आइए जानते हैं एक रहस्यमई बीमारी हवाना सिंड्रोम के बारे में

अभिनय आकाश 

ट्रंप और बिडेन प्रशासन के कुछ अधिकारियों का मानना ​​​​है कि हमलों के लिए रूसी खुफिया जिम्मेदार है, लेकिन अभी तक इसके कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। सरकारी एजेंसियां ​​हाल के दिनों में हुई घटनाओं के बारे में चेतावनी देती रही हैं।

1972 के साल में एक फिल्म आई थी- गोरा और काला। इस फिल्म का एक गाना बहुत मशहूर हुआ था “धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले”। आनंद बख्शी ने ये गाना लिखा तो प्रेमियों के लिए था लेकिन सीक्रेट सर्विसेज में काम करने वाले लोग इस गाने को बहुत पसंद करते हैं। और पसंद क्या करते हैं गुनते भी हैं और जीते भी हैं। क्योंकि इनके बीच जानकारी का लेन-देन खूब होता है जिसे लेकर हमेशा डर भी रहता है कि कोई सुन न ले। जासूसी की दुनिया में बहुत कुछ होता है। हम लोग जासूसी की कहानियां सुनते हैं। अलग-अलग देशों की सीक्रेट सर्विसेज हैं। सभी की अपनी-अपनी अलग-अलग कहानियां हैं। लेकिन अगर देखा जाए तो दुनियाभर की खुफिया एजेंसियां और उनसे जुड़े लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर देश के लिए काम करते हैं। आपका सच जमाने के सामने न आए। नहीं तो उनके साथ उनके परिवार की जान को खतरा हो जाता है। बहुत सारी हॉलीवुड की फिल्में आई हैं जिसमें ये दिखाया गया है कि जासूसों कि गोपनीय लिस्ट लीक हो गया और वो एक-एक कर मारे जाते हैं। जासूसी पर अजीब-अजीब तरीके से हुए हमलों की कहानियों से भरे-पड़े हैं। आज की कहानी जासूसी के ऊपर हमले की कहानी है। एक रहस्मयी हमला जिसमें एक रहस्यमयी बीमारी या फिर कहे कि एक खास तरह का सिंड्रोम जो केवल एक खास किस्म के लोगों को ही अपना शिकार बनाता है। आखिर ‘हवाना सिंड्रोम’ है क्‍या और क्‍यों अमेरिका के लिए अब तक यह पहेली ही बना हुआ है, आइए समझते हैं।

क्यूबा में अमेरिकी दूतावास
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के बारे में सभी जानते हैं। अमेरिका खुद को सुपरपॉवर कहता है तो पूरी दुनिया को कंट्रोल में रखने के लिए उसके जासूस दुनियाभर में फैले हैं। हर देश की अंदरूनी राजनीति में अमेरिका का दखल शुरू से ही रहा है। इस कहानी की शुरुआत होती है क्यूबा से। अमेरिका के साथ कभी अच्छे रिश्ते रहे नहीं। कास्त्रो की जब तक सरकार रही अमेरिका उसे मान्यता नहीं देती रही। 1953 में क्यूबा में एक क्रांति शुरू हुई थी। जब क्रांति शुरू हुई थी तो वहां की फुलखेंशियो बतीस्ता सरकार को अमेरिका का समर्थन था। क्यूबा के फिदेल कास्त्रो की अगुवाई में वहां एक क्रांति शुरू हुई। लेकिन अमेरिका की तमाम कोशिशों के बावजूद साल 1959 में क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता को सत्ता से हटाकर फ़िदेल कास्त्रो ने क्यूबा में कम्युनिस्ट सत्ता कायम की। इसके बाद फ़िदेल कास्त्रो को करीब चार दशक तक अमरीका विरोधी के तौर पर देखा गया। उसी दौर में अमेरिका ने क्यूबा में अपने छह मंजिला इमारत में अमेरिकी दूतावास था। वहीं छठी मंजिल पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के जासूस काम करते थे। क्यूबा के साथ अमेरिका के रिश्ते करीब आधी सदी बाद 20 जुलाई 2015 को वापस बहाल हुआ। बराक ओबामा की सरकार आने के बाद क्यूबा के साथ नए रिश्ते की शुरुआत होती है। ओबामा मार्च 2016 में क्यूबा भी पहुंचे। 1928 के बाद ये पहली बार था जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति का क्यूबा दौरा हुआ हो। फिर 2016 में डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बनते हैं। क्यूबा को लेकर उनकी राय-सोच जगजाहिर थी। इससे पहले की क्यूबा को लेकर ट्रंप कोई कदम उठाते उनके सत्ता संभालने के महज 17 दिनों के भीतर ही 25 नवंबर, 2016 को कास्त्रो की मौत हो जाती है। कास्त्रो की मौत पर ट्रंप ने बयान जारी करते हुए कहा था कि करीब छह दशक तक अपने ही लोगों पर अत्याचार करने वाले एक क्रूर तानाशाह का अंत हुआ।

