दलित की परिभाषा

डॉ. विवेक भटनागर

कहा जाता है कि पुष्यमित्र शुंग के काल में ब्राह्मण और दलित जैसा विभाजन था, जबकि यह विभाजन मुसलमानों और अंग्रेजों की देन है। उन्होंने अपने समय में जो हमारी पुस्तकों से खिलवाड़ किया और हमारे समाज की वर्ण व्यवस्था को समझ नहीं सके। मुसलमानों को शेख सैयद, मुगल व पठान जैसे विशेषणों वाली जाती व्यवस्था की आदत थी और अंग्रेजों में स्टूअर्ट, बार्बू, हेनरी और हॉनऑवर जैसी उच्च जाति व्यवस्था की। ऐसे में जब भारत को कोई बंधन युक्त जाति व्यवस्था नहीं दिखी तो उन्हें कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र जैसी कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था समझ नहीं आई। उन्होंने इसे अपनी संस्कृति के अनुसार कमर्णा के स्थान पर जन्मना बना बना दिया। वरना हमारे शास्त्रोक्त विधान के अनुसार जन्म से हर व्यक्ति शुद्र है। कर्म से वह वर्ण को प्राप्त करता है। उसी के अनुसार उसका शिक्षण और उपनयन होता है। ऐसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज को 1000 वर्ष की गुलामी ने सवर्ण और दलित में बदल दिया।

ऐसा क्या है कि दलितों की जातियां और अल अटक सवर्णों जैसी हैं। अगर दलित और सवर्ण में अपृश्यता का भाव या विभाजन होता तो दलितों को शुक्ला, सिन्हा, चौहान, राठौड़ आदि प्रकार के सवर्णों की अल अटक दलितों की जातियां को प्रयोग में नहीं लाने दी जाती। इंसान को कौन मारता है, यह देखा जाए। विभाजन की जो रेखा खींची गई है, उसे तोड़ा जाए। न तो कोई सवर्ण है और न ही कोई दलित। सारा झगड़ा सत्ता और धन का है। पहले भी यही था और आज भी यही है।

जब नन्दों ने देश पर शासन किया तो वे दलित थे और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुए। इसी प्रकार बंगाल का पाल शासक भी गौड़ों की सत्ता के नष्ट होने पर सामान्य जन से निकल कर सत्ता पर काबिज हुआ। अग्नि कुल का सिद्धान्त तो स्पष्ट रूप से सामान्य जन से यौद्धा तैयार करने का है। इसको गलत ढंग से देश के सामने रख कर अंग्रेजों और कम्युनिस्टों ने विभाजन की जो रेखा खींची है, उसे अब तोडऩा चाहिए। कानून अगर न्याय संगत हो तो सही है, लेकिन वोटों की राजनीति के लिए बनाया गया तो फिर गलत है। तुष्टीकरण से हम गृहयुद्ध की और बढ़ रहे हैं। एक और जिहादी आतंकवाद मँुह बायें खड़ा है और दूसरी और सवर्ण-दलित के मसले में समाज को विभाजित किया जा रहा है।
गाय को नहीं मारने के नियम धर्म की देन है। यह पूर्ण रूप से उस वर्ण के लिए था जो श्रम पर अपना जीवन यापन करता था। प्रथम तीन वर्ण बुद्धि, बल और द्वितीयक स्तर के श्रम में लगे थे। वहीं चौथा वर्ण शारीरिक श्रम करता था। वही खेतों से लेकर बाड़ों तक का मालिक था। हमारे यहां पर दास प्रथा का विधान ही नहीं था। किसी अंग्रेज ने यह नहीं बताया कि आश्वलायन गृह सूत्र के अनुसार राज्य की पूंजी का सबसे बड़ा अधिकारी चौथा वर्ण ही था और वह सबसे धनी भी था। ब्राह्मण भी उसकी भिक्षा पर और क्षत्रीय उसके दिए कर पर जीवित था। फिर ऐसा क्या हुआ कि मुसलमानों और अंग्रेजों ने इसे दास बना दिया। इस पर अध्ययन करिये।

