जनप्रतिनिधित्व की धारा-123 और श्रीमती इंदिरा गांधी

अभिनय आकाश

ममता बनर्जी ने बीजेपी विधायक को लेकर भ्रष्ट आचरण” का जो आरोप लगाया है उसे अधिनियम की धारा 123 के तहत परिभाषित किया गया है। इसी धारा का प्रयोग कर कभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष राजनाराय ने अप्रैल 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की थी।

ये 18 मार्च 1995 की बात है घड़ी में 10 बजने में यही कोई तीन-चार मिनट का वक्त शेष रह गया था कि तभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 24 में जस्टिस जगमोहन सिन्हा की एंट्री होती है। वैसे तो यह दिन देश के राजनीतिक इतिहास में खास रहने वाला था क्योंकि देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री न्यायालय में दाखिल होने वाली थीं। यह उनकी प्रतिपरीक्षा, सरल भाषा में कहें तो क्रॉस एक्जामिन का दिन था। इंदिरा गांधी को अदालत कक्ष में बुलाने से पहले जस्टिस सिन्हा ने भरी अदालन में ऐलान करवाया कि अदालत की परंपरा है कि लोग तभी खड़े हों जब जज अदालत के अंदर घुसे। इसलिए जब कोई गवाह अदालत में घुसे तो वहां मौजूद लोगों को खड़ा नहीं होना चाहिए। इसके बाद जब इंदिरा गांधी अदालत में घुसीं तो उनके सम्मान में उनके वकील एससी खरे को छोड़ कोई खड़ा नहीं हुआ। इंदिरा गांधी के लिए कटघरे में एक कुर्सी का इंतजाम किया गया था ताकि वे उसपर बैठकर अपनी गवाही दे सकें। सामान्यतः एक गवाह, विटनेस बॉक्स में खड़ा होता है। इंदिरा एक गवाह के तौर पर अदालत में पेश हो रही थीं, परन्तु वो देश की प्रधानमंत्री थीं इसलिए उनकी कुर्सी, न्यायाधीश के दाहिनी ओर लगाई गई। लेकिन इतना जरूर है कि इस मामले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री की कुर्सी हिला कर रख दी।

