नई दिल्ली को शिक्षा लेनी होगी कि गंधार अपनी गलतियों से जल रहा है


आज कंधार जल रहा है । संभवत: अपनी पुरानी गलतियों का हिसाब चुकता कर रहा है। जब कंधार ने वैदिक धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो यह अहिंसावादी हो गया । जब इसके अहिंसावादी स्वरूप के सामने इस्लाम की नंगी तलवार आकर खड़ी हुई तो यह उसका सामना नहीं कर पाया। बहुत जल्दी अफगानिस्तान के भारतीय क्षेत्र का इस्लामीकरण हो गया। यदि अफगानिस्तान के निवासी बौद्ध धर्म की अहिंसा के दीवाने ना होते तो बहुत संभव था कि वे इस्लाम की तलवार के शिकार भी ना होते। इसी को कहते हैं कि ”लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई।” आज के भारत को अफगानिस्तान के इस सच से बहुत सीखने की आवश्यकता है । यदि ‘अहिंसा परमो धर्म:’ – का गीत गाते गाते हमने भी अफगानिस्तान के मूल निवासियों जैसी मूर्खता को गले लगाया तो कल को हमारे लिए भी कोई यही कहेगा कि ‘दिल्ली जल रही है।’
     आज कई लोग ऐसे हैं जो देश की केंद्रीय सरकार पर यह दबाव बना रहे हैं कि अफगानिस्तान में आयी मानवीय समस्या के दृष्टिगत वहां के मुस्लिम शरणार्थियों को शरण दी जाए। हमारा मानना है कि जो लोग ऐसी मांग मांग कर रहे हैं वह इतिहास से कोई शिक्षा न लेकर एक बड़ी मूर्खता करवाने की तैयारी केंद्र सरकार से करवाना चाहते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार से हमारा विनम्र आग्रह है कि किसी भी स्थिति में किसी भी अफगानिस्तानी मुस्लिम को यहां शरण ना दी जाए। क्योंकि शरण मांगने वाले विदेशी ही इस देश के लिए गद्दार सिद्ध हुए हैं।
हमें इतिहास को अपने सामने एक आईने के रूप में रखना चाहिए और उसमें अपना चेहरा देखकर ही काम करने का आदी होना चाहिए।
   देश के प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी और उनके सभी रणनीतिकारों के लिए यह समझना आवश्यक है कि एक बार कंधार के तत्कालीन शासक अमीर अली खान पठान को किसी कारण से जैसलमेर राज्य में शरण लेनी पड़ी। तब यहां के महारावल लूणकरण थे। वे महारावल जैतसिंह के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उनके बाद यहां के शासक बने। महारावल लूणकरण भाटी बहुत ही देशभक्त, संस्कृति और धर्म के प्रति अनुराग रखने वाले महान शासक थे। पर विदेशियों के अनुरोध पर शरण देने की भारत की परंपरागत बीमारी के वह भी शिकार थे। जब उनके सामने अफगानिस्तान के इस शासक का शरण देने संबंधी प्रस्ताव आया तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। क्योंकि वह मानते थे कि जिस विदेशी शासक की ओर से यह प्रस्ताव आया है वह तो उनका पहले से ही मित्र है और मित्र भविष्य में कभी भी गद्दारी नहीं कर सकता । बस, इसी भूल में महारावल ने विदेशी गद्दार को अपने यहां शरण दे दी, जिसके भविष्य में उन्हें भयंकर परिणाम भुगतने पड़े।
जब तक महारावल लूणकरण भाटी के किले और उनके सुरक्षा चक्र का इस विदेशी तथाकथित अतिथि को सही ज्ञान नहीं हुआ तब तक तो वह शांत बैठा रहा , पर जैसे-जैसे उसे महारावल के विषय में जानकारी होती गई वैसे-वैसे उसके भीतर गद्दारी का भाव विकसित होने लगा ।
