पाकिस्तान की कीमत पर भारत का साथ देने की तालिबान की बात कितनी उचित हो सकती है ?

अशोक मधुप 

तालिबान से दूसरे चैनल से बातचीत का ही परिणाम है कि भारत अफगानिस्तान से बड़ी सरलता है अपने नागरिक निकाल लाया। वहां से अपने दूतावास को बन्द कर अपने स्टाफ और नागरिकों को वापस भारत बुलाकर अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार को अपनी नाराजगी भी प्रकट कर दी।

कोई कुछ भी कहे किंतु यह सत्य है कि विदेश नीति पर भारत बहुत सोच समझ कर कदम बढ़ा रहा है। अफगानिस्तान में भले ही उसने अपना दूतावास बंद कर दिया हो, दूतावास से अपना स्टाफ और वहाँ से भारतीय नागरिक भारत बुला लिए हों किंतु वहां सरकार में आए तालिबान से वह दूसरे रास्तों से जुड़ा रहा। दूसरे चैनल से बात जारी रखी। इसी का प्रतिफल रहा कि दोहा में तालिबान के विदेश मंत्री ने वहां के भारतीय राजदूत से मुलाकात की थी। यह तो स्पष्ट नहीं हुआ कि क्या बात हुई, किंतु तालिबान के बयान ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान के लिए वह भारत से संबंध समाप्त नहीं करना चाहेगा। उससे दोस्ती  चाहेगा। उससे अपने देश में विकास और मदद चाहेगा।

तालिबान के विदेश मंत्री शेर मोहमम्द अब्बास स्टेनकजई ने दोहा में जारी अपने बयान में कहा कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान को मदद या समर्थन देने की बात उन्होंने कभी नहीं की है। उन्होंने साफ कहा कि  भारत-पाकिस्तान के आपसी विवाद में हमें न घसीटें। नए विदेश मंत्री बोले कि हम पड़ोसी मुल्कों से अच्छे संबंध चाहते हैं। स्टेनकजई ने कहा कि तालिबान की ओर से भारत के खिलाफ पाकिस्तान का समर्थन करने का कोई बयान या संकेत नहीं दिया गया है।
स्टेनकजई ने कहा कि भारत पाकिस्तान अपनी लंबी सीमा पर आपस में लड़ सकते हैं। इसके लिए उन्हें अफगानिस्तान का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हम किसी भी देश को ऐसा कुछ भी करने के लिए अफगानिस्तान की जमीन का उपयोग नहीं करने देंगे। उन्होंने कहा कि मुझे दोनों के बीच लंबे समय से जारी राजनीतिक और भौगोलिक विवादों की समझ है। यह उनके अंदरूनी विवाद हैं। यही उम्मीद करता हूं कि इसमें अफगानिस्तान का इस्तेमाल नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को युद्ध से खस्ताहाल हो रहे अफगानिस्तान में अपनी कूटनीतिक मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए।
दरअसल अफ़गानिस्तान का नया तालिबानी शासन यह भी जानता है भारत ने बिना किसी प्रतिफल के अफगानिस्तान में डैम, सड़क, बिजलीघर, स्कूल और अस्पताल आदि बनवाये हैं। वे उनके और उनके देशवासियों के लाभ के हैं। ऐसे में उससे सम्बन्ध बनाकर और विकास कार्य भी कराए जा सकते हैं। तालिबान सरकार के विदेश मंत्री के इस बयान से साफ हो गया है कि अफगानिस्तान के मसले पर भारत के प्रयास बहुत कामयाब रहे हैं।
तालिबान से दूसरे चैनल से बातचीत का ही परिणाम है कि वह अफगानिस्तान से बड़ी सरलता है अपने नागरिक निकाल लाया। साथ ही वहां से अपने दूतावास को बन्द कर अपने स्टाफ और नागरिकों को वापस भारत बुलाकर अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार को अपनी नाराजगी भी प्रकट कर दी। दोहा से जारी स्टेनकजई के इस बयान को पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। पाकिस्तान को यह उम्मीद थी कि कश्मीर में तालिबान न केवल उसका साथ देगा, बल्कि आतंकवाद को बढ़ावा देने में भी मदद करेगा। स्टेनकजई ने साफ कहा कि मीडिया में इस प्रकार की बातें आ रही हैं, लेकिन वे सब मनगढ़ंत हैं। हम सभी पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं।

तालिबान के विदेश मंत्री के बयान से पूर्व हमने पहले भी कहा था अफगानिस्तान में कोई सरकार हो, वह वहां भारत द्वारा किए गए खरबों डालर के निवेश को नजर अंदाज नहीं कर सकती। अच्छे संबंध रखेगी तो और ज्यादा निवेश आएगा। खस्ताहाल उनके देश में विकास के रास्ते खुलेंगे। सत्ता पर कब्जे के बाद उसकी प्राथमिकता अफगानिस्तान का विकास, जरूरत का सामान और जनता को जरूरत की चीज उपलब्ध कराना है। वैसे भी भारत से उसके दूसरे हित भी हैं। खरबों डॉलर का भारत से प्रति वर्ष व्यापार होता है। तालिबान जानता है कि उसके कार्य से पूरी दुनिया नाराज है। वह उन्हें अब कोई मदद नहीं देगी। मदद चाहिए, देश का विकास चाहिए तो उसे अपना आचरण बदलना होगा। पाकिस्तान ने सिर्फ उनके लड़ाकों को अब तक प्रशिक्षण दिया है। विकास के नाम पर कुछ खास नहीं किया। आज उसकी हालत अपने आम ही बहुत खस्ता है। उसके देश में भुखमरी का आलम है। आज उसे खुद मदद चाहिए। दूसरों की वह क्या मदद करेगा।
उधर तालिबान के विदेश मंत्री ये इस बयान से उन अफवाहों को भी विराम मिल गया, जिसमें कहा जा रहा था कि अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान पाकिस्तान में सक्रिय भारत के दुश्मन आतंकियों को वह खतरनाक हथियार दे रहे हैं, जो अमेरिका अफगानिस्तान में छोड़ गया है। दूसरे तालिबान को आज खुद को बढ़िया हथियार चाहिए, उसे आज ज्यादा जरूरत है। अभी उसकी लड़ाई जारी है। वह अपनी जरूरत के होते बढ़िया हथियार दूसरों को क्यों देगा। वह तो अपनी जरूरत के लिए अपने पास सम्भाल कर रखेगा। एक बात और भारतीय विदेश नीति की ही ये कामयाबी है कि पाकिस्तान के एयर बेस में आज भी अमेरिका मौजूद है। तालिबान अमेरिका को अपना पक्का दुश्मन मानता है। पाकिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी ये बताने के लिये काफी है कि पाकिस्तान उसके सबसे बड़े दुश्मन की मदद कर रहा है। पाकिस्तान एयरबेस में अमेरिका की मौजूदगी स्वीकार भी कर चुका है। वह पाकिस्तान जो इस्लामिक देशों का रहनुमा बनने के सपने देख रहा था, वह आज अमेरिका को अपना एयर बेस सौंप कर इस्लामिक देशों के सामने नँगा हो चुका है। प्रायः सारे इस्लामिक देश अमेरिका को पसन्द नहीं करते। तालिबान तो उसे अपना पक्का दुश्मन मानता है।

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