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स्वर्णिम इतिहास हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन, अध्याय – 8 ( क ) वफादारी और गद्दारी का संगम

जब मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण की सूचना राजा दाहिर सेन को प्राप्त हुई तो उन्होंने पहले से ही अपनी रक्षा तैयारियां करनी आरम्भ कर दी थीं। उस समय राजा दाहिर सेन ने बहुत ही दूरदर्शिता और कूटनीतिक दृष्टिकोण से कार्य किया। उन्होंने देश ,धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उन सभी शक्तियों का सहयोग लेना उचित समझा जो अभी तक उनसे या तो रुष्ट थीं या किसी कारण से दूरी बनाए हुए थीं।

सबको साथ लगायकर चले थे सेन नरेश।
सब मिल उन्नति करें आगे बढ़े निज देश।।

दाहिर सेन ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए पदच्युत किए गए गुर्जर, जाट और लोहाणों को पुन: अपने साथ लिया और उन्हें उचित सम्मान देते हुए अतीत की कड़वाहट को भूलने के लिए प्रेरित किया।
राजा दाहिर सेन के इस प्रकार के सद्भावपूर्ण प्रस्ताव का समर्थन करते हुए गुर्जर,जाट और लोहाणों ने भी उदारता और अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया। उन्होंने देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए सहर्ष राजा दाहिर सेन के साथ मिलकर काम करना स्वीकार किया। इस प्रकार भारतवर्ष में राजा दाहिर सेन के साथ बड़ी शक्तियों ने मिलकर काम करने का निर्णय लेकर न केवल अपनी दूरदर्शिता का बल्कि देश भक्ति का भी परिचय दिया। लोग एक साथ एक उद्देश्य के प्रति समर्पित होकर राजा दाहिर सेन के नेतृत्व में काम करने को तैयार हो गए।
भारतीय इतिहास में घटी ऐसी घटनाओं का हमें विशेष दृष्टिकोण से अवलोकन करना चाहिए, जब किसी एक राजा ने अपने आपसे असंतुष्ट या रुष्ट शक्तियों को विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सहायता देने के लिए आमंत्रित किया और उन असन्तुष्ट शक्तियों ने सहर्ष अपने देश के लिए उक्त राजा के साथ मिलकर काम करना उचित समझा।
ऐसी घटनाओं से हमें यह पता चलता है कि राष्ट्रीय आपदा के समय हमने मिलकर काम करने में भलाई समझी है ।

भारतीयों ने त्याग दिये व्यक्तिगत स्वार्थ

उस समय भारतवासियों ने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्यागकर बड़े स्वार्थ अर्थात राष्ट्रीय हितों पर काम करना उचित समझा है। हम भारतवासियों को हमारे पूर्वजों के इस प्रकार के देशभक्ति पूर्ण कार्यों से परिचित नहीं कराया जाता। केवल ‘फूट-फूट’ को इस प्रकार प्रदर्शित व बार-बार दोहरा जाता है कि हम इतिहास को पढ़ते समय अपने बारे में यही मान लेते हैं कि हमारे पूर्वजों में बड़ी गहरी फूट थी ? वे किसी भी एक मुद्दे पर एकमत होकर काम करने को कदापि तैयार नहीं होते थे। वैसे यह ध्यान रखना चाहिए कि गुर्जर, जाट और लोहाणा लोग क्षत्रिय समाज के लोग रहे हैं और क्षत्रिय समाज राष्ट्र रक्षा को अपना सर्वोपरि कर्तव्य प्राचीन काल से समझता आया है।

‘फूट-फूट’ तो सब कहैं मैं कहता कुछ और ।
‘लूट – लूट’ की सोच को लाया मुस्लिम दौर।।

ऐसी परिस्थितियों में जब राजा दाहिर सेन ने इन सभी लोगों को अपना साथ देने के लिए आमंत्रित किया तो उन सभी ने राजा को बढ़-चढ़कर अपना सहयोग दिया। उस समय राजा दाहिर सेन के लोगों ने राष्ट्रवाद की अलख जगाने के लिए अब तक के इतिहास में अनोखा कार्य किया। जिसका उदाहरण हमें आज के सन्दर्भ में भी लेना चाहिए। राजा का पूरा परिवार देश रक्षा के लिए मैदान में उतर आया। राजा और उसके परिवार के सदस्यों ने राजसिक सुखों को त्यागकर जनता के बीच जाकर काम करने में भलाई समझी।

