सीरिया में शक्ति का निर्मम प्रदर्शन

एस. निहाल सिंह

सीरिया में चार साल से चले आ रहे गृहयुद्ध में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दखल की कई तात्कालिक वजहें हैं। रूस ने पहली बार हवाई जहाजों और क्रूज मिसाइलों के जरिये आतंकियों के ठिकानों पर हमले किये हैं। इस हस्तक्षेप की एक वजह यह है कि इस देश की किस्मत को लेकर भविष्य में होने वाली शांति-वार्ता में रूस की जगह बन सके। दूसरे क्रीमिया के अधिग्रहण व यूक्रेन में दखल के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों के चलते अलग-थलग पड़े रूस ने इस हस्तक्षेप के जरिये अपनी उपस्थिति का एहसास कराया है। साथ ही यह संदेश देने की भी कोशिश की है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की मनमानी अब नहीं चलेगी।

नि:संदेह इस रणनीति के कई खतरे हैं। संकटग्रस्त सीरिया में रूस तथा पश्चिमी देशों के लड़ाकू जहाजों के टकराव का तो खतरा है ही मगर मुख्य टकराव दोनों पक्षों के हितों का है। राष्ट्रपति पुतिन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सीरिया संकट का कोई भी राजनीतिक समाधान राष्ट्रपति बशर अल असद की सत्ता को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए किया जा सकता है। जबकि दूसरी ओर पश्चिमी ताकतें उन्हें हटाना चाहती हैं। उनका आरोप है कि सीरिया में लगभग तीन लाख मौतें उनके शासन के दौरान हुई हैं और देश की लगभग आधी जनता विस्थापन को मजबूर हुई है। लाखों लोग पड़ोसी देशों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं तथा लाखों लोग सुरक्षा के लिए यूरोप के लिए पलायन कर रहे हैं। दरअसल सीरिया संकट के समाधान की तात्कालिक जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि लाखों सीरियाई शरणार्थी यूरोप की ओर पलायन कर रहे हैं और यूरोपियन यूनियन के देशों के लिए यह बोझ उठाना असंभव-सा है। अब पश्चिमी देशों का रुख राष्ट्रपति असद के प्रति उदार हुआ है और अमेरिका कह रहा है कि असद के लिए तत्काल पद छोडऩा जरूरी नहीं है लेकिन वे अपने विरोधियों से बातचीत करें। दरअसल, भ्रम की स्थिति इसलिए बनी हुई है कि मास्को उन्हें समाधान का हिस्सा मानता है और पश्चिम समस्या का।

जमीनी हकीकत यह है कि रूस के सैन्य हस्तक्षेप से कई समस्याओं का जन्म हुआ है। रूस आईएसआईएस आतंकवादियों और असद सरकार के खिलाफ लड़ रहे घटकों नुसरा आदि के बीच फर्क नहीं कर पा रहा है। वहीं पश्चिमी देश और उनके सुन्नी अरब सहयोगी असद सरकार के मित्र व अमित्र के बीच में फर्क कर रहे हैं। वास्तव में अमेरिका शिकायत कर रहा है कि रूसी युद्धक विमान इस्लामिक स्टेट की बजाय पश्चिम समर्थित लड़ाकों को निशाना बना रहे हैं।

वास्तव में रूसी हस्तक्षेप ने पहले से जटिल समस्या को और जटिल बना दिया है। क्षेत्र के नीति-नियंता मानते हैं कि इसके चलते शिया-सुन्नी विभाजन और तेज हो जायेगा। अमेरिका व पश्चिमी देशों से हुए परमाणु समझौते के बाद आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्त हो रहा ईरान शियाओं के नेता के रूप में उभर रहा है, जिसे इराक, असद के नेतृत्व वाले सीरिया और हिजबुल्लाह का समर्थन हासिल है। वहीं सऊदी अरब सुन्नी जगत का नेतृत्व कर रहा है जिसे अमेरिका व पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है। मास्को ने अब शिया ताकतों के बीच जगह तलाशी है। हाल का एक घटनाक्रम अमेरिका की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। राष्ट्रपति बराक ओबामा चाहते थे कि वे मध्य-पूर्व की दलदल से बाहर निकलें लेकिन उन्हें फिर इसमें उलझना पड़ रहा है। यह एक वास्तविक तथ्य है कि इस्लामिक स्टेट ने एक साल पूर्व फिर उन्हें हवाई हमले करने के लिए बाध्य किया। लेकिन अमेरिका द्वारा असद शासन के खिलाफ उदार सीरियाई लड़ाके तैयार करने के प्रयास बुरी तरह विफल साबित हुए। इसका नकारात्मक परिणाम यह हुआ कि आईएसआईएस के खिलाफ कुशलतापूर्वक लड़ रहे कुर्द लड़ाकों को तुर्की के बमों का शिकार होना पड़ा। दरअसल तुर्की आईएसआईएस के बजाय तुर्की के कुर्दों पीकेके पर हमला करने का ज्यादा इच्छुक रहा है।

