बाबर को पूरे जीवन में शयबानी जैसा दुश्मन नहीं मिला, लेकिन उसकी मौत के बाद भारत की तरफ रूख करने पर क्यों हुआ मजबूर?

अभिनय आकाश 

बाबर दिल्ली की ओर बढ़ा तो उसे अपने दुश्मन को घेरने के लिए एक अच्छी जगह भी मिल गई। ये पानीपत नाम का शहर था जो दिल्ली से केवल 40 किमी दूरी पर था। बाबर ने लोदी के हाथियों पर तोप के गोले बरसाने शुरू कर दिए और तीरों की बौछार के साथ ही बाबर ये युद्ध जीत गया।

डिज्नी प्लस हॉट स्टार पर द एम्पायर अलेक्स रदरफोर्ड की किताब “एम्पायर ऑफ़ द मुग़ल” पर आधारित है। ये सीरिज मुगल साम्राज्य के उत्थान से लेकर पतन तक की कहानी बताती है। इसकी शुरुआत बाबर को बादशाह बनाए जाने से होती है। इसमें अफगानिस्तान से भारत पहुंचने, इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली में सल्तनत बनाने तक की कहानी को दिखाया गया है। लोगों का कहना है कि ये सीरिज बाबर जैसे क्रूर शासक का महिमामंडल करती है। पिछले दिनों मनोज मुंतशिर ने मुगलों को “डकैत” करार दिया था और बाद में मशहूर निर्देशक कबीर खान ने एक इंटरव्यू में मुगलों को हिंदुस्तान का राष्ट्रनिर्माता करार दिया था। सोशल मीडिया खासकर ट्विटर पर दोनों के बयानों को लेकर खूब बहस देखने को मिली। लेकिन यह भी सच है कि बाबर हमलावर था और साम्राज्य बनाने के क्रम में उसने खौफनाक लड़ाइयां कीं। इसके साथ ही तलवार के बूते धर्मांतरण, हिंदू मंदिरों और ऐतिहासिक स्थलों को भी निशाना बनाया।  लेकिन इतिहास में इन चीजों को जानबूझकर तवज्जों नहीं दिया गया। अयोध्या विवाद में जितनी बार भगवान राम का जिक्र होता है उतनी बार मुगल बादशाह बाबर का भी जिक्र होता है। भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और बाबर का जन्म फरगना में हुआ था। ये जगह आज उज्बेकिस्तान में है। भगवान राम के बारे में हमारे देश में सभी लोग जानते हैं। लेकिन बाबर के व्यक्तित्व के बारे में हमारे देश के लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। आज हम आपको बाबर के बारे में तथ्यात्मक जानकारी देना चाहते हैं। ताकी आपकी नजर और नजरिया दोनों साफ हो जाए। भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना कैसे हुई, भारत में बाबर क्यों आया और उस वक्त सेंट्रल एशिया में क्या हो रहा था आज के इस विश्लेषण में आपको बताएंगे।

