विदर्भ के छोटे से शहर चंद्रपुर से निकलकर मोहन भागवत कैसे बन गए संघ और बीजेपी की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी?

अभिनय आकाश

मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यूं तो फौरी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से परहेज करता है। लेकिन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने और बीजेपी को चुनावी जंग जिताने में पर्दे के पीछे से उनका ही सबसे अहम योगदान रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इतिहास में पहली बार संघ का कोई प्रचारक देश पूर्ण बहुमत के साथ देश की गद्दी पर बैठा है।

ये वाजपेयी और आडवाणी के दौर की बात है। तब चाणक्य की भूमिका में प्रमोद महाजन हुआ करते थे। एक बार प्रमोद महाजन से वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने पूछा था कि आप वाजपेयी और आडवाणी में से बड़ा नेता किसे मानते हैं। प्रमोद महाजन ने जवाब दिया था कि बड़ा नेता वो जिसे संघ बड़ा नेता माने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) 2025 में जिसकी उम्र 100 बरस हो जाएगी। किसी भी संगठन के लिए करीब सौ साल का सफर अहम होता । लेकिन आरएसएस एक ऐसा नाम है जिसका जिक्र होते ही राजनीति के गलियारों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। समाज के भीतर देश के सबसे बड़े परिवार के तौर पर आरएसएस अपनी पहचान कराता है। इतिहास के पन्नों से गुलाम हिन्दुस्तान की यादों में हिंदुत्व की आस्था से भारतीयता की भावना में रचे-बसे इस संगठन का जन्म तो 96 साल पहले हुआ था। उस वक्त सिर्फ 12 लोग थे लेकिन आज करोड़ों-करोड़ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद संगठन की हामी हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ने वाले इस संगठन ने राजनीति से तो अपनी दूरी परस्पर बनाई रखी, लेकिन सत्ता की राजनीति में अपनी मौजूदगी की धमक को कुछ इस प्रकार बरकरार रखा कि जिसके इशारों को नजरअंदाज करना तख्त पर बैठे हुक्मरानों के लिए कभी आसान नहीं रहा। आरएसएस का इरादा अखंड भारत का है और संघ का वादा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पन्नों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहता है। संघ मतलब शालीनता, संघ मतलब सुचिता, संघ मतलब अनुशासन, संघ मतलब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ये वो हीरे हैं जो संघ की खुदाई से निकले हैं। 

वैसे तो देश की सबसे ताकतवर हस्ती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 2014 और 2019 की जीत के बाद मोदी देश में सबसे चमकदार चेहरा बन गए हैं। लेकिन राजनीति की दुनिया से अलग देश में सबसे ताकतवार शख्स जिसने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचाने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र के विदर्भ का छोटा सा शहर चंद्रपुर से मोहन मधुकर राव भागवत की कहानी की शुरुआत हुई थी। मोहन भागवत ये नाम मीडिया के कैमरों के आगे कभी-कभार ही चमकता है। लेकिन ये वो शख्स हैं जो देश के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को चलाते हैं। 

मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यूं तो फौरी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से परहेज करता है। लेकिन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने और बीजेपी को चुनावी जंग जिताने में पर्दे के पीछे से उनका ही सबसे अहम योगदान रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इतिहास में पहली बार संघ का कोई प्रचारक देश पूर्ण बहुमत के साथ देश की गद्दी पर बैठा है। आज संघ परिवार के एक सदस्य के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही है और इस दुरूह कारनामे को सरसंघचालक मोहन भागवत ने कर दिखाया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत आज राजनीति की दुनिया के बाहर देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन चुके हैं। 
भागवत का संघ से तीन पीढ़ियों का नाता रहा 
धुंआ उगलती चिमनियों का शहर जो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने के लिए जाना जाता है। ये शहर है चंद्रुपुर जो संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी शहर है। मोहन भागवत का जन्म 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। लेकिन चंद्रपुर की गलियों में खेलते-कूदते उनका बचपन गुजरा है। क्योंकि मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत महाराष्ट्र के सतारा से चंद्रपुर में आकर बस गए थे। नारायण भागवत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के स्कूल के दिनो के दोस्त भी थे। यही वजह है कि मोहन भागवत का संघ से तीन पीढ़ियों का नाता रहा है। इसके बाद उनके पिता मधुकर राव भी संघ से सक्रिय तौर पर जुड़े रहे। वो गुजरात के प्रचारक भी बने। मां मालती संघ के महिला विंग की सदस्य थीं। भागवत परिवार के बारे में कहा जाता है कि वो टकराव की बजाय लोगों का दिल जीतने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। मधुकर राव ने ही बीजेपी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी को संघ में दीक्षित किया था। चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से मोहन भागवत ने स्कूल की पढ़ाई पूरी की थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शहर के ही जनता कॉलेज में बीएससी में एडमिशन ले लिया था। लेकिन उन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और एक साल बाद ही चंद्रपुर शहर को भी छोड़ दिया। महाराष्ट्र का आकोला उनकी जिंदगी का अहम पड़ाव बना। यही उन्होंने बीएससी की पढ़ाई छोड़ आकोला के पंजाब राव कृषि विद्यापीठ में वेटनरी साइंसेज एंड एनीमल हसब्रेंडरी के कोर्स में दाखिला ले लिया। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन में यही एडमिशन लिया। लेकिन 1975 में भागवत ने ये पढ़ाई बीच में ही छोड़ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दामन थाम लिया। 

