कोरोना के बाद अब वित्तीय महामारी से विश्व होगा दो-चार?

अभिनय आकाश 

एवरग्रैंड रियल एस्टेट समूह चीन की दूसरी सबसे बड़ी रियल स्टेट कंपनी है। लेकिन अब यह दिवालिया होने की कगार पर है। एवरग्रैंड पर कई चीनी बैंकों की जो देनदारी है उसके आंकड़ों को जरा ध्यान से सुनें, ये आंकड़ा है 300 अरब डॉलर का और भारतीय रुपयों में यह रकम 22 लाख करोड़ रुपये से जरा ज्यादा ही बैठती है।

“अगर आप हमारे पैसे वापस नहीं करेंगे तो मैं ऊंची इमारत से छलांग लगा दूंगी। उन्होंने हमारे साथ धोखा किया। हमारे पास कुछ नहीं बचा।” “आपको क्या लगता है, एक साधारण इंसान के लिए पैसे कमाना आपको इतना आसान लगता है। हमने अपना सबकुछ बेच दिया। यहां तक की अपने दोनों अपार्टमेंट को भी ताकि हम एवरग्रैंड में प्रॉपर्टी खरीद सकें। क्योंकि ये विश्व की 500 टॉप कंपनियों में से एक मानी जाती है।” ये सारे बोल चीन के लोगों के हैं जिन्होंने अपनी पाई-पाई जोड़ कर आशियाने की आस में सारी जमापूंजी लगा दी। लेकिन अब उन्हें इसके डूबने की आशंका खाए जा रही है। जिस वजह से ये लोग चीन की रियल एस्टेट जाइंट कहे जानी वाली एवरग्रैंड के हेडक्वाटर के बाहर पहुंच गए हैं। वो वहां जमे हैं और जगह छोड़ने से मना कर रहे हैं। पानी की बोतले, केएफसी के फूड पैकेट से लैस सभी प्रदर्शकारी लंबी लड़ाई लड़ने के इरादे से एकट्ठा हुए हैं। वहां कि लोकल पुलिस असहाय दिखी और पेपर स्प्रे के सहारे प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाने की कोशिश करती नजर आई। एक महिला ने एक बड़ी रियल एस्टेट कंपनी के हेडक्वाटर के बाहर सुसाइड करने की कोशिश की। 

आखिर चीन की सड़कों पर इस तरह का प्रदर्शन क्यों हो रहा है?

कैसे चीन की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी का ये हाल हो गया?

इसमें भारत के लिए क्या चिंता की  बात है?

इन सारे सवालों के जवाब आपको देंगे लेकिन पहले आपको थोड़ा पीछे लिए चलते है। 2019 का वो दौर जब चीन ने कोरोना के मामले में दुनिया को धोखे में रखा और इसे छुपाने की भरसक कोशिश में लगा रहा। नतीजा आपके और हमारे सामने हैं। पूरी दुनिया वुहान वायरस महामारी की चपेट में आ गई। लेकिन वर्तमान दौर के जो हालात नजर आएं वो चीन के फाइनेंशियल पैंडेमिक की ओर इशारा कर रहे हैं। वैश्विक वित्तीय संकट अन्य देशों में भी पैर-पसार सकता है और एवरग्रैंड के बाहर का नजारा तो महज इसकी शुरुआत है। एवरग्रेंड रियल एस्टेट समूह चीन की दूसरी सबसे बड़ी रियल स्टेट कंपनी है। लेकिन अब यह दिवालिया होने की कगार पर है। एवरग्रैंड पर कई चीनी बैंकों की जो देनदारी है उसके आंकड़ों को जरा ध्यान से सुनें, ये आंकड़ा है 300 अरब डॉलर का और भारतीय रुपयों में यह रकम 22 लाख करोड़ रुपये से जरा ज्यादा ही बैठती है। 

