प्रधानमंत्री मोदी के सीएए ने अपनी प्रासंगिकता सिद्ध कर दी है

नीरज कुमार दुबे 

दरअसल नागरिकता का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में इसलिए आया है क्योंकि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सीएए कानून की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहां बसे हिंदुओं और सिखों के युद्धग्रस्त देश छोड़ने की स्थितियों का हवाला दिया है।

भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में जिस तरह के हालात हैं उसको देखते हुए नागरिकता संशोधन कानून को लागू किया जाना बेहद आवश्यक हो गया है। संसद के दोनों सदनों से पारित इस कानून के नियम चूँकि अभी तक नहीं बने हैं इसलिए सरकार को इस काम में तेजी लाने की जरूरत है। वैसे तो नागरिकता संशोधन कानून यानि सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को उनके मूल देश में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होने के आधार पर नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान करता है। लेकिन मोदी सरकार ने इस साल 17 अगस्त को घोषणा की थी कि वह सभी धर्मों के उन अफगान नागरिकों को आपातकालीन ई-वीजा जारी करेगी जो अफगानिस्तान में मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत आना चाहते हैं।

देश में जमकर हुआ था बवाल
हम आपको याद दिला दें कि मोदी सरकार ने जब नागरिकता संशोधन कानून पारित कराया था तब जमकर हंगामा हुआ था और इस कानून के विरोधियों ने देशभर में भ्रम फैलाते हुए दंगे-फसाद और विरोध प्रदर्शन कराये थे लेकिन इस कानून की पैरवी करते हुए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि आजादी के बाद से स्वतंत्र भारत ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के हिंदुओं, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों से ये वादा किया था कि अगर उनको जरूरत होगी तो वो भारत आ सकते हैं। यही इच्छा गांधी जी की थी और यही 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते की भी थी।
सीएए फिर से सुर्खियों में क्यों आ गया है?
दरअसल नागरिकता का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में इसलिए आया है क्योंकि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सीएए कानून की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहां बसे हिंदुओं और सिखों के युद्धग्रस्त देश छोड़ने की स्थितियों का हवाला दिया है। यही नहीं अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने भी सीएए विरोधियों को आड़े हाथ लेते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी नीतियों का ही परिणाम है कि आज अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आ रहे लोगों को सीएए कानून का लाभ मिलेगा। अफगानिस्तान के हालात तो टीवी समाचार चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से सबके सामने हैं ही साथ ही पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यकों पर जिस तरह अत्याचार बढ़ा है और वहां उनके धर्मस्थलों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएं जिस तरह बढ़ी हैं उससे परेशान होकर भारत आने वालों की मदद भी यही नागरिकता कानून ही करेगा।
नागरिकता कानून से संबंधित सारे तथ्य क्या हैं?
अब जब नागरिकता कानून एक बार फिर चर्चा में आ गया है तो आइये इस कानून से जुड़ा यदि आपका भी कोई सवाल है या मन में कोई भ्रम है तो उसे कुछ प्रश्नों और उनके उत्तर के माध्यम से दूर करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 1- क्या नागरिकता संशोधन कानून भारतीयों खासकर किसी भी हिंदू या मुस्लिम को प्रभावित करता है ?
उत्तर- नहीं। नागरिकता कानून में हुए संशोधन का किसी भी भारतीय नागरिक के साथ किसी भी तरह से कोई लेना-देना नहीं है। भारतीय नागरिकों को भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का इस कानून के जरिये किसी प्रकार का हनन नहीं होगा। यह कानून किसी भी भारतीय नागरिक चाहे वह हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो, बौद्ध हो, ईसाई हो या अन्य किसी धर्म का पालन करने वाला हो, किसी के भी अधिकार को जरा-सा भी प्रभावित नहीं करता है।
प्रश्न 2- नागरिकता संशोधन कानून किस पर लागू होता है ?
उत्तर- नागरिकता संशोधन कानून 2019 पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर पलायन कर भारत आये हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई विदेशियों के लिए प्रासंगिक है। यहां यह बात ध्यान रखनी होगी कि इन धर्मों के लोगों ने अगर सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर भारत में 31.12.2014 तक या उससे पहले प्रवेश किया है तो ही उन्हें नागरिकता मिलेगी।