लम्बे समय से दुर्ग में रहते हुए अमीर अली खान पठान को किले की व्यवस्था और गुप्त मार्ग की सारी जानकारी मिल चुकी थी।
अब उसके मन में दिन रात एक ही योजना बनने लगी कि कैसे इस किले पर अपना अधिकार स्थापित किया जाए और लूणकरण भाटी व उसके परिवार का अंत कर हिंदुस्तान में अपनी सल्तनत कायम की जाए ? अपने विदेशी अतिथि के इस गद्दारी भाव से पूर्णतया बेखबर राजा लूणकरण भाटी उसके प्रति प्रेम और अनुराग का भाव प्रकट करते रहे और आस्तीन के सांप को दूध पिलाते रहने का कार्य करते रहे। उन्हें तनिक भी यह ज्ञान और भान नहीं हो पाया कि इस विदेशी अतिथि के मन मस्तिष्क में उनके प्रति कैसी योजनाएं बन रही हैं ? वे अंधे होकर अपने इस विदेशी अतिथि की बातों पर विश्वास करते थे और उसके साथ अपनी कूटनीतिक व रणनीतिक योजनाओं पर भी विचार विमर्श कर लिया करते थे। महारावल को सपने में भी यह विचार कभी नहीं आया कि यह विदेशी अतिथि उनके विनाश की योजनाएं बना रहा है।
  इधर राजकुमार मालदेव अपने कुछ मित्रों और सामंतों के साथ शिकार पर निकल पड़े। अमीर अली खान पठान ने इस अवसर को अपने लिए सर्वथा अनुकूल समझा। उसने देख लिया कि अब महारावल और उसकी महारानी इस समय महल में उतने सुरक्षित नहीं है, जितने होने चाहिए । अतः उसने अपनी योजना को गंभीरता से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया।
  वह पहले से ही यह योजना बना चुका था कि जब उचित अवसर आएगा तो महारावल लूणकरण भाटी को किस प्रकार अपने विश्वास में लेकर उसके किले को छीनने की योजना पर काम किया जाएगा? अब उसने महारावल लूणकरण भाटी को संदेश भिजवाया कि यदि महारावल उसे आज्ञा दें तो उसकी पर्दानशीन बैगमें रनिवास में जाकर महारानी और रनिवास की अन्य महिलाओं से मुलाकात कर लें। उसने महारावल को भ्रमित करते हुए और उसे अपने विश्वास में लेते हुए कहा कि इस प्रकार की मेल मुलाकातों से दोनों राज्य परिवारों की महिलाएं एक दूसरे के निकट आ सकेंगी और एक दूसरे को समझ सकेंगी ।

महारावल पठान की बातों में आ गए और उन्होंने बिना आगा पीछा सोचे अपने विदेशी अतिथि को इस बात की अनुमति दे दी कि उसकी महिलाएं रनिवास में जाकर महारानी और राजपरिवार की अन्य महिलाओं से भेंट कर लें। महारावल की अनुमति प्राप्त करते ही पठान की बांछें खिल गई। उसने ऊपर से तो विनम्रता का नाटक किया परंतु भीतर ही भीतर उसे इस बात की असीम खुशी हो रही थी कि महारावल लूणकरण भाटी उसकी बातों में आ गए हैं और आज वह अपने सपने को साकार होते देखेगा। अपनी योजना को क्रियान्वित करते हुए पठान ने बहुत सारी पर्दे वाली पालकी दुर्ग के भीतर भिजवानी आरंभ कर दीं। उन पालकियों में इस विदेशी गद्दार अतिथि ने अपने सशस्त्र सैनिकों को बैठा रखा था। कुछ देर में ही महल के मुख्यद्वार पर खड़े प्रहरियों को इस बात का आभास होने लगा कि दाल में कुछ काला है। अपनी बात की पुष्टि के लिए उन प्रहरियों ने एक पालकी का पर्दा हटा दिया। पर्दा हटते ही उन्हें भीतर किसी बेगम के दर्शन ना होकर दो तीन सशस्त्र सैनिकों के दर्शन हुए। जिन्हें देखकर वह सारी स्थिति को समझ गए। अब क्या था ? उन सैनिकों को देखते ही किले के भीतर मारकाट आरंभ हो गई।