एवरग्रैंड क्या है?
चीनी अरबपति जू जियान द्वारा 1996 में ग्वांगझू में स्थापित किया गया एवरग्रैंड चीन के सबसे बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स में से एक है। रियल एस्टेट के सेक्टर में इसने खूब नाम कमाया। कॉर्पोरेट वेबसाइट के अनुसार वर्तमान में एवरग्रैंड चीन के 280 से अधिक शहरों में 1,300 से अधिक परियोजनाओं का मालिक है। बाद में इसने इलेक्ट्रिक वाहन, खेल और थीम पार्क, खाद्य और पेय व्यवसाय, बोतलबंद पानी, किराने का सामान और डेयरी उत्पादों में विविधता बढ़ाई। वेबसाइट की माने तो कंपनी लगभग 200,000 लोगों को रोजगार देती है और हर साल 3.8 मिलियन से अधिक नौकरियां पैदा करती है। 2010 में कंपनी ने गुआंगज़ौ एवरग्रैंड सॉकर टीम खरीदी व 185 मिलियन डॉलर की लागत से दुनिया का सबसे बड़ा सॉकर स्कूल बनाया है। वर्तमान में कंपनी 1.7 बिलियन डॉलर के निवेश से कमल के फूल के शेप का फुटबॉल स्टेडियम बनाने पर काम कर रही है, जिसमें 100,000 लोगों के बैठने की क्षमता है। रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी ने पिछले साल 110 बिलियन डॉलर की बिक्री दर्ज की थी।
समस्या कैसे शुरू हुई?
 अब आप कह रहे होंगे कि इतने प्रोजक्ट्स, इतना निवेश और अलग-अलग क्षेत्र में मौजूदगी हो, भला उस कंपनी को फिर क्या दिक्कत हो गई? कंपनी ने अपनी अन्य परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए कर्ज लिया और धीरे-धीरे इसके बोढ चले दबता गया।इसने नकदी जुटाने और फिर से जमीन खरीदने की उम्मीद के साथ कम मार्जिन के साथ भी तेज दर पर अपार्टमेंट बेचे। पिछले साल सितंबर के महीने में कंपनी की एक लीक लेटर से खुलासा हुआ था कि उसकी तरफ से लिस्टिंग योजना के लिए सरकार से समर्थन मांगा गया था। इसके बाद से ही निवेशकों के बीच चिंता पैदा होने लगी थी, हालांकि कंपनी ने ऐसे किसी भी पत्र लिखने से किया इनकार किया था। 
ऋण मूल्य
बताया जा रहा है कि एवरग्रैंड की समस्याओं की शुरुआत चीनी केंद्रीय बैंक द्वारा पिछले साल जारी की गई ‘थ्री रेड लाइंस’ के साथ हुई थी। इसमें बैंकों से कंपनियों को दिए हुए कर्जों की समीक्षा करने को कहा गया था- 1. कहीं ये उनकी वापसी क्षमता से ज्यादा तो नहीं हैं, 2. कंपनियों ने कोलैटरल के रूप में पर्याप्त संपत्ति गिरवी रखी है या नहीं, और 3. डिफॉल्ट होने की स्थिति में बैंकों ने अपने पास जरूरी पूंजी की व्यवस्था कर रखी है या नहीं। कंपनी की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक एवरग्रैंड का ब्याज कर्ज जून के अंत में 571.8 अरब युआन (89 अरब डॉलर) था। 2020 के अंत में यह 716.5 बिलियन युआन था। इसकी कुल देनदारी 1.97 ट्रिलियन युआन थी, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2 प्रतिशत है।

जोखिम में कौन हैं?

