मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना, अध्याय – 6( 1)

तैमूरलंग का आतंकी अभियान

इस्लाम के नाम पर विजय अभियानों का आयोजन करने वाले प्रत्येक आक्रमणकारी ने मजहबी जुनून और उग्रवाद का परचम लहराकर सारे संसार को आतंकित करने का कार्य किया । इस दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो इस्लामिक आतंकवाद कल परसों की बात नहीं है , यह इस्लाम के जन्म के साथ ही पैदा हुआ है। यह अलग बात है कि देश, काल व परिस्थिति के अनुसार भूमण्डल पर इसका विस्तार कम या अधिक क्षेत्र में रहा । इस्लाम के नाम पर जिन आक्रमणकारियों ने अपने विजय अभियान चलाए उन्हीं इस्लामिक आक्रमणकारियों में से एक नाम तैमूर लंग का भी है।तैमूरलंग ने अपने इतिहासकारों का कहना है कि लगभग 70 वर्ष के जीवन में  इस्लामिक आतंकवाद और साम्प्रदायिक सोच से प्रेरित होकर 35 विजय अभियान भारत के विरूद्घ चलाये थे। भारत में उसने हरिद्वार से लेकर पश्चिम में कैरो तक के प्रदेश में भारी विनाश किया था।

इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि तैमूर लंग ने भारत के विरुद्ध इतने व्यापक स्तर पर विनाश मचाने का संकल्प केवल गाजी बनने के लालच में लिया था। तैमूर ने स्वयं कहा था-‘‘काफिरों (हिन्दुओं) के विरूद्घ एक अभियान चलाकर गाजी बनने की इच्छा मेरे मन में पैदा हुई, क्योंकि मैंने सुना है कि काफिरों की हत्या करने वाला गाजी होता है। मैं अपने दिमाग में यह तय नही कर पा रहा था कि चीन के काफिरों के विरूद्घ पहले जाऊं या हिन्दुस्तान के। इस बारे में मैंने कुरान से हुकुम लिया। मैंने जो पद निकाला वह यों है-हे पैगंबर! काफिरों, नास्तिकों से लड़ाई छेड़ दो, और उनसे बड़ी कठोरता से पेश आओ।’’
उपरोक्त उद्घरण हमने ‘इलियट एण्ड डाउसन’ के ग्रंथ से लिया है। इसी ग्रंथ के पृष्ठ 397 पर लिखा है-कि तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व अपने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था-
‘‘हिन्दुस्तान पर हम लोग उस देश के लोगों को मुसलमान बनाकर काफिरपन की गंदगी से उस देश की जमीन को पाक और साफ कर सकें और उन लोगों के मन्दिरों तथा मूर्तियों को नष्ट कर हम लोग गाजी और मुजाहिद कहला सकें।’’

मजहब की यह गंदगी करती सोच खराब।
मानव को दानव करे , है ऐसी बुरी शराब।।

तैमूर के लिए इस्लाम की व्यवस्था के अनुरूप इससे उत्तम कोई आदर्श या जीवनोद्देश्य नही हो सकता था कि वह भारत से काफिरपन ( हिन्दुत्व) को समाप्त करने के लिए आये और उसके विनाश के लिए अपनी सारी शक्ति का पूर्ण मनोयोग से उपयोग करे। वास्तव में वामपंथियों ने जिस प्रकार मजहब को एक अफीम कहा है, उनका यह कथन इस्लाम के आक्रमणकारियों पर पूर्णतया सटीक बैठता है ।जो मजहब की शराब पी – पीकर भारत की ओर या विश्व के अन्य देशों की ओर अपने दुष्ट दानव दल को लेकर चले और लूटपाट, डकैती, हत्या, बलात्कार और नरसंहार के कीर्तिमान स्थापित करने को ही उन्होंने उस समय का सबसे बड़ा पुण्य कार्य मान लिया था। भारत की ज्ञान परम्परा में जब व्यक्ति पाप को पुण्य मानने लगता है तो उसे मानव का अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञानता मानवता का बहुत भारी अनर्थ करती है। इससे भी बड़ा अनर्थ तब होता है जब व्यक्ति अज्ञान को भी ज्ञान मान लेता है और अपने उस तथाकथित ज्ञान के से पगलाकर संसार को भारी कष्ट में डाल देता है। बस, मुस्लिम लोग यही कर रहे थे। इनका ज्ञान पगला चुका था और वह यह नहीं देख रहा था कि सामने जिनके धड़ कट कटकर धरती पर गिर रहे हैं वह भी तो मानव ही हैं। इसकी दृष्टि में वे मानव नहीं थे अपितु काफिर थे और काफिरों के खून में स्नान करना इसके लिए सबसे बड़ा सबाब बन चुका था।

