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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

‘प्रिवीपर्स’ के जीवनमरण की कहानी

जब 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ तो बड़ी अजीब स्थिति उस समय इस देश की थी। कहने के लिए तो भारत ने उस समय लोकतंत्र का स्वरूप ग्रहण कर लिया था और देश की सत्ता की बागडोर पं. नेहरू ने संभाल ली थी। परंतु अभी कई समस्याएं ऐसी थीं जिन पर पार पाना आवश्यक था। सरदार पटेल देश की रियासतों के एकीकरण की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जटिल चुनौती का सामना कर रहे थे। जिसमें वह अप्रत्याशित रूप से सफल भी रहे-पर जहां वह असफल रहे वहां उन्हें असफल किया गया था। हमारा संकेत कश्मीर की ओर ही है।

देश के संविधान के निर्माण की तैयारियां चल रही थीं। देश की संविधान सभा में सदस्यगण बड़ी गंभीरता से देश के संविधान के निर्माण में अपना-अपना सहयोग दे रहे थे। उन सबको भी भली-भांति ज्ञात था कि देश इस समय कैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है? उस समय विभाजन की पीड़ा को झेल रहे देश के सामने अपने राजे-रजवाड़ों की संवैधानिक स्थिति का निर्धारण करना भी आवश्यक था। उस समय बहुत सी रियासतें ऐसी थीं, जिनके राजा महाराजा के साथ यदि कोई अन्याय होता तो उनकी जनता उनके साथ संघर्ष के लिए सडक़ों पर उतर आती। यद्यपि देश लोकतंत्र में ढलने की तैयारी कर रहा था, परंतु अपने लोकप्रिय शासकों के प्रति परंपरा से श्रद्घालु रही भारतीय जनता का कई रियासतों में अपने राजा को अधिकार विहीन कर देने की स्थिति में उसके समर्थन में संघर्ष करने की संभावना थी।

वैसे भारत के राजा-महाराजा उस समय अधिक भारी नही रह गये थे। स्वतंत्रता आंदोलन में लगभग अपनी अनुपस्थिति दिखाकर वह अपने आपको देश की राष्ट्रीय सत्ता से स्वयं ही दूर कर चुके थे। पर जब अंग्रेजों ने स्वतंत्र भारत के साथ या नवोदित पाकिस्तान के साथ जाने या अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाये रखने के लिए राजा-महाराजाओं को स्वतंत्र छोड़ दिया तो उनके पंख निकल आये। तब कई राजाओं ने स्वतंत्र भारत में अपने लिए विशेषाधिकार मांगकर अपनी ‘विशेष स्थिति’ बनाये रखने की बात कही। संविधान सभा यद्यपि भारत में विधि के समक्ष समानता और समान नागरिक संहिता की बात कर रही थी, परंतु किसी भी असहज स्थिति से बचने के लिए उसने समझौतावादी और तुष्टिकरणपरक नीति का अवलंबन किया। संविधान सभा ने संविधान में राजाओं की विशेष स्थिति मान ली और उन्हें कुछ विशेषाधिकार दे दिये। जिनसे उनके राजकीय वैभव को बनाये रखने में सहायता मिल सके।

उस समय की भारत सरकार ने तत्कालीन राजा-महाराजाओं को भारतीय संघ के साथ स्वेच्छा से मिल जाने या अपनी रियासत का विलय पत्र देश की लोकतांत्रिक सरकार को सौंप देने की स्थिति में वचन दिया था कि उन्हें अपने परिवार, निजी स्टाफ और राजमहलों के रख-रखाव के लिए सरकारी कोष से कुछ धनराशि दी जाएगी। इसी को ‘प्रिवीपर्स’ का नाम दिया गया था। स्वतंत्रता से पहले कौन राजा कितनी सेना रख सकता था, या किसको कितनी तोपों की सलामी लेने का अधिकार था या किसका कितना बड़ा राज्य था, या किसकी कितनी शक्ति थी इत्यादि बातों को देखकर उसकी ‘हैसियत’ मापी जाती थी। ‘प्रिवीपर्स’ के विषय में भी इन्हीं बातों का ध्यान रखा गया। इस प्रकार यह आवश्यक नही था कि सभी राजाओं के प्रिवीपर्स समान होते।

