बाबर और राणा सांगा के बीच का युद्ध और मुगल बादशाह की क्रूरता के वो किस्से, जिसे इतिहास में बड़ी चालाकी से छुपा लिया गया

अभिनय आकाश

बाबर ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया लेकिन उसे अपना सल्तनत चलाने के लिए शहर की दौलत चाहिए थी। उसके बिना वो अपनी सल्तनत नहीं चला सकता था। बाबर को जल्द ही पता लग गया कि दिल्ली के पास काफी दौलत है। जिससे वो कई जंग लड़ सकता था।

बाबर मंगोल योद्धा चंगेज खान और तैमूर लंग का वंशज था। चंगेज खान और तैमूर लंग के नक्शेकदम पर चलते हुए ही बाबर दुनिया के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमाना चाहता था। यही इच्छा उसे भारत खींच लाई। वर्ष 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर बाबर ने दिल्ली पर कब्जा जमा लिया। इस जीत ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। अयोध्या विवाद में हिन्दू पक्ष ये मानता है कि वर्ष 1528 में बाबर के सेनापति मीरबांकी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मौजूद मंदिर को तोड़ डाला और वहां बाबर के नाम पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया। 

बाबर का व्यक्तित्व किस तरह का था और वो भारत के बारे में क्या सोचता था। भारत के नागरिकों के बारे में बाबर के विचार क्या थे? इस बारे में कई ऐतिहासिक किताबों में लिखा गया है। लेकिन अगर आप स्कूलों में पढ़ाई जा रही इतिहास की किताबों का अध्ययन करेंगे तो आपको लगेगा कि बाबर में सिर्फ एक ही कमी थी कि उसने भारत पर हमला किया था। हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवियों और वामपंथी इतिहासकारों ने ये प्रचारित किया कि बाबर एक महान व्यक्ति था। अयोध्या विवाद की वजह से बाबर की छवि खराब कर दी गई है। हमारे देश के कई विद्धवानों और कुछ पेज थ्री सेलिब्रेटी ने ये भी कहा कि मुगल साम्राज्य में भारत का बहुत विकास हुआ था।

बाबर ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया लेकिन उसे अपना सल्तनत चलाने के लिए शहर की दौलत चाहिए थी। उसके बिना वो अपनी सल्तनत नहीं चला सकता था। बाबर को जल्द ही पता लग गया कि दिल्ली के पास काफी दौलत है। जिससे वो कई जंग लड़ सकता था। उसे तोहफे में मिला था कोहिनूर हीरा जो करीब 180 कैरेट का था। उस वक्त उसकी इतनी कीमत थी कि उसे बेचकर पूरी दुनिया को ढाई दिनों तक खिलाया जा सकता था। दिल्ली पर कब्जा के बाद बाबर ने खूब लूट मचाई और भारत से लेकर काबुल तक सोने-चांदी लुटाए गए। आखिर तीन शताब्दियों तक चलने वाले तुर्क-अफगानी सुल्तानों की सल्तनत को समाप्त कर बाबर ने अपनी ‘बादशाहत’ कायम की थी। जब भी मुगल बादशाह कोई नया इलाका जीतते थे तो वो वहां सबसे पहले बाग ही बनाते थे। पानीपत की जीत के दो साल के अंदर बाबर ने कई और राज्यों पर जीत हासिल की। पर हिन्दुस्तान की गर्मी से परेशान उसकी सेना अपना साजो-सामान लेकर अपने वतन वापस जाना चाहती थी। मगर बाबर के दिल में कुछ और था। उसने मध्य भारत में मजबूती से अपने पैर जमा लिए थे। जिसके पश्चिम में काबुल था तो पूर्व में बिहार और दक्षिण में हिमालय की तलहटी से लेकर ग्वालियर तक उसका राज था। बाबर की कट्टर और क्रूर था। उसने अपने पहले आक्रमण में ही बाजौर के सीधे-सादे 3000 से भी अधिक निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। यहां तक कहा जाता है कि उसने इस युद्ध के दौरान एक पुश्ते पर आदमियों के सिरों को काटकर उसका स्तंभ बनवा दिया था। यह नरसंहार उसने ‘भेरा’ पर आक्रमण करके भी किए थे बाबर द्वारा किए गया तीसरा, चौथा व पांचवां आक्रमण- सैयदपुर, लाहौर तथा पानीपत पर किया था जिसमें उसने किसी के बारे में नहीं सोचा। उसके रास्ते में बूढ़े, बच्चे और औरतें, जो कोई भी आया वह उन्हें काटता रहा। वह किसी भी कीमत पर अपने साथ ज्यादा से ज्यादा धन लूट कर ले जाना चाहता था। बाबर ने अपने विजय पत्र में अपने को मूर्तियों की नींव का खण्डन करने वाला बताया। इस भयंकर संघर्ष से बाबर को गाजी की उपाधि प्राप्त की। गाजी उसे कहा जाता है जो काफिरों का कत्ल करे। बाबर ने अमानुषिक ढंग से तथा क्रूरतापूर्वक हिन्दुओं का नरसंहार ही नहीं किया, बल्कि अनेक हिन्दू मंदिरों को भी नष्ट किया। इतिहासकारों के अनुसार 1528 में बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। बाबर एक तुर्क था। उसने बर्बर तरीके से हिन्दुओं का कत्लेआम कर अपनी सत्ता कायम की थी। मंदिर तोड़ते वक्त 10 हजार से ज्यादा हिन्दू उसकी रक्षा में शहीद हो गए थे। बाबर पहला मुगल बादशाह बना और उसने अपने यहां राजवंश की स्थापना की। मगर वो ज्यादा समय तक अपनी कामयाबी का मजा नहीं ले पाया। सन 1530 में सिर्फ 47 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई। 
बाबर और राणा सांगा के बीच वर्चस्व की जंग
अपने शासन काल में राणा सांगा दिल्ली, मालवा और गुजरात पर चढ़ाई कर चुके थे। माना जाता है उस दौर में भारत में कोई ऐसा शासक नहीं था, जो राणा सांगा से युद्ध में लोहा ले सके। दिल्ली में बाबर का काबिज होना राणा सांगा के लिए एक बुरा संकेत था। राणा सांगा ने बाबर को खदेड़ने की ठानी। 17 मार्च 1527 ई. में खानवा में दोनों के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में राणा सांगा मारवाड़, अम्बर, ग्वालियर, अजमेर, हसन ख़ाँ मेवाती, बसीन चंदेरी एवं इब्राहिम लोदी के भाई महमूद लोदी के साथ संयुक्त मोर्चे के साथ डटे थे। उधर, बाबर सांगा के साथियों में फूट डालकर और गोला बारूद का जमकर इस्तेमाल कर लड़ाई का रूख अपने पक्ष में मोड़ दिया और युद्ध को जीत लिया। यह जीत बाबर के लिए बहुत अहम थी, क्योंकि उसने उत्तर-भारत के एक वीर शासक को हराया था।