30 दिसंबर 2016 से ये कहानी शुरू होती है। जब क्यूबा के हवाना में अमेरिकी दूतावास में काम करने वाले एक कर्मचारी अपने ऑफिस के मेडिकल टीम के पास जाकर बताता है कि रात को उसके साथ कुछ अजीब सी चीज हुई। उसे लगा कि उसके सिर पर कोई भारी चीज से हमला हुआ है लेकिन चोट के कोई निशान नहीं हैं। इसके बाद उसे बहुत तेज चीखने की आवाज सुनाई दे रही है व सिर में तेज दर्द है। वो शख्स सीआईए का एजेंट था। पहले तो मेडिकल टीम के लोगों को सीआईए एजेंट की बातें अजीब सी लगी और उसने उसे दवाई दे दी। लेकिन एजेंट ने अपने साथियों से पूरे घटनाक्रम का जिक्र किया। लेकिन दूतावास के लोगों ने इस बात को गंभीरता से लिया नहीं और उन्हें लगा कि ये एक वहम मात्र है और कुछ नहीं। जनवरी 2017 को हवाना के इसी दूतावास में काम करने वाला एक अफसर ऐसी ही शिकायत लेकर मेडिकल टीम के पास पहुंचा। उसके साथ ही वहीं सेम समस्या थी सिर पर तेज भार वाली चीज से प्रहार और तेज आवाजे सुनाई देना, चक्कर आना। जिसके बाद इसे गंभीरता से लिया गया और उन्हें लगा कि मामला कुछ तो है। अभी इसको लेकर चर्चा शुरू ही हुई थी कि 15 दिनों के भीतर ही एक-एक कर ऐसी ही शिकायत के साथ कई सीआईए एजेंट वहां पहुंचने लगे। सभी के साथ जो कॉमन बात थी कि इन्हें ये घर के अंदर ही ये सारी चीजें महसूस हुई। इन सभी ने दरवाजा खोला और देखा वहां कुछ नहीं था। करीब दो महीने के अंदर ही एक दर्जन से ज्यादा सीआईए एजेंट्स के साथ ऐसा ही हुआ।
शुरुआती शक क्यूबा पर  
पहला शक उन्हें क्यूबा की सरकार पर हुआ। हवाना के अमेरिका दूतावास के चीफ ऑफ मिशन जेफ़री डीलॉरेंटिस ने 2017 में क्यूबा की विदेश मंत्रालय के सामने इस बात को रखा। उन्होंने कहा कि हमारे दूतावास के कर्मचारी इस तरह की शिकायत लेकर आ रहे हैं। जिसके बाद क्यूबा की सरकार ने इसमें उनकी संलिप्ताता की बातों को सिरे से खारिज करते हुए सहयोग की बात कही। लेकिन सीआईए एजेंट का भेद खुलने के कारण अमेरिका ने क्यूबा के साथ मिलकर जांच से इनकार किया और अकेले ही तफ्तीश में जुट गए। अगला नंबर शक का राउले कास्त्रो के विरोधियों पर हुआ। इसके साथ ही क्यूबा की इंटेलिजेंस विंग पर भी अमेरिका की नजर थी। बाद में शक की सुईयां अमेरिकी के धुर विरोधी रूस पर जाकर रुकी। अमेरिका को लगा कि रूस ने अपना ऐसा कोई सीक्रेट हथियार बनाया है। जिससे वो सीआईए को निशाना बना रहा है। इसके साथ ही रूस के ऐसा करने के पीछे  का मकसद ये हो सकता था क्यूबा और अमेरिका के रिश्तों में जमी बर्फ का पिघलना, जो रूस को कतई स्वीकार नहीं था। लेकिन ये तमाम तरह की थ्योरी थी और रूस के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे। शुरुआत में तो अमेरिकन्स इसे ‘द थिंग’ कहकर पुकारते रहे। फिर कुछ ने इसे ‘इमैक्युलेट कनकशन’ नाम दिया. मगर इसके लिए जो टर्म पॉपुलर हुआ, वो था- हवाना सिंड्रोम।

