प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाते-बनाते राज्यों के मुख्यमंत्री खुद दब कर रह गये

नीरज कुमार दुबे

2014 से लेकर अब तक जब भी कोई संकट आया तो प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने उसका बखूभी सामना किया और विजय प्राप्त की। इसीलिए आज कर किसी को यह विश्वास है कि संक्रामक रोग हो या आक्रामक देश, सभी से मोदी निपट ही लेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया है कि प्रत्येक भारतीय को कोरोना रोधी टीका मुफ्त में लगाया जायेगा और अब राज्यों को कंपनियों से टीके खरीदने की अनुमति नहीं होगी बल्कि पहले की तरह केंद्र सरकार ही वैक्सीन निर्माता कंपनियों से टीका खरीद कर राज्यों को मुफ्त में देगी। प्रधानमंत्री के इस फैसले का हर भारतीय ने तो दिल खोलकर स्वागत किया लेकिन विपक्षी दल ऐसा नहीं कर पाये। किसी दल के नेता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने सरकार को टीकाकरण नीति की समीक्षा करने को कहा इसीलिए सरकार ने यह फैसला किया तो कई विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि हम तो प्रधानमंत्री को छह महीने से यह बात कह रहे थे लेकिन उन्होंने अब जाकर हमारी माँग मानी है। वहीं भाजपा ने कहा है कि जब-जब देश पर संकट आया है, तब-तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर उसका सामना किया है और देश को राहत दिलाई है।

तुम रक्षक काहु को डरना

2014 से लेकर अब तक जब भी कोई संकट आया तो प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने उसका बखूभी सामना किया और विजय प्राप्त की। इसीलिए आज कर किसी को यह विश्वास है कि संक्रामक रोग हो या आक्रामक देश, सभी से मोदी निपट ही लेंगे। महामारी के इस दौर में केंद्र सरकार ने इस बार के आम बजट में टीकाकरण के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था और कई बार कहा था कि टीकाकरण के लिए धन की कमी नहीं होने दी जायेगी। यही हुआ भी। टीका निर्माता कंपनियों को ना सिर्फ टीके के लिए अग्रिम भुगतान किया गया है बल्कि वह अपना उत्पादन बढ़ा सकें इसके लिए भी उन्हें जरूरी आर्थिक मदद नियमों को लचीला बनाते हुए दी गयी है।

नासै रोग हरे सब पीरा

भारत दुनिया के उन पहले देशों में शुमार है जहाँ कोरोना वायरस के आगमन के साथ ही इसके टीके के निर्माण की दिशा में काम शुरू हो गया था। प्रधानमंत्री मोदी कोरोना की पहली लहर के दौरान से ही टीके पर कार्य कितना आगे बढ़ा, इसकी लगातार समीक्षा बैठकें किया करते थे, यही नहीं उन्होंने टीका कंपनियों के संयंत्रों का दौरा कर भी प्रगति जानी। टीका निर्माता कंपनियों को अनुसंधान और विकास के लिए सरकारी खजाने से भारी-भरकम मदद भी की गयी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता देखिये कि जैसे ही टीका चिकित्सा विज्ञान जगत के मानकों पर खरा उतरा, उन्होंने सबसे पहले हैल्थ वर्कर्स के टीकाकरण की नीति बनाई। वाकई यदि हमारे हैल्थ वर्कर्स का टीकाकरण नहीं हुआ होता तो कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हालात भयावह हो जाते। यदि हैल्थ वर्कर्स ही कोरोना के शिकार हो रहे होते तो बड़ी संख्या में आ रहे मरीजों का इलाज कौन करता? हालांकि टीकाकरण के बावजूद देश ने बड़ी संख्या में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को खोया है लेकिन यदि उनका टीकाकरण नहीं हुआ होता तो स्थिति और विकट हो सकती थी।