सबकी अपनी अपनी चाहना अपने अपने चाव। इस्लाम बढ़े इस हिंद में थी एक सभी की चाह।।

इतिहास के इस सच को जिन लोगों ने तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए दबाने का काम किया है उन्होंने भी मानवता का अहित किया है । थोड़ी देर के लिए हम यह मान लेते हैं कि उन्होंने यह कार्य इसलिए किया हो कि पिछली कड़वाहट को भूलो और आगे बढ़ो। लेकिन जिनके लिए यह किया गया था उन्होंने न तो कड़वाहट को भुलाया और ना ही वे आगे बढ़े।
वे क्रूर सांप्रदायिकता के खूंटे से बंधे रहे। चौदह सौ वर्ष पहले के बहशीपन के कार्यों में वे आज भी लगे हुए हैं। उन्होंने न तो अपने इतिहास को भुलाया और न ही अपने इतिहास पुरुषों को भुलाया। वे अपने इतिहास और इतिहास पुरुषों से शिक्षा लेकर उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और सारे संसार को दारुल इस्लाम के झंडे तले ले आने के अपने महान कार्य में लगे हुए हैं।

जब तैमूर चला आतंक का पर्याय बनकर

संसार के लिए आतंक और विनाश का पर्याय बनकर मार्च 1398 में तैमूर ने कटक के पास से सिंधु नदी को पार किया और तुलुम्ब नामक कस्बे के सारे हिन्दुओं को अपनी मजहब की पाशविकता की प्यासी तलवार का शिकार बना दिया और उनका सारा धनादि उनसे छीन लिया। इस प्रकार पहले झटके में ही हजारों हिन्दू तैमूर की तलवार से बलि का बकरा बन गये। इसके बाद तैमूर जब भारत के शीश कश्मीर में प्रविष्ट हुआ तो उसने वहाँ पर भी ऐसा ही तांडव मचाया । हिन्दुओं पर अनगिनत निर्ममतापूर्ण अत्याचार किए। इस प्रकार वह आतंक का पर्याय बन कर भारत आया था।
अपने मजहबी उन्माद में पगलाए इस विदेशी क्रूर आक्रमणकारी ने भारतवर्ष के हिन्दू किसानों से उनका अन्न तक छीन लिया था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि हिन्दुस्तानी लोग भूख से मरने लगें। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो उसने लूटे गये क्षेत्रों में आग लगा दी। उसके ऐसे अत्याचारों को देखकर मानवता कराह उठी थी। चारों ओर चीख-पुकार और दु:खी लोगों की आवाजें सुनाई देती थीं। पर इस बहरे गूंगे तैमूर के लिए ये सारी चीख पुकारें दु:ख का कारण न होकर आनन्द का विषय बन गई थीं। उसके इस प्रकार के आनन्द का कारण यही था कि वह अपने मन से ऐसे ही ‘मनमोहक’ दृश्यों की कल्पना करके अपने घर से चला था।
कश्मीर में अपने आतंक का साम्राज्य स्थापित कर तैमूर फतहबाद, राजपुर और पानीपत में अपने मजहबी आतंक से काफिरों को आतंकित करता हुआ अन्त में दिल्ली आ धमका। दिल्ली के बहुत से हिन्दुओं को तैमूर के अत्याचारों की सूचना पहले ही मिल चुकी थी कि तैमूर अब से पूर्व मुलतान, दीपालपुर, सरसुती, कैथल आदि में कितने ही अत्याचार कर चुका है। हृदय को झकझोर देने वाले तैमूरी अत्याचारों की कहानी से बहुत से हिन्दू राजधानी दिल्ली से इधर-उधर भाग गये या जिन्हें अवसर मिला उन्होंने आक्रांता के क्रूर अत्याचारों से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, अथवा अपने बच्चों व पत्नी को जीवित ही जला दिया। जो हिन्दू बचे उनके साथ क्रूरता की सीमाएं लांघकर अत्याचार किये गये। आत्मरक्षा में हिन्दुओं के द्वारा अपने ही बच्चों व परिजनों को जला देने की ऐसी ह्रदयविदारक घटनाओं को इतिहासकार या कोई लेखक दो चार पंक्तियों में लिख कर आगे बढ़ जाता है, परन्तु जब इन भयावह दृश्यों की कल्पना की जाती है या यह अनुभव किया जाता है कि यदि यह अत्याचार मेरे साथ हो रहे होते तो कैसा लगता ? तब पता चलता है कि हमारे पूर्वजों ने कितने अमानवीय और पाशविक अत्याचारों को सहन कर अपना धर्म और संस्कृति बचाने का व्रत निभाया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत
एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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