योगी ने की अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग तो अमित शाह ने थमाया 4 हजार करोड़ का बिल, CAPF की तैनाती पर राज्यों को क्यों देना पड़ता है पैसा?

अभिनय आकाश 

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों यानी की सीएपीएफ की तैनाती की मांग की। जिसको लेकर इसे गृह मंत्रालय की तरफ से मंजूरी भी मिल गई।

आपको अगर अचानक चाय की तलब लगे और जब चाय बनाने के लिए जाएं तो देखें कि चाय की पत्ती तो खत्म हो गई है। फिर आप भागते हुए परचुन की दुकान पर जाते हैं और उससे चाय की पत्ती लेने के बाद कहते हैं इसे खाते में लिख लो। जवाब में परचुन की दुकान वाला आपसे पुराने बिल का तगादा करते हुए कहता है पुराना हिसाब कब चुका रहे हो? आज की कहानी का संबंध किसी चाय और उसकी पत्ती को लेकर नहीं है बल्कि एक राज्य के मुख्यमंत्री और देश के गृह मंत्रालय से जुड़ा है। अभी लखीमपुर के हालात को लेकर तो आप तमाम तरह की खबरे टीवी और सामाचर पत्रों में पढ़ ही रहे होंगे। आजकल ये राजनेताओं का फेवरेट पॉलिटिक्ल स्पॉट भी बना हुआ है। लखीमपुर के तनावपूर्ण हालात के मद्देनजर सूबे की सुरक्षा व्यवस्था को कायम रखने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों यानी की सीएपीएफ की तैनाती की मांग की। जिसको लेकर इसे गृह मंत्रालय की तरफ से मंजूरी भी मिल गई और इसके बाद इलाके में रेपिड एक्शन फोर्स और सशस्त्र सीमा बल की दो-दो कंपनी को यहां तैनात किया गया। लेकिन इसके साथ ही अमित शाह के नियंत्रण वाले मंत्रालय की तरफ से योगी सरकार को 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के बकाया बिल का तगादा भी कर दिया। आखिर किस बात का था ये बिल, जिसे चुकाने के लिए योगी सरकार को कहा गया? दरअसल, राज्य में कानून व्यवस्था बरकरार रखने के लिए किसी इलाके में गृह मंत्रालय की ओर से सीएपीएफ की तैनाती की जाती है और राज्य सरकारों को इसका भुगतान केंद्र सरकार को करना होता है। ऐसे में जानते हैं आखिर इसके क्या नियम हैं।

क्या होता है CAPF?
सबसे पहले आपको केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल यानी सीएपीएफ के बारे में बताते हैं। सीएपीएफ के तहत भारत में पांच पुलिस सशस्त्र बल है। ये गृहमंत्रालय के अंदर आता है। इसका रक्षा मंत्रालय से कोई भी संबंध नहीं है। इसका मुख्य कार्य किसी भी राज्य में हुए दंगे–फसाद, सीमा में हुई झड़प या फिर उग्रवाद जैसी घटनाओं में राज्य की सहायता करना है। सीएपीएफ का नेतृत्व आर्मी कमांडर्स के बजाय आइपीएस ऑफीसर्स करते हैं। जूनियर और मिडिल रैंक के अधिकारियों की सीधी भर्ती की जाती है। वरिष्ठ पदों पर ज्यादातर अधिकारी आईपीएस से आते हैं सीएपीएफएस से भी कुछ अधिकारियों की वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति होती है।
कितना देना होता है चार्ज?
पहले आपको बता दें कि एक सीएपीएफ कम्पनी में 100 जवान होते हैं और इन जवानों की तैनाती पर राज्य सरकार को केंद्र सरकार को पैसे देने होते हैं। यह रेट राज्य की कैटेगरी के आधार पर निर्भर करता है, जैसे जनरल कैटेगरी स्टेट से अलग चार्ज लिए जाते हैं और अन्य राज्यों के लिए अलग चार्ज होता है। साल 2020-21 में जनरल कैटेगरी स्टेट के लिए 15.40 करोड़ रुपये चार्ज किए गए। वहीं, साल 2021-22 में 17.36 करोड़, 2022-23 में 19.65 करोड़ और 2023-24 में 22.30 करोड़ रुपये चार्ज किए जाएंगे। इतना ही नहीं, ये चार्ज देने के लिए एक निश्चित अवधि होती है और अगर उस अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है तो 2.5 फीसदी के हिसाब से एक्स्ट्रा चार्ज भी लिया जाता है।

