भारतीय व्यवस्था और भारतीय संस्कृति

बजरंग मुनि

व्यवस्था तथा संस्कृति एक दूसरे के पूरक होते हैं। व्यवस्था का प्रभाव संस्कृति पर पड़ता है तथा संस्कृति का व्यवस्था पर। दुनिया में वर्तमान समय में चार संस्कृतियां प्रमुख हैं जिनका व्यवस्थाओं पर दूरगामी प्रभाव है। (1) इस्लामिक (2) पाश्चात्य (3) भारतीय (4) साम्यवादी। साम्यवाद ने संस्कृति को रौंदकर बुलडोजर प्रणाली से व्यवस्था बनाने की कोशिश की। इस्लाम, ईसाइयत तथा हिन्दुत्व ने व्यक्ति, परिवार तथा समाज और धर्म के बीच कुछ तालमेल बिठाकर व्यवस्था की रूपरेखा बनाई तो, साम्यवाद ने व्यक्ति, परिवार, समाज, धर्म आदि को एकसाथ समाप्त करके सिर्फ बन्दूक के बल पर अपनी व्यवस्था बनाने की कोशिश की। साम्यवाद कुछ वर्षों तक सफल भी रहा किन्तु शीघ्र ही उसकी पोल खुल गई तथा अब वह धीरे धीरे इतिहास के पन्नों तक सिमटता जा रहा है। अन्य तीन संस्कृतियां और उनसे प्रभावित व्यवस्था अब भी स्वस्थ प्रतियोगिता में सक्रिय है।

तीनो संस्कृतियों में व्यक्ति, परिवार, समाज और धर्म का तालमेल है। हिन्दू संस्कृति प्रभावित व्यवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज का पूरा पूरा समन्वय होता है। तीनो के अपने-अपने विशेषाधिकार भी होते हैं तथा सीमाएं भी। इस्लाम में परिवार व्यवस्था का स्वतंत्रा अस्तित्व है तथा धर्म का भी। इस्लाम में व्यक्ति के मूल अधिकारों को मान्यता लगभग नहीं के बराबर है। ईसाइयत में व्यक्ति और समाज को महत्त्व प्राप्त है। इसमें धर्म और परिवार को व्यवस्था में विशेष स्थान प्राप्त नहीं। हिन्दू संस्कृति में धर्म व्यवस्था का अंग नहीं है। हिन्दू संस्कृति में धर्म किसी भी रूप में संगठन नहीं होता। इसलिये यह व्यवस्था का सहायक मात्रा तक सीमित होता है।

हिन्दू संस्कृति दुनिया की एकमात्रा ऐसी संस्कृति है जो बहुत पुराने तथा लम्बे समय से अपनी व्यवस्था को बचाये हुए है। प्राचीन समय में हमारी संस्कृति तथा व्यवस्था बहुत ज्यादा विकसित थी या पिछड़ी हुई यह निष्कर्ष अभी भी विवादास्पद ही है, किन्तु यह बात विवाद रहित है कि यह व्यवस्था बहुत पुरानी है। उल्लेखनीय यह भी है कि हमारी व्यवस्था पिछले कई सौ वर्षाे तक एक एक करके दोनों व्यवस्थाओं की गुलाम रहीं। सामान्यतया गुलामी व्यवस्थाओं पर गहरा परिवर्तनकारी प्रभाव डालती है। किन्तु इतनी लम्बी गुलामी के बाद भी तथा विशेष कर इस्लामिक आक्रमणों को झेलते हुए भी हमारी संस्कृति और व्यवस्था लगभग बची रही। इससे सिद्ध होता है कि व्यक्ति, परिवार और समाज को मिलाकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा विपरीत परिस्थितियों में भी अपने संरक्षण की विशेष शक्ति है, अन्यथा इस्लाम के आधिपत्य के बाद तो कोई बच सकता ही नहीं किन्तु हम बचे रह गये।

मेरे विचार में हमारे बच जाने का कारण हमारी व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। इन तीनों का तालमेल इतना मजबूत हो जाता है कि बड़ी से बड़ी ताकत भी इसे तोड़ नहीं पाती। व्यक्ति और समाज के बीच परिवार का स्वतंत्रा अस्तित्व है और परिवार एक अभेद्य दीवार होती है जिसे तोड़े बिना समाज व्यवस्था पर कोई बड़ा प्रभाव डालना संभव ही नहीं होता।

