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इतिहास के पन्नों से

महाभारत से पहले भी भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष ही था

 

‘भरत’ से ‘भारत’ की व्युत्पत्ति कवियों की कल्पना है, भरत से पहले भी भारतवर्ष ही नाम था । “भारत” प्राचीनतम नाम है इस राष्ट्र का । ऋग्वेद में “भारत” की चर्चा है । सभी पुराणों में जम्बूद्वीप के भारतवर्ष की चर्चा है । महाभारत के पहले अध्याय में ही “भारत” की परिभाषा व्याकरण के आधार पर कही गयी है (“भर्” धातु से जिसका अर्थ है भरण करना) :– “भारत उस वृक्ष का नाम है जिसके पुष्प और फल हैं धर्म और मोक्ष” । अर्थात भारत वह राष्ट्र है जो चारों पुरुषार्थों की उपलब्धि कराकर प्रजा का भरण करने में सक्षम हो, अन्य देशों में केवल दो पुरुषार्थ ही सम्भव हैं — अर्थ और काम, और वह भी धर्मविरुद्ध । प्रत्येक कल्प में द्वीपों और वर्षों के नाम अपरिवर्तित रहते हैं, “भारतवर्ष” सनातन नाम है ।

आर्यावर्त विन्ध्य से उत्तर भारतवर्ष का उत्तरी भाग है ।

तीन सप्तसिन्धुओं अर्थात 21 विशाल नदियों के देश को (S)ind > India तथा Sind > Hind नाम दिया । गुलामी के काल में भारत के बहुत से लोग म्लेच्छों द्वारा दिए गए विकृत नामों से ही भारत को पुकारने लगे ।
ऋग्वेद में तीन सप्तसिन्धुओं के समूह का उल्लेख सुप्रसिद्ध “नदीसूक्त” में है , जिसमे किसी भी नदी का नाम “सिन्धु” नहीं था । वैसे भी ब्रह्मपुत्र और सोनभद्र की भाँति “सिन्धु” शब्द पुल्लिङ्ग है , अतः स्त्रीलिङ्ग “नदी” के सूक्त में पुल्लिङ्ग “नद” का होना अनुचित होता । छ वेदाङ्गों में “निरुक्त” भी एक वेदाङ्ग है जिसका प्रयोजन है वेदों के विशिष्ट शब्दों का अर्थ-निर्णय । निरुक्तकार महर्षि यास्क के कथनानुसार ऋग्वेद के “नदीसूक्त” में जिसे “सुषोमा” कहा गया उसे यास्क के काल में लोग “सिन्धु” कहने लगे थे । ऋग्वेद में नदियों के जो नाम थे उनके नाम हमारे युग में बदल चुके हैं, किन्तु आज भी भारत में तीन ही सप्तसिन्धु हैं :–

(1) दक्षिण (विन्ध्य से दक्षिण) —
कावेरी, तुङ्गभद्रा, कृष्णा, गोदावरी, महानदी, ताप्ती और नर्मदा ।

(2) पश्चिम —
पँजाब की पाँच नदियाँ, सिन्धु (सुषोमा) और थार में जाने वाली सरस्वती ।

(3) आर्यावर्त —
कौशिकी, गण्डकी, सरयू, गोमती, गङ्गा, यमुना, पूर्व की सरस्वती ।

आर्यावर्त की प्रमुख नदियों के नाम ऋग्वेद में भी वैसे ही थे जो आज हैं – सरयू, गोमती, गङ्गा, यमुना, सरस्वती । किन्तु अधिकाँश नदियों के पर्यायवाची नाम नदीसूक्त में हैं ।