भ्रम, भय का कारोबार करने वालों का खेला

यह सही है कि जन स्वास्थ्य सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए और सबको टीका लगे यह सुनिश्चित करना भी सरकार का काम है। लेकिन इतने बड़े देश में जब ऐसा वृहद स्तर वाला अभियान चले तो उसे सभी के सहयोग से ही पूरा किया जा सकता है। सबने देखा कि जैसे ही भारत में दो टीकों को मंजूरी मिली तो यह बात कुछ लोगों को हजम नहीं हुई। भारत के चिकित्सा विज्ञान की शक्ति पर सवाल उठाये जाने लगे, टीका कंपनियों को आपस में लड़ाया जाने लगा, कंपनियों की ओर से तय की गयी टीकों की कीमतों पर सवाल उठाये गये, टीका कंपनियों के क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम मांगे जाने लगे, कोई इसे भाजपा की वैक्सीन बताने लगा तो किसी ने अफवाह उड़ा दी कि यह मर्दानगी खत्म कर देगा। खासतौर पर भोले-भाले नागरिकों के मन में संदेह का ऐसा वातावरण पैदा कर दिया गया जोकि आज भी कायम है। ऐसा नहीं है कि भ्रम का वातावरण बनाने वालों ने यह काम पहली बार किया हो, बल्कि कह सकते हैं कि जबसे देश में मोदी सरकार बनी है तबसे भ्रम फैलाने वाले लोग इतने कार्यों को अंजाम दे चुके हैं कि आज वह इसमें सिद्धहस्त हो चुके हैं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं

यह भी जगजाहिर है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई मंदी का वर्ष 2019 से ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ रहा था। रही सही कसर 2020 में आये कोरोना वायरस ने पूरी कर दी जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाने पर देश की सरकार को मजबूर होना पड़ा। जरा कल्पना करके देखिये, एक तो लॉकडाउन से सरकार की आमदनी प्रभावित हुई, दूसरा उसने हजारों करोड़ रुपए के पैकेज घोषित किये, गरीबों को लगभग साल भर मुफ्त अनाज दिया, कई अन्य योजनाओं के माध्यम से जरूरतमंदों तक राहत पहुँचाई, यही नहीं पूर्वी लद्दाख में चीन की ओर से दी गयी चुनौती का भी बखूभी सामना किया, चक्रवातों और तूफानों का भी सामना किया और जानमाल की भरसक रक्षा की। सरकारी खजाने का ऐसे में क्या हाल हुआ होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, बावजूद उसके नये बजट में कोई नया कर नहीं लगाया गया और अर्थव्यवस्था को वापस तेजी की ओर लौटाने के लिए कई उपायों की घोषणा की गयी। यही नहीं अब सभी को मुफ्त टीकाकरण के साथ ही गरीबों को दीपावली तक हर माह प्रधानमंत्री गरीब अन्न योजना के तहत मुफ्त राशन भी दिया जायेगा।

सरकार ने टीकाकरण की जो नीति घोषित की उसमें पहले स्वास्थ्य कर्मियों को और उसके बाद बुजुर्ग आबादी का मुफ्त में ही टीकाकरण किया जा रहा था। लेकिन जब राज्यों, खासकर विपक्ष शासित राज्यों की सरकारों को लगा कि हमें तो कोई श्रेय ही नहीं मिल रहा है और हमारे हिस्से कुछ काम ही नहीं आ रहा है तो यह कहते हुए कि केंद्र ने सबकुछ अपने नियंत्रण में ले रखा है जबकि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है, प्रधानमंत्री पर दबाव बनाया जाने लगा। एक-एक कर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने लगे और राज्यों को टीका कंपनियों से सीधे टीके खरीदने की अनुमति देने की माँग करने लगे। सहकारी संघवाद की भावना पर चल रही मोदी सरकार ने राज्यों की माँगें मान लीं और एक मई से सभी राज्यों को 25 प्रतिशत टीके कंपनियों से सीधे खरीदने की छूट दे दी गयी। 50 प्रतिशत टीके केंद्र स्वयं खरीद कर राज्यों को दे रहा था और बाकी 25 प्रतिशत टीके निजी अस्पताल सीधे टीका निर्माता कंपनियों से खरीद रहे थे।