सरकार ने राज्यों में सीएपीएफ की तैनाती के लिए शुल्क घटाया
साल 2019 में मोदी सरकार ने सांप्रदायिक तनाव और उग्रवाद से संबंधित हिंसा सहित विभिन्न कानून और व्यवस्था के कर्तव्यों के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की तैनाती के लिए राज्यों के लिए शुल्क में काफी कमी की थी। संशोधित दरों के अनुसार, एक सामान्य श्रेणी के राज्य को वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान सात-कंपनी बटालियन की तैनाती के लिए केंद्र सरकार को सालाना 13.7 करोड़ रुपये का शुल्क देना होता था, जिसमें परिवहन की वास्तविक लागत और बलों की आवाजाही शामिल नहीं है। 2018-19 के दौरान शुल्क 52.40 करोड़ रुपये था। CAPF की एक कंपनी में लगभग 100 कर्मी होते हैं। वित्तीय वर्ष 2020-21, 2021-22, 2022-23 और 2023-24 के लिए सामान्य श्रेणी के राज्यों में समान संख्या में सैनिकों की तैनाती का शुल्क 15.40 करोड़ रुपये, 17.36 करोड़ रुपये, 19.65 करोड़ रुपये और 22.30 करोड़ रुपये होगा। वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2017-18 तक पांच प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ राशि निर्धारित की गई थी। वित्तीय वर्ष 2014-15, 2015-16, 2016-17 और 2017-18 के लिए तैनाती शुल्क क्रमशः 43.10 करोड़ रुपये, 45.26 करोड़ रुपये, 47.52 करोड़ रुपये और 49.90 करोड़ रुपये था। उच्च जोखिम और मध्यम कठिनाई वाले क्षेत्रों में तैनात एक सीएपीएफ बटालियन के लिए प्रति वर्ष राशि 25.18 (2019-20), 26.88 करोड़ रुपये (2020-21), 28.85 करोड़ रुपये (2021-22), 31.13 करोड़ रुपये (2022-) होगी। 23) और 33.78 करोड़ रुपये (2023-24) रखी गई। 2014-15 और 2018-19 के बीच उच्च जोखिम, उच्च कठिनाइयों या मध्यम कठिनाइयों का कोई वर्गीकरण नहीं था।
राज्य सरकार को क्यों करना पड़ता है भुगतान
गृह मंत्रालय की तरफ से तैयार की गई पंच वर्षीय नीति के अंतर्गत राज्यों को संवेदनशील या ज्यादा जोखिम वाले स्थानों में केंद्रीय बलों की तैनाती के लिए 34 करोड़ रुपये चुकाने होते हैं। ये सारा पैसा केंद्रीय बलों की ट्रेनिंग और अन्य जरूरतों पर खर्च होता है। जिसका भुगतान एक नियमित प्रक्रिया के तहत सभी राज्यों से केंद्र सरकार वसूल करती है। जहां भी केंद्रीय बलों को भेजा जाता है। ये पैसा महीने अथवा सालाना की दर से लिया जाता है। भुगतान में देरी की वजह से गृह मंत्रालय के कोष पर अतिरिक भारी पड़ता है।
यूपी सरकार पर है कितना बकाया?
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर योगी सरकार की तरफ से केंद्र से अतिरिक्त फोर्सेज की मांग की गई लेकिन इसके जवाब में गृह मंत्रालय की ओर से बकाया 4 हजार करोड़ का भुगतान करने को कहा गया। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार सीएपीएफ की तैनाती के साथ ही होम मिनिस्ट्री ने एक चिट्ठी भी लिखी है। इसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों की पिछली तैनाती का बिल का भुगतान करने को कहा गया है। ये पिछले कई साल से बकाया है। चिट्ठी में लिखा गया है। “हम यूपी सरकार से केंद्रीय पुलिस बलों की तैनाती के लिए 4,084 करोड़ रुपये के बिल का भुगतान करने का आग्रह करते हैं। यह बिल 1 जुलाई 2021 तक का है”। गौरतलब है कि राज्य में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव में केंद्रीय बलों की ज्यादा से ज्यादा जरूरत होगी, जिसकी तैयारी में पहले से ज्यादा बिल बढ़ने की संभावना है। ऐसे में गृह मंत्रालय बकाया राशि का जल्दी भुगतान चाहता है।

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