हमारे वीर योद्धाओं ने उन षड्यंत्रकारी राक्षसों का संहार करना आरंभ कर दिया। सबको महारावल और राज परिवार की महिलाओं की सुरक्षा की चिंता थी, इसलिए अपने प्राणों की परवाह न कर सब वीर योद्धा उन विदेशी राक्षसों का विनाश करने में जुट गए।  चारों ओर अफरा -तफरी मच गई किसी को भी अमीर अली खान पठान के इस विश्वासघात की पहले भनक तक नहीं थी। कोलाहल सुनकर दुर्ग के सबसे ऊंचे बुर्ज पर बैठे प्रहरियों ने संकट के ढोल-नगाड़े  बजाने आरम्भ कर दिए। जिसकी घुर्राने की आवाज दस-दस कोश तक सुनाई देने लगी। महारावल ने रनिवास की सब महिलाओं को बुला कर अचानक आए हुए संकट के बारे में बताया। अब अमीर अली खान पठान से आमने-सामने युद्ध करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था। राजकुमार मालदेव और सांमत पता नहीं कब तक लौटेंगे। दुर्ग से बाहर निकलने के सारे मार्ग पहले ही बंद किए जा चुके थे। राजपरिवार की स्त्रियों को अपना सम्मान बचाने के लिए जौहर के सिवाय कुछ और उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक से किया गया आक्रमण बहुत ही भंयकर था और महल में जौहर के लिए लकड़ियां भी बहुत कम थी। इसलिए सब महिलाओं ने महारावल के सामने अपने अपने सिर आगे कर दिये और सदा सदा के लिए बलिदान हो गयीं। महारावल केसरिया बाना पहन कर युद्ध करते हुए रणभूमि में बलिदान हो गए । महारावल लूणकरण भाटी को अपने परिवार सहित चार भाई, तीन पुत्रों के साथ, कई विश्वास पात्र वीरों को खोकर मित्रता की कीमत चुकानी पड़ी। इधर रणदुंन्दुभियों की आवाज सुनकर राजकुमार मालदेव दुर्ग की तरफ दौड़ पड़े। वे अपने सामंतों और सैनिकों को लेकर महल के गुप्त द्वार से किले में प्रवेश कर गए और अमीर अली खान पठान पर प्रचण्ड आक्रमण कर दिया।अमीर अली खान पठान को इस आक्रमण की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। अंत में उसे पकड़ लिया गया और चमड़े के बने कुड़िए में बंद करके दुर्ग के दक्षिणी बुर्ज पर तोप के मुँह पर बांध कर उड़ा दिया गया। इस क्रूर घटना को इतिहास ने बड़ी निकटता से देखा और उसे अपने मर्म में छुपा भी लिया, पर दुर्भाग्य कि इससे इतिहास ने कोई शिक्षा नहीं ली।
आज जब इतिहास के दोबारा लिखे जाने की बातें हो रही हैं तो हमें इतिहास की इन घटनाओं को इसलिए पुन: लिखित करना चाहिए कि हमारा वर्तमान अतीत से शिक्षा लेकर भविष्य की उज्जवलता का निर्माण करे। देश की वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री मोदी जी को इतिहास की इस प्रकार की क्रूर घटनाओं को एक नजीर के रूप में देखना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि विदेशी गद्दार कभी भी हमारे अतिथि या शरणार्थी नहीं हो सकते। विशेष रूप से वे लोग जिनके लिए हम काफिर हैं। वे हमें चारे के रूप में तो प्रयोग कर सकते हैं भाईचारे के रूप में कभी नहीं।
  कुल मिलाकर गंधार अपनी गलतियों से जल रहा है और हमें वे गलतियां नहीं दोहरानी हैं जिनका अंतिम परिणाम जलना या गलना होता है।

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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