राजा की वीरांगना बेटियां

महाराजा दाहिर की दोनों पुत्रियों राजकुमारी परमाल और सूर्यकुमारी ने भी अपने आपको देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वह सिंध के गांव-गांव में जाकर घूमने लगीं और युवा शक्ति को सेना में भर्ती होकर देश सेवा के लिए प्रेरित करने लगीं। उनकी वीरता, सादगी और देशभक्ति को देखकर लोगों में एक अलग ही तरह का उत्साह, उमंग और देशभक्ति का भाव पैदा होने लगा । राजा की वे बेटियां जिस गांव में भी जातीं वहीं लोगों की बड़ी भीड़ उन्हें देखने ,सुनने और उनके साथ काम करने के लिए एकत्रित हो जाती ।
लोगों में देशभक्ति का एक अलग ही भाव पैदा हो चुका था । सभी मिलकर विदेशी शत्रु का सामना करने के लिए तैयार थे और इसके लिए अपनी ओर से जो भी बलिदान करने की आवश्यकता हो – उसे वह करने के लिए पूर्णतया तैयार थे। अपनी दोनों राजकुमारियों के प्रति लोगों की भावाभिव्यक्ति ऐसी थी कि वे भाव विभोर होकर अपना सर्वस्व उनके लिए समर्पित करने को तैयार थे। उन लोगों को यह बात विशेष रूप से प्रेरित और उत्साहित कर रही थी कि राजा की बेटियां स्वयं उनके बीच आकर देशभक्ति का आह्वान कर रही थीं।
राजा की बड़ी बेटी लोगों के समक्ष खड़े होकर यह बोलती कि ”देश आज आपको पुकार रहा है। अपने युवा शक्ति का आवाहन कर रहा है कि देश के लिए उठ खड़े होओ और माँ भारती का सम्मान बचाने के लिए विदेशी शत्रु का मिलकर सामना करो। विदेशी शत्रु के सामने यदि एकताबद्ध खड़े होकर हमने उसका सामना नहीं किया और उसे धूल नहीं चटाई तो हमारी भारतीय संस्कृति का नाश होना तय है। यदि हम आज जागरूक नहीं हुए तो हमारा धर्म नहीं बचेगा और हमारी बहन बेटियों का सम्मान नहीं बचेगा। भारत की वैदिक संस्कृति के शत्रुओं का नाश किया जाना समय की आवश्यकता है । इसके लिए भारत की जवानी यदि नहीं मचली तो संसार से मानवता और नैतिकता का पतन आरंभ हो जाएगा। भारत के नौजवानों को अपनी नौजवानी विदेशी शत्रु के विनाश के लिए लगानी चाहिए।

“यौवन मचलता देश का ,
धर्मार्थ ही उद्देश्य था,
हिंद की उन बेटियों का
सहयोग कुछ विशेष था।।
सर्वत्र जय जयकार था
भारत भय शत्रु पे सवार था।
अपनी बेटियों के ‘अभियान’
से भारत युद्ध को तैयार था।।”

हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस्लाम का यह तूफान जिस प्रकार भारत की ओर चढ़ा आ रहा है, वह अबसे पहले जिस प्रकार कई संस्कृतियों और देशों की सभ्यताओं को लील चुका है, वह अब ऐसा ही भारत के साथ करने वाला है । इसलिए इस तूफान को समाप्त करने के लिए हम सब मिलकर सामना करें, यही समय की आवश्यकता है।”