ट्रंप और बिडेन प्रशासन के कुछ अधिकारियों का मानना ​​​​है कि हमलों के लिए रूसी खुफिया जिम्मेदार है, लेकिन अभी तक इसके कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। सरकारी एजेंसियां ​​हाल के दिनों में हुई घटनाओं के बारे में चेतावनी देती रही हैं, खासकर विदेश यात्रा करने वाले अधिकारियों के लिए। पिछले हफ्ते पेंटागन ने अपने पूरे कार्यबल को विषम स्वास्थ्य घटनाओं के बारे में चेतावनी दी थी, जिसमें कहा गया था कि इसमें अक्सर अजीब आवाजें या गर्मी या दबाव की अनुभूति होती है, जिसके बाद सिरदर्द, मतली, चक्कर और अन्य लक्षण होते हैं। नई सरकार निर्देशों में कहा गया है कि अधिकारी यदि  ऐसी लक्षणों का अनुभव करते हैं तो वे उस क्षेत्र को तुरंत छोड़ दें जहां वे हैं। अधिकारियों ने लक्षणों का कारण निर्धारित करने के लिए प्रयासरत हैं। जबकि कुछ अधिकारियों का मानना ​​है कि ये विरोधियों द्वारा किए हए हमले हैं। खुफिया एजेंसियों को अभी तक किसी भी ठोस निष्कर्ष पर आना बाकी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने इस साल की शुरुआत में जुलाई में खुफिया अधिकारियों को दिए एक भाषण में इस मुद्दे का दुर्लभ सार्वजनिक संदर्भ दिया था। उन्होंने कहा कि प्रशासन “इन घटनाओं का जवाब देने के लिए सरकार के व्यापक प्रयास का समन्वय कर रहा है, इस चुनौती से निपटने के लिए पूरे खुफिया समुदाय सहित विभागों और एजेंसियों को एक साथ काम करना चाहिए।
इससे पहले की घटना
इससे पहले अगस्त में अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस दक्षिण पूर्व एशिया की यात्रा पर थी लेकिन वियतनाम के लिए उनके प्रस्थान में कई घंटे की देरी हुई, जब उनके कार्यालय को हनोई, वियतनाम में अमेरिकी दूतावास द्वारा “संभावित विषम स्वास्थ्य घटना” के बारे में सूचित किया गया, जो तथाकथित “हवाना सिंड्रोम” के संदर्भ में था। जब कमला हैरिस का वियतनाम दौरा टला तो खुद इस सिंड्रोम का शिकार हुए पूर्व सीआईए ऑपरेटिव ने कहा था कि ऐसे हमले बढ़ते चले जा रहे हैं। अमेरिका की राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए यह बड़ा खतरा है। जून में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापक समीक्षा कर रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि राजनयिकों पर संदिग्ध “निर्देशित” रेडियो फ्रीक्वेंसी हमलों का कारण क्या था।
हवाना सिंड्रोम के लक्षण क्‍या हैं?
राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अनुसार हवाना सिंड्रोम के कुछ लक्षण अचानक महसूस किए जाते हैं और ये लंबे वक्त तक रहते हैं। जिनमें तेज आवाजें सुनाई देना, एक या दोनों कानों में दर्द, कानों में सीटिंया बजना, सुनने की क्षमता कम होना, स्मरण शक्ति का कमजोर होना, देखने में परेशानी, लड़खड़ाना, बैलेंस बिगड़ना, सिर चकराना।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, ‘हवाना सिंड्रोम’ के मामले अब हर महाद्वीप से आने लगे हैं। क्‍यूबा के बाद चीन, जर्मन, ऑस्‍ट्रेलिया, ताईवान और यहां तक कि वाशिंगटन डीसी में भी इसके केस मिले। इस साल की शुरुआत में ऑस्ट्रिया के विएना से भी दर्जनों मामलों कों पता चला था। भारत में ‘हवाना सिंड्रोम’ के लक्षण नजर आने का यह पहला मामला है।
हवाना सिंड्रोम होता कैसे है?
वैज्ञानिकों के बीच एक राय नहीं है। अमेरिका की नैशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के अनुसार, सबसे मुमकिन थियरी यह है कि ‘डायरेक्‍टेड, पल्‍सड रेडियो फ्रीक्‍वेंसी एनर्जी’ से यह सिंड्रोम होता हो। सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्‍स ने कहा है कि बहुत हद तक संभव है कि यह सिंड्रोम इंसान नियंत्रण में हो और शायद रूस इसके पीछे हो। अमेरिका के ज्‍यादातर अधिकारी मानते हैं कि यह इलेक्‍ट्रॉनिक हथियारों से किया गया हमला है। हालांकि किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है।
भारत में हवाना की दस्तक
सीआईए के एक अधिकारी विलियम बर्न्स अपने अधिकारियों के साथ  इस महीने ही भारत की यात्रा पर आए थे। उन्होंने सीएनएन और द न्यूयॉर्क टाइम्स के समक्ष एक हैरान करने वाला खुलासा किया है। ऐसी खबरें सामने आई हैं कि सीआईए के एक अफसर को हाल ही में भारत में हवाना सिंड्रोम के लक्षण महसूस हुए। इस सीआईए अफसर का नाम सामने नहीं आया है लेकिन यह बताया जा रहा है कि उसका उपचार किया गया है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *