कांग्रेस हार पर चिंतन या विचार-विमर्श करेगी?

नीरज कुमार दुबे

कांग्रेस का आलाकमान तो सिर्फ इसी बात पर चिंतन मनन करता रहा है कि कैसे पार्टी की कमान को अपने परिवार तक ही सीमित रखा जाये। कांग्रेस का आलाकमान तो सिर्फ इसी बात का चिंतन मनन करता रहा है कि इस बार छुटि्टयों में कहाँ चला जाये।

कांग्रेस नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियति मान लिया है। यह बात कांग्रेस के विरोधी राजनीतिक दल नहीं बल्कि खुद पार्टी के वरिष्ठ नेता कह रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने एक साक्षात्कार में बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी पराजय पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियति मान लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों से भी ऐसा लग रहा है कि देश के लोग कांग्रेस पार्टी को प्रभावी विकल्प नहीं मान रहे हैं। यही नहीं कपिल सिब्बल के इस साक्षात्कार को रिट्वीट करते हुए कांग्रेस सांसद कार्ति चिदम्बरम ने कहा है कि यह आत्मविश्लेषण, चिंतन और विचार-विमर्श करने का समय है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आत्मविश्लेषण करेगी? क्या कांग्रेस हार पर चिंतन या विचार-विमर्श करेगी?

कांग्रेस का आलाकमान तो सिर्फ इसी बात पर चिंतन मनन करता रहा है कि कैसे पार्टी की कमान को अपने परिवार तक ही सीमित रखा जाये। कांग्रेस का आलाकमान तो सिर्फ इसी बात का चिंतन मनन करता रहा है कि इस बार छुटि्टयों में कहाँ चला जाये। भले कोई विधानसभा चुनाव हो रहे हों, भले लोकसभा चुनाव हो रहे हों, भले संसद का सत्र चल रहा हो, भले पार्टी के सामने कोई विकट समस्या आकर खड़ी हो गयी हो लेकिन कांग्रेस आलाकमान की पिकनिक में कोई विघ्न नहीं आना चाहिए। छुटि्टयों में मौज मस्ती करो, समय मिल जाये तो टि्वटर पर राहुल गांधी मोदी को घेर लें और प्रियंका गांधी योगी को घेर लें, बस हो गया विपक्ष की भूमिका का निवर्हन।

कांग्रेस सिर्फ अपने सिद्धांतों और विचारधारा से ही नहीं भटक गयी है बल्कि किस चुनाव में किन मुद्दों को लेकर आगे जाना है इसको लेकर भी अटक गयी है। हालिया कुछ राज्य विधानसभा चुनावों की बात कर लें तो ऐसे लोगों को प्रभारी बनाकर भेज दिया जाता है जो अपने अड़ियल रवैये के कारण राज्य के नेताओं को भरोसे में नहीं लेते। सिर्फ अपनी चलाते हैं और जैसे ही चुनाव परिणाम कांग्रेस को चलता कर देते हैं यह प्रभारी लोग भी वापस दिल्ली को चल देते हैं। अचम्भे की बात यह है कि ऐसे प्रभारियों को कांग्रेस में लगातार तरक्की भी मिल रही है जोकि पार्टी को पलीता लगाने में जुटे हुए हैं। क्या कांग्रेस में जनाधार वाले नेताओं की कोई पूछ है? यह सवाल जरा एक बार जनाधार वाले नेताओं से करके देखिये वह ऑफ द रिकॉर्ड अपने साथ हो रहे अन्याय की लंबी कहानी सुनाने लग जायेंगे।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पिकनिक खूब मनाता है और राजनीतिक पर्यटन भी उन्हें खूब भाता है। हाथरस मामले को लेकर सड़क पर उतरे राहुल और प्रियंका अब इस मामले को भुला चुके हैं और उन्हें यह भी पता लग गया होगा कि कैसे जनता ने उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस का सारा घमंड चूर-चूर कर दिया है। दरअसल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की दिक्कत यह है कि राहुल और प्रियंका अनुभवी नेताओं की बात सुनना छोड़ चुके हैं, उन्हें लगता है कि जो लोग भी उन्हें सही सलाह दे रहे हैं वह गांधी परिवार के खिलाफ हैं। यही कारण है कि वरिष्ठ नेताओं से विमर्श किये बिना राहुल और प्रियंका जिन मुद्दों का चयन करते हैं और चुनावों के दौरान जो मुद्दे उठाते हैं उससे लगातार पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

यही कारण है कि भाजपा को कहने का मौका मिल गया है कि कांग्रेस जिसे छूती है वह बर्बाद हो जाता है। अब भाजपा की जरा इस बात में कितना दम हैं यह भी देख लीजिये। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया, सपा बर्बाद हो गयी। बिहार में कांग्रेस की वजह से राष्ट्रीय जनता दल का सरकार बनाने का सपना चकनाचूर हो गया। कांग्रेस की वजह से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा बर्बाद हो गयी। कांग्रेस की वजह से कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर की सरकार चली गयी। देश के अन्य राज्यों में भी आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पता चल जायेगा कि देश की ग्रैण्ड ओल्ड पार्टी का क्या हाल है। कांग्रेस के नेताओं में पार्टी छोड़ने की होड़ लगी है, विधायक हों या सांसद अब कांग्रेस के प्रति वफादार नहीं रह गये हैं और पाला बदलने के लिए मौका देखते रहते हैं, ऐसी स्थिति में आम कार्यकर्ता आलाकमान की ओर आशा भरी उम्मीदों से देख रहा है लेकिन आलाकमान अगली पिकनिक कहाँ मनाएँ इस बात की सोच रहा है। खबर तो यह भी रही कि बिहार की हार के बाद कांग्रेस के उन 23 नेताओं की एक और बैठक हुई जिन्होंने आलाकमान को अगस्त महीने में एक पत्र लिख कर पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने की माँग की थी। लेकिन इस बैठक से ज्यादा कुछ निकल कर नहीं आया क्योंकि इन नेताओं को पिछली बार का हश्र याद था जब इन्हें गद्दार और भाजपा एजेंट तक कह दिया गया था।

बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह आरजेडी के नेता कांग्रेस को घेरने में लगे हुए हैं उस पर कांग्रेस पलटवार भले कर दे लेकिन पार्टी को यह सोचना ही होगा कि वह देश में गंभीर राजनीति करना चाहती है या नहीं। हम होते तो 15 मिनट में चीन को बाहर कर देते, हम होते तो यह कर देते वह कर देते…जैसे बयान विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में तो काम कर सकते हैं लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मुद्दे अलग होते हैं यह बात कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को समझनी ही होगी। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से बाहर निकल कर कांग्रेस को अपने विजन को प्रस्तुत करना चाहिए और देश की जनता को समय देना चाहिए कि वह उसके दृष्टिकोण या नीतियों पर विचार कर फैसला करे। लेकिन कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व से इस बात की उम्मीद कम ही है। भाजपा का नारा है- मोदी है तो मुमकिन है। कांग्रेस का नारा होना चाहिए- राहुल है तो नामुमकिन है।

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