क्या किसानों का ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम बहुत अधिक जोखिम भरा नहीं है?

 

दीपक कुमार त्यागी

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं।

कड़कड़ाती कड़ाके की हाड़ कंपकंपा देने वाली भयंकर शीतलहर में हमारे देश का अन्नदाता अपने हक को लेने के लिए सड़कों पर धरना देकर बैठा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं की सड़कों पर व देश में अन्य भागों में बहुत जगहों पर केंद्र सरकार के द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले बहुत लंबे समय से हमारे प्यारे किसान जगह-जगह पर धरनारत हैं। मसले के समाधान के लिए केंद्र सरकार से किसानों की बार-बार वार्ता होने के बाद भी अभी तक भारत सरकार व किसानों के बीच कोई भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है, किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं केंद्र सरकार बिंदुवार चर्चा करके असहमत बिंदुओं में संशोधन करने की बात कह रही है। लेकिन धरातल पर वास्तविकता यह है कि किसान संगठनों व केंद्र सरकार के बीच मामला आंदोलन के एक-एक दिन गुजरने के साथ और लंबा खिचता जा रहा है, जिसके चलते उतना ही यह मामला पेचीदा होकर सुलझने की जगह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा उलझता जा रहा है।

अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को अब धीरे-धीरे दो माह होने वाले हैं, लेकिन फिर भी किसानों की समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं, जिसके चलते अब किसान आंदोलन देश के विभिन्न भागों में बहुत तेजी से विस्तार लेता जा रहा है। अब तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है, जिसने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, जो किसानों से बात करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी। हालांकि कमेटी का गठन होते ही वो सदस्यों की वजह से विवादों के दायरे में आ गयी, किसान संगठनों के कुछ नेताओं ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर कमेटी के सदस्यों के चयन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उनको तीनों कृषि कानूनों का समर्थक बताया है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसके बाद एक सदस्य ने तो कमेटी में रहने से इंकार ही कर दिया है।

खैर हमारे देश में राजनीति जो करवा दे वो भी कम है, लेकिन अब देश में किसानों का हितैषी बनने को लेकर के पक्ष विपक्ष व निष्पक्ष लोगों के बीच में जबरदस्त चर्चा के साथ किसान राजनीति अपने चरम पर है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनका हक ना देने वाले राजनीतिक दलों से लेकर के हर कोई अपने आपको अन्नदाता किसानों का कट्टर हितैषी दिखाने पर लगा हुआ है। वैसे विचारणीय बात यह है कि जिस तरह से देश में आजादी के बाद से ही गरीबी को खत्म करने के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं चलाई गयीं और हर वक्त राजनीतिक दलों के द्वारा उनका श्रेय लेने में भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती है ठीक उसी प्रकार से ही किसानों के नाम पर भी देश में आजादी के बाद से यही स्थिति है, राजनीतिक दल हमेशा श्रेय लेने से चूके नहीं हैं। लेकिन अफसोस फिर भी सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि ना तो देश से गरीबी समाप्त होने का नाम ले रही है और ना ही हमारे अन्नदाता किसानों को भी उनकी समस्याओं का समाधान व हक अभी तक मिल पा रहा है। हाँ, देश में लंबे समय से गरीब व किसानों का हितैषी बनने के लिए राजनीतिक लोगों के द्वारा केवल और केवल हर वर्ष की आंकड़ेबाजी अवश्य जारी है। आंकड़ों की बाजीगरी व धरातल के हालातों में बहुत अंतर होने के कारण उत्पन्न आक्रोश की वजह से ही किसान अब सड़कों पर उतरे हुए हैं और वो अब अपने हक के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते ही वो दिल्ली की सीमाओं के साथ देश के अन्य भागों में अपना घर-बार छोड़कर अनिश्चितकालीन लंबे धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार व आम जनमानस का अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

उसी क्रम में कुछ किसान संगठन राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर दिल्ली की आउटर रिंगरोड व देश के विभिन्न भागों में ट्रैक्टर परेड के आयोजन करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहे हैं। जिसको लेकर केंद्र सरकार व देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन 26 जनवरी पर किसी भी अनहोनी की आशंका को रोकने के लिए सरकार व सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हैं। ‘केन्द्र सरकार तो ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक चली गयी है, जिस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबडे ने कहा, ‘दिल्ली में रैली निकाले जाने के मामले में हमने पहले ही कहा था कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और यह पुलिस को देखना है।’ उन्‍होंने कहा, ‘यह देखना पुलिस का काम है, कोर्ट का नहीं कि कौन दिल्ली में प्रवेश करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा!’ सीजेआई ने कहा कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, हमें बताने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली पुलिस गणतंत्र दिवस की गरिमा सुनिश्चित करे।

वहीं अब किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग के तार खालिस्तानी संगठनों से जुड़ने के अंदेशों को देखते हुए जांच करने के लिए देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी एनआईए भी एक्टिव हो गयी है। सूत्रों के अनुसार उसने किसान संगठनों के कुछ शीर्ष नेताओं व अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजे हैं। जिसके बाद उत्पन्न हालात को देखकर हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक सरकार व किसानों के बीच भविष्य में टकराव का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। किसानों के द्वारा ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा के बाद से ही देश के अधिकांश आम लोगों के मन में एक विचार बहुत तेजी से कौंध रहा है कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर क्या सुरक्षा की दृष्टि से किसानों का इस तरह से ट्रैक्टर परेड निकालना उचित है?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि सुरक्षा एजेंसी के जरिये उन्हें जानकारी मिली है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर परेड निकालने वाले हैं। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्ता के इस महत्वपूर्ण समारोह को प्रभावित करना है, हालांकि किसान संगठन समारोह में किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की रणनीति से इंकार कर रहे हैं, वो केवल गरिमापूर्ण ढंग से परेड निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन पूर्व में जिस तरह से कुछ लोगों की वजह से किसानों के धरने के बीच ही देश को तोड़ने की बात करने वाले लोगों के फोटो लगे थे उस घटना से सबक लेकर अब किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड के दौरान अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी, उनको आत्ममंथन करना होगा कि क्या किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में आये ट्रैक्टरों के बीच अनुशासन बना कर रख सकते हैं, क्योंकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में कोई भी देश विरोधी घटना घटित ना हो पाये इसको रोकने की जिम्मेदारी किसानों की खुद होगी, क्योंकि अगर कोई भी घटना घटित हो जाती है तो भविष्य में किसान आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगने का काम हो सकता है और वैसे भी यह हमारे प्यारे देश की आन-बान-शान व अस्मिता के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। किसान संगठनों व उससे जुड़े लोगों को ध्यान रखना होगा कि धरना प्रदर्शन करने का उनका अधिकार है। तो यह ध्यान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है कि आंदोलन व परेड के दौरान कोई ऐसी घटना घटित ना हो जाये जिससे कि कोई देशद्रोही व्यक्ति देश की मान प्रतिष्ठा को इस किसान आंदोलन की आड़ में धूमिल करने का दुस्साहस कर सके। एक वीर जाबांज जवान की तरह देश के लिए सभी कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहने वाले अन्नदाता किसानों को हर हाल में देश की आन-बान-शान व स्वाभिमान का ध्यान रखना होगा।

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