सेकुलरिज्म: राष्ट्रद्रोह का दूसरा नाम

 

“स्वाधीनता आने पर मुस्लिम साम्राज्यवाद के कुछ अवशेष तो पाकिस्तान चले गए, किन्तु उनका एक वर्ग भारत में ही रहकर नए अवसर की बाट जोहने लगा। इस वर्ग के बहुसंख्यक लोग सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी में घुसकर अपनी सत्ता का उपयोग इस्लाम की सेवा के लिए करने लगे, कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टी में प्रश्रय पाकर प्रगतिशीलता की आड़ में इस्लाम का कुचक्र आगे बढ़ाने लगे, और शेष लोग अन्यान्य दलों में प्रविष्ट होकर इन दलों द्वारा इस्लाम की हिमायत करवाने लगे। दल चाहे कोई भी हो, काम एक ही करना था ― विशाल भारत में से बचे हुए भूखण्ड पर भी इस्लाम की विजयपताका फहराना। जमाते इस्लामी, मुस्लिम लीग, इत्तहादुल मुसलमान, जमायतुल उल्माए हिन्द इत्यादि पुराने मुस्लिम संगठन यथापूर्व बने रहे।
अन्तर केवल इतना आया कि विभाजन के पूर्व जो लोग सीना तानकर और आंखे लाल करके मज़हब, इतिहास तथा संस्कृति के नाम पर मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र बतलाते थे और अपनी बात मनवाने के लिए रक्तपात का भय दिखलाते थे, वे अब भारत की नई नीतियों की दुहाई देकर आर्तनाद करने लगे। बात वही पुरानी कही जा रही थी, केवल कहने का ढंग नया था।
लोकतंत्र की दुहाई देकर ये लोग कहने लगे कि यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें जनता के एक बड़े वर्ग को संसदीय संस्थानों, राज-काज तथा सेना और पुलिस इत्यादि में यथोचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।
समाजवाद की दुहाई देकर ये लोग कहने लगे कि यह कैसा समाजवाद है जिसमें उत्पादन तथा वितरण के समस्त साधन हिन्दुओं के उच्च वर्ग के हाथों में है और जिसमें दीन-हीन तथा सब प्रकार से दलित-शोषित मुसलमानों को भरपेट भोजन और तन ढकने के लिए कपड़ा नहीं मिलता।
धर्मनिरपेक्ष अथवा सर्वधर्म-समभाव नीति की दुहाई देकर ये लोग कहने लगे कि यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है जिसमें सारे सरकारी संस्थान और प्रचार-साधन हिन्दू धर्म और संस्कृति का प्रसार करते रहते हैं, जिसकी घोषणा करने वाले महामहिम लोग हिन्दू मंदिरों में जाते रहते हैं। और यह कैसा सर्वधर्म समभाव है जिसमें मुस्लिम मज़हब तथा संस्कृति को कोई संरक्षण नहीं मिलता और जिसमें उर्दू जैसी भाषा की अवहेलना की जाती है।
गुटनिरपेक्ष नीति की दुहाई देकर ये लोग कहने लगे कि यह कैसी गुटनिरपेक्षता है, जिसमें राष्ट्र के एक बहुत बड़े वर्ग की भावनाओं का निरादर करके अरब राष्ट्रों पर किए गए इस्राइल के साम्राज्यवादी आक्रमण का विरोध नहीं किया जाता और जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय इस्लाम तथा मुस्लिम राष्ट्रों के हिताहित का समावेश नहीं।
यदि किसी ने कहा कि लोकतंत्र, समाजवाद तथा धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वालों को उन मुसलमान देशों की भी आलोचना करना चाहिए जहां इन नीतियों का लवलेश भी नहीं मिलता, तो सारे मुसलमान नेता एक स्वर से चिल्लाने लगे- हमें विदेशों से क्या मतलब, हम तो भारत और भारत में मानी गई नीतियों की बात कह रहे हैं। यदि किसी ने कहा कि यदि आपको विदेशों से मतलब नहीं तो किसलिए आप लोग आए दिन मुस्लिम राष्ट्रों में घटी घटनाओं को लेकर अथवा उन राष्ट्रों के प्रति बरती गई अन्यान्य राष्ट्रों की नीतियों को लेकर सभाएं करते रहते हैं, जुलूस निकालते रहते हैं, भारत सरकार पर मुस्लिम राष्ट्रों का समर्थन करने के लिए दबाव डालते हैं और हिन्दुओं के साथ मारकाट मचाते हैं, तो सारे मुसलमान नेता एक स्वर से चिल्लाने लगे-समस्त संसार के मुसलमान एक ही मिल्लत के अविभाज्य अंग हैं, इस्लाम यह नहीं मानता कि कोई मुसलमान केवल उसी देश का नागरिक है जहां वह वास करता हो।
