सार्थक संबंधों की धूमिल होती आस

कुलदीप नैयर

मौजूदा दौर से दोनों देशों के रिश्तों को कौन सी दिशा मिलेगी? यह काफी हद तक डीजीएमओ और सैन्यबलों के शीर्ष अधिकारियों के बीच सीमा पर होने वाली बैठक के परिणामों पर निर्भर करेगा। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज का भी कहना है कि एनएसए स्तर की बैठक रद्द होने के बाद उम्मीद है कि अन्य स्तरों पर होने वाली द्विपक्षीय मुलाकातें निर्धारित समय पर होंगी। सौभाग्यवश बीएसएफ और रेंजर्स प्रमुखों के मध्य मुलाकात निर्धारित की गई है। इसके बावजूद हैरानी होगी कि मुख्य वार्ता के टलने के बाद इस बैठक में कोई प्रभावी निष्कर्ष निकल पाएगाज्मेरा आकलन है कि भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर होने वाली वार्ता को लेकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मन में पहले से ही कुछ अन्य विचार चल रहे थे। अगर ऐसा नहीं है, तो इस वार्ता के रद्द होने से पहले वह उचित हस्तक्षेप करते हुए बताते कि रूस के उफा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वह स्वयं इस मुलाकात के लिए राजी हुए थे। उस दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्री आतंकवाद के मसले पर कोई सार्थक संवाद के लिए तैयार हुए थे, जो कि दोनों ही देशों में खून बहाता रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना ने इस वार्ता को रद्द करवाने के लिए दबाव बनाया। लेकिन इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। अगर पाकिस्तान सेना प्रमुख को दोनों देशों के बीच इस स्तर की बैठक मंजूर न होती, तो इस मुलाकात की तारीख ही तय नहीं होती। इस संदर्भ में पाकिस्तानी सेना की आलोचना करना किसी भी कोण से जायज नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों द्वारा जारी किए गए साझा बयान में ‘कश्मीर’ शब्द का जिक्र नहीं किया गया था। पाकिस्तान के उपद्रवी तत्त्वों को यह बात रास नहीं आई। इन्हीं लोगों ने दोनों देशों के बीच होने वाली इस बैठक को रद्द करवाने के लिए दबाव बनाया था, क्योंकि इसमें कश्मीर मुद्दे पर बातचीत को शामिल नहीं किया गया था। यहां रणनीतिक तौर पर भी पाकिस्तान गलत माना जाएगा। आतंकवाद पर बातचीत के दौरान भी पाकिस्तान कश्मीर पर बात कर सकता था। तब यदि भारत बैठक छोडक़र चला जाता तो इससे वैश्विक समुदाय की नजरों में भारत की साख कम होती। दुर्भाग्यवश इस पूरे घटनाक्रम से यही संदेश जाता है कि भारत और पाकिस्तान के मध्य कभी भी वार्ता होने की संभावना नहीं है। स्वाभाविक तौर पर मुलाकात के रद्द होने से दोनों देशों के लोगों में हताशा पैदा हुई है। उन्हें उम्मीद थी कि दोनों देशों के बीच बढ़ रहे तनाव के बीच शायद इस बैठक से हालात सामान्य हो जाते। इसके अतिरिक्त नियंत्रण रेखा और सीमा से सटे क्षेत्रों में गोलीबारी से हालात जिस तरह बिगड़े हैं, शायद उसका भी कोई हल इस बैठक से निकल पाता। वार्ता रद्द होने का फैसला उन किसानों के लिए भी किसी त्रासदी सरीखा है, जिनकी जमीनें सीमा के साथ सटी हुई हैं। वार्ता का टूटना दोनों देशों के मध्य एक खालीपन सा तैयार कर देगा जिससे इनमें सौहार्दपूर्ण संबंधों के लिए शायद कुछ और वक्त लग जाएगा। भारत-पाक संबंधों में सुधार को लेकर कुछ और महीनों का इंतजार बढ़ गया है। इसके विपरीत न्यूज चैनलों ने इसके जरिए सक्रिय होने का मौका मिल गया और अपने लाभ के लिए इस खबर का भरपूर उपयोग किया। नवाज शरीफ पाकिस्तानी सेना और देश की उपद्रवी ताकतों को इस बात के लिए राजी नहीं कर सकते कि भारत-पाक के बीच होने वाली वार्ता में कश्मीर मद्दे को दरकिनार करके महज आतंकवाद के मुद्दे तक सीमित किया जाए। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बैठक के बाद जब साझा बयान में कश्मीर का जिक्र नहीं किया गया, तो पाकिस्तान में सेना और उपद्रवी तत्त्वों के तीखे विराधी तेवर देखने को मिले। मौजूदा दौर से दोनों देशों के रिश्तों को कौन सी दिशा मिलेगी? यह काफी हद तक डीजीएमओ और सैन्यबलों के शीर्ष अधिकारियों के बीच सीमा पर होने वाली बैठक के परिणामों पर निर्भर करेगा। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज का भी कहना है कि एनएसए स्तर की बैठक रद्द होने के बाद उम्मीद है कि अन्य स्तरों पर होने वाली द्विपक्षीय मुलाकातें निर्धारित समय पर होंगी। सौभाग्यवश बीएसएफ और रेंजर्स प्रमुखों के मध्य मुलाकात निर्धारित की गई है। इसके बावजूद हैरानी होगी कि मुख्य वार्ता के टलने के बाद इस बैठक में कोई प्रभावी निष्कर्ष निकल पाएगा। पाकिस्तान की तरफ से आवाजें आने लगी हैं कि दोनों पक्षों के बीच एक मध्यस्थ की जरूरत है। लेकिन अगर ऐसा होता है, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते का उल्लंघन माना जाएगा। 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने के वक्त पाकिस्तान के 90 हजार सैनिक भारत में बंदी थे। उस दौरान पाकिस्तान ने समझौता किया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी मसले के समाधान के लिए किसी तीसरे पक्ष का सहारा नहीं लिया जाएगा। दूसरा यह कि विश्व मानचित्र पर ऐसा कौन सा मुल्क है, जिसे परोपकारी माना जाए। अगर किसी तीसरे देश को इस मसले को सुलझाने के लिए कहा जाता है, तो वह अपने हितों को केंद्र में रखते हुए एक अलग नजरिए से इसका समाधान करना चाहेगा। दिल्ली-इस्लामाबाद के बीच निर्बाध संवाद का कोई अन्य विकल्प नहीं है। यह भी वास्तविकता है कि इस संदर्भ में अब तक हुए प्रयासों से कुछ भी ठोस निकलकर सामने नहीं आ सका है। इसके बावजूद युद्ध किसी भी समस्या को समाधान नहीं है, विशेषकर तब, जबकि दोनों देश परमाणु शक्ति से संपन्न हैं। मोदी और शरीफ दोनों ही न्यूयार्क में यूएन की आम सभा के उद्घाटन सत्र में मौजूद रहेंगे।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *