हिन्दू कोड बिल को नेहरू ने बनाया ‘अपनी निष्ठा’ का सवाल

अभिनय आकाश

“राजेंद्र बाबू ने केवल और केवल हिन्दू कानून बनाने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर मौजूदा कानून अपर्याप्त और आपत्तिजनक है तो सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जाती। सिर्फ एक समुदाय को ही कानूनी दखलंदाजी के लिए क्यों चुना गया। नेहरू इससे इत्तेफाक नहीं रखते थे”।
“मेरी समझ में नहीं आता कि जब संविधान के निर्माताओं ने शादी-ब्याह के लिए कानून बनाने की सोची और ये कहा कि राज्य इस पर ध्यान देगा। तो क्या ये सांप्रदायिक कारणों से प्रेरित थे, क्या ये सांप्रदायिक मुद्दा है। क्रिमिनल लॉ एक है, सिविल लॉ एक क्यों नहीं हो सकता। गोवा में अभी भी सिविल लॉ एक है। अगर मुस्लिम मित्रों को इसमें कठिनाई है तो वो कठिनाई आकर बताएं। इस्लामिक देशों में पर्सनल लॉ में संशोधन हो रहे हैं।” तीन दशक से ज्यादा वक्त पहले जो जरूरत देश के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बताई अब उसी बात को दिल्ली हाई कोर्ट ने दोहराया है। तलाक को लेकर एक कोर्ट केस के फैसले में हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की है। आर्टिकल 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने का वक्त आ चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से कहा गया है कि सरकार को समान नागरिक संहिता पर विचार करना चाहिए। जिसके बाद से समान नागरिक संहिता को लेकर बहस शुरू हो गई है। फिलहाल देश में हर धर्म के लोग शादी, तलाक, जमीन-जायदाद जैसे मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं। जबकि हिंन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। लेकिन समान नागरिक संहिता लागू होने पर देश में सभी के लिए एक कानून लागू होगा। चाहे वो किसी भी धर्म के क्यों न हो। जो लोग संविधान में सेक्युलर शब्द का हवाला देते हैं आज वो देश में एक कानून वाली व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं।

आजादी के बाद जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पहले कानून मंत्री बीआर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता लागू करने की बात की, उस वक्त उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। नेहरू को भारी विरोध के चलते हिंदू कोड बिल तक ही सीमित रहना पड़ा था और संसद में वह केवल हिंदू कोड बिल को ही लागू करवा सके, जो सिखों, जैनियों और बौद्धों पर लागू होता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी बताया गया है। अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। नीती निर्देशक तत्व में शामिल प्रावधानों के अंतर्गत संविधान भारत सरकार से अपेक्षा करती है कि वो जनहित व राष्ट्रहित में यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाए।

भारत का एक मात्र राज्य गोवा ही है जहां सिविल कोड लागू है। गोवा में सभी धर्मों के लोगों को एक ही कानून के तहत चलना पड़ता है। इसके तहत यहां होने वाले सभी जन्म, शादियां और मृत्यु को दर्ज कराना जरूरी है। साथ ही यहां आय और प्रॉपर्टी में पति-पत्नी और उनके बच्चों को बिना किसी लिंग भेदभाव के समान अधिकार प्राप्त होता है। यहां तक कि वे मुस्लिम भी जिनकी शादियां गोवा में रजिस्टर्ड हैं एक से ज्यादा निकाह नहीं कर सकते और न ही तीन बार तलाक-तलाक बोलकर तलाक दे सकते हैं। तलाक की स्थिति में पति-पत्नी दोनों को आधी-आधी संपत्ति पर हक मिलता है और किसी एक की मृत्यु होने पर पूरी संपत्ति दूसरे के पास चली जाती है। गोवा के उदाहरण से पता चलता है कि इस कानून को पूरे देश में लागू करने से कितनी सारी समस्याएं सुलझ सकती हैं।

ये तो हमने कॉमन सिविल को़ड की मोटा-माटी बात आपके सामने रख दी। लेकिन इसकी बारीकियों को और गहराई में समझना है तो आपको इतिहास में उतरना होगा। ब्रिटिश शासनकाल से लेकर आजादी के साल तक समान नागरिकता कानून को लेकर ऐसा रहा सूरते-हाल। अंग्रेजी हुकूमत ने 1835 को एक रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट में अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया था। लेकिन विशेष रूप से सिफारिश की गई थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इससे बाहर रखा जाए। आगे चलकर यही रिपोर्ट से कॉमन सिविल कोड वाले बहस को जमीनी आधार मिल गया था।

