आइए जानें – किस प्रकार से होता है अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव

अभिनय आकाश

अमेरिका में दो राजनीतिक पार्टियों की व्यवस्था है। वहां चुनाव हर चार साल में एक बार होते हैं। राष्ट्रपति बनने की आकांक्षा रखने वाले उम्मीदवार सबसे पहले एक समिति बनाते हैं, जो चंदा इकट्ठा करने और संबंधित नेता के प्रति जनता का रुख भांपने का काम करती है।

अनेक भारतीयों के मन में ये सवाल उमड़ रहा है कि अमेरिका में जो बाइडेन का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए ठीक रहेगा या डोनाल्ड ट्रंप का दूसरे कार्यकाल के चुना जाना। दुनिया भर की नजर अमेरिकी चुनाव पर लगी है। एक तरफ जहां जो बाइडेन राष्ट्रपति ट्रंप को कोरोना वायरस की रोकथाम में लापरवाही का जिम्मेदार बता रहे हैं और ट्रंप की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं तो दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप तीखी बयानबाजी से जो बाइडेन पर व्यक्तिगत हमला कर रहे हैं। कोरोना वायरस महामारी के चलते रैलियों पर रोक लगी हुयी है। चुनाव प्रचार मीडिया, सोशल माडिया के माध्यम से ही हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप अपनी जीत के लिए पूरी तरह से आश्वस्त नज़र आ रहे हैं। जबकि उनके खिलाफ बाइडेन कड़ी टक्कर देने को तैयार हैं। बाइडेन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगातार नाकाम राष्ट्रपति के तौर पर दिखाने में लगे हुए हैं। जबकि डोनाल्ड ट्रंप खुद को सबसे बेहतर राष्ट्रपति बता रहे हैं।

जब भी हर चार साल के बाद अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव आता है तो दुनिया भर की निगाहें उस पर टिकी होती हैं लेकिन बहुतों को अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया के बारे में पता नहीं होता है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि अमेरिका की जनता सीधे तौर पर वोट देकर प्रेसिडेंट चुनती है। लेकिन ऐसा नहीं है। अमेरिका में कौन प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ सकता है, ये होता कैसे है, इसकी प्रक्रिया क्या है, अलग-अलग प्रक्रियाओं में किया क्या जाता हैं ऐसी तमाम जानकारियां हम आपके साथ साझा कर रहे हैं। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपतियों के भारत के साथ रिश्तों के बारे में भी बताएंगे।

US प्रेसिडेंट बनने के लिए 3 जरूरी बातें

जो भी अमेरिकी नागरिक हैं भले ही उनका जन्म विदेश में हुआ हो प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ सकते हैं।
चुनाव लड़ने की कम से कम उम्र 35 साल है।
चुनाव लड़ने जा रहे किसी भी उम्मीदवार का अमेरिका में 14 साल से रहना जरूरी है।
इस तरह होता है अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव

अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव हमेशा नवंबर के पहले सोमवार के बाद आने वाले पहले मंगलवार को होता है। इस बार यह तारीख तीन नवंबर है जिसको लेकर अमेरिका में सरगर्मियां तेज हो गई हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की प्रक्रिया भारत के मुकाबले काफी पेचीदा और लंबी है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दुनिया का सबसे ‘ताकतवर’ माना जाने वाला मुल्क अपने राष्ट्रपति का चुनाव कैसे करता है। अमेरिकी संविधान में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था है। यह विधि तब वजूद में आई जब अमेरिका के संविधान निर्माताओं के दो धड़ों के बीच समझौता हुआ। अमेरिकी संविधान निर्माताओं का एक धड़ा इस पक्ष में था कि अमेरिकी संसद को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार मिले। दूसरा धड़ा जनता की सीधी वोटिंग के जरिए राष्ट्रपति चुने जाने के हक में था। इलेक्टोरल कॉलेज को इन दोनों धड़ों की अपेक्षाओं की बीच की एक कड़ी माना गया।