संघ से सफर की शुरुआत
आपातकाल के दौरान मोहन भागवत ने भूमिगत रहकर अपने सभी कार्यों को पूरा किया। जिसके बाद वर्ष 1977 में उन्हें अकोला, महाराष्ट्र का प्रचारक नियुक्त किया गया था। इसके बाद वह नागपुर और विदर्भ क्षेत्र के भी प्रचारक बनाए गए। 1991 में मोहन भागवत आरएसएस कार्यकर्ताओं को दिए जाने वाले शारीरिक प्रशिक्षण के प्रभारी बनाए गए। इस पद पर वह 1999 तक रहे। 1999 में एक वर्ष के लिए मोहन भागवत आरएसएस स्वयंसेवकों के प्रभारी भी रहे। 2000 में जब राजेन्द्र सिंह और एच.वी. शेषाद्रि ने खराब स्वास्थ्य के चलते अपने-अपने पद से इस्तीफा दे दिया तब केएस सुदर्शन और मोहन भागवत संघ के सर संघचालक और महासचिव नियुक्त किए गए। 21 मार्च, 2009 को मोहन भागवत ने सर संघचालक का पदभार ग्रहण किया।

भागवत के हाथों में कमान 
मोहन भागवत पहली बार लाइमलाइट में पहली बार आए थे। जब उन्हें 2009 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक बनाया गया। लेकिन संघ प्रमुख बनने के बाद अपने बयानों को लेकर भी वो खूब चर्चा में रहे। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार 2.0 बनने के बाद हाल ही में डीएनए पर दिए उनके बयान पर इन दिनों खूब चर्चा भी हो रही है। आपको बताते हैं कि देश की मौजूदा राजनीति में सरसंघचालक मोहन भागवत होने का क्या मतलब है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है। जिससे करीब तीन दर्जन छोटे-बड़े संगठन जुड़े हुए हैं। इन संगठनों का दायरा पूरे देश में फैला हुआ है। 2009 में जब मोहन भागवत सर संघचालक बनने के दो महीने बाद ही बीजेपी लोकसभा चुनाव हार चुकी थी। लेकिन भागवत ने हार नहीं मानी। न केवल उन्होंने बीजेपी में जबरदस्त बदलाव लाया बल्कि उन्होंने संघ परिवार को चुनावी जंग में बीजेपी की मदद के लिए तैयार भी किया। 

