धार्मिक उन्माद व कट्टरवाद किसी भी देश की प्रगति के लिए अभिशाप

दीपक कुमार त्यागी

जिस ढंग से धर्म की ओट लेकर के आये दिन धर्म के तथाकथित स्वघोषित ठेकेदार इंसान व इंसानियत के रक्षक की जगह उसके दुश्मन बने हुए हैं, वह अब किसी भी देश के लोगों से छिपा हुआ नहीं है और यह स्थिति विश्व के सभी बुद्धिजीवी लोगों के लिए विचारणीय है।
भारत अपने नीति-निर्माताओं की बेहद कुशल कारगर रणनीति व अपनी अपार संभावनाओं के चलते बहुत तेजी के साथ विकास के पथ पर चलने वाला देश है, जो अपने मेहनतकश निवासियों की मेहनत के बलबूते बहुत जल्द ही विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है। बशर्ते हमारे देश के हुक्मरान सामप्रदायिक सौहार्द व आपसी भाईचारे की सुरक्षा करके रखें, क्योंकि आजादी के बाद से लेकर आज तक ना जाने कितनी बार छोटी-छोटी बातों का अनेक बार बतंगड़ बनाकर, हमारे देश के दुश्मनों के द्वारा सांप्रदायिक दंगों को अंजाम देकर इंसान व इंसानियत की हत्या कराने का काम लगातार किया गया है, इन दंगा-फसाद की घटनाओं ने देश के विकास में बार-बार अवरोध उत्पन्न किया है। दंगों ने भारत की बेहद गौरवशाली बहुलतावादी संस्कृति को बेहद गहरे जख्म देकर, लोगों के बीच दूरी बनाकर समाज के भाईचारे को छिन्न-भिन्न कर दिया है। देश में बढ़ता धार्मिक उन्माद कट्टरवाद आपसी प्यार-भाईचारे को खत्म करके लोगों के बीच गहरी खाई खोदने का कार्य कर रहा है, कुछ माह पूर्व देश की राजधानी दिल्ली में घटित दंगे इसका सबसे ताजा शर्मनाक उदाहरण हैं।

“हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र आदि जैसे बेहद संकीर्ण आधारों पर कुछ लोगों, समूह व संगठनों ने देशवासियों में सामाजिक, वैचारिक और धार्मिक विषमता बढ़ाने का कार्य अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु बेहद चतुराई के साथ किया है।” सभी धर्मों को पूर्ण स्वतंत्रता मिलने वाले देश भारत में धर्म की आड़ लेकर देश के कुछ अतिवादी संगठन व कुछ लोग अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता का दावा सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करके एक-दूसरे के धर्म के लोगों को चिढ़ाने का कार्य करते हैं, जिसके चलते यह धर्म के तथाकथित ठेकेदार लोगों के बीच आपसी जहरीली विद्वेषपूर्ण मानसिकता का विकास करके मनमुटाव की बेहद गंभीर स्थिति उत्पन्न कर देते हैं। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद से तो हमारे देश में एक अलग तरह के नए राजनीतिक वातावरण का उद्गम हुआ है। जिसमें हम सभी लोगों के धार्मिक आस्था के वो प्रश्न जो कि बहुत नितांत व निजी होते थे, उन प्रश्नों पर अब सार्वजनिक मंच से चर्चा होने लगी है और वो प्रश्न अब राजनेताओं की कृपा से बहुत तेजी से राजनीतिक रंग भी लेने लगे हैं। इस तरह की स्थिति देश के विकास की रफ्तार में अवरोध उत्पन्न करती है और देश व समाज हित में बिल्कुल भी उचित नहीं है।

हाल ही में फ्रांस में घटित एक घटना के बाद से आजकल एक बार फिर विश्व में धार्मिक उन्माद व कट्टरवाद अपने पूर्ण चरम पर है, दुनिया में बनी इस स्थिति पर नियंत्रण के लिए बुद्धिजीवी लोगों के बीच चर्चा जारी है। जिस ढंग से धर्म की ओट लेकर के आये दिन धर्म के तथाकथित स्वघोषित ठेकेदार इंसान व इंसानियत के रक्षक की जगह उसके दुश्मन बने हुए हैं, वह अब किसी भी देश के लोगों से छिपा हुआ नहीं है और यह स्थिति विश्व के सभी बुद्धिजीवी लोगों के लिए बेहद विचारणीय है। वैसे दुनिया का प्रत्येक धर्म अपने हर एक अनुयायी को नियम-कायदे से रहकर अनुशासित जीवन जीना सिखाता है, लेकिन फिर भी ना जाने क्यों विश्व में धर्म के नाम पर आये दिन निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं। जो धर्म सभी को जीवन देना सिखाते हैं अफसोस आये दिन उसी धर्म की आड़ लेकर कुछ तथाकथित लोगों व उन्मादी भीड़ के द्वारा लोगों को उकसा कर मानवता की हत्याएं हो रही हैं। कुछ लोगों के द्वारा अपने छिपे हुए ऐजेंडे को लागू करवाने और अपना हित साधने के लिए लोगों का जीवन छीनने का काम धर्म की आड़ लेकर किया जा रहा है।