सवाल की राजनीति करने वालों को अपनी ताकत का अंदाजा हो गया

राज्यों के हाथों में कुछ व्यवस्था आई तो वह प्रचार की होड़ में पूरे टीकाकरण अभियान को पटरी से उतार बैठे। वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगाने की ऐसी होड़ मची कि सिर्फ दो सप्ताह में ही राज्यों को समझ आ गया कि यह काम उनके बस का नहीं है और पहले वाली व्यवस्था ही ठीक थी। इसके बाद फिर से मुख्यमंत्रियों की ओर से प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का सिलसिला चलाया गया और टीके का सारा काम केंद्र को अपने ही हाथ में लेने की सलाह दी गयी। यही नहीं मई में जिस तरह राज्यों ने अपने बलबूते वैक्सीन पाकर केंद्र को अपनी ताकत दिखाने के प्रयास किये उसमें भी वह विफल रहे। विभिन्न राज्यों ने वैक्सीन के लिए ग्लोबल टेंडर जारी कर दिये और अंतिम तिथि बार-बार बढ़ाने के बावजूद एक भी वैक्सीन निर्माता कंपनी आगे नहीं आई और एक भी राज्य का मुख्यमंत्री अपने प्रयासों से दुनिया के किसी भी कोने से एक भी कोरोना रोधी वैक्सीन लाने में सफल नहीं हो पाया। राज्यों के हाथ में जबसे टीकाकरण अभियान आया तबसे निजी अस्पतालों में मनमाने दाम वसूले जाने लगे लेकिन अब प्रधानमंत्री ने यह भी तय कर दिया है कि वैक्सीन की कीमत के अलावा निजी अस्पताल सेवा शुल्क के रूप में अधिकतम 150 रुपए ही लिये जा सकेंगे।

चारों जुग परताप तुम्हारा

हर भारतीय को मुफ्त वैक्सीन का वादा करके भारत दुनिया के उन कुछ चुनिंदा और बड़े देशों में शुमार हो गया है जो अपने नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन दे रहे हैं। भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जापान, फ्रांस, नॉर्वे, जर्मनी और इजराइल आदि कुछ देशों में ही मुफ्त वैक्सीन दी जा रही है। लेकिन यहां यह भी गौर करना चाहिए कि टीके की पहली खुराक देने की संख्या में भारत दुनिया के सभी देशों से आगे निकल चुका है और टीका अभियान देश में सर्वाधिक तेज गति से चल रहा है। गति का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि 16 जनवरी 2021 को शुरू हुआ टीकाकरण अभियान आठ जून 2021 तक 24 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। यही नहीं भारत ने इसी वर्ष दिसम्बर तक अपनी समूची व्यस्क आबादी के टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करने का प्रण किया है। यदि यह लक्ष्य प्राप्त हो जाता है तो यह विश्व के लिए एक नया रिकॉर्ड तो होगा ही साथ ही मोदी सरकार की कार्यशैली और उसके काम करने की गति पर सवाल उठाने वालों के लिए अध्ययन का नया विषय भी होगा।

संकट कटै, मिटै सब पीरा

बहरहाल, प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि भ्रम तो सरकार के लोग ही फैला रहे हैं खासकर जब स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पतंजलि आयुर्वेद की कोरोनिल किट को जारी किया था। यह भी कहा गया कि भाजपा के करीबी योग गुरु रामदेव खुद कह रहे हैं कि मुझे वैक्सीन की जरूरत नहीं है तो भ्रम फैलाने का आरोप दूसरों पर क्यों लगाया जा रहा है ? इस पर कहा जा सकता है कि जिसको भी कोरोनिल पर आपत्ति है उसे जरा पहले कोरोनिल के पैकेट पर लिखी बातों को पढ़ना चाहिए कि उस दवा के बारे में उसकी उत्पादक कंपनी ने क्या दावे किये हैं। रही बात इस आरोप पर कि उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार टीकाकरण नीति की समीक्षा को बाध्य हुई तो इस पर कहा जा सकता है कि यदि ऐसा है भी तो इसमें गलत क्या हुआ या इस बात में शर्म कैसी। हालात और संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए जनता को राहत देने के लिए नीतियों में जितने भी बदलाव की जरूरत पड़े, वह करने ही चाहिए। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने बच्चों के लिए भी दो कोरोना रोधी वैक्सीन के ट्रायल के अग्रिम चरणों में होने की जो जानकारी देश को दी है उसके बाद ट्विटर के जरिये सरकार को सिर्फ घेरते रहने की राजनीति करने वालों का मुँह कुछ समय के लिए बंद हो जायेगा।

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