गुलामी के लम्बे काल में भी हमारी त्रिस्तरीय व्यवस्था सुरक्षित रही। यधपि इस व्यवस्था में कुछ विकृतियाँ आई। समाज व्यवस्था ने व्यक्ति और परिवार की सीमाओं का उल्लंघन करके अपना हस्तक्षेप बढ़ाया। परिणाम हुआ जातिवादी शोषण, धार्मिक कट्टरवाद, अन्धविश्वास, पुरूष प्रधानता आदि। ये सभी विकृतियां परिवार व्यवस्था की देन न होकर समाज सशक्तिकरण की देन रही। स्वतंत्राता के बाद भारत की राजनैतिक व्यवस्था इस त्रिस्तरीय व्यवस्था के विकल्प के रूप में सामने आई। इस्लाम, पश्चिमी संस्कृति तथा साम्यवाद के बीच प्रतिस्पर्धा हुई कि भारत की नई राजनैतिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित करें। गांधी के जीवित रहते हुए भी तीनो शक्तियां समझ चुकी थीं कि नेहरू और अम्बेडकर राजनैतिक दौड़ में आगे निकल जायेंगे। तीनों ने ही इन दोनों को अपने साथ जोड़ने की जी तोड़ कोशिश की। गांधी को ये तीनो ही शक्तियां बाधक मानती थीं और नेहरू अम्बेडकर को साधक। गांधी के बाद तो इन्हें और भी सुविधा हो गई। नेहरू और अम्बेडकर दोनों ही पाश्चात्य व्यक्ति और समाज व्यवस्था को मानते थे। दोनों ही परिवार व्यवस्था को अनावश्यक मानते थे। नेहरू जी के मन में हिन्दू समाज व्यवस्था के प्रति नफरत का भाव था और अम्बेडकर के मन में हिन्दुत्व के प्रति आक्रोश। अम्बेडकर इस्लाम को हिन्दुFamily 1त्व की अपेक्षा ज्यादा अच्छा समझते थे तो नेहरू जी साम्यवाद को। पश्चिम को तो दोनो ही ठीक मानते थे। यही कारण रहा कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से परिवार व्यवस्था को बिल्कुल गायब कर दिया गया। यदि ये प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रा इकाई भी मान लेते तब भी कोई कठिनाई नहीं थी। किन्तु एक ओर तो इन्होंने परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता से अलग कर दिया तो दूसरी ओर इन्होंने समाज सुधार के नाम पर परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के भी लगातार प्रयत्न किये। हिन्दू कोड बिल, अनेक प्रकार के विवाह कानून, संपत्ति कानूनों में मनमाना बदलाव आदि ने हिन्दू परिवार समाज व्यवस्था को लगातार कमजोर किया तथा आज भी कर रहे हैं। आज भी भारत के सभी राजनैतिक दल भारत की त्रिस्तरीय व्यवस्था को द्विस्तरीय करने का लगातार प्रयत्न करते रहते हैं। अन्य राजनैतिक दल तो इस व्यवस्था को व्यक्ति, परिवार और समाज से बदलकर व्यक्ति और समाज तक ही ले जाना चाहते हैं किन्तु भारतीय जनता पार्र्टीी और संघ परिवार तो इससे भी आगे जाकर इसे धर्म के अन्तर्गत करने की दिशा में अग्रसर है जो पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के विरूद्ध इस्लामिक संस्कृति है। हमारी हिन्दू संस्कृति में धर्म हमेशा ही आचरण का भाग रहा है, व्यवस्था का नहीं। व्यवस्था में तो परिवार और समाज ही आगे रहे हैं। ये तथाकथित धर्म के ठेकेदार, धर्म और समाज का कभी अन्तर ही नहीं समझते तो भूल तो होगी ही।

व्यवस्था को ठीक रखने के लिये व्यक्ति परिवार समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था बहुत सफल भी है और आवश्यक भी। स्वतंत्राता के बाद परिवार व्यवस्था अलग करने के दुष्परिणाम हमारे सामने स्पष्ट हैं। अपराध लगातार बढ़े हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ भावना बढ़ी है और सहअसितत्व का विचार घटा है। घूर्तता को सफलता का मापदण्ड माना जा रहा है। संपत्ति के विवाद बढ़ रहे हैं। अव्यवस्था का वातावरण है। समाधान स्पष्ट नहीं दिख रहा। किन्तु करना तो होगा ही। परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना सबसे अच्छा समाधान है। व्यक्ति, परिवार और समाज के अलग अधिकार, उनकी स्वतंत्राताएं तथा सीमाएं तय करके उन्हें संवैधानिक मान्यता दे दी जाये। धर्म को व्यक्तिगत आचरण तक सीमित कर दें तथा सरकार का व्यक्ति, परिवार, समाज के आपसी सम्बन्धों की सुरक्षा के अतिरिक्त उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बिल्कुल रोक दें। परिवार व्यवस्था हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था की मेरूदण्ड है। परिवार व्यवस्था को मजबूत करना ही चाहिये। पश्चिम की परिवार विहीन प्रणाली तथा इस्लाम की समाज विहीन प्रणाली के परिणाम हम देख चुके हैं। अब हम अपनी भारतीय व्यवस्था को मजबूत करें तो अच्छा होगा।

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