यदि किसी ने कहा कि आप सर्वधर्म समभाव की दुहाई देते हैं किन्तु इस्लाम के शास्त्रों में इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म के लिए कोई स्थान ही नहीं हैं, तो सारे मुसलमान नेता एक स्वर से चिल्लाने लगे-सर्वधर्म समभाव के अनुयायी आप हैं, हम नहीं। इस्लाम इस प्रकार की किसी भावना का पोषण करने की इजाजत नहीं देता, इसलिए हम पर यह भावना लागू नहीं होती। किन्तु आप चूंकि इस भावना की घोषणा करते है तो आप
इस्लाम पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर सकते।
वोट के भूखे राजनीतिक दलों ने या तो चुप्पी साधी या मुसलमानों की हां में हां मिलाई। कम्युनिस्टों ने एक हथियार मुसलमानों के हाथों में विभाजन से पूर्व ही थमा दिया था ― जो भी मुसलमानों की मांगों को नाजायज बतलाए अथवा उनकी शिकायतों को आधारहीन कहे अथवा इस्लाम पर उंगली उठाए अथवा हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज के संरक्षण की बात कहे, वह संकीर्ण सम्प्रदायवादी, फासिस्ट मनोवृत्ति वाला, प्रतिक्रियावादी तथा रक्तपिपासु पिशाच है। मुसलमान इस हथियार का प्रयोग विभाजन के बाद भी करते रहे। सत्तारूढ़ दल पर कम्युनिस्ट विचारधारा की छाप पण्डित नेहरू के प्रभुत्वकाल में गहरी पड़ चुकी थी। उस दल ने भी कम्युनिस्टों तथा मुसलमानों के स्वर को दोहराया। और धीरे-धीरे सभी दलों की घिग्घी बंधने लगी कि मुसलमान नाराज होकर कहीं उनके विरुद्ध फतवा न दे दें। सारे दलों में यह दिखलाने की होड़ लग गई कि दल में मुसलमान-सदस्य कितने हैं, मुसलमानों को किस-किस प्रमुख पद पर रखा गया है, निर्वाचन के समय कितने मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट दिए गए हैं और दल के घोषणा-पत्र में मुसलमानों की किन-किन मांगों का समावेश है।
यह सिलसिला चल रहा था कि आर्तनाद करने वाले मुसलमान सहसा सिंहनाद करने लगे। मुस्लिम राष्ट्रों ने अपने तेल के भण्डार को राजनीतिक हथियार के रूप में आजमाने का निश्चय किया था। उस हथियार की चोट सभी राष्ट्रों पर कुछ समय तक पड़ी। किन्तु शेष सब शीघ्र ही संभल गए। केवल भारत ही उस चोट से तिलमिला उठा। मुसलमानों के अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान यह घोषणा करने लगे कि इस्लाम के भाग्य ने अल्लाह की मेहरबानी से पल्टा खाया है और अब भारत में इस्लाम का अधूरा काम पूरा किया जाना चाहिए। साथ ही कई-एक मुसलमान देशों से एक अपार धनराशि भारत के मुसलमानों को मिलने लगी। उस धनराशि का उपयोग किन-किन कामों के लिए हो रहा है यह विस्तरश: यहां बतलाने की आवश्यकता नहीं। इस्लाम का वर्तमान क्रिया-कलाप केवल वे ही नहीं देख-सुन-समझ पा रहे जो कम्युनिस्ट अथवा किसी अन्य देशद्रोही दृष्टि के कारण हिन्दू-विद्वेषी हैं।
किन्तु अब की बार हिन्दू समाज की ओर से एक नया प्रत्युत्तर प्रस्तुत किया जा रहा है। विश्व हिन्दू परिषद तथा अन्यान्य हिन्दू संस्थानों ने इस्लाम की इस नई चुनौती के प्रति हिन्दू समाज का ध्यान ही आकर्षित नहीं किया अपितु ललकार कर यह भी कहा है कि इस्लाम का यह कुचक्र अब और नहीं चलने दिया जाएगा। हिन्दू समाज ने इस ललकार को सुना है, इस बात के भी अनेक प्रमाण मिलते हैं। हिन्दू समाज अब यह सुनने के लिए भी तैयार है कि इस्लाम कोई धर्म नहीं प्रत्युत धर्म की भाषा का दुरुपयोग करके आंखों में धूल झोंकने वाला एक आततायी और साम्राज्यवादी सिद्धांत है।
राष्ट्र का यह नया स्वर अभी पूरी तरह से निखरा नहीं है, राष्ट्र के नेता अभी भी दबी जुबान में बोल रहे हैं। किन्तु आशा का जा सकती है कि वह दिन दूर नहीं जब हिन्दू समाज एक स्वर से यह कहेगा कि इस्लाम का साम्राज्य भारत से चला गया है और अब इस देश में इस्लाम का कोई स्थान नहीं। उस दिन उस महायज्ञ का शुभारम्भ होगा जिसकी पूर्णाहुति के समय इस्लाम के द्वारा दबाए गए राष्ट्र के समस्त अंचल तथा इस्लाम के द्वारा भ्रांत राष्ट्र के समस्त नागरिक पुनरेण राष्ट्र में समाविष्ट हो जाएंगे।”
लेखक – स्व. सीताराम गोयल

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