सरकार विरोध से राष्ट्र विरोध में परिवर्तित होता जा रहा किसान आंदोलन

दीपक कुमार त्यागी

जिस ढंग से कुछ देशद्रोही लोगों के द्वारा देश की आन-बान-शान लाल किले की प्राचीर पर 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री के द्वारा तिरंगा फहराये जाने वाले पोल पर धर्म विशेष के संकेत वाला दूसरा ध्वज लहराया गया, वह बहुत ही शर्मनाक घटना है।

गणतंत्र दिवस का दिन प्रत्येक भारतीय के जीवन में बहुत गौरवशाली दिन होता है, लेकिन हमारे यहां इस दिन भी ओछी राजनीति करने वाले चंद राजनेताओं को चैन नहीं है, वो अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए देश की आन-बान-शान व मानसम्मान से खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रहे है और सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि हमारी सरकार व सिस्टम तमाशबीन बनकर चुप खड़े होकर तमाशा देख रहा है, गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में घटित घटनाएं इसका ताजा उदाहरण हैं। हर वक्त देशभक्ति का दंभ भरने वाले चंद राजनेताओं के निजी स्वार्थ इतने अधिक हो गये हैं कि उनके चलते देशभक्ति व देशहित एक ही क्षण में बहुत पीछे छूट जाता है। इसी ओछी राजनीति के चलते राष्ट्रीय महापर्व 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली की सड़कों पर जमकर घमासान हुआ। किसानों की ट्रैक्टर परेड़ की आड़ में कुछ उपद्रवियों ने नियम-कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाकर जमकर हुड़दंग उतारा, संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग करके देश की छवि को विश्व में खराब करने का दुस्साहस किया। हमारे देश के लचर सिस्टम, चंद राजनेताओं व ओछी राजनीति की वजह से राजधानी दिल्ली की सड़कों पर जो तांडव मचा वह कोई माफी योग्य आम घटना नहीं है, जिस तरह से किसानों की ट्रैक्टर परेड़ की आड़ लेकर कुछ आतंकी मानसिकता के देशद्रोही लोगों के द्वारा दिल्ली की सड़कों पर हिंसा का तांडव मचाया गया वह किसी भी दृष्टि उचित नहीं है और माफी योग्य अपराध नहीं है।

जिस ढंग से कुछ देशद्रोही लोगों के द्वारा देश की आन-बान-शान लालकिले की प्राचीर पर 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री के द्वारा तिरंगा फहराये जाने वाले पोल पर धर्म विशेष के संकेत वाला दूसरा ध्वज लहराया गया, वह बहुत ही शर्मनाक घटना है। लाल किले में घटित इस अक्षम्य अपराध की घटना ने सरकार व हमारे देश के सिस्टम की कार्यप्रणाली पर विश्व समुदाय के सामने प्रश्नचिन्ह लगाने का कार्य किया है, जब पुलिस के पास पहले से ही पुख्ता खुफिया सूचना थी कि किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली में कोई अप्रिय घटना घट सकती है, फिर भी चंद राजनेताओं के हाथ में खेलती हमारे देश की सरकार व सरकारी सिस्टम क्या करता रहा, वो सड़कों पर खड़े होकर कुम्भकर्णी नींद में सोता रहकर तमाशा देखता रहा और देश विरोधी लोग अपना कार्य कर गये। चंद राजनीतिक लोगों के हाथ की कठपुतली बनी सुरक्षा एजेंसियों को समझना होगा कि लाल किला देश की एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत है जहाँ दशकों से तिरंगा शान के साथ लहराता रहा है, वह किसी व्यक्ति के घर की आम बालकनी नहीं है कि जिसे जब मन आए वो उस पर चढ़कर अपनी मन पसंद का धार्मिक या राजनीतिक ध्वज फहरा दे।