इस देश में जब भी सियासत की बात आती है तो आंकड़े तो अक्सर पीछे छूट जाते हैं, याद रह जाते हैं तो चेहरे और किस्से। आज मुझे जयनारायण बनाम इंदिरा का किस्सा याद आ रहा है। साल था 1971 का इंदिरा गांधी हमेशा की तरह उत्तर प्रदेश की रायबरेली संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रही थीं। कोई खिलाड़ी जो अप्रत्याशित रूप से एक अधिक मजबूत प्रतिद्वंद्वी को हरा देता है तो उसे जायंट किलर कहा है। राजनीति में भी ऐसे ही नाम हैं। वर्तमान के संदर्भ में बात करें तो सुब्रत पाठक कन्नौज में डिंपल यादव को हराया। स्मृति ईरानी जिन्होंने राहुल गांधी को अमेठी में हराया। केपी यादव ने गुणा में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मात दी। आजकल जो जायंट किलर की बात होती है, कभी केजरीवाल के संदर्भ में तो कभी किसी और के। राजनारायण ऐसे जायंट किलर थे, उन्होंने ये जाना कि अगर सत्ता को चुनौती देनी है तो सबसे पहले उसकी जड़ों में मट्ठा डालना होगा। खैर, 1971 की बात है और जाहिर सी बात है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास संसाधन बहुत ज्यादा थे। लेकिन राजनारायण और उनके लोग लड़े जमकर लड़े और इतिहास, आंकड़े और किस्से तीनों ही इस बात का गवाह हैं कि रायबरेली के इस चुनाव आगे चलकर देश की राजनीति की दशा और दिशा दोनों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। ये तो हो गई इतिहास की बात अब थोड़ा वर्तमान पर नजर डालते हैं क्योंकि इसके बाद ही हम आपको एक बार फिर इतिहास में लिए चलेंगे और सुनाएंगे एक किस्सा चुनाव में मिली हार का, अदालती चुनौती का और एक ऐतिहासिक फैसले का भी। दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले ‘खेला होबे’ का ‘फॉर्म्युला’ लोगों के बीच रखा। सवाल उठा कि आखिरकार खेला होबे का मतलब क्या है। आमतौर पर बंगाल के लोग इस शब्द को ‘जोरदार मुकाबले’ से जोड़कर देखते हैं। लेकिन 2 मई को चुनावी नतीजों के बाद नंदीग्राम की पराजय पर शाम के 6 बज रहे थे और प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए ममता बनर्जी ने कहा था कि नंदीग्राम में जो भी कुछ हुआ उसे भूल जाइए। हम पूरे राज्य में भारी बहुमत के साथ जीते हैं। सवा महीने बाद ममता बनर्जी को अब लगने लगा है कि नंदीग्राम में उनके साथ खेला हो गया। अब इस मामले में ममता दीदी ने अदालत का रुख किया है। नंदीग्राम में हार और शुभेंदु अधिकारी की जीत को लेकर ममता बनर्जी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। नदींग्राम में कड़े मुकाबले में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी में को 1956 वोटों से हराया था। लेकिन 46 दिन के बाद ममता बनर्जी इस नतीजे को कोर्ट में चुनौती देने के लिए पहुंची। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर धांधली के आरोप उस दौरान भी लगाए थे और फिर से काउंटिंग की मांग की थी। लेकिन चुनाव आयोग ने ममता की मांग को ठुकरा दिया था। जिसके बाद ममता बनर्जी ने इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता ने अपनी याचिका में भाजपा विधायक अधिकारी पर जन प्रतिनिधि कानून, 1951 की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण करने का आरोप लगाया। ममता की याचिका पर 18 जून को सुनवाई होने वाली थी, लेकिन इसे टाल दिया गया है। अब 24 जून को सुनवाई होगी। नियम के अनुसार चुनाव के नतीजे आने के डेढ़ महीने के अंदर मामला दायर करने का प्रावधान है।

चुनौती का आधार

चुनाव याचिका लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में कहा गया है कि “कोई भी निर्वाचन इस भाग के प्रावधान के अनुसार उपस्थित की गई निर्वाचन अर्जी द्वारा प्रश्नगत किये जाने के सिवाय प्रश्नगत न किया जाएगा”। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत चुनाव याचिका पर उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय दिया जाता है। चुनाव परिणाम की घोषणा के 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका किसी भी उम्मीदवार या किसी भी निर्वाचक द्वारा एक या एक से अधिक आधार पर प्रस्तुत किया जा सकती है। ममता बनर्जी ने बीजेपी विधायक को लेकर भ्रष्ट आचरण” का जो आरोप लगाया है उसे अधिनियम की धारा 123 के तहत परिभाषित किया गया है। भले ही भ्रष्ट आचरण स्वयं उम्मीदवार द्वारा उपयोग में न लिए गए हों, पर यदि यह उम्मीदवार की सहमति और सम्मति के साथ उपयोग में लिए गए हैं, तो उम्मीदवार उत्तरदायी है। धारा 123 में रिश्वत, असम्यक असर डालना, धर्म, जाति, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट की अपील, बूथ कैप्चरिंग आदि का उल्लेख मिलता है।

