने धमकाने में लगा है वो हैरान करने वाला है। पिछले एक साल से ड्रैगन की सेना ताइवान के इलाके में घुसपैठ कर रही है।

कूटनीति का एक मशहूर फॉर्मूला है साम, दाम, दंड, भेद। ताइवान को हासिल करने के लिए चीन यही कॉम्बिनेशन इस्तेमाल कर रहा है। चीन के लड़ाकू विमान बीते कई दिनों से ताइवान की सीमा में घुसकर स्टंट दिखा रहे हैं। इस शक्ति प्रदर्शन में दोनों देशों के बीच समुंदर में खींची एक संवेदनशील लकीर को भी लांघा। ये लकीर चीन और ताइवान के बीच का अनाधिकारिक बॉर्डर है। ताइवान ने चीन की हरकत पर ऐतराज जताया। इस पर चीन ने जवाब दिया कैसी सीमा, कौन सी सीमा ये क्या मामला है? चीन और ताइवान के बीच का ये झगड़ा क्या है? हमारे पड़ोस का देश अब किस मोर्चे पर गुंडागर्दी कर रहा है। आज आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं। साथ ही बताते हैं चीन और ताइवान के बीच क्या है पुराना झगड़ा और इसकी पृष्ठभूमि।

सबसे पहले शुरुआत करते हैं कि क्यों चीन ताइवान विवाद इन दिनों चर्चा में है। दरअसल, ताइवान और चीन के बीच दशकों से तनाव है। चीन जबरन तरीके से ताइवान पर कब्जा करना चाहता है, ये हकीकत भी पूरी दुनिया को पता है। जिस तरीके से एक छोटे से मुल्क को चीन डराने धमकाने में लगा है वो हैरान करने वाला है। पिछले एक साल से ड्रैगन की सेना ताइवान के इलाके में घुसपैठ कर रही है। चाहो वो जमीन पर हो समुंदर में हो या आसमान में लगातार तीनों फ्रंट से ड्रैगन की उकसावे वाली हरकतें सामने आई है। लेकिन अब ताइवान के आसमान में ऐसा हुआ जिसकी वजह से पूरे मुल्क में खलबली मच गई है। एक साथ 39 लड़ाकू विमान ताइवान के एयर स्पेस में दाखिल हुए। वो भी बम, गोला-बारूद और मिसाइलों के साथ। चीनी फाइटर पायलट्स ने पीएलए ईस्टर्न थियेटक कमांड से मिले ऑर्डर के बाद घुसपैठ में अपने सबसे विस्फोटक घातकआसमानी लड़ाकों के साथ घुसपैठ की। जिन चीनी विमानों ने ताइवान में एंट्री ली थी उनमें से ज्यादातर की पहचान जे-17 और सू-30 फाइटर जेट के रूप में की गई। चीनी सरकार के प्रोपोगेंडा चलाने वाली पेईचिंग न्यूज वेवसाइट के अनुसार चीन का मकसद 2025 तक ताइवान पर कब्जा कर लेना है। 
कितना पुराना है विवाद
चीन के साथ ताइवान का पहला संपर्क साल 1683 में हुआ था जब ताइवान, क्विंग राजवंश के नियंत्रण में आया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसकी भूमिका पहले चीन-जापान युद्ध (1894-95) में सामने आई, जिसमें जापान ने क्विंग राजवंश को हराया था और ताइवान को अपना पहला उपनिवेश बनाया। इस पराजय के बाद चीन कई छोटे छोटे भागों में टूटने लगा। उस दौर में चीन के बड़े नेता सुन् यात-सेन हुआ करते थे जो सभी भागों को जोड़कर पूरे चाइना को एक देश बनाना चाहते थे। चीन को एक करने के लिए सुन् यात-सेन ने 1912 में कुओ मिंगतांग पार्टी का गठन किया और रिपब्लिक ऑफ चाइना वाले अपने अभियान में वो काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन 1925 सुन् यात-सेन की मौत हो गई। उनकी मृत्यु के बाद कुओ मिंगतांग पार्टी दो भागों में बंट गई एक बनी नेशनलिस्ट पार्टी और दूसरी कम्युनिस्ट। नेशनलिस्ट पार्टी जनता को ज्यादा अधिकार देने की पक्षधर थी। जबकि कम्युनिस्ट का मानना था कि सरकार तय करेगी की कैसे शासन करना है। नेशनलिस्ट पार्टी पूरी तरह से उदारवादी परिकल्पना पर आधारित था जबकि उसके वनस्पद कम्युनिस्ट वन मैन शो यानी पूरी तरह से डिक्टेटरशिप पर आश्रित था। यहीं से चीन के अंदर महायुद्ध की शुरुआत होती है। 