अगर कंपनी दिवालिया होती है तो इसका असर बैंकों, आपूर्तिकर्ताओं, घर खरीदारों और निवेशकों को होगा। कंपनी ने कहा कि इसकी स्थिति “क्रॉस डिफॉल्ट” की ओर ले जा सकती है, जहां एक डिफ़ॉल्ट दूसरों में दायित्वों को ट्रिगर करता है। 2018 में ही चीन के केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी थी कि एवरग्रैंड जैसी कंपनियां देश की वित्तीय प्रणाली के लिए प्रणालीगत जोखिम पैदा कर सकती हैं। 
अब आगे क्या?
 चीनी केंद्रीय बैंक ने एवरग्रैंड मामले में रुचि लेनी शुरू कर दी है और बिल्कुल संभव है कि अगले कुछ दिनों में वह इस कंपनी को कर्जा देने वाले बैंकों को देर से अदायगी और हेयरकट (ब्याज, मूलधन या दोनों में कटौती) के लिए राजी कर ले। उसकी असल चिंता यह है कि इस कंपनी की बीमारी कहीं पूरे रीयल एस्टेट सेक्टर में न फैल जाए, जिसने फिलहाल चीन के कुल जीडीपी के एक चौथाई के बराबर कर्जा उठा रखा है।
भारत पर क्या होगा असर
चीन दुनिया की दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था है और भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है। यहां से आगे समस्या दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में और चीनी अर्थव्यवस्था से बाहर भी जा सकती है। कोरोना के दौर में आर्थिक जगत में इसके फैलने की फिलहाल तो कोई चर्चा फौरी तौर पर नहीं है लेकिन भविष्य की संभवनाों की आशंका जरूर जताई जा सकती है। एवरग्रैंड मामले से सबक लेकर भारत में अभी इतना ही किया जा सकता है कि डिफॉल्ट के कगार पर बैठी कंपनियों का हिसाब-किताब रखा जाए और उन्हें बचाने के लिए समय रहते जरूरी उपाय किए जाएं। जिन कंपनियों का पुराना कर्जा संदिग्ध स्थिति में हो उन्हें बचाने के लिए नया कर्जा बांटने के बजाय उनके कारोबार की दशा सुधारने के लिए काम किया जाए। 
वर्ल्ड बैंक को ड्रैगन की वजह से लगानी पड़ी कारोबार सुगमता रिपोर्ट पर रोक
 भारत सरकार ने विश्व बैंक समूह द्वारा दुनिया के देशों में ‘कारोबार सुगमता रैंकिंग रिपोर्ट’ का प्रकाशन बंद करने के फैसले को चीन की धोखाधड़ी का पर्दाफाश करार दिया है। इससे वैश्विक कंपनियों को अपना विनिर्माण स्थल भारत में स्थानांतरित करने के काम में तेजी आएगी। एक सरकारी सूत्र ने यह जानकारी दी। गौरतलब है कि विश्व बैंक समूह ने अनियमितताओं के आरोपों के बाद विभिन्न देशों में निवेश के माहौल से जुड़ी रिपोर्ट का प्रकाशन बंद करने का फैसला किया है। यह फैसला, 2017 में चीन की रैंकिंग को ऊपर करने की खातिर कुछ शीर्ष बैंक अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर दबाव डाले जाने के कारण हुई डेटा संबंधी अनियमितताओं के सामने आने के बाद लिया गया। सूत्र ने कहा, भारतीय डेटा में कोई अनियमितता नहीं पायी गयी। भारत दुनिया के लिए पसंदीदा निवेश गंतव्य और एक विश्वसनीय, भरोसेमंद गंतव्य बना हुआ है जबकि चीन का आकर्षण कम हो रहा है। सूत्र ने कहा, चीन द्वारा की गयी धोखाधड़ी से विनिर्माण कारखानों को भारत में स्थानांतरित करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला की मजबूत करने जैसी बहुपक्षीय पहलों को बढ़ावा मिलेगा। अक्टूबर 2019 में जारी विश्व बैंक की कारोबार सुगमता रिपोर्ट में भारत 14 पायदान की छलांग लगाकर 63वें स्थान पर पहुंच गया था।

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