राजाओं से ‘प्रिवीपर्स’ के विषय में वार्ता की गयी तो उसमें यह भी स्पष्ट हो गया था कि जो राजा उस समय थे, उनके जीवनकाल के लिए ही ये प्रिवीपर्स होंगे, उनके मरते जाने के पश्चात ये अगली पीढ़ी के लिए क्रमश: कम होते जाएंगे। इसका अभिप्राय था कि धीरे-धीरे एक दिन वह स्थिति ला दी जाएगी जब ‘प्रिवीपर्स’ स्वत: ही मर जाएंगे। राजा लोग इस बात से सहमत थे। ऐसी परिस्थितियों में देशी रियासतों के शासकों को ‘प्रिवीपर्स’ देने का वायदा संविधान में भी सम्मिलित कर लिया गया था। जिससे राजाओं का ‘प्रिवीपर्स’ भारत सरकार के लिए बंधनकारी दायित्व था। उधर जो लोग देश की स्वतंत्रता के पूर्व से ही भारत में पूर्ण लोकतंत्र स्थापित करने की बात करते आये थे, ऐसे लोगों को राजाओं के ‘प्रिवीपर्स’ देश में लोकतंत्र की आत्मा को कचोटने वाली व्यवस्था के समान लगे। इसलिए उन्होंने पहले दिन से ही ‘प्रिवीपर्स’ बंद कराने के लिए लेखनी धर्म का निर्वाह करना आरंभ कर दिया था। इन विश्लेषकों को आपत्ति थी कि देश में ‘प्रिवीपर्स’ की व्यवस्था समानता और न्याय के सिद्घांतों के विरूद्घ है। इन्हें जितनी शीघ्रता से समाप्त कर दिया जाए उतना ही उचित होगा।

‘प्रिवीपर्स’ के विरूद्घ उठती आवाज को इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में गहराई से सुना और उन्हें देश के खजाने पर व्यर्थ का बोझ बन गये ‘प्रिवीपर्स’ की अलोकतांत्रिक प्रणाली को समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने ‘प्रिवीपर्स उन्मूलन संबंधी विधेयक’ सितंबर 1970 में प्रस्तुत किया। लोकसभा में प्रस्तुत किये गये इस विधेयक को लोकसभा ने संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई बहुमत से पारित कर दिया। पर राज्यसभा में इसे आवश्यक दो तिहाई बहुमत से एक मत कम मिला। तब इंदिरा गांधी की सरकार ने राष्ट्रपति से अध्यादेश जारी कराकर यह ‘प्रिवीपर्स’ बंद करा दिये। कुछ लोग इस अध्यादेश के विरूद्घ उच्चतम न्यायालय में चले गये। तब उच्चतम न्यायालय ने 15 दिसंबर 1970 को इस अध्यादेश को अवैध घोषित कर दिया।

संघर्ष में इंदिरा गांधी हार मानने वाली नही थीं। उन्होंने ‘प्रिवीपर्स’ के मुद्दे पर पांचवें आम चुनाव 1971 में जनता से राय मांगी। जनता ने उन्हें अपना व्यापक समर्थन दिया जिससे इंदिरा जी को उस चुनाव में 350 सीटें मिलीं। जिससे देश की जनता के ‘मन की बात’  पता चल गयी कि वह चाहती क्या है? इस जीत के पश्चात इंदिरा गांधी ने ‘26वें संविधान संशोधन अधिनियम’ के माध्यम से देशी रियासतों के शासकों के ‘प्रिवीपर्स’ और विशेषाधिकारों का समूलोच्छेदन कर दिया। जिससे उनकी लोकप्रियता में भी असीम वृद्घि हुई। यह थी ‘प्रिवीपर्स’ के जीवन मरण की कहानी है।

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