1927 में शंघाई शहर में नेशनलिस्ट पार्टी के लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी के लाखों लोगों का नरसंहार कर दिया, इसे शंघाई नरसंहार के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन इसने ही गृह युद्ध का रूप ले लिया। ये गृह युद्ध 1927 से लेकर 1950 तक चला। चीन के इस आपसी संघर्ष का फायदा चीन ने उठाया और इसके एक बड़े शहर मंचूरिया पर कब्जा कर लिया। जापान ने वहां पर अत्याचार किया। लेकिन तब दोनों पार्टी के लोगों ने जापान के हमलों के खिलाफ एक साथ होकर इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। दूसरे विश्व युद्ध में दोनों ने जापान के खिलाफ मिलकर लड़ाई की थी। 1945 में जापान हारकर बाहर चला गया। उसे ताइवान पर से भी अपना दावा छोड़ना पड़ा। जापान के जाने के बाद दोनों पार्टियों के बीच फिर से सिविल वॉर शुरू हो गया।  पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी चीन और ताइवान। इन दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी यानी माओ त्देसेंग का शासन था। जबकि ताइवान पर नेशनलिस्ट कुओमिन्तांग यानी चियांग काई शेक का शासन था। चियांग काई शेक और माओ ज़ेदोंग के बीच चीन पर कब्जे को लेकर जंग छिड़ गई, जिसमें कम्युनिस्ट जीत जाते हैं। कहा जाता है इसमें  कम्युनिस्ट की मदद रूस ने की। उन्होंने कुओमिन्तांग को ताइवान में समेट दिया। चियांग काई शेक  अपने समर्थकों के साथ फ़ॉरमोसा द्वीप चले जाते हैं। इसे ही ताइवान के नाम से जाना जाता है। ये द्वीप पेइचिंग से लगभग दो हज़ार किलोमीटर दूर था। लेकिन इन सब के बावजूद माओ की इच्छा फिर भी पूरी नहीं हुई और वो ताइवान को भी कम्युनिस्ट बनाना चाहता था। समय-समय पर झगड़ा चलता रहा लेकिन चीन अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसकी एक बड़ी वजह थी कि ताइवान के पीछे अमेरिका खड़ा था। 

चीन पर एटम बम गिराने वाला था अमेरिका?
कोरिया वॉर के दौरान अमेरिका ने ताइवान को न्यूट्रल इलाका घोषित किया था। इसके साथ ही उसने एक नौसैनिक बेरा भी ताइवान में तैनात किया। ये इलाका चीन को रोकने के लिए अहम था। इसके अलावा अमेरिका चीन को आर्थिक मदद भी दे रहा था। 1953 में जब कोरिया वॉर खत्म हो गया तो अमेरिका ने अपना बेरा वापस बुला लिया। चीन तो जैसे इसी मौके की ताक में था। उसने ताइवान पर हमला कर दिया। ताइवान की हार निश्चित थी और ऐसे में फिर से अमेरिका की एंट्री होती है। उसने ताइवान के साथ सुरक्षा संधि की और वादा किया कि अगर चीन ने हमला किया तो हम मदद करने आएंगे। मदद का ये पहला मौका आया 1954-55 में जब सात महीने चली लड़ाई के दौरान चीन हावी रहा। उसने कुछ विवादित द्वीपों पर कब्जा भी जमाया। लेकिन ताइवान को पूरी जीतने में नाकाम रहा। चार साल बाद अगस्त 1959 में चीन ने असरदार तरीके से ताइवान पर आक्रमन किया। चीन ने ताइवान की राजधानी ताइपे के सुरक्षा चक्र को भेदना शुरू कर दिया था। अमेरिका को डर था कि कहीं चीन अपने मंसूबे में कामयाब न हो जाए। तब अमेरिकी वायुसेना के चीफ ऑफ स्टॉफ नैथन ट्विनिंग ने एटम बम गिराने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि शुरुआत में कम क्षमता वाले बम गिराए जाए ताकि चीन की एयरफील्ड को तबाह किया जा सके। अगर चीन फिर भी हमले बंद नहीं करता तो फिर चीन के अंदर उत्तर में शंघाई तक जाकर परमाणु हमला करने के लिए कोई और विकल्प नहीं था। उस वक्त चीन के पास ज्ञात परमाणु हथियार नहीं थे लेकिन उसकी तरफ से सोवियत संघ के आने की आशंका थी। अमेरिका को ये भी डर था कि सोवियत संघ कहीं पर भी हमला कर सकता है और तब तीसरा वर्ल्ड वॉर भी शुरू हो सकता है। अमेरिकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़  इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डी आइज़नहॉवर ने पारंपरिक हथियारों पर भरोसा करने का फ़ैसला किया। आखिरकार 6 अक्टूबर 1958 को दोनों देशों के बीच युद्धविराम हो गया। 
यूएन ने शुरुआत में चीन को मान्यता ही नहीं दी