फ्रांस की घटना के बाद से जिस तरह से पूरी दुनिया के बहुत सारे अलग-अलग देशों में हंगामा बरपा है, उस हालात से अब हमारा देश भारत भी अछूता नहीं रहा है, भोपाल व हैदराबाद में इकट्ठा लाखों की भीड़ ने साबित कर दिया है कि भारत में भी लोगों को अपनी गंभीर समस्याओं व रोजी-रोटी, रोजगार और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की योजनाओं की जगह विश्व के अन्य देशों में घटित घटनाओं की बेहद चिंता है। हालात ने एक बार फिर सभी बुद्धिजीवी लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर हम 21वीं सदी में धर्म की आड़ लेकर किस तरह का नफरत भरा माहौल देश व दुनिया में बना रहे हैं। वैसे भी धर्म का पालन जीवन को अनुशासित करता है और धर्म के नाम पर कट्टरवाद जीवन व समाज का नाश करता है। हर धर्म हमेशा अपने प्रत्येक अनुयायी को अनुशासन में रहना सिखाता है, ना कि अनुशासनहीनता करके समाज में हिंसा व हंगामा बरपाना सिखाता है। वैसे आज के स्वार्थी दौर में यह भी कटु सत्य है कि कुछ सच्चे धार्मिक लोगों को छोड़कर अधिकांश धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को भी धर्म की परिभाषा तक सही ढंग से याद नहीं है। बस यह अधिकांश लोग बेहद चतुराई के साथ आम जनता का इस्तेमाल करके धर्म के नाम पर केवल और केवल अपनी दुकानदारी चलाने में व्यस्त हैं और अपनी व अपने आकाओं की स्वार्थपूर्ति सिद्ध करने में व्यस्त हैं, वास्तव में इनका धर्म के नियम-कायदों व सिद्धांतों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।

आज मेरा देश के प्रत्येक आम व खास नागरिकों से एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल है कि वह विश्व में धर्म के नाम पर बढ़ते उन्माद, नफरत व धार्मिक कट्टरता को किस तरह से देखते हैं, क्या वो भी इस नफरती हिंसक भीड़ का हिस्सा खुद व अपने बच्चों को बनाना चाहते हैं? आज हम लोगों को शांत मन से विचार करना चाहिए कि दुनिया के किसी भी छोर पर जब धर्म के नाम पर कोई धर्मांध उन्मादी व्यक्ति बदले की आग में झुलस कर किसी दोषी या निर्दोष व्यक्ति की हत्या करता है, तो क्या यह नियम-कानून के साथ-साथ मानवता व सच्चे धर्म के विरुद्ध जघन्य अपराध नहीं है? क्या इस तरह के जघन्य अपराध करने के लिए उसको ईश्वर सख्त सजा नहीं देगा? क्या दुनिया का कोई भी सच्चा धर्म किसी इंसान की हत्या करने की अनुमति देता है? क्या इस तरह की जघन्य घटना को अंजाम देकर किसी सच्चे धार्मिक व्यक्ति को संतुष्टि मिल सकती है? वैसे दुनिया के किसी भी महान सच्चे धर्म में हिंसा या धर्म के जबरन विस्तार को मान्यता नहीं है लेकिन फिर भी ना जाने क्यों दुनिया में बार-बार ऐसा होता है। जबकि वास्तव में तो धर्म मानवतावादी होता है और अनुशासन, प्रेम व सद्भाव इसका मूल आधार होता है। लेकिन आज सोचने वाली बात यह है कि इन बातों पर आखिर अमल कितने लोग व धर्म के ठेकेदार करते हैं। आज हम लोगों को यह ध्यान रखना होगा कि सत्ता हासिल करने के लालच में देश के चंद राजनेताओं के द्वारा आम देशवासियों के बीच में धर्म के कुछ ठेकेदारों के सहयोग से लोगों को बरगला कर धर्म के नाम पर नफरत की कभी ना टूटने वाली मजबूत दीवार खड़ी करने का लगातार बेहद घातक शर्मनाक प्रयास जारी है। जिस साजिश को हम लोगों को समय रहते हर हाल में देश व समाज के हित में नाकाम करना होगा।

आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व समुदाय के सामने चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि वह किस तरह से तेजी से बढ़ते हुए धार्मिक उन्माद व कट्टरवाद की स्थिति से निपटने का कार्य करें और मानवता की दुश्मन बन चुकी इस बेहद गम्भीर चुनौती का आखिर किस तरह से सामना करें। दुनिया में किसी भी धर्म की आड़ लेकर हंगामा बरपाने वाले किसी संगठन के आतंकी रवैये से क्या किसी सभ्य इंसान को यह महसूस होता है कि वह और उसका परिवार अब पूर्ण रूप से सुरक्षित है या उसके द्वारा चलाये जा रहे अघोषित युद्ध से क्या किसी धर्म की विजय हुई? बेहद सीधी सच्ची व कड़वी बात यह है कि कोई भी धर्मावलंबी कभी किसी भी व्यक्ति की हत्या से कभी भी उल्लासित नहीं होता है, बल्कि सच्चा धार्मिक मन ऐसी मानवता विरोधी घटनाओं से बहुत ज्यादा आहत व परेशान होता है। हमारी आस्था के अनुसार सभी धर्मों का पूजा अर्चना करने का तरीका अलग है, स्थल अलग-अलग हैं, नियम-कायदे कानून व धार्मिक तरीके अलग हैं, लेकिन फिर भी सभी धर्म इंसान व इंसानियत की रक्षा का संदेश देते हैं, तो फिर धर्म की आड़ लेकर देश में आये दिन यह हंगामा और मारकाट क्यों! लेकिन अब हमारे देश के नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि वो बिना किसी भेदभाव के राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर, देश व समाज के हित में उन्मादियों व कट्टरपंथियों की भीड़ से सख्ती के साथ निपटने का काम करें और उन सभी अज्ञानी बने लोगों को धर्म की सच्ची परिभाषा व सिद्धांत समझाने का काम करें। तब ही हमारे देश में अमन-चैन, प्यार मोहब्बत व भाईचारे के साथ शांति कायम रहेगी और देश विकास के नये आयाम स्थापित करके विश्व गुरु बनने की राह पर तेजी से अग्रसर होगा।

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