समुद्र की भाँति विशाल जलराशि वाली नदियों को “सिन्धु” कहा जाता था । अतः भारतवर्ष वैदिक युग में भी सिन्धुओं का देश कहलाता था, जिससे विदेशियों ने “इन्दु” (Indus) , “इंडिया”, “हिन्दू” और “हिन्दुस्तान” गढ़े । संसार में अनेक बड़ी नदियाँ हैं, किन्तु ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ इक्कीस विशाल नदियाँ हों (और ब्रह्मपुत्र और सोनभद्र सहित दो विशाल नद भी ; कुल तेईस — गायत्री मन्त्र के अक्षरों की भाँति) ! अतः “सिन्धु” के नाम पर प्रसिद्ध होने का अधिकार केवल भारतवर्ष को ही है ।

मानसून (जो अरबी शब्द “मौसम” से बना) का वार्षिक वर्षाचक्र भी भारत में ही है जिसके कारण तीनों सप्तसिन्धुओं और अन्य भारतीय नदों-नदियों को विशाल जलराशि प्राप्त होती रहती है, इसी वार्षिक वर्षा के चक्र के कारण भारत को भारतवर्ष कहा गया । वार्षिक वर्षा के अन्य कुछ चक्र भी संसार में हैं, अर्थात भारतवर्ष की भाँति कुछ अन्य “वर्ष” भी हैं, किन्तु जल द्वारा मनुष्यों का भरण करने की क्षमता में भारतवर्ष का कोई सानी नहीं ।

आधुनिक जनसंख्याशास्त्रियों अनुसार मौर्यकाल में भारत (पाकिस्तान एवं बांग्लादेश सहित) की जनसंख्या 12 करोड़ से अधिक थी जबकि चीन की जनसंख्या 6 करोड़ ही थी, यूरोप की 365 लाख, अफ्रीका की 3 करोड़ और दोनों अमरीकाओं सम्मिलित जनसंख्या लगभग 4 करोड़ थी । आज भी चीन से दोगुना कृषियोग्य भूमि पाकिस्तान एवं बांग्लादेश सहित भारत में है किन्तु हज़ार सालों की गुलामी, कत्लेआम और लूट-खसोट के कारण संसार में भारत की आबादी का जो अंश होना चाहिए वह नहीं है : भारत की आबादी मौर्यकाल में शेष विश्व का 60.05% से घटकर आज 31.51% हो गयी है (यह आधुनिक जनसंख्याशास्त्रियों के अनुमान हैं, मेरे आँकड़े भिन्न हैं जिनका उल्लेख यहाँ आवश्यक नहीं है)।

तीनों सप्तसिन्धुओं में हर दृष्टिकोण से प्रमुख रही हैं आर्यावर्त की नदियाँ — वैदिक पौराणिक साहित्य में जहाँ भी केवल एक सप्तसिन्धु का उल्लेख है वहाँ आर्यावर्त का उपरोक्त सप्तसिन्धु ही अभीष्ट रहा है, न कि पश्चिम का सप्तसिन्धु । उदाहरणार्थ, महाभारत में जब श्रीकृष्ण ने शान्तिवार्ता हेतु हस्तिनापुर की यात्रा आरम्भ की तो शान्तिवार्ता की असफलता के सूचक अनेक अपशकुन प्रकट हुए, जिनमें एक अपशकुन था — “पूर्व की ओर बहने वाली सातों सप्तसिन्धु कुछ काल के लिए पश्चिम की ओर बहने लगीं” । केवल आर्यावर्त की सातों बड़ी नदियां पूर्व की ओर बहती थीं, पश्चिम या दक्षिण की ओर नहीं ।

किन्तु वेदविरोधी म्लेच्छों और वामपन्थियों ने ऋग्वैदिक नदीसूक्त का झूठा उद्धरण प्रचारित किया – कहा कि ऋग्वेद में केवल पश्चिम भारत के एक सप्तसिन्धु का उल्लेख है जो सिद्ध करता है कि ऋग्वैदिक आर्य केवल पाकिस्तान में रहते थे !! झूठ के आधार पर आर्य-आक्रमण का मनगढ़न्त सिद्धान्त खड़ा किया गया ।