1945 में जब UN बना, तब मेनलैंड चीन ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ हुआ करता था। वो UN के शुरुआती सदस्यों में था। शुरुआत में च्यांग काई-शेक वाले चीन यानी ताइवान को मान्यता मिली थी। 10 अक्टूबर को ताइवान ‘राष्ट्रीय दिवस’ के तौर पर सेलिब्रेट करता है। 25 अक्टूबर, 1971 को UN ने ताइवान को निकालकर कम्युनिस्ट चीन को अपना लिया। अमेरिका को लगा कि अगर चीन हमारे साथ रहा तो बेनिफ़िट हो सकता है. यही सोचकर 1978 में उसने भी चीन को मान्यता दे दी।
वन चाइना पॉलिसी
1992 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमितांग के बीच एक समझौता हुआ था। इसमें ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर सहमति बनी थी। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि ताइवान और चीन एक ही है. हालांकि, दोनों पक्षों को इस बात की आज़ादी थी कि वे ताइवान वाले रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को मानें या कम्युनिस्ट चाइना को। साल 2005 में चीन ने एंटी-सेशेसन लॉ लागू किया। इस कानून में था कि अगर ताइवान ने अलग होने की कोशिश की तो चीन के पास हिंसक तरीके अपनाने का पूरा अख़्तियार होगा। मतलब ये कि चीन, ताइवान को रोकने के लिए ताक़त का इस्तेमाल कर सकता है। 2016 के चुनाव में बड़ा मोड़ आया। इस साल के राष्ट्रपति चुनाव में कुओमितांग की ज़बरदस्त हार हुई। साइ इंग-वेन के नेतृत्व में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ने सरकार बनाई। डीपीपी की पॉलिसी साफ़ है। वे ताइवान को संप्रभु देश मानते हैं। वे चीन के साथ एकीकरण की संभावनाओं से इनकार करते हैं। वहीं अमेरिका की तरफ से भी ताइवान को हर संभव मदद का भरोसा दिया जाता है। ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव जीता तो उसके बाद साई की तरफ से उन्हें फोन करके बधाई दी गई थी। 2020 में फिर से डीपीपी ने जीत दर्ज की और इधर 2021 में जो बाइडन सत्ता में आए। उन्होंने भी ट्रंप की ताइवान पॉलिसी को ही आगे बढ़ाया है।
चीन और ताइवान के बीच संबंध
इस साल की शुरुआत में चीन ने ‘हानिकारक जीवों’ से अपनी फसलों के नुकसान की आशंका को देखते हुए ताइवान से अनानासों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। ताइवान ने इन दावों को खारिज कर दिया और कहा कि यह चीन के लिए ताइवान पर दबाव बनाने का एक तरीका है। ताइवान के राष्ट्रपति, त्साई इंग-वेन ने उस समय एक ट्वीट में कहा, “ऑस्ट्रेलियाई शराब के बाद, अनुचित चीनी व्यापार प्रथाएं अब ताइवान अनानास को लक्षित कर रही हैं। लेकिन यह हमें नहीं रोकेगा। चाहे स्मूदी में हो, केक में, या प्लेट में ताजा कटा हुआ हो, हमारे अनानास हर मौके पर आते हैं। हमारे किसानों का समर्थन करें और स्वादिष्ट ताइवानी फलों का आनंद लें! चीन ने पिछले वर्ष ऑस्‍ट्रेलिया से नाराजगी बढ़ाते हुए उसके यहां से आयातित वाइन (मदिरा) पर दो सौ प्रतिशत से भी अधिक तक का दंडात्मक शुल्क लगा दिया था।  लगभग उसी समय जब चीन ने शराब के आयात पर शुल्क लगाने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया से गोमांस के आयात पर भी कर लगाया था। इस कदम की काफी आलोचना भी की गई थी। 
अमेरिका की चेतावनी
चीन के उकसावे वाली हवाई प्लानिंग पर अमेरिका भी भड़क गया है और उसने चीन को चेतावनी दे दी है। अमेरिका ने इस मामले पर चीन से उसकी उकसाने वाली सैन्य गतिविधियों को रोकने के लिए कहा है। अमेरिका ने अपने बयान में कहा कि हम बीजिंग से अपील करते हैं कि वह ताइवान पर सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक दबाव और दंडात्मक कार्रवाई रोके। 
चीन के हालिया ताइवान के एयरस्पेस में उकसावे वाली हरकत के बीच सबसे बड़ा सवाल कि क्या चीन ताइवान पर आक्रमण करेगा? भविष्य में चाहे जो हो, एक आक्रमण की लागत बहुत अधिक है- न केवल वित्तीय बल्कि डिप्लोमैटिक भी। ताइवान पर आक्रमण चीन को दुनिया का सार्वजनिक दुश्मन नंबर एक बना देगा।

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