अमेरिका में दो राजनीतिक पार्टियों की व्यवस्था है। वहां चुनाव हर चार साल में एक बार होते हैं। राष्ट्रपति बनने की आकांक्षा रखने वाले उम्मीदवार सबसे पहले एक समिति बनाते हैं, जो चंदा इकट्ठा करने और संबंधित नेता के प्रति जनता का रुख भांपने का काम करती है। कई बार यह प्रक्रिया चुनाव से दो साल पहले ही शुरू हो जाती है।

औपचारिक तौर पर चुनावी साल में चुनाव प्रक्रिया ‘प्राइमरी’ के साथ जनवरी में शुरु होती है और जून तक चलती है। इस दौर में पार्टी अपने उन उम्मीदवारों की सूची जारी करती है, जो राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में उतरना चाहते हैं। इसके बाद दूसरे दौर में अमेरिका के 50 राज्यों के वोटर पार्टी प्रतिनिधि (पार्टी डेलिगेट) चुनते हैं।

अमेरिकी संविधान प्राइमरी स्तर पर पार्टी प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया में कोई लिखित निर्देश नहीं देता है। यही वजह है कि कुछ राज्यों में जनता ‘प्राइमरी’ दौर में मतदान का इस्तेमाल न करके ‘कॉकस’ के जरिए पार्टी प्रतिनिधि का चुनाव करती है। ‘कॉकस’ के तहत राज्यों में स्थानीय स्तर पर बैठक कर पार्टी प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है।

प्राइमरी में चुने गए पार्टी प्रतिनिधि दूसरे दौर में पार्टी के सम्मेलन (कन्वेंशन) में हिस्सा लेते हैं। कन्वेनशन में ये प्रतिनिधि पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। इसी दौर में नामांकन की प्रक्रिया होती है। राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपनी पार्टी की ओर से उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनता है।

तीसरे दौर की शुरुआत चुनाव प्रचार से होती है। इसमें अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवार मतदाताओं का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान उम्मीदवारों के बीच टेलीविजन पर इस मामले से जुड़े मुद्दों पर बहस भी होती है। आखिरी हफ्ते में, उम्मीदवार अपनी पूरी ताकत ‘स्विंग स्टे्टस’ को लुभाने में झोंकते हैं। ‘स्विंग स्टे्टस’ वे राज्य होते हैं, जहां के मतदाता किसी भी पक्ष की ओर जा सकते हैं।

चुनाव की अंतिम प्रक्रिया में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ राष्ट्रपति पद के लिए मतदान करता है। लेकिन इससे पहले राज्यों के मतदाता इलेक्टर चुनते हैं, जो राष्ट्रपति पद के किसी न किसी उम्मीदवार का समर्थक होता है। ये इलेक्टर एक ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ बनाते हैं, जिसमें कुल 538 सदस्य होते हैं। इलेक्टर’ चुनने के साथ ही आम जनता के लिए चुनाव खत्म हो जाता है। अंत में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के सदस्य मतदान के जरिए अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टोरल मत जरुरी होते हैं।

हर राज्य का इलेक्टर चुनने का कोटा तय होता है। यह संख्या हर राज्य से अमेरिकी संसद के दोनों सदनों-हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सेनेट के सदस्यों की कुल संख्या के बराबर होती है। इसलिए हर राज्य के इलेक्टरों की संख्या में अंतर होता है। चुनाव के लिए भी दिन निश्चित होता है। ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ राष्ट्रपति पद के लिए चुनावी साल के नवंबर महीने में पड़ने वाले पहले मंगलवार को मतदान करता है।

इस साल अमेरिका में 3 नवंबर को ही राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में ही इलेक्टोरल कॉलेज उपराष्ट्रपति पद के लिए भी मतदान करेगा। कोई भी इलेक्टर दोनों पदों के लिए एक ही स्टेट के उम्मीदवारों को वोट नहीं दे सकता है। चुनाव के इस तरीके से उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को चुनौती देने की संभावना खत्म हो जाती है। 1804 से पहले उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इलेक्टोरल कॉलेज ही करता था, लेकिन तब अलग-अलग मत नहीं डाले जाते थे। तब जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते था, वह राष्ट्रपति बनता था और दूसरे नंबर पर रहने वाला व्यक्ति उपराष्ट्रपति चुना जाता था।