इसी तरह तुर्की का दूसरा लक्ष्य सीरिया के भीतर सेफ-ज़ोन बनाना रूस के सैन्य हस्तक्षेप के बाद ज्यादा समस्या पैदा करने वाला बन गया है। यह जानते हुए कि लाखों सीरियाई शरणार्थी यूरोप की तरफ जा रहे हैं, राष्ट्रपति तैयब अर्डोगोन इस कोशिश में हैं कि यूरोपियन यूनियन से कई छूटें हासिल की जा सकती हैं। तुर्की चाहता है कि उसके नागरिक यूरोप में वीजा-मुक्त यात्रा कर सकें और यूरोपियन यूनियन से दूसरे लाभ उठा सकें। अधिकांश यूरोप तुर्की की जनसंख्या के आकार को देखते हुए ऐसी सुविधा देने के लिए अनिच्छुक है। उन्हें डर है कि इससे यूरोपियन यूनियन का स्वरूप बिगड़ जायेगा।

जहां तक अमेरिका का सवाल है, रूस का सैन्य हस्तक्षेप उसकी विषम परिस्थितियों के बीच हुआ है क्योंकि वहां राष्ट्रपति की लंबी चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और हर कदम का प्रभाव चुनाव अभियान पर पड़ेगा। रिपब्लिकन हमेशा इस कोशिश में रहे हैं कि सीरिया के प्रति राष्ट्रपति ओबामा की उदासीनता के मुद्दे पर उन्हें घेरा जा सके। ऐसे ही वे इराक और अफगानिस्तान से निकलने के मुद्दे को प्राथमिकता देते रहे हैं। इस नये संकट का परिणाम यह हुआ है कि यूक्रेन का मुद्दा पीछे चला गया है और सीरिया का मुद्दा केंद्र में आ गया है। इसके चलते रूस मध्य पूर्व के समाधान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका चाहता है। राष्ट्रपति पुतिन की भूमिका के चलते असद को लेकर एकतरफा फैसला नहीं हो सकता। हालात ने मास्को को बाध्य किया है कि वह दमिश्क में हस्तक्षेप करे क्योंकि इसने भूमध्य सागर में रूस को एक नौसैनिक अड्डा बनाने का मौका दिया है तथा असद के शिया अनुयायियों बहुल वाले लटाकिया में मजबूती का मौका दिया है। इसके चलते सीरिया का भविष्य बाहरी ताकतों द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। यह सुनिश्चित है कि अंत में संयुक्त रूप से इस्लामिक स्टेट के खिलाफ बल प्रयोग होगा, जिसने सीरिया और इराक के एक बड़े भूभाग पर कब्जा किया हुआ है। यह कहना जल्दबाजी होगा कि कैसे और कब यह कदम उठाया जायेगा मगर रूस ने वह ताकत हासिल कर ली है जिसके चलते समाधान में उसकी भूमिका होगी। रूस के अप्रत्याशित कदम के बाद उत्पन्न हालातों में इस समस्या के समाधान के लिए अमेरिका को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सीरिया के लोग इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उनके घर, कस्बे और शहर नष्ट हो चुके हैं और उनमें जो बचे हैं, उनकी बड़ी आबादी घर और बाहर शरणार्थी के रूप में रह रही है। दुनिया को उम्मीद है कि रूस, अमेरिका और अन्य देश जो इस मामले से जुड़े हैं, शीघ्रातिशीघ्र अपनी शक्ति का निर्मम प्रदर्शन समाप्त करेंगे।

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