प्रश्न 3- क्या पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से गैर-कानूनी रूप से भारत आए मुस्लिम अप्रवासियों को नागरिकता संशोधन कानून के अंतर्गत वापस भेजा जाएगा?
उत्तर- जी नहीं। नागरिकता संशोधन कानून का भारत में वैध या अवैध रूप से रह रहे किसी भी विदेशी को भारत से बाहर भेजने से कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ आपको एक बात समझनी होगी कि किसी भी विदेशी नागरिक को देश से बाहर भेजने, चाहे वह किसी भी धर्म या देश का हो, इसकी प्रक्रिया फॉरनर्स ऐक्ट 1946 अथवा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) ऐक्ट 1920 के तहत की जाती है। ये दोनों कानून, सभी विदेशियों- चाहे वे किसी भी देश अथवा धर्म के हों, देश में प्रवेश करने, रिहाइश, भारत में घूमने-फिरने और देश से बाहर जाने की प्रक्रिया को देखते हैं। 
अगर किसी विदेशी घुसपैठिये को देश से बाहर निकालना हो तो उसकी क्या प्रक्रिया होती है ? इसे भी समझिये। नागरिकता संशोधन कानून को एक साइड रख दीजिये यह कानून किसी को भी देश से नहीं निकाल सकता। हम यहाँ बात फॉरनर्स ऐक्ट 1946 अथवा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) ऐक्ट 1920 की कर रहे हैं। इन दोनों कानूनों के तहत सामान्य निर्वासन की प्रक्रिया सिर्फ गैरकानूनी रूप से भारत में रह रहे विदेशियों पर लागू होती है। अवैध रूप से आये लोगों को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया भी तब शुरू होती है जब कोई व्यक्ति द फॉरनर्स ऐक्ट, 1946 के तहत ‘विदेशी’ साबित हो जाये। यहाँ एक बात और समझने की जरूरत है कि यहां सिर्फ केंद्र की ही नहीं चलती बल्कि राज्य सरकारों और उनके जिला प्रशासन के पास फॉरनर्स ऐक्ट के सेक्शन 3 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) ऐक्ट 1920 के सेक्शन 5 के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियां होती हैं, जिससे वह गैरकानूनी रूप से रह रहे विदेशी की पहचान कर सकती हैं, हिरासत में रख सकती हैं और उस घुसपैठिये को उसके देश भेजने को केंद्र से कह सकती हैं।
प्रश्न 4– पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को इस कानून से कैसे फायदा होगा ?
उत्तर- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलने के बाद भारत आये शरणार्थियों के पास यदि पासपोर्ट, वीजा जैसे दस्तावेजों का अभाव है तो भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून ऐसे लोगों को भारतीय नागरिकता का अधिकार देता है लेकिन इसके लिए भारत में एक से लेकर 6 साल तक की रिहाइश अनिवार्य है। भारत में अन्य लोगों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए अभी 11 साल भारत में रहना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
प्रश्न 5- क्या इसका मतलब यह माना जाये कि इन 3 देशों के मुसलमानों को भारतीय नागरिकता कभी नहीं मिल सकती है ?
उत्तर- इस प्रश्न का जवाब है कि यह तीन देश ही क्यों, अन्य देशों के मुसलमान भी कभी भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं यदि वो पात्र हैं। एक बात सभी को स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि नागरिकता संशोधन कानून ने किसी भी देश के किसी भी विदेशी को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोका है बशर्ते कि वह भारतीय कानून के तहत मौजूदा सभी योग्यताओं को पूरा करे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि नरेंद्र मोदी के शासन की ही बात कर लें तो लगभग 3000 के आसपास पाकिस्तानी नागरिकों, हजार के पास अफगानी नागरिकों और 200 के लगभग बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है। इनमें से कई लोग इन तीन देशों में बहुसंख्यक समुदाय यानि मुस्लिम वर्ग से हैं। विदेशियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त होती रही है और यह जारी रहेगी बस सभी अनिवार्य शर्तों को पूरा करना होगा। यहाँ हम आपको वह आंकड़ा भी बताना चाहेंगे कि नरेंद्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद 2014 में जब बांग्लादेश के साथ सीमा समझौता किया गया था तो बांग्लादेश के पचास से अधिक हिस्सों को भारतीय क्षेत्र में शामिल किया गया और वहां के बहुसंख्यक समुदाय यानि मुस्लिम वर्ग के लगभग 14,864 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई थी।
प्रश्न 6- क्या पाकिस्तान में बलूचियों, अहमदिया और म्यांमार में रोहिंग्याओं को इस कानून के अंतर्गत रियायत नहीं दी जानी चाहिए ?
उत्तर- बलूच, अहमदिया और रोहिंग्या कभी भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं बशर्ते वो नागरिकता अधिनियम-1955 से संबंधित वर्गों में प्रदत्त योग्यता को पूरा करें। एक बार फिर आपको समझा रहे हैं कि नागरिकता अधिनियम-1955 के तहत नागरिकता संशोधन कानून किसी भी देश के किसी भी नागरिक को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से नहीं रोकता है। 