ब्रिटिश शासन के अंत में व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानूनों की भरमार ने सरकार को 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए बीएन राव समिति बनाने के लिए मजबूर किया। जिसके बाद संविधान सभा में नेहरू और आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल का शुरुआती मसौदा पेश किया। बिल का मसौदा ये था कि हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों के वसीहत और शादी के नियम कलमबद्ध किए जाए। और वो आधुनिक समाज की चेतनाओं के मुताबिक हों। देश की एक बड़ी आबादी को और उससे भी ज्यादा धर्म गुरुओं को निजी मामलों में सरकार का दखल लगा। राजेंद्र प्रसाद लोगों की इस राय से इत्तेफाक रखते थे। जून 1948 में जब मसौदे पर पहली मर्तबा बहस हुई तो बतौर अध्यक्ष दखल देते हुए उन्होंने कहा कि ये जल्दबाजी में की जा रही चीज है। देश इससे सहमत नहीं है। जरूरत रजामंदी की है और जरूरत ऐसी विधायिका की भी है जो लोगों की इस मामले में आंकाक्षा का सही प्रतिनिधित्व करती हो। राजेंद्र बाबू ने केवल और केवल हिन्दू कानून बनाने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर मौजूदा कानून अपर्याप्त और आपत्तिजनक है तो सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जाती। सिर्फ एक समुदाय को ही कानूनी दखलंदाजी के लिए क्यों चुना गया। नेहरू इससे इत्तेफाक नहीं रखते थे। नेहरू ने तमाम वाद पेश किए और अपनी बात को जायज ठहराने की कोशिश की। संविधान सभा की कार्यवाही आगे बढ़ी, हिन्दू कोड बिल को लेकर देश में बहस बढ़ती रही। लेकिन जैसे कि नेहरू ने हिन्दू कोड बिल को अपनी निष्ठा का प्रश्न बना लिया। राजेंद्र बाबू और पंडित नेहरू के बीच इसको लेकर काफी घमासान भी हुआ और पत्राचार भी।

14 सितंबर 1951 को राजेंद्र प्रसाद ने पंडित नेहरु को पत्र लिखा था जिसमे सिर्फ हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर जो प्रावधान किये जा रहे हैं वो ज्यादातर लोगों के लिए फायदेमंद और लाभकारी हैं तो सिर्फ एक समुदाय के लोगों के लिए क्यों लाए जा रहे हैं बाकी समुदाय इसके लाभ से क्यों वंचित रहें। उन्होंने कहा था कि वह बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर भी परखेंगे। नेहरू ने उसी दिन उन्हें उसका जवाब भी भेज दिया जिसमें कहा कि आपने बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर परखने की जो बात कही है वह गंभीर मुद्दा है। इससे राष्ट्रपति और सरकार व संसद के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है। संसद द्वारा पास बिल के खिलाफ जाने का राष्ट्रपति को अधिकार नहीं है। डाक्टर प्रसाद ने नेहरू को 18 सितंबर को फिर पत्र लिखा जिसमें उन्होंने संविधान के तहत राष्ट्रपति को मिली शक्तियां गिनाई साथ ही यह भी कहा कि वह मामले में टकराव की स्थिति नहीं लाना चाहेंगे। बात अधिकारों तक पहुंची और अंत में अटार्नी जनरल की राय ली गई तब मामला शांत हुआ था।

1955 में हिंदू मैरिज एक्ट, 1956 में ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू दत्तक ग्रहण और पोषण अधिनियम और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम अस्तित्व में आया। हिंदुओं के लिए बनाए गए कोड के दायरे में सिखों, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों को भी लाया गया। दूसरी तरफ भारत में मुसलमानों के शादी-ब्याह, तलाक़ और उत्तराधिकार के मामलों का फैसला शरीयत के मुताबिक होता रहा, जिसे मोहम्मडन लॉ के नाम से जाना जाता है।