बीजेपी पर नियंत्रण
2009 में जब मोहन भागवत ने सरसंघचालक का पद संभाला तो आम चुनाव में महज दो महीने बाकी थे। इस चुनाव में बीजेपी की हार हुई और आडवाणी पीएम इन वेटिंग बने रह गए। इसके बाद संघ ने पार्टी पर अपनी पकड़ फिर से मजबूत करनी शुरू की। चुनाव में हार के बाद अगस्त में बीजेपी के नए अध्यक्ष का ऐलान हुआ। अध्यक्ष ऐसे आदमी को बनाया गया जो राष्ट्रीय राजनीति में उस समय तक बहुत प्रासंगिकता नहीं रखता था। नितिन गडकरी नागपुर के रहने वाले थे। ब्राह्मण परिवार से आने वाले गडकरी का बचपन भी संघ की शाखा में बीता था। इससे पहले वो महाराष्ट्र में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे थे और उनके नेतृत्व में ही महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को हार मिली थी। लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति से केंद्र की राजनीति में नितिन गडकरी को लाकर संघ ने एक फिर से बीजेपी की कमान अपने हाथ में ले ली है।
आरएसएस के संगठन
देश के सबसे मजदूर यूनियन में से एक भारतीय मजदूर संघ जिसके करीब दस लाख से ज्यादा सदस्य है। देश का सबसे बड़ा विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी जैसी संघ की कई और संगठन हैं। जिन्हें संघ परिवार कहा जाता है। संघ परिवार देश भर में शिक्षा. जनकल्याण और हिन्दू धर्म से जुड़े कार्यक्रमों सहित कई क्षेत्रों में हजारों प्रोजक्ट चला रहा है। संघ परिवार के इन सारे कार्यक्रमों और उद्देश्यों के लिए दिशा-निर्देश देना और उनका वैचारिक मार्ग दर्शन करने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक का होता है। 
मोदी और भागवत का कनेक्शन
दरअसल, जिन दिनों मोहन भागवत के पिता मधुकर राव गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक हुआ करते थे। तब ही उनके संपर्क में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए थे। जिनके बारे में जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने एक बार कहा था- प्रारंभिक जीवन में मुझे उनके पिताजी से का मुझे बहुत प्यार मिला था। एक प्रकार से मैं कह सकता हूं मुझे ऊंगली पकड़कर चलाते थे। ये मैं परमात्मा की कृपा मानता हूं कि ऐसे जीवन के साथ मुझे बचपन में जुड़ने का अवसर मिला था। बता दें कि लगातार दो चुनाव में हार के बाद बीजेपी और संघ में निराशा का माहौल था। वहीं गुजरात में लगातार दो चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की दावेदारी के लिए अपनी तैयारी भी तेज कर दी थी। इसलिए उस वक्त चुनाव नतीजों के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने प्रेस कॉनफ्रेंस कर अपने इरादे जता दिए थे। कि वो बीजेपी में बड़े परिवर्तन चाहते हैं। उनके निशाने पर खासतौर पर लाल कृष्ण आडवाणी और उनकी टीम के वो केंद्रीय नेता थे जिन्होंने इन चुनावों की रणनीति बनाई थी। बीजेपी की हार के बाद ये भी तय किया गया था कि पार्टी की कमान आडवाणी नहीं बल्कि कोई और संभालेगा। लोकसभा में भी विपक्ष का नेता सुषमा स्वराज को बनाया गया। गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद नरेंद्र मोदी ने 6 फरवरी 2013 को पहली बार दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दी। दिल्ली के श्रीमा कॉलेज में जब मोदी बोले तो ये साफ हो गया कि उनकी अगली मंजिल दिल्ली ही है। नरेंद्र मोदी देश की युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं के प्रतीक बन चुके थे। मोदी- मोदी के लगते नारों के बीच धर्म संसद में इस बात के संकेत दे दिए कि लोगों की जनभावना का ध्यान रखा जाएगा। जून 2013 में बीजेपी ने उन्हें केंद्रीय चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर अपना संदेश साफ कर दिया। 10 जून के आडवाणी ने पार्टी के सभी अहम पदों से इस्तीफा दे दिया। ये पहला मौका था जब संघ ने खुले तौर पर बीजेपी के मामले में दखल दिया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आडवाणी को मनाने और समझाने के लिए खुद मोर्चा संभाला। मोहन भागवत का पहला बड़ा एक्शन तब देखा गया था जब उन्होंने नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाया था जबकि दूसरा बड़ा एक्शन नरेंद्र मोदी के उम्मीदवारी पर न केवल अपनी मुहर लगाना बल्कि उनकी राह में आने वाली हर रूकावट को भी साफ किया। ये मोहन भागवत की ही रणनीति थी कि संघ कार्यकर्ताओं ने चुनाव में 100 फीसदी वोटिंग का लक्ष्य बनाया। 
संघ की कार्यशैली में आया बड़ा बदलाव
मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ की कार्यशैली में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। संघ की बीजेपी पर जो पकड़ अब भी है वो इतिहास में कभी नहीं रही। इसके अलावा संघ के अनुषांगिक संगठनों की संख्या और सदस्यता में भी बड़ा इजाफा हुआ है। आज संघ के मुख्य 36 मुख्य अनुषांगिक संगठन काम कर रहे हैं। देश भर में करीब डेढ़ लाख प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। शुरुआती दौर में मोहन भागवत संघ के अबतक के सबसे कमजोर सरसंघचालक कहे जाते थे। 2014 के बाद स्थितियां बदली और आज सरसंघचालक के चारों तरफ Z प्लस सुरक्षा का घेरा चलता है। यह जान के खतरे की बजाय उनके सियासी हैसियत की गवाही देता है। संघ के ताजा उभार को इतने से समझा जा सकता है कि मंत्रिमंडल विस्तार से ठीक दो दिन पहले बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष संघ की बैठक में सामान्य कार्यकर्ता की तरह पिछली सीट पर बैठा देखा जाता है। मोहन भागवत एक व्यवहारिक नेता हैं। वह आधुनिकता के साथ हिंदुत्व को अपनाने की पैरवी करते हैं। संघ की मूलभूत विशिष्टताओं को बरकरार रखते हुए मोहन भागवत समय के साथ बदलने में विश्वास रखते हैं। मोहन भागवत हिंदू धर्म और इसकी मान्यताओं का पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन वह अस्पृश्यता के बड़े विरोधी हैं। उनका मानना है कि हिंदू धर्म अनेकता में एकता को अपने अंदर समाहित किए हुए है, यहां बिना किसी भेदभाव के सभी अनुयायियों को बराबर स्थान और सम्मान मिलना चाहिए। बहरहाल, नजरें जितनी नजदीक तक जाती हैं उतनी ही तरेरती भी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर हमेशा से विरोधियों के द्वारा सवाल उठाए जाते रहे हैं। एक जमाने तक आरएसएस पर रायसीना हिल से एक बार नहीं तीन-तीन बार पाबंदी लगी। वक्त का पहिया घूमा, समय चक्र तेजी से चल रहा था। आज संघ के लोग रायसीना हिल पर काबिज़ हैं। जो लोग समय को नहीं समझ पाते, समय उन्हें पीछे छोड़ देता है और जो वक्त से लड़ाई में नहीं हारते, वक्त उन्हें अपने सिर पर बिठा लेता है।

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