वैसे तो अस्पृश्यता का विषय घर में ही होता था। घर के पुरूष चूंकि बाहर काम करते थे, अत: उनका चौके में प्रवेश ही वर्जित था। यह मैंने मेरी दादी के दौर में देखा है। हम भी चौके में नहीं जा सकते थे। पाखाने में जाने के वस्त्र भी अलग थे। उन्हें पहन कर शौच के लिए जाते थे और स्नान करके दूसरे वस्त्र धारण किए जाते थे। ऐसे में कर्म के अनुसार भी शुचिता के नियम बनाए गए। सभी नियम स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, लेकिन एक साथ एक ही स्थान पर शौच करने वाले अंग्रेजों और मटकों में शौच करने वाले तुर्कों, मुगलों और शेखों को यह व्यवस्था कब समझ में आती।

मैला ढोने की प्रथा तुर्क भारत में लेकर आए। हम तो घरों में पाखाने बनाते ही नहीं थे। शौच के लिए व्यवस्था अलग से की गई थी। यह गांव से बाहर होती थी। ऐसे में हमारे यहां पर अस्पृश्य और छुआछूत जैसे विषय भी अंग्रेजों और मुसलमानों की देन है। रामराज्य का मतलब समानता से है। यह समानता हमें हमारे राज्य में दण्ड का विधान दिलाता है। ऐसे में इस विधान की गलत व्याख्या कर हमें लड़ाने वालों को सिस्टम से बाहर करने की जरूरत है न कि जात पांत और सवर्ण दलित में फंसने की।

वैसे तो शाब्दिक रूप से दलित शब्द ही गलत है। दलित तो अनाज और दाल हो सकती है। इंसान का दलन नहीं दमन होता है। फिर वह किसी वर्ण, जाति और पंथ का हो। संविधान के अनुसार पर धर्मनिरपेक्ष नहीं पंथनिरपेक्ष है। हमारे यहां पर धर्म और पंथ में अन्तर है लेकिन अंग्रेजों के पास इसके लिए सिर्फ एक ही शब्द है रिलीजियन। इसलिए वह धर्म और पंथ में फर्क नहीं कर पाए और हम उसमें फंस कर रह गए।

हम प्रथम तो इस क्रूर जातिसंज्ञक शब्द के प्रयोग के लिए भी क्षमाप्रार्थी है। फिर इसका विश्लेषण करेंगे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर श्यामलाल पाठक ने भारत के अलग-अलग प्रान्तों में मैला उठाने वाले लोगों को किन-किन नामों से जाना जाता है, इसका वर्णन करते हुए यह पता लगाने की कोशिश की है कि वे भंगी कैसे बने? उन्होंने एक तरह से भंगी शब्द की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने का प्रयास किया।
समाजशा की सामान्य मान्यता है कि सफाई करने वाले लोग हर सभ्यता में थे। भारत में भी पुकस (निषाद पिता और शूद्रा माता से उत्पन्न एक प्राचीन जाति), श्वपच और चाण्डाल के नाम मिलते हैं, जो सफाई करते थे। लेकिन हमारे यहां पर शौच किसी बंद स्थान पर नहीं किया जाता था। वास्तु के सामान्य नियमानुसार घर में शौचालय बनाया ही नहीं जा सकता था। इसलिए भारतीय संस्कृति के अनुसार शौच घर से बाहर खुले में किए जाने का प्रावधान था। ऐसे में न तो मैला ढोने की आवश्यकता थी और न ही किसी मैला ढोने वाले की। सभी कुछ प्राकृतिक वातावरण में जैविक रूप खद्य हो जाता था। लेकिन भारत से बाहर हर सभ्यता तथा नगरों में रहने वाले लोगों को न केवल शौच के लिए एक खास स्थान की जरूरत पड़ती थी, बल्कि मल को उठाकर फेंकने वालों की भी जरूरत पड़ती थी।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्राचीन भारत के लोग सफाई कर्मचारी के नाम से परिचित नहीं थे लेकिन अस्पृश्य समाज जो मैला ढोने का काम करे, वह उपलब्ध नहीं था। इसके लिए बी. एन. श्रीवास्तव, एन. आर. मलकानी और बिन्देश्वर पाठक के मुस्लिम मत के विश्लेषण का अध्ययन किया जाना चाहिए। यह सभी कहते हैं कि स्वच्छकार का औपचारिक पेशा मुस्लिम काल में आया। उनके अनुसार, मुसलमान स्त्रियां बुरका पहनती थीं। अत: उनके लिए परदे वाले खास किस्म के शौचालय बनवाए जाते थे, जिन्हें साफ करने और मल को उठाकर फेंकने के लिए भी आदमी नियुक्त किए जाते थे। इस प्रकार तुर्क और मुगल समुदाय में घर में शौच करने का प्रचलन था। उनके पैतृक स्थानों पर तो मैला ढोने में गुलाम लगाए जाते थे और उन्हें हेला कह कर सम्बोधित किया जाता था, लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए यह काम प्रारम्भ में उन्होंने युद्धबंदियों से कराया, क्योंकि उनके सजातीय आदमी यह काम नहीं कर सकते थे।