प्रश्न 7– कुछ लोगों का सवाल है कि क्या शरणार्थियों की देखभाल के लिए ‘संयुक्त राष्ट्र’ के तहत भारत का दायित्व नहीं बनता है ?
उत्तर- शरणार्थियों की देखभाल का दायित्व भारत का बनता है जनाब। भारत तो आजाद होने से पहले से शरणार्थियों की देखभाल करने का शानदार रिकॉर्ड रखता है। नागरिकता संशोधन कानून के तहत किसी भी शरणार्थी को बाहर नहीं भेजा जायेगा। अभी का आंकड़ा आपको बताएं तो भारत में दो लाख से अधिक श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती और पंद्रह हजार से अधिक अफगानी, 20-25 हजार रोहिंग्या और विदेशों से सैंकड़ों अन्य शरणार्थी वर्तमान में रह रहे हैं। भारत को यह उम्मीद है कि जब कभी इन देशों की स्थिति सुधरेगी और हालात अनुकूल पाएंगे तो यह शरणार्थी अपने-अपने देशों को लौट जाएंगे। अभी इन शरणार्थियों को हर प्रकार की सुविधा दी जा रही है और इनके मानवाधिकारों की चिंता की जा रही है। लेकिन यहां एक बात और बताना चाहेंगे कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत जिन तीन देशों के अल्पसंख्यकों की बात की गयी है उन देशों के बारे में भारत सरकार का आकलन यह है कि वहां अल्पसंख्यकों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आने वाला है इसलिए उनकी चिंता करते हुए उन्हें भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है।
प्रश्न 8– तमिलनाडु के कुछ साथी पूछ रहे हैं कि भैया श्रीलंका के तमिलों का क्या होगा ?
उत्तरः आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1964 और 1971 में प्रधानमंत्री स्तरीय करार के बाद भारत ने चार लाख 61 हज़ार तमिलों को भारतीय नागरिकता प्रदान की है। इस समय 95 हज़ार तमिल लोग तमिलनाडु में रह रहे हैं और केंद्र और राज्य से सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं। ये लोग अपनी पात्रता पूर्ण होते ही भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसलिए श्रीलंकाई तमिलों की आड़ में भारतीय नागरिकता संशोधन कानून की आलोचना करना सही नहीं है।
प्रश्न 9- क्या नागरिकता संशोधन कानून में नस्ल, लिंग, राजनीतिक अथवा सामाजिक संगठन का हिस्सा होने, भाषा व जातीयता के आधार पर होने वाले भेदभाव से पीड़ित लोगों को भी संरक्षण देने का प्रस्ताव है?
उत्तर- नहीं। नागरिकता कानून सिर्फ भारत के तीन करीबी देशों- जिनका अपना राजधर्म है, के छह अल्पसंख्यक समुदायों की सहायता करने के उद्देश्य से लाया गया है।
प्रश्न-10. क्या नागरिकता संशोधन कानून के बाद एनआरसी आयेगा और मुस्लिमों को छोड़कर सभी प्रवासियों को नागरिकता देगा ?
उत्तर- नागरिकता संशोधन कानून का एनआरसी से कोई संबंध नहीं है।
प्रश्न 11- क्या नागरिकता संशोधन कानून धीरे-धीरे भारतीय मुस्लिमों को भारत की नागरिकता से बाहर कर देगा?
उत्तर- नहीं, नागरिकता संशोधन कानून किसी भी भारतीय नागरिक पर किसी भी तरह से लागू नहीं होगा।
प्रश्न 12- क्या पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अलावा अन्य देशों में धार्मिक आधार पर भेदभाव का सामना कर रहे हिंदू भी नागरिकता कानून के अंतर्गत नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं?
उत्तर- नहीं। उन्हें भारत की नागरिकता लेने के लिए सामान्य प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके लिए उन्हें या तो पंजीकरण करवाना होगा अथवा नागरिकता हासिल करने के लिए आवश्यक समय भारत में गुजारना होगा। नागरिकता कानून लागू होने के बाद भी द सिटिजनशिप एक्ट, 1955 के तहत कोई प्राथमिकता नहीं दी जायेगी।

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