भारत में सर्व समावेशी विकास से ही तेज़ आर्थिक प्रगति सम्भव

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वर्तमान परिदृश्य में आर्थिक गतिविधियों का महत्व पूरे विश्व में बढ़ता ही जा रहा है। आचार्य चाणक्य ने भी कहा है “सुखस्य मूलम धर्म:, धर्मस्य मूलम अर्थ:” अर्थात राष्ट्र जीवन में समाज के सर्वांगीण उन्नति का विचार करते समय अर्थ आयाम का चिंतन भी अपरिहार्य रूप से किया जाना चाहिये। भारतीय दर्शन के अनुसार अर्थ एक पुरुषार्थ है। अतः आर्थिक गतिविधियाँ भारतीय चिंतन का भी एक महत्वपूर्ण अंग रही हैं। इसी के चलते, भारतीय अर्थव्यवस्था का गौरवशाली इतिहास रहा है एवं जो भारतीय संस्कृति हज़ारों सालों से सम्पन्न रही है, उसका पालन करते हुए ही उस समय पर अर्थव्यवस्था चलाई जाती थी। भारत को उस समय सोने की चिड़िया कहा जाता था। वैश्विक व्यापार एवं निर्यात में भारत का वर्चस्व था। पिछले लगभग 5000 सालों के बीच में ज़्यादातर समय भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। ब्रिटिश राज के प्रारम्भ होने के बाद इसमें लगातार गिरावट होती चली गई। उस समय भारत में कृषि क्षेत्र में उत्पादकता अपने चरम पर थी। मौर्य शासन काल, चोला शासन काल, चालुक्य शासन काल, अहोम राजवंश, पल्लव शासन काल, पण्ड्या शासन काल, छेरा शासन काल, गुप्त शासन काल, हर्ष शासन काल, मराठा शासन काल, आदि अन्य कई शासन कालों में भारत आर्थिक दृष्टि से बहुत ही सम्पन्न देश रहा है। धार्मिक नगर – प्रयाग राज, बनारस, पुरी, नासिक, आदि जो नदियों के आसपास बसे हुए थे, वे उस समय पर व्यापार एवं व्यवसाय की दृष्टि से बहुत सम्पन्न नगर थे। वर्ष 1700 में भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में 25 प्रतिशत का हिस्सा था। इसी प्रकार, वर्ष 1850 तक भारत का विनिर्माण के क्षेत्र में भी विश्व में कुल विनिर्माण का 25 प्रतिशत हिस्सा था। भारत में ब्रिटिश एंपायर के आने के बाद (ईस्ट इंडिया कम्पनी – 1764 से 1857 तक एवं उसके बाद ब्रिटिश राज – 1858 से 1947 तक) विनिर्माण का कार्य भारत से ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपीयन देशों की ओर स्थानांतरित किया गया और विनिर्माण के क्षेत्र में भारत का हिस्सा वैश्विक स्तर पर घटता चला गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक दृष्टि से भारत का दबदबा इसलिए था क्योंकि उस समय पर भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए ही आर्थिक गतिविधियाँ चलाईं जाती थीं। परंतु, जब से भारतीय संस्कृति के पालन में कुछ भटकाव आया, तब से ही भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर से वर्चस्व कम होता चला गया। दूसरे, आक्रांताओं ने भी भारत, जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था, को बहुत ही दरिंदगी से लूटा था। इस सबका असर यह हुआ कि ब्रिटिश राज के बाद तो कृषि उत्पादन में भी भारत अपनी आत्मनिर्भरता खो बैठा।

इसी वजह से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ आर्थिक चिंतकों ने भारत को पुनः अपनी संस्कृति अपनाते हुए आगे बढ़ने की पैरवी की थी। परंतु, उस समय के शासकों ने समाजवाद का चोला ओढ़ना ज़्यादा उचित समझा। जिसके चलते आर्थिक क्षेत्र में भी कोई बहुत अधिक प्रगति नहीं की जा सकी।

उसी समय पर आदरणीय पंडित दीन दयाल उपाध्याय, जिनका जयंती दिवस 25 सितम्बर को मनाया गया, ने भी अपने आर्थिक चिंतन को “एकात्म मानव दर्शन” के नाम से देश के सामने रखा था। यह एक समग्र दर्शन है, जिसमें आधुनिक सभ्यता की जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय विचारधारा के मूल तत्वों का समावेश किया गया था। उनका मानना था कि समाज के अंतिम छोर पर बैठे एक सामान्य व्यक्ति को ऊपर उठाने की सीढ़ी है, राजनीति। अपनी इस सोच को उन्होंने साम्यवाद, समाजवाद, पूँजीवाद या साम्राज्यवाद आदि से हटाकर राष्ट्रवाद का धरातल दिया। भारत का राष्ट्रवाद विश्व कल्याणकारी है क्योंकि उसने “वसुधैव कुटुम्बकम” की संकल्पना के आधार पर “सर्वे भवन्तु सुखिन:” को ही अपना अंतिम लक्ष्य माना है। यही कारण था कि अपनी राष्ट्रवादी सोच को उन्होंने “एकात्म मानववाद” के नाम से रखा। इस सोच के क्रियान्वयन से समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति का विकास होगा। उसका सर्वांगीण उदय होगा। यही हम सभी भारतीयों का लक्ष्य बने और इस लक्ष्य का विस्मरण न हो, यही सोचकर इसे “अन्त्योदय योजना” का नाम दिया गया। अंतिम व्यक्ति के उदय की चिंता ही अन्त्योदय की मूल प्रेरणा है।