पूरे जीवन में शयबानी जैसा दुश्मन नहीं मिला
बाबर का पूरा नाम जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 ई. में उज्बेकिस्तान की फरगना घाटी में हुआ था। बाबर के पिता तैमूर वंश के और मां चंगेज खान के वंश की थी। बाबर के पिता उमर शेख मिर्जा फरगाना घाटी के शासक थे। वो उमर शेख का सबसे बड़ा बेटा था। इसलिए फरगाना घाटी के तख्त का दावेदार भी। 10 जून 1494 को अपनी महल की छत से कबूतरों को दाना खिलाते हुए उमर शेख मिर्जा का पांव फिसला और वो नीचे खाई में जा गिरा। मौके पर ही उमर शेख मिर्जा की मौत हो गई। इसके बाद 11 साल की उम्र में उसे अपने अपने चाचाओं से खतरा था क्योंकि वो फरगाना के तख्त को कब्जाना चाहते थे। लेकिन अपनी नानी ईशरत बेगम जहां की मदद से वो फगराना की तख्त पर काबिज हो गया। बाबर भी अपने पूर्वज तैमूर की तहत एक अमरी सल्तनत बनाना चाहता था। जो कि अब गुजरे जमाने की याद बन कर रह गया था। सन 1496 में उसने 14 साल की उम्र में ही उसने तैमूर की राजधानी समरकंद पर हमला किया। सात महीनों की लड़ाई के बाद बाबर ने इसे जीतकर फरगाना से जोड़ दिया। लेकिन इसी दौरान फरगाना में बगावत हो गई और वहां के लोगों ने उसके छोटे भाई जहांगीर मिर्जा को तख्त पर  बैठा दिया। जब बाबर फरगाना में वापस आ रहा था तो उसकी फौज ने समरकंद में उसका साथ छोड़ दिया। जिसकी वजह से समरकंद और फरगाना दोनों ही उसके हाथों से निकल गए। उसने तजाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान की पहाड़ियों में रहकर ताजिक लोगों की फौज बनाई। 2 साल बाद उसने फिर से समरकंद जीत लिया। लेकिन फिर समरकंद में बाबर को मोहम्मद शयबानी ने घेर लिया। बाबर को पूरे जीवन में शयबानी जैसा दुश्मन नहीं मिला। शयबानी ने बाबर को समरकंद से खदेड़ दिया। इसके बाद बाबर उत्तरी अफगानिस्तान और तजाकिस्तान के पास की पहाड़ियों में घूमता रहा। 1503 में शयबानी ने बाबर के पुश्तैनी फरगान पर भी कब्जा कर लिया। यहीं से उज्बेकिस्तान का जन्म हुआ। समरकंद से निकलने के बाद बाबर ने 1504 के दरमियां जब उसके दुश्मन एक दूसरे से दुश्मनी निभा रहे थे, तब इस बात का फायदा उठाते हुए हिंदू कुश की चोटियों को पार कर काबुल को जीत लिया। लेकिन मोहम्मद शयबानी के हाथों उसे बल्ख में भी हार का सामना करना पड़ा। सन 1505 तक वो कई जंग लड़ चुका था। उस वक्त उसकी उम्र सिर्फ 22 साल थी। इसके बाद पूरी तैयारी के साथ बाबर ने 1505 में पेशावर पर हमला किया। इसे बाबर का हिन्दुस्तान पर पहला हमला माना जाता है। इसके बाद बाबर ने काबुल और सिंधु नदी के पूरे क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया। 1507 में बाबर ने काबुल घाटी के पठानों पर कब्जा करना शुरू किया। सन 1510 में बाबर को एक खुशखबरी मिली कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन शयबानी फारस के शाह स्माइल के हाथों मारा गया। लेकिन फारस के इस तेजी से उभरते सल्तनत के बीच बाबर की ईरान में साम्रज्य विस्तार की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो गई।   
बाबर का भारत आना
अब उसकी नजर भारत पर थी। अगले 20 साल तक बाबर अपने मुगल साथियों के साथ इस उपमहाद्वीप पर कब्जा जमाने की कोशिश करता रहा। मगर नाकाम रहा। फिर 1525 में उसने भारत के सबसे अमीर और शक्तिशाली शहर दिल्ली को निशाना बनाया। तब जब वहां का बादशाह कमजोर पड़ रहा था। वहां एक मुसलमान सुल्तान का राज था और बाबर को लगा कि वो उसे गद्दी से हटाकर कब्जा जमा सकता है और सुल्तान इब्राहिम लोदी की सेना उसे रोक भी नहीं पाएगी। बाबर के पास 12 हजार जवान थे तो लोदी के सेना में एक लाख लोग। बाबर की सेना खतरनाक बंजारे लड़ाकों से भरी पड़ी थी। उनके बीच गजब का भाई चारा था और वे जंग में मिली जीत का इनाम आपस में बांट लेते थे। बाबर दिल्ली की ओर बढ़ा तो उसे अपने दुश्मन को घेरने के लिए एक अच्छी जगह भी मिल गई। ये पानीपत नाम का शहर था जो दिल्ली से केवल 40 किमी दूरी पर था। अन्य हमलावरों की तरह बाबर ने भी पहले अपने दुश्मन की ताकत का पता लगाया। उसने खास बात ये देखी की इब्राहिम लोदी की लोगों से मिलने की आदत थी और लोगों से इस जंग में मदद करने के लिए भी कह रहा है। तब बाबर को लगा कि लोदी को आसानी से पानीपत लाया जा सकता है। 