लापरवाही बरतने वाले देश के चंद राजनेताओं व पुलिस-प्रशासन को समझना होगा कि लाल किला हमारे लोकतंत्र की सर्वोच्च मर्यादा के प्रतीकों में से एक है, उससे हर हाल में तथाकथित आन्दोलनकारियों को दूर रखना चाहिए था। क्योंकि इसकी मान मर्यादा की रक्षा के लिए माँ भारती के असंख्य वीर जांब़ाज सपूतों ने देश में व सीमाओं पर अपने बलिदान दिये हैं और आज भी दे रहे हैं, लेकिन उस जगह राजनीतिक नौटंकी की यह घटना बहुत ही दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। इस घटना ने साबित कर दिया है कि किसानों के भेष में छिपे हुए कुछ आतंकियों के लिए किसान आंदोलन तो मात्र एक बहाना है, उनका असली मक़सद देश के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाना है, जो प्रत्येक सच्चा देशभक्त भारतीय व सच्चा अन्नदाता किसान कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगा।

वैसे इस घटना के बाद अन्नदाता किसानों का जो आंदोलन पिछले दो माह से देश में विभिन्न जगहों पर शांतिपूर्ण ढंग से आम जनमानस के जबरदस्त सहयोग से चल रहा था, उसको अब बहुत बड़ा झटका लगना तय है, 26 जनवरी की घटना ने किसानों के बेहद मजबूत आंदोलन को एक क्षण में ही कमजोर करने का कार्य कर दिया है और भविष्य में उसको मिलने वाले अथाह जनसमर्थन को बहुत बड़ा झटका दे दिया है। दिल्ली में जिस तरह से किसान आंदोलन के नाम पर चंद गुंडों के द्वारा पत्थरबाजी करके हिंसा की गयी, गुंडों ने नियमों-कायदों को ठेंगा दिखाया, पुलिस के द्वारा तय मार्ग का पालन न करते हुए दिल्ली के माहौल को खराब करने के लिए पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों पर पत्थरबाजी की गयी व उनसे मारपीट की गयी, वह घटना बेहद निंदनीय है। वैसे भी सरकार व किसान दोनों पक्षों को समझना चाहिए कि इतिहास गवाह है कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान प्रदान नहीं करती है, वह मसले को बिगाड़ने का काम करती है, लेकिन सरकार को भी सोचना चाहिए कि हठधर्मिता का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, सरकार का काम हठधर्मिता त्याग कर जनहित के कार्य करना है, ठीक उसी प्रकार किसी भी सफल आंदोलन में हिंसा का भी कोई स्थान नहीं होता है।

लेकिन अब बहुत हद हो गई शासन प्रशासन को तत्काल किसान व आतंकियों में अंतर करके अपनी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए और भविष्य में हालात को खराब होने से रोकना चाहिए। हम सभी को समझना चाहिए कि लाल किला हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम प्रतीक है, उसकी मान-मर्यादा का ध्यान सभी को रखना चाहिए। क्योंकि लाल किले की प्राचीर पर घटित किसी भी देशद्रोही घटना के बाद भारत के विरोधी देशों में उत्सव मनना तय है, ओछी राजनीति करने वाले कुछ राजनेताओं व अराजक तत्वों ने देश को विश्व में शर्मसार करने का दुस्साहस कर दिया है। कुछ आतंकी लोगों की गलत हरकतों व ओछी सोच की वजह से अन्नदाता किसानों का आंदोलन सत्ता विरोध से देश-विरोध में तब्दील हो चुका है, किसानों संगठनों को तत्काल हंगामे करने वाले लोगों को चिन्हित करके उनका पूर्ण रूप से सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए और गुंडागर्दी की घटना फिर भविष्य में घटित ना हो उस पर चंद राजनेताओं की तरह वायदे ना करके सख्ती से धरातल पर अंकुश लगाना चाहिए और ‘जय जवान जय किसान’ के नारे की आज के समय में भी उतनी ही सार्थकता है उसको साबित करना चाहिए।

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