इसमें कई दिन लग सकते हैं क्योंकि हर एक वोट की गिनती करनी होती है लेकिन शुरुआती घंटों में ही रुझान से पता चलने लगता है कि कौन जीत रहा है। 2016 में डोनाल्ड ट्रंप ने सुबह तीन बजे ही न्यूयॉर्क में अपनी जीत का भाषण दे दिया था। इस साल डाक बैलट में बढ़ोत्तरी को देखते हुए मतगणना में कई दिन और यहां तक कि हफ़्ते भी लग सकते हैं। नए राष्ट्रपति आधिकारिक रूप से 20 जनवरी को शपथ ग्रहण करते हैं। यह शपथ ग्रहण समारोह वॉशिंग्टन डीसी की कैपिटल बिल्डिंग की सीढ़ियों पर होता है।

अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी एक पुरातनपंथी राजनीतिक दल है। इस पार्टी से इस बार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उम्मीदवार हैं और वो अगले चार सालों तक फिर से राष्ट्रपति बनने की कोशिश में लगे हुए हैं। अमेरिका के ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में इस पार्टी का आधार मजबूत दिखाई पड़ता है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश, रोनाल्ड रीगन और रिचर्ड निक्सन रिपब्लिकन पार्टी से थे।

अमेरिका की दूसरी प्रमुख पार्टी डेमोक्रेट्स एक लिबरल पार्टी है और इस साल होने वाले चुनाव में जो बाइडन इस पार्टी से राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार है। बराक ओबामा के अमेरिकी राष्ट्रपति रहते हुए आठ सालों तक वो देश के उपराष्ट्रपति रह चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप जहां 74 साल के हैं तो वहीं जो बाइडन 78 साल के हैं।

मानवाधिकारों और जलवायु परिवर्तन पर लंबे समय से डेमोक्रेटिक पार्टी के सख्त रवैये के मद्देनज़र भारत में बहुतों के मन में ये दुविधा हो सकती है कि भारत के लिए डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति सही रहेगा या रिपब्लिकन।

इस बात को याद करना उपयोगी रहेगा कि 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान का समर्थन एक रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने किया था, और उन्होंने भारत के खिलाफ युद्ध में चीन को शामिल करने के लिए गुप्त प्रयास भी किए थे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को रिपब्लिकन राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने मजबूत किया था, जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ को भगाने के वास्ते ‘उग्रवादी जिहाद’ के लिए उन्होंने आईएसआई के ज़रिए समर्थन और फंड की व्यवस्था की थी। भारत को पहले पंजाब में और फिर जम्मू कश्मीर में आईएसआई प्रायोजित आतंकवाद का सामना करना पड़ा। दूसरी तरह डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारत का समर्थन किया, और 2000 में भारत की ऐतिहासिक यात्रा कर अमेरिका और भारत के बीच नए संबंधों की नींव रखी।

रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने असैनिक परमाणु सहयोग समझौते के ज़रिए दोनों देशों के रिश्तों को एक नई दिशा दी। लेकिन ये डेमोक्रेटिक ओबामा थे जो अपने कार्यकाल में दो बार भारत की यात्रा करने वाले प्रथम अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जिनमें से एक मौका 2015 के गणतंत्र दिवस समारोहों का था। उन्होंने संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के भारत के दावे का समर्थन किया था और भारत को एक ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ करार दिया था। जबकि व्यापार मामलों में भारत के साथ असंगत व्यवहार करने और उसे तरजीही दर्जे (जीएसपी) के फायदों से वंचित करने का काम रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का है, हालांकि उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों के महत्व पर ज़ोर देने और भारत को अधिक उन्नत प्रौद्योगिकी दिए जाने की अनुमति देने जैसे काम भी किए हैं। इसलिए स्पष्टतया अधिक महत्व इस बात का है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को किस भूराजनैतिक संदर्भ में रखा जाता है।