इस तरह उन्होंने एक अलग भंगी जाति का निर्माण किया, जिसे बाद में बादशाह अकबर ने मेहतर का नाम दिया था। लेकिन इससे पहले ही भंगी जाति का सही स्वरूप मध्य 14वीं सदी में नजर आने लगा था, जब तुर्क सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने भारतीय सनातनियों को जबरन इस्लाम ग्रहण करवाने की मुहिम प्रारम्भ किया। इस दौरान जो भी भारतीय मुसलमान नहीं बने, उसे मैला ढोने में लगा दिया गया। चूंकि इस्लाम ग्रहण करने का प्रतीक उपनयन को भंग करना माना गया, अत: जिन्होंने उपनयन भंग होने के बावजूद इस्लाम ग्रहण नहीं किया और आपातकाल में मैला उठाना स्वीकार किया उन्हें भंग से भंगी पुकारा गया। श्रीवास्तव के अनुसार ब्रिटिश काल में सेना की छावनियों और नगरपालिकाओं का गठन हुआ, जहां दैनिक आधार पर बड़ी संख्या में स्वच्छकारों को रखा गया। उनकी जातियों के नामों से पता चलता है कि उन्हें विभिन्न जातियों और विभिन्न सामाजिक वर्गों से भर्ती किया गया था।

प्रो. पाठक के अनुसार, इनमें न केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, बल्कि पुकस और चंडाल भी शामिल किए गए। उनके अनुसार वे लोग भी आज के भंगी और मेहतर के रूप में जाने जाते हैं। 1931 की जनगणना में इन स्वच्छकारों की संख्या 19,57,460 थी, जिनमें 10,38,678 पुरुष और 9,18,782 स्त्रियां थी। यही वर्ग आगे चलकर भारतीय समाज में स्वच्छकारों का पुश्तैनी वर्ग बन गया। चूकि मानव-मल उठाना बहुत ही गंदा काम था, इसलिए समाज में इनको सम्मानित स्थान नहीं मिला और वे सबसे निम्न वर्ग बन गए। यहां प्रोफेसर श्यामलाल ठीक ही सवाल उठाते हैं कि ये लोग भंगी के रूप में कैसे माने गए? क्या उन्हें पहले जाति-बहिष्कृत किया गया और बाद में उन्हें गंदा काम करने के लिए बाध्य किया गया, या वे शुरू से ही यही काम कर रहे थे और इसी आधार पर सबसे नीच कहलाए? इस सवाल का जवाब यह है कि वे शुरू से गन्दा काम नहीं कर रहे थे, बल्कि मुसलमानों ने उन्हें यह काम करने के लिए बाध्य किया।

हिन्दू धर्म शास्त्रों और स्मृतियों में चंडाल जाति का वर्णन है। मनु के अनुसार, चंडाल का काम लाशों को ढोना और जल्लाद का काम करना था। इसके बाद लेखक अपने अभीष्ट के लिए इतिहास में प्रवेश करता है। वह 400 ईसवी में चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा विवरण को देखता है, जिसे डा. आंबेडकर ने भी अपने ग्रन्थ ‘द अनटचेबल्स’ में उद्धृत किया है। फाह्यान ने अपने नगर-वृतांत में चंडाल का जिक्र किया है, भंगी का नहीं। इसका अर्थ है फाह्यान के समय में भारत में भंगी कोई था ही नहीं। आंबेडकर के अनुसार उस समय तक अस्पृश्यता भी अस्तित्व में नहीं आई थी। फाह्यान के बाद 629 ईसवी में दूसरा चीनी यात्री युआन च्वांग भारत आया और यहां सोलह साल तक रहा। उसने नगरों का वर्णन करते हुए लिखा है कि कसाई, धोबी, मछुआरे, नट-नर्तक, वधिक, और स्वच्छकार की बस्तियों पृथक थी। उन्हें नगर के बाहर व्यवस्थित निवास स्थान उनके कर्म के अनुसार दिया गया था। उनके व्यवसाय के लिए अधिक स्थान खुल क्षेत्र और जलाशयों की आवश्यकता थी।