समरकंद में मिली पराजय वाली नीति का प्रयोग लोदी को हराने में किया
शयबानी, बाबर का दुश्मन था। जब तक शयबानी जिंदा रहा, बाबर चाहकर भी उसपर वर्चस्व नहीं बना पाया था। हो भी क्यों ना, शयबानी की गिनती मध्य एशिया के उस दौर में सबसे खूंखार योद्धाओं में की जाती है। शयबानी की जिद्दी सेनाएं दुश्मन पर बिजली की तरह गिरती थीं। पलक झपकते ही विरोधी खेमा उनके आगे हताश और विवश नजर आता था। दरअसल, मोहम्मद शयबानी “तुलुगमा” रणनीति से युद्ध करता था।मध्यकालीन उज्बेकी लड़ाके इसी रणनीति के तहत दुश्मनों पर धावा बोलकर उन्हें तहस-नहस कर देते थे। सामरिक रूप से तुलुगमा रणनीति को छोटी सेनाओं के लिए माकूल माना जाता है। गुरिल्ला लड़ाइयां, एक हद तक तुलुगमा जैसी दिखती हैं। मगर इनमें फौरी अंतर ये है कि गुरिल्ला योद्धा अचानक हमला करते हैं, दुश्मन खेमे में अफरा-तफरी मचाते हैं और पलक झपकते ही भाग खड़े होते हैं। गुरिल्ला इकाइयां संख्याबल में भी बहुत मामूली होती हैं और दुश्मन की छोटी टुकड़ियों को निशाना बनाती हैं। गुरिल्ला लड़ाकों का मकसद हार या जीत की बजाय दुश्मन में खौफ पैदा करना और उन्हें नुकसान पहुंचाना ज्यादा होता है। 
बाबर की मुट्ठीभर फौज ने लोदी की लंबी चौड़ी सेना को दी मात
कहते हैं कि पानीपत की जंग में उसने मोहम्मद शयबानी खान के युद्ध कौशल से प्रेरणा लेकर रणनीति बनाई थी। बाबर ने जंग से पहले कहा था- जो भी इस दुनिया में आया है उसे मरना है. जीवन खुदा के हाथ में है, इसलिए मृत्यु से नहीं डरना चाहिए। तुम अल्लाह के नाम पर क़सम खाओ, मौत को सामने देखकर भी मुंह नहीं मोड़ोगे और जब तक जान बाक़ी है तब तक लड़ाई जारी रखोगे। पानीपत के नतीजों ने इतिहास की नई धारा का सूत्रपात किया। जंग की तैयारी के लिए बाबर वक्त से हफ्ता भर पहले ही पानीपत पहुंच गया। शहर उसके दाई ओर था इसलिए उसने बाई ओर एक खाई खुदवा दी ताकि लोदी की विशाल सेना उसकी ओर बढ़े तो वो बहुत ही संकड़ी जगह में फंस जाए। धनुष बाण मुगलों का पसंदीदा हथियार था। बाबर अपने चार हजार तीरंदाजों के साथ भारत को फतह करने निकला था। लेकिन पानीपत की लड़ाई में सिर्फ तीरंदाजों के काम नहीं बनने वाला था। उसने जंग से एक दिन पहले ही सात सौ लकड़ी की गाड़ियों से नाकाबंदी कर दी और उन्हें छोटे-छोटे झुंड में बांट दिया। उसके पास करीब दर्जनभर हल्की तोपें थी। वो इन तोपों को करीब ग्यारह सौ किलोमीटर दूर काबुल से गाड़ियों पर लाद कर ले आया। 20 अप्रैल 1526 को शुक्रवार की सुबह इब्राहिम लोदी उसके जाल में फंस गया। लोदी के एक लाख जवान और एक हजार हाथी उसके बिछाए फंदे की ओर चल पड़े। उसने लोदी के जवानों को उस मौत के घेरे के अंदर घेर लिया जहां से भागने का कोई रास्ता नहीं था। फिर उसने उन जवानों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया और तो और बाबर ने लोदी के हाथियों पर तोप के गोले बरसाने शुरू कर दिए जिससे वो बेकाबू होकर अपनी सेना के जवानों को कुचलने लगे। तीरों की बौछार के साथ ही बाबर ये युद्ध जीत गया और लोदी के साथ ही उसके सारे जवान मारे गए। जिसके बाद बाबर ने दिल्ली पर कब्जा जमा लिया। लेकिन उसका सपना तो पूरे हिन्दुस्तान पर कब्जे का था। 

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