1948 में संविधान सभा में जब डॉ आंबेडकर ने यूनीफॉर्म कोड अपनाए जाने की बात रखी तो इस प्रस्ताव का कुछ सदस्यों ने उग्र विरोध किया। समिति में शामिल 5 मुस्लिम सदस्यों ने इस मसले का विरोध किया। मुसलमानों को लगा कि यह उनकी पहचान को मिटाने की कोशिश है। हालांकि डॉ आंबेडकर ने चर्चा के दौरान यह भी कहा था कि अगर भारत जैसे देश के लिए एक कानून नहीं बन सकता तो संविधान सभा ही नहीं बनती. संविधान भी तो एक कोड ही है जो पूरे देश में लागू होगा।

लॉ कमीशन ने 7 अक्टूबर 2016 को यूनिफॉर्म सिविल कोड पर लोगों से राय मांगी थी। इसमें 16 सवाल पूछे गए थे। लॉ कमिशन के सवाल इस प्रकार थे:-

  1. क्या आप जानते हैं कि अनुच्छेद-44 में प्रावधान है कि सरकार समान नागरिक आचार संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) का प्रयास करेगा?

  2. क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड में तमाम धर्मों के पर्सनल लॉ, कस्टमरी प्रैक्टिस या उसके कुछ भाग शामिल हो सकते हैं। जैसे शादी, तलाक, गोद लेने की प्रक्रिया, भरण पोषण, उत्तराधिकार व विरासत से संबंधित प्रावधान?

  3. क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड में पर्नसल लॉ व प्रथाओं को शामिल करने से लाभ होगा?

4.यूनिफॉर्म सिविल कोड से लैंगिग समानता सुनिश्चित होगी?

  1. क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड को वैकल्पिक किया जा सकता है?

6.क्या बहु विवाह प्रथा, बहु पति प्रथा, मैत्री करार आदि को खत्म किया जाए या फिर रेग्युलेट किया जाए।

  1. क्या तीन तलाक के प्रथा को खत्म किया जाए या कस्टम में रहने दिया जाए या फिर संशोधन के साथ रहने दिया जाए?

  2. क्या यह तय करने का उपाय हो कि हिंदू स्त्री अपने संपत्ति के अधिकार का प्रयोग बेहतर तरीके से करे जैसा पुरुष करते हैं क्या इस अधिकार के लिए हिंदू महिला को जागरुक किया जाए और तय हो कि उसके सगे संबंधी इसबात के लिए दबाव न डालें कि वह संपत्ति के अधिकार का त्याग कर दे।

  3. दो साल तक क्रिश्चियन तलाक के लिए वेटिंग पीरियड क्रिश्चियन महिला अधिकार का उल्लंघन तो नहीं है?

  4. तमाम पर्नसल लॉ में उम्र का पैमाना एक हो?

  5. तलाक के लिए तमाम धर्मों के लिए एक समान आधार तय होना चाहिए?

  6. यूनिफर्म सिविल को़ के तहत तलाक का प्रावधान होने से भरण पोषण की समस्या हल होगी?

  7. शादी रजिस्ट्रेशन को बेहतर तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है।

  8. अंतर जातीय विवाह या फिर अंतर धर्म विवाह करने वाले कपल की रक्षा के लिए क्या उपाय हो सकते हैं।

  9. क्या यूनिफर्म सिविल कोड धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

  10. यूनिफर्म सिविल कोड, या फिर पर्सनल लॉ के लिए सोसायटी को संवेदनशील बनाने के लिए क्या उपाय हो सकता हैं।

इसके बाद आयोग ने कहा कि मौजूदा पर्सनल लॉ में सुधार कर दिया जाए और धार्मिक परंपराओं और मूल अधिकारों के बीच तालमेल बेहतर कर दिया जाए तो यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत नहीं पड़ेगी।

एक तरफ जहां भारत में सभी धर्मों को एक समान कानून के तहत लाने पर बहस जोरों पर है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इसे लागू कर चुके हैं।

यूनिफॉर्म सिविल कोड आरएसएस और जनसंघ के संकल्प में रहे तो बीजेपी के मेनिफेस्टों में ही बरसों तक बने रहे। गठबंधन सरकारों के दौर में बीजेपी ने हमेशा इन विवादित मुद्दे से खुद को दूर रखा। लेकिन अब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार है। लोकसभा में तो बीजेपी का पूरा दम है ही राज्यसभा में भी उसने तीन तलाक और 370 के खात्मे के फैसले पारित करवा लिए।

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