मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना, अध्याय 8( 1 ) जहांगीर के हिंदू समाज पर अत्याचार

जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब की हिन्दू नीति

अकबर के लिए कहा जाता है कि उसकी सेना में अधिकांश लोग हिन्दू हुआ करते थे । जिन पर उसका बहुत अधिक विश्वास होता था । अकबर की सेना में रहने वाले इन हिन्दुओं को अकबर की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के साथ जोड़कर देखा जाता है। जिससे कि पाठक के भीतर यह विश्वास पैदा हो कि अकबर वास्तव में प्रेम, अहिंसा और बन्धुत्व में विश्वास रखने वाला महान शासक था । उसके लिए मजहब नाम की कोई चीज नहीं थी जो उसे अपने राजधर्म से विमुख कर सके।
वास्तव में अकबर के बारे में ऐसा लिखा जाना बहुत भ्रामक है । क्योंकि वास्तविकता इसके विपरीत थी। अकबर के लिए काफिर काफिर था और मुस्लिम मुस्लिम था। यद्यपि वह अपने आपको सामान्य मुसलमानों से कहीं बहुत ऊपर मानता था। उसके बारे में विद्वानों की मान्यता यह भी है कि वह अपने आप को दूसरा पैगम्बर घोषित करना चाहता था। अकबर की हिन्दुओं के प्रति साम्प्रदायिक सोच को प्रकट करने वाला बदायूँनी का यह कथन बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है :-
”हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर की सेना से जुड़े राजपूत, और राणा प्रताप की सेना के राजपूत जब परस्पर युद्धरत थे और जब उनमें यह भेद करना असम्भव हो रहा था कि कौन किस ओर है, तब मैनें शाही फौज के अपने सेनानायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ? – जिससे कि शत्रु ही मरे।

तब उसकी सेना के सेनापति आसफ खाँ ने उत्तर दिया कि यह जरूरी नहीं कि गोली किसको लगती है क्योंकि दोनों ओर से युद्ध करने वाले काफिर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा।”
(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदायूँनी,
खण्ड II,अनु अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित 1962; हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर :आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ 132 तृतीय संस्करण)

हिन्दुओं के प्रति जहाँगीर की नीति

अकबर का हिन्दुओं के प्रति ऐसा दृष्टिकोण केवल इसलिए था कि वह भी दारुल – इस्लाम के लक्ष्य को लेकर चल रहा था। वह भी इसी सोच से प्रभावित और ग्रसित था कि सम्पूर्ण भूमण्डल इस्लाम के रंग में रंग जाए और पृथ्वी काफिरों से खाली हो जाए। यही कारण था कि उसने अपने शासनकाल में जी भरकर हिन्दुओं का विनाश किया था। उसके हिन्दुओं के प्रति इस दृष्टिकोण की जानकारी हमें उसी के बेटे जहाँगीर से प्राप्त होती है। जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ”तारीख-ई-सलीमशाही” में लिखा था कि ‘‘अकबर और जहाँगीर के शासन काल में पाँच से छः लाख की संख्या में हिन्दुओं का वध हुआ था।”
(तारीख-ए-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ 225-26)
इसी प्रकार के अन्य कई उदाहरण हैं जिनसे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अकबर की भांति ही उसका पुत्र सलीम उपनाम जहाँगीर भी अपने शासनकाल में हिन्दुओं के प्रति निर्दयता और कठोरता का व्यवहार करने वाला ही बना रहा। उसके विषय में यही कहा जा सकता है :-

अकबर जैसा ही रहा – बेटा खास सलीम।
हिन्दू दुश्मन दीन का थी उसकी ये तालीम।।

इतिहास को विकृत करने वाले इतिहासकारों ने चाहे जहाँगीर को भी दयालु और न्यायप्रिय शासक लिख दिया हो ,पर स्मिथ ने उसके बारे में लिखा है कि – “कोमलता और क्रूरता का एक विचित्र यौगिक, न्याय और सम्प्रदाय, शोधन और क्रूरता, अच्छी भावना और बचकाना।”
पिता के विरुद्ध विद्रोह करने का भाव अकबर के शासन काल में सबसे पहली बार सलीम ने ही प्रकट किया था। बाद में प्रत्येक मुगल सम्राट के विरुद्ध उसके बेटे के द्वारा ही विद्रोह करना समझो मुगल शासन की एक ‘महान परम्परा’ ही बन गई थी।अपने ही पिता के विरुद्ध विद्रोह करने वाले सलीम उपनाम जहाँगीर को जब अपने बेटे खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा तो उसने पहली बार तो उसे क्षमा दान दे दिया ,परन्तु दूसरी बार के विद्रोह के करने के उपरान्त उसने अपने पुत्र खुसरो को अंधा कर दिया।
वास्तव में मुगल शासन काल में होते रहे बेटों के इस प्रकार के विद्रोहों का कारण भी उनके पिताओं की लम्पटता ही अधिक थी । क्योंकि सारे के सारे लम्पट और व्यभिचारी मुगल शासक हिन्दू महिलाओं को बलात उठा – उठाकर अपनी रखैल या बेगम बनाते रहे और उनसे जो अवैध सन्तानें होती रहीं वह कहीं शासन की दावेदार न बन जाएं या उनके सम्भावित खतरे को भांपकर ही राजमहलों में सत्ता षड़यंत्र रचे जाते थे।

षड़यंत्र रचे जाते रहे महलों के दरम्यान।
पिता की दुश्मन बन गई अपनी ही संतान।।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने एक पत्नीधर्म की व्यवस्था इसीलिए की थी कि यदि अधिक पत्नियां रखी जाएंगी या राजा लम्पट, व्यभिचारी या व्यसनी होगा तो उसकी अनेकों सन्तानों के मध्य सत्ता को लेकर संघर्ष होंगे। जिसका विपरीत प्रभाव राज्य के नागरिकों पर भी पड़ेगा। आज जनसामान्य में भी यदि संपत्ति के विवाद हैं तो उसका कारण केवल एक ही है कि आज के तथाकथित राजा अर्थात हमारे जनप्रतिनिधि सत्ता षड़यंत्र और संपत्ति के विवादों में फंसे हुए हैं।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत
एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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