सुनवाई टली तो जज पर ही उठाए सवाल

सुनवाई टलने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने जज के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। टीएमसी ने जज कौशिक चंदा की तस्वीर जारी कि जिसमें बीजेपी के मंच पर दिख रहे हैं। टीएमसी ने सिंगल बेंच जज कौशिक चंदा पर संदेह जताया, जिन्हें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल ने ममता बनर्जी की चुनावी याचिका पर सुनवाई के लिए नियुक्त किया है। टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने बंगाल बीजेपी नेतृत्व के साथ जस्टिस चंदा की तस्वीरें ट्वीट की हैं। इस तस्वीर के जरिए टीएमसी ने कई सवाल उठाए हैं। टीएमसी नेता कुणाल घोष ने ट्वीट करके कहा, ‘न्यायपालिका के प्रति सम्मान के साथ: न्यायमूर्ति कौशिक चंदा, उन्हें नंदीग्राम केस की सुनवाई का जिम्मा सौंपा गया है।’ कुणाल घोष ने इस तस्वीर के साथ एक फोटो शेयर की है, जिसमें कथित तौर पर जस्टिस कौशिक चंदा, बीजेपी के बंगाल प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के साथ मंच पर बैठे है। बहरहाल, टीएमसी बनाम बीजेपी की जंग बंगाल चुनाव के बाद भी थमने का नाम नहीं ले रही है और अब नंदीग्राम का मामला अदालती दरवाजे पर भी दस्तक दे चुका है। अब आपको इतिहास में फिर से लिए चलते हैं और ऐसे किस्से से रूबरू करवाते हैं जब एक फैसले से पहले और उसके बाद सियासत को बदल कर रख दिया।

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण

ये साल 1971 की बात है आम चुनावों में विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त कर चुके राजनारायण उत्तर प्रदेश के रायबरेली से देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनावी खम ठोक रहे थे। 7 मार्च को संपन्न हुए चुनाव के दो दिन बाद यानी 9 तारीख को मतगणना शुरू हुई। ये वो बैलेट पेपर वाला दौर था जब चुनावी निशान पर स्वास्तिक छाप वाला ठप्पा लगाकर हम औऱ आप अपने पसंदीदा दल या उम्मीदवार को अपना मत देते थे। 10 मार्च को परिणाम घोषित किए गए। इंदिरा गांधी 1 लाख 83 हजार 309 वोट लाकर अपने प्रतिद्वंदी राजनारायण को 1 लाख 10 हजार वोटों के भारी अंतर से पराजित कर देती हैं। शुरू से ही अपनी जीत को लेकर आस्वस्त राजनारायण इस हार को पचा नहीं पाए और अदालत का रूख किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष राजनाराय ने अप्रैल 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की। उस वक्त एक अफवाह उड़ी थी कि मतपत्रों के साथ रसायन के इस्तेमाल से हेरफेर की गयी है, जिससे कुछ समय बाद वास्तविक स्टैंप मार्क की स्याही गायब हो जाए और मतपत्रों की छपाई के समय उप पर लगा अदृश्य स्टैंप काउंटिंग से पहले पेपर पर दिखाई दे जाए। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 जिसका जिक्र हमने ऊपर किया है के तहत इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट में दायर करने का फैसला किया। तब देश में इंदिरा इज इंडिया का नारा बुलंद था। उनकी तूती बोलती थी। ऐसे में समाजवादी राजनारायण के पक्ष में कोई खड़ा होने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन कानून विद शान्ति भूषण ने इस शर्त के साथ इस मुकदमे को लड़के के लिए अपनी हामी भरी कि इसे एक चुनावी याचिका के रूप में गंभीरता से लड़ा जाए न कि एक प्रचार स्टंट के तौर पर देखा जाए।

सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग

अदालत के समक्ष जो मुख्य मुद्दे रखे गए जैसे इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे। उन्होंने 7 जनवरी से इंदिरा गांधी के लिए चुनाव प्रचार करना शुरू कर दिया जबकि 13 जनवरी को उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया जिसे अंतत: 25 जनवरी को स्वीकार किया गया। यशपाल कपूर पर इंदिरा गाँधी की ओर से स्वामी अद्वैतानंद (रायबरेली से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले एक प्रत्याशी) को रिश्वत दिया जाना। मतदान केंद्रों से मतदाताओं को लाना ले जाना और चुनावी व्यय सीमा (जोकि उस वक़्त 35,000 रूपये था) से अधिक खर्च करना। लेकिन साल 1971 से 1974 तक इस मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई। हालांकि जैसे ही जस्टिस सिन्हा के समक्ष ये मामला आया उन्होंने इसे प्राथमिकता दी। बेहद तैयारी के साथ इंदिरा गांधी के चुनाव में सत्ता के दुरुपयोग को जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत में रखा।