प्रो. श्यामलाल कहते हैं कि इस विवरण में गौर करने लायक बात यह है कि युआन च्वांग ने चांडालों के सिवा कुछ अन्य समुदायों का भी जिक्र किया है। इसमें यही एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जो यह बताता है कि युआन च्वांग के समय भारत में अछूत वर्गों और छुआछूत का विकास हो चुका था। इसी के आधार पर डा. आंबेडकर ने भी यह निष्कर्ष निकाला था कि 200 ईसवी तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं था, परन्तु 600 ईसवी तक इसका जन्म हो गया था। डॉ. आंबेडकर का अध्ययन इस विषय पर था कि अछूत कौन थे और वे अछूत कैसे बने? उन्होंने किसी विशेष अछूत जाति के संदर्भ में शोध नहीं किया था। अछूतों में भी अछूत भंगी कौम कैसे बनी? वे इसे एक जटिल समस्या मानते हैं. उनके अनुसार नस्ल, आक्रमण, और भारतीय इतिहास में विभिन्न काल-खंडों की संस्थाओं और सरकारों ने जाति पर अपनी छाप छोड़ी है। इसलिए वे समझते हैं कि भारत में भंगियों के उद्गम को समझने के लिए ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता है, लेकिन वे ‘अनार्य’ या ‘द्रविडिय़न’ सिद्धांत पर भी सवाल करते हैं कि आज जाति इतनी विशाल बन गई है कि सिर्फ इस आधार पर कि आर्यों ने मूलनिवासियों को दास बनाया और उनसे स्वच्छता के गंदे काम कराए गये, कोई सही निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

इसके बाद मानव-विज्ञान और आचार-विज्ञान के सिद्धांतों की कसौटी पर इस विषय को जांचने पर पता चलता है कि भंगी कभी भी प्राचीन काल से नहीं रहे हैं। समाजशाी जी. एस. घुर्ये ने अपनी किताब ‘कास्ट एंड क्लास इन इंडिया’ (1957) में दिया है कि संयुक्त प्रान्तों का ब्राह्मणों का शारीरिक स्वरूप पंजाब के चूहड़ा और खत्री से अधिक समान है। निस्संदेह यह हो सकता है कि किसी समय ब्राह्मण और चूहड़ा (भंगी) दोनों एक ही जाति के लोग रहे हों। विजेता लोग पराजितों को अपनी अधीनता में रखते थे, और उनसे नीच काम कराते थे, और अवश्य ही वह नीच काम केवल मल उठाने का ही हो सकता था।

स्टैनली राइस ने भी अछूत लोगों को विजेताओं का ही अधीनस्थ माना है। लेखक के अनुसार उत्तर भारत की भंगी जाति से इन बदलावों की पुष्टि की जा सकती है। वे क्रूक के हवाले से कहते हैं कि कुछ भंगियों का रंग गहरा काला और चमकीली आँखें डोम से मिलती हैं। कुछ मानव-विज्ञानी विद्वान यह मानते हैं कि कुछ वर्ग व्यवस्था के बदलाव के साथ अपनी अस्मिता और प्रतिष्ठा को बनाए रखने में असमर्थ थे, जिसके परिणामस्वरूप वे निम्नतम स्तर पर चले गए। शायद इसलिए उनमें बहुत से गोत्र समान पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए चौहान, सोलंकी, गहलोत, परिहार, राठोड़, शुक्ला, मिश्रा, शर्मा व पंडित आदि राजपूत और ब्राह्मण गोत्र हैं, लेकिन ये गोत्र भंगियों में भी मिलते है।

लेखक ने बताया है कि 1911 में भंगी समाज ने जनगणना अधिकारी से यह अपील की थी कि उनकी गणना उच्च वर्णों में की जाए, क्योंकि मानव-मल साफ करने वाले लोग सिर्फ एक जाति के नहीं थे। लेखक के अनुसार उत्तर भारत के भंगियों के उच्च जातीय होने के कुछ प्रमाण धर्मांतरण और धर्म