बाबर की खूनी कविता
हमारे देश में बहुत से शायर भी हैं जो बाबर के बहुत बड़े प्रशंसक भी हैं। बाबर के बारे में ये भी कहा जाता है कि वो बहुत बड़ा कवि और शायर था। डॉ. अहमद सईद की किताब ‘नो यॉर इंडिया, टर्न ए न्यूज पेज टू राइट नेशनलिज्म’ के पेज 82 पर लिखा गया है कि इस्लाम के लिए मैं भटकता रहा हूं। मैं काफिरों और हिन्दुओँ से लड़ता रहा हूं। मैं शहीद बनने के लिए दृढ़संकल्प हूं। हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद। मैं गैर मुसलमानों का हत्यारा बन गया। दीपक बासु और विक्टोरिया ने भी अपनी किताब इंडिया एज इन ऑर्गनाइजेशन में बाबर की लिखी इस कविता का जिक्र किया है। इन कविताओं से ये साफ प्रतीत होता है कि बाबर कवि तो था लेकिन उसकी कलम में स्याही नहीं बल्कि खून भरा हुआ था। वो अपना स्वार्थ के लिए धर्म का इस्तेमाल कर रहा था और लोगों की हत्या करना उसके लिए एक मनोरंजन था। 
भारत के लोगों को लेकर बाबर की सोच
एनेट बेबरिज नाम की एक महिला लेखक ने 1922 में बाबरनामा का अनुवाद किया था। जिसमें हिन्दुस्तान के बारे में बाबर ने लिखा कि भारत के लोग दिखने में अच्छे नहीं हैं। न तो यहां के लोग बुद्धमान हैं और न ही यहां के लोगों में क्षमता है। ये लोग सभ्य भी नहीं हैं। यहां अच्छे घोड़े नहीं हैं। यहां अच्छे कुत्ते नहीं हैं। यहां मीठे अंगूर और खरबूजे नहीं हैं। न तो बर्फ है और न ठंडा पानी। बाजार में खाने के लिए अच्छा भोजन नहीं है। बाबरनामा की इन बातों से साफ है कि बाबर को हिन्दुस्तान से कोई लगाव नहीं था। 
आगरा के इस बाग में दफनाया गया था शव
बाबर ने इच्छा जताई थी कि उसे हिन्दुस्तान में मरने के बाद न दफनाया जाए। बाबर की मृत्यु 26 दिसंबर 1530 को हुई थी। आगरा में यमुना नदी के किनारे पहले बाग रामबाग के साथ ही बाबर ने एक और बाग ए जार अफशान बनवाया था। यह अब चौबुर्जी के नाम से चर्चित है। इसी बाग में मुगल बादशाह बाबर को 1530 में मृत्यु के बाद अस्थायी तौर पर दफन किया गया था। छह माह के दफन के बाद शव को निकालकर काबुल ले जाकर दफनाया गया। बाबर के इस चारबाग में अब बागीचा तो बचा नहीं, लेकिन यह इमारत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित कर रखी है। 
मुगल भारत में न आते तो… 
भारत में मुगल शासन को कई लोग गोल्डन पीरियड बताते हैं। कई लेखक तो उनके गुणगान करते नहीं थकते। कई लोगों का कहना है कि अगर मुगल न होते तो हिन्दुस्तान में लालकिला, ताजमहल जैसी कई इमारतें ही नहीं होती। लेकिन ताजमहल न भी होता तो अजंता-अलोरा की गुफाएं, सांचे का स्तूप, खजुराहो के मंदिर, दक्षिण की मूर्ति कला मौजूद होते। शेरशाह सूरी का ग्रैंड ट्रंक रो़ड और मकबरा होता। गोल गुबंद होता, उड़ीसा के मंदिर होते।

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