दिया लोगों ने भरपूर समर्थन

अपनी राजकुमारियों के इस प्रकार के वचनों और उत्साहपूर्ण संबोधन को सुनकर बच्चा – बच्चा अपने राजा के साथ उठ खड़ा हुआ । हिन्द की दोनों बेटियों ने उस समय जो कुछ भी किया वह ‘सिन्ध’ के लिए ना करके ‘हिंद’ के लिए किया था । उनके देश भक्तिपूर्ण शब्दों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। राजकुमारी जिस प्रकार की संयत और देशभक्ति पूर्ण भाषा का प्रयोग कर रही थीं, उससे लोगों के भीतर उत्साह छलांगें मार रहा था। अपनी राजकुमारी के संबोधन के बीच नौजवान ‘हिंद की जय’ ‘सिन्ध की जय’ और ‘राजा दाहिर सेन की जय’ के गगनभेदी नारे लगाते रहे और अपने उत्साह के माध्यम से अपनी राजकुमारियों का मनोबल बढ़ाते रहे।
राजकुमारियों के इस महान कार्य पर हमें गर्व और गौरव की अनुभूति होनी चाहिए। क्योंकि इतिहास में ऐसे कम ही उदाहरण मिलते हैं जब किसी राजा की बेटियों ने देश सेवा के लिए इस प्रकार का अनुपम और वीरता पूर्ण कार्य किया हो। उन्होंने उस समय देश की रक्षा के लिए एक अभियान चलाया और उस अभियान का नेतृत्व अपने हाथों में लेकर यह सिद्ध किया कि जब देश की रक्षा की बात आएगी तो देश की बेटियां भी पीछे रहने वाली नहीं हैं। इसके लिए वे के राजभवनों के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन को त्यागने के लिए ही तैयार नहीं हैं, बल्कि किसी भी प्रकार का बलिदान देने तक के लिए तैयार हैं।
राजकुमारियों के इस महान अभियान को देश के लोगों ने जिस प्रकार अपना सहयोग और समर्थन प्रदान किया उससे यह पता चलता है कि भारत का राष्ट्रवाद बड़ा गहरा और व्यापक है । यह हर उस काल में अपने उफान पर आया है जब इसने देखा है कि देश की संस्कृति के लिए शत्रु देश के शौर्य को ललकार रहा है। दोनों राजकुमारियों के ओजस्वी भाषणों को सुनकर लोग देश सेवा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए तैयार हो गए। उस समय सिंध में चारों ओर देशभक्ति का एक अलग ही दृश्य उपस्थित हो गया था। तनिक सी आवाज पर लोग एक साथ मिलकर मां भारती के लिए संकल्पित होकर ‘हर हर महादेव’ का नारा लगाते और अपनी एकता का परिचय देते।

सिंध प्रांत का सूबेदार ज्ञानबुद्ध

देश के लिए विभिन्न मत मतान्तर भारतीय राष्ट्रवाद के विचार को प्रभावित करने में बहुत अधिक सफल रहे हैं । राजा दाहिर सेन ने उस समय देवल का सूबेदार बौद्ध मत के ज्ञानबुद्ध को बना दिया था। महात्मा बुध्द यद्यपि अपने काल में एक समाज सुधारक के रूप में सामने आए थे, वेद के नाम पर जिस प्रकार हिंसा को लोगों ने धर्म का एक अंग बना लिया था उसके विरुद्ध महात्मा बुद्ध ने उस समय एक सफल क्रांति की थी। उन्होंने लोगों को बताया था कि अहिंसा ही हमारा परम धर्म है, इसलिए वेदों के नाम पर यज्ञ आदि में ऐसा मत कीजिए।

वेदों के आदर्श का
उद्धार बुद्ध ने किया,
वेदों के अपकर्ष का
उत्कर्ष बुद्ध ने किया।
उनके बाद इस संघर्ष को
नया मोड़ लोगों ने दिया।
अर्थ का अनर्थ कर
नया तोड़ लोगों ने दिया।।

कालांतर में महात्मा बुद्ध के इस सिद्धांत की अति हो गई। जिससे लोग बौद्ध धर्म को स्वीकार करने का अर्थ यह लगाने लगे कि अब हमें हिंसा किसी भी स्थिति परिस्थिति में नहीं करनी है। ‘जबकि आपत्ति काल में कोई मर्यादा नहीं होती’ – ऐसा भारतीय सिद्धांत कहता है , जिसे लोगों ने महात्मा बुद्ध की अहिंसा की अति के कारण विस्मृत कर दिया। फलस्वरूप अनेकों लोग अहिंसावादी बनकर समय आने पर राष्ट्र धर्म से ही मुख फेर कर बैठ गए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सम्राट अशोक का है। जिसने महात्मा बुद्ध के बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के उपरान्त अपनी तलवार को ही खूंटी पर टांग दिया था और यह घोषणा कर दी थी कि वह अब हिंसा नहीं करेगा।
यदि महात्मा बुद्ध के जीवन पर हम प्रकाश डालें या विचार करें तो पता चलता है कि वह वेद धर्म के ही सुधारक थे। उन्होंने राजाओं को हथियार खूंटी पर टांगने की सलाह नहीं दी थी। उन्होंने राज्य विस्तार के लिए लोगों की हत्या करने वाले राजाओं को ऐसा करने से रोकने का सुझाव दिया था। उनके दृष्टिकोण में जन कल्याण राजा का सबसे बड़ा धर्म है, इसलिए उसे अपने राज्य विस्तार के लिए हत्याएं नहीं करनी चाहिए। उनकी शिक्षाओं का अनुचित अर्थ लगाकर लोगों ने अहिंसा को सही ढंग से नहीं समझा।

(हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “राष्ट्र नायक राजा दाहिर सेन” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹175 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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