भारत का भी अपना एक अलग स्वभाव है, अपनी “चित्ति” है। उसी “चित्ति” या स्वभाव के अनुरूप देश की व्यवस्थाएँ, मान्यताएँ, परम्पराएँ, जीवन शैली एवं सुख-दुःख की समान कल्पनाएँ बनती बिगड़ती हैं। देश रूपी व्यक्ति को, उसके शरीर, मन एवं उसकी बुद्धि तथा आत्मा के अस्तित्व को चिन्हित करते हुए, उसके विकास की समुचित व्यवस्था हो, तदनरूप नीति बने एवं उसे क्रियान्वित करने योग्य व्यवस्था बने। ये चारों तत्व एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार प्रत्येक देश की आर्थिक नीतियाँ उस देश की अपने “चित्ति” के अनुरूप ही बनाई जानी चाहिए, न कि अन्य देशों की देखा देखी आर्थिक नीतियों को स्वरूप प्रदान किया जाय।

चाहे व्यक्ति हो, परिवार हो, देश हो या विश्व हो, किसी के भी विषय में चिंतन का आधार एकांगी न होकर एकात्म होना चाहिए। इस प्रक्रिया में देश या राष्ट्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई है। अतः भारत को एवं भारत की चित्ति को समग्रता से जानना ज़रूरी है। भारत के “स्व” को जानना होगा, “स्व” को जगाना होगा, “स्व” को गौरवान्वित करना होगा एवं “स्व” को ही प्रतिष्ठित करना होगा।

“कमाने वाला खिलाएगा” ये भारतीय संस्कृति है। विदेशी संस्कृति में “हम” के स्थान पर “मैं” का अधिक महत्व है। इसीलिए विदेशी संस्कृति भारत में नहीं चल सकती है। प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू अनुपात में वृद्धि दर को ही विकास का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है, जब तक इसमें रोज़गार के सृजित किए जाने वाले नए अवसरों एवं देशवासियों में ख़ुशी के पैमाने को भी जोड़ा नहीं जाता। रोज़गार के नए अवसर सृजित किए बग़ैर एवं देश की जनता में ख़ुशी को आंके बिना यदि सकल घरेलू उत्पाद एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती भी है तो वह किस काम की। यह वृद्धि दर तो आधुनिक मशीनों के उपयोग के चलते हासिल की जा रही है एवं इससे तो देश में आर्थिक असंतुलन की खाई चौड़ी होती जा रही है।

पूँजीवादी विचारधारा उपभोगवादी व्यवहार को आधार मानकर व्यक्तिवाद को आगे बढ़ाती है। समाजवादी विचार इसकी प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्ति के उत्कर्ष और स्वाभाविक प्रवृतियों को दबाकर सरकार के सहभाग को अतिरिक्त महत्व देती है। भारतीय चिंतन में अर्थ आयाम का संदर्भ इन दोनों धाराओं से भिन्न है। विकास, मनुष्य केंद्रित हो और सर्व समावेशी हो। आर्थिक विषमता की खाई बढ़ती जाय तो ऐसी व्यवस्था राष्ट्र जीवन के लिए घातक बनती है। शोषण मुक्त और समतायुक्त समाज को साकार करने वाला सर्व समावेशी विकास ही समाज जीवन को स्वस्थ और निरोगी बना सकता है। इसलिए “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” ऐसी विकासोन्मुखी अर्थव्यवस्था प्रतिस्थापित करने का प्रयास होना चाहिए।

भारतीय चिंतन धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इन चार स्तंभों पर स्थापित है। यदि अर्थ का अभाव द्रष्टिगत होता है इसके परिणाम में शोषण, दारिद्रता, विषमता आदि विकारों से समाज ग्रस्त होता दिखेगा। इसके विपरीत, अर्थ का प्रभाव भी अगर मर्यादा विहीन रहा तो उद्दंडता, अमानवीय व्यवहार, दास्यता आदि व्याधियाँ समाज में प्रबल होती दिखेंगी। इसलिए मूल भारतीय चिंतन में अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव इन दोनों से मुक्त होकर संतुलित, न्यायपूर्ण और धारणक्षम विकास का विचार ही प्रधान विचार माना जाता है।

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