क्या फैसला आने वाला है? ये पता लगाने में लगी आईबी

जगमोहन सिन्हा बेहद सख्त जज माने जाते थे और कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र है कि उन्हें विभिन्न माध्यों से प्रभावित करने की कोशिश की गई औऱ यहां तक की इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक ऑफिसर को यह पता करने के लिए लगा दिया गया था कि क्या फैसला आने वाला है। लेकिन जस्टिस जगमोहन कहां कम थे, उन्होंने अपने टाइपिस्ट को घर बुला लिया। और फैसला लिखवाने के बाद उसे तभी जाने दिया जब फैसला सुना दिया गया। इसके अलावा जस्टिस जगमोहन पर पीएम के निजी चिकित्सक और उनके रिश्तेदार डॉ. माथुर के माध्यम से इंदिरा के अनुकूल फैसला सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट में जज बना देने की भी बात कही गई।

ऐतिहासिक फैसला और सियासत में भूचाल

12 जून, 1975 सुबह के दस बजने वाले थे और इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 24 में जस्टिस जगमोहन सिन्हा की एंट्री होती है। लेकिन जैसे ही दुबले-पतले 55 साल के जस्टिस सिन्हा ने अपा आसन ग्रहण किया। उनके पेशकार ने घोषणा की “भाईयों और बहनों, राजनारायण की याचिका पर जब जज साहब फैसला सुनाएं तो कोई ताली नहीं बजाएगा। जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पन्नों का दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका फ़ैसला लिखा हुआ था। मामले पर अपना निर्णय सुनाते हुए जस्टिस सिन्हा ने राजनारायण की याचिका को 2 आधार पर अनुमति दी। पहला तो ये कि इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे. माना गया था कि इंदिरा गांधी ने लाउडस्पीकरों और शामियाने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर कराई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के एक फैसले ने देश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया। इंदिरा गांधी पर अनियमितता के आरोप में राज नारायण द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने न केवल इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया बल्कि उन्हें 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। फैसले वाले दिन इंदिरा गांधी के आवास पर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी थी। जो भावी राजनीतिक घटनाक्रम की दिशा स्पष्ट कर रही थी। कांग्रेस का जत्थे जस्टिस सिन्हा मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए अदालती फैसले को सीआईए की साजिश भी बता रहे थे। शाम तक मंत्रिमंडल ने एक स्वर से उनके इस्तीफे को नकार दिया। 12 जून के बाद समूचा विपक्ष एकजुट हुआ और न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग पर अड़ा रहा। पूरा विपक्ष राष्ट्रपति भवन के सामने धरना देकर अपना विरोध दर्ज कर रहा था। देशभर के शहर जुलूस और विरोध प्रदर्शन के गवाह बन चुके थे। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद इंदिरा गांधी की तरफ से पैरवी करने के लिए मशहूर वकील एन पालखीवाला को बुलाया गया। आख़िरकार इंदिरा गांधी की तरफ से अपील सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई 22 जून 1975 को और वैकेशन जज जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर के सामने ये अपील आई। 24 जून को इंदिरा गांधी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘कंडीशनल स्टे’ दिया गया जिसके तहत वह प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, पर मताधिकार छीन लिया गया। 5 जून को दिल्ली में जयप्रकाश नारायण की रैली रामलीला मैदान में हुई और इसी रैली के बाद इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी।

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