शीत युद्ध के बाद से अमेरिका से भारत के रिश्ते गर्मजोशी से भरे होना शुरू हो गए थे, चाहे वहां रिपब्लिकन राष्ट्रपति बने या डेमोक्रेट। ऐसे ही, वहां चाहे डोनाल्ड ट्रंप बरकरार रहे या फिर उनकी जगह जो बाइडेन चुनकर आ जाएं, भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते कमोवेश वैसे ही रहने हैं।

अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय अमेरिकी कम्युनिटी को सम्बोधित करते हुए जो बाइडेन ने कहा कि, ‘’15 साल पहले भारत और अमेरिका के बीच होने वाली सिविल न्यूक्लीयर डील के लिए प्रयास मेरी अगुआई में हो रहे थे। मैंने कहा था कि अगर अमेरिका और भारत दोस्त बन जाते हैं तो विश्व ज्यादा सुरक्षित रहेगा। ओबामा के काल में 2009 में न्यूक्लीयर डील को साइन करना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी। जानकार मानते हैं कि नई दिल्ली से समझौता करने में विदेश नीति में बाइडेन की विशेषज्ञता ने एक अहम भूमिका अदा की, जिसका मतलब नई दिल्ली वाशिंगटन के लिए हमेशा प्राथमिकता में रहेगी। स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने इस भाषण में बाइडेन ने कहा कि वो चीन और पाकिस्तान के चलते भारत की सीमाओं पर बने खतरे के वक्त भी भारत के साथ हमेशा खड़े रहेंगे। भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के बारे में बात करें तो आपको ये पता होना चाहिए कि जब बाइडेन अमेरिका के उप-राष्ट्रपति थे, तब उन्हें पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान ‘हिलाल ए पाकिस्तान’ मिला था। पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी 2013 से 2016 के बीच 630 बिलियन डॉलर से ज्यादा बनी रही, जो 2017 में ट्रंप ने कम करके 392 बिलियन डॉलर कर दी। बाइडेन के कैम्पेन की वेबसाइट पर एक पॉलिसी पेपर में सीएए और एनआरसी की ये कहते हुए आलोचना की गई थी, कि ये भारत की सेकुलर और विभिन्न धर्मों वाले लोकतंत्र की विश्वसनीयता के साथ समझौता करते हैं। ये आलोचना केवल सीएए तक सीमित नहीं थी बल्कि कश्मीर को लेकर भी थी।

ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री ने हमेशा एक दूसरे के प्रति रिश्ते गर्मजोशी से भरे दिखाए हैं। उन दोनों के बीच इस खुशमिजाजी का नतीजा ये निकला कि पहली बार भारत ने अमेरिका के साथ रक्षा और विदेश मंत्रालय के स्तर पर 2+2 यलॉग हुआ है। कई मौकों पर मोदी की तारीफें करने के बावजूद ट्रम्प ने भारत की प्राथमिकताओं के विरुद्ध भी काम किए हैं, जिनमें शामिल हैं एच-1बी वीजा, जीएसपी और कश्मीर विवाद में मध्यस्थता के प्रस्ताव। हालांकि कई जानकार ये भी मानते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह से भारत का साथ देते हुए पाकिस्‍तान और चीन पर लगाम लगाने का काम किया है उसका असर भारत और अमेरिका के संबंधों पर पड़ा है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच कुछ दिक्‍कतें होने के बाद भी दोनों लगातार आगे बढ़े हैं। चीन को लेकर उनकी आक्रामकता भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित हुई है।

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर पूरे विश्व की नज़रें रहा करती है लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय मूल के लोगों का भी बहुत बड़ा योगदान रहता है। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भारतीय मूल के वोटर्स को लुभावने की कोशिश में लगे रहते हैं।

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