पिछले तीस वर्षों से ऐसे अनेक प्रमाण मैंने अनेक प्रोफेसरों और अन्य विद्वानों को दिखाये, किन्तु एकाध अपवाद के सिवा किसी ने रूचि नहीं ली । अतः वर्षों पहले मैंने इन विषयों में शोधकार्य बन्द करके स्वयं को प्राचीन खगोलविज्ञान एवं फलित-ज्योतिष में सीमित कर दिया । किन्तु हाल में “अखिल भारतीय विद्वत परिषद्” ने निर्णय लिया है कि वेदों और सम्बन्धित ग्रन्थों के सही भाष्य एवं आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित किये जाएंगे (जिसमें सहयोग करने के लिए मुझे कहा गया है) ।

(संकल्प बृहद है, मानवीय और आर्थिक साधन सीमित हैं, अतः पता नहीं कितना कार्य सम्पन्न हो पायेगा ।

आर्थिक साधन महत्वपूर्ण नहीं है, मानवीय साधन अधिक महत्वपूर्ण हैं । भारतविरोधी तथाकथित “विद्वानों” में एकता है, किन्तु अधिकाँश राष्ट्रवादियों में एकता और सही शोध-प्रविधि के ज्ञान का अभाव है क्योंकि पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों ने जानबूझकर केवल गलत विद्वान और मूर्ख पाठक ही पैदा किये हैं । संस्कृत विद्वानों की दशा तो और भी दयनीय है क्योंकि इक्का-दुक्का अपवादों के सिवा संस्कृत में वही छात्र आते हैं जो किसी अच्छे स्कूल से सही-सलामत निकलने की योग्यता नहीं रखते — मूर्खों को समझाना भैंस के आगे बीन बजाना है । केवल राष्ट्रवाद की गप्पें हाँकने से कोई सच्चा और विद्वान नहीं बन सकता, इनमें से अधिकाँश लोग तो राष्ट्र की परिभाषा तक नहीं जानते । मुझे गैरों से नहीं, अपनों से शिकायत है, अपने अगर सही हों तो गैरों की क्या बिसात है !!)

ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारत नाम पड़ा या दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर ? पुराणों में पहली कथा है, कुछ में दूसरी कथा है । दोनों तो सही नहीं हो सकते । उपरोक्त पहली कथा के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में ही ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारत नाम पड़ा, जबकि दूसरी कथा को सही मानें तो द्वापरयुग के अन्तिम भाग में “भारतवर्ष” नामकरण हुआ, किन्तु इस कथा में यह उल्लेख ही नहीं है कि उससे पहले भारतवर्ष का क्या नाम था । पहली कथा के अनुसार सृष्टि के 99% से अधिक कालखण्ड में “भारतवर्ष” नाम रहता है पहले छोटे कालखण्डों के दौरान अजनाभ-वर्ष जैसे नाम थे , जबकि दूसरी कथा को सही मानें तो सृष्टि के अधिकाँश कालखण्ड में “भारतवर्ष” नाम नहीं रहता है किन्तु क्या नाम रहता है यह “कवि” को पता नहीं।

सृष्टि के 99% से अधिक कालखण्ड में “भारतवर्ष” नाम रहने के कारण इस नाम को मैंने “सनातन” कहा, दूसरी कथा कवि की कल्पना है । कवि यदि विश्वामित्र जैसा ऋषि हो तो द्वारा दूसरा स्वर्ग रच सकता है । ब्रह्माजी की कल्पना ही सम्पूर्ण कल्प है, किन्तु साधारण मनुष्यों की कल्पना गल्प मात्र है ।

शेर के दाँत गिनने वाले भरत तो दुष्यन्त के पुत्र थे, उनके नाम पर किसी कस्बे या गाँव का भी नामकरण नहीं हुआ । किन्तु कुछ लोग तो 1947 में भारत का जन्म मानते हैं और कई ज्योतिषी भी उस समय को भारत का जन्मकाल मानकर देश की कुण्डली बनाते हैं ।

वैदिका

प्रस्तुति : मनोज शास्त्री चतुर्वेदी

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