योगी आदित्यनाथ चुनावी रण भूमि के एक ‘अजेय’ योद्धा

दीपक कुमार त्यागी

चुनावी वर्ष में जिस तरह से उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर जीत के लिए सत्ता पक्ष भाजपा के साथ-साथ प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू कर रखी हैं, उसमें योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अब भाजपा ने कहीं ना कहीं बढ़त बना ली है।
कोरोना महामारी के भयावह काल में ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक रहा तो उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव वर्ष 2022 में तय समय पर ही होने की संभावना है। वर्ष 2017 में निर्वाचित वर्तमान राज्य विधानसभा का कार्यकाल 14 मई 2022 को समाप्त हो जायेगा, इसलिए चुनाव आयोग को राज्य में किसी भी तरह के संवैधानिक संकट से बचने के लिए उससे पहले चुनाव प्रक्रिया को संपन्न करना होगा। इसलिए उम्मीद है कि राज्य में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया फरवरी या मार्च में हर हाल में शुरू होकर अपने तय समय से पहले पूर्ण हो जायेगी।

चुनावी वर्ष में राज्य के सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी चुनावी बिसात बिछाने में तेजी से जुट गये हैं, जिसकी एक बहुत छोटी-सी बानगी कुछ समय पूर्व संपन्न हुए पंचायत चुनाव व अभी जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में देखने को मिली है। हालांकि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में कोई भी विपक्षी दल योगी आदित्यनाथ के चक्रव्यूह को भेदने में नाकाम रहा है। योगी ने राज्य में विधानसभा चुनावों से पूर्व हुई इस परीक्षा में अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करके 75 में 67 सीटों पर विजय हासिल करके एकजुट होने के प्रयास में लगे विपक्ष को अलग-अलग करके बिखरेने का कार्य कर दिया है, राज्य में एक योगी की चुनावी रणनीति की विपक्ष के पास अभी तक कोई काट नजर नहीं आ रही है।

जिला पंचायत चुनावों में जीत हासिल करने के लिए बेशक सिस्टम का जमकर दुरुपयोग होता हो, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा हर राजनीतिक दल ने अपने राज में लोकतांत्रिक मूल्यों का ध्यान ना रखकर हमेशा चुनावी जीत को तरजीह दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी जबरदस्त व्यूह रचना करके जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनावों में भाजपा को प्रचंड जीत दिलाकर उत्तर प्रदेश की सत्ता के सेमीफाइनल को भारी बहुमत से जीत कर अपने सभी विरोधियों को जबरदस्त झटका देते हुए, राज्य की आम जनता व राजनेताओं को भी स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह केवल संन्यासी या आम राजनेता नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के चाणक्य और आम-जनमानस पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले एक लोकप्रिय जननेता हैं।

चुनावी वर्ष में जिस तरह से उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर जीत के लिए सत्ता पक्ष भाजपा के साथ-साथ प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू कर रखी हैं, उसमें योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व में अब भाजपा ने कहीं ना कहीं बढ़त बना ली है। जबकि राज्य के जमीनी हालातों पर नजर डालें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के लंबे समय से चल रहे आंदोलन व कोरोना की दूसरी जबरदस्त लहर के बाद उपजी जनता की नाराजगी, योगी लहर के चलते शांत होने के कगार पर है। राज्य में एक मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की आम जन समुदाय के बीच लोकप्रियता आज भी बरकरार है। लोग उन्हें मोदी व शाह के बाद हिन्दुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं। वैसे भी देखा जाये तो भारत में प्रतीकों को मानने व उनके अनुसार चलने का चलन आदिकाल से रहा है, जिस पर योगी आदित्यनाथ एकदम खरे उतरते हैं। आज वो एकतरफ तो प्रदेश में हिन्दुत्व के सबसे बड़े ताकतवर प्रतीक बन कर ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाली अपनी जबरदस्त छवि बनाकर बहुसंख्यक जनता के दिलोदिमाग पर छा गये हैं, वहीं प्रदेश में बहुत लंबे अरसे बाद वह एक ऐसे मुख्यमंत्री बने हैं जिन पर व्यक्तिगत रूप से कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है। जिसके चलते आज योगी आदित्यनाथ आम जनता के बीच वह एक बेहद ईमानदार सशक्त राजनेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। आज वह राज्य की आम जनता के बीच में एक मठ के संन्यासी से राजनेता और अब बेहद लोकप्रिय जननेता के रूप में अपना स्थान बनाकर उनके दिलोदिमाग पर छा चुके हैं।

वैसे देखा जाये तो उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावी रण में जाने के लिए भाजपा के पास एक से एक दिग्गज चर्चित राजनेता मौजूद हैं, लेकिन उनमें कोई भी ऐसा नेता नहीं है जोकि पूरे राज्य में आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो। आज के हालात में भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर कोई राजनेता मौजूद नहीं है। भाजपा को राज्य में हर हाल में अपने स्टार प्रचारक मोदी, शाह व योगी के बलबूते ही चुनावी रण में जाना होगा। हिन्दुत्ववादी व ईमानदार छवि के चलते योगी आदित्यनाथ को अपना मुख्यमंत्री का चेहरा बनाना होगा, तब ही उसकी विजय पताका लहरायेगी। वैसे भी राज्य में अभी तक तो योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व को सत्ता पक्ष व विपक्ष के किसी भी नेता से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल पा रही है। राज्य में विपक्ष बिखरा हुआ है इसका उदाहरण जिला पंचायत के चुनावों में जनता ने देख लिया है, वैसे भी राज्य में विपक्षी दलों के पास अखिलेश यादव, मायावती व प्रियंका गांधी के अलावा कोई ऐसा लोकप्रिय चेहरा नहीं है जो क्षेत्रीय क्षत्रप हो या लोकप्रिय जननेता हो, लेकिन इन सभी की कार्यशैली व लक्ष्य केवल मुस्लिम वोटों को आकृषित करने का रहता है, जिसकी वजह से अन्य मतदाता इन से दूर हो जाता है। इस वजह से राज्य में भाजपा को विशेष सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और वह चुनावी लक्ष्य साधने में कामयाब हो जाती है। खैर यह तो आने वाला समय बतायेगा कि उत्तर प्रदेश की जनता वर्ष 2022 में किसके सिर पर सेहरा बांधने का कार्य करेगी, लेकिन आज की परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश में एक कुशल चुनावी रणनीतिकार के रूप में व लोकप्रिय जननेता के रूप में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की काट ढूंढ़ना असंभव है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में चुनावी वर्ष में योगी आदित्यनाथ चुनावी रण भूमि के एक अजेय योद्धा बने हुए हैं, जिनको मात देना विपक्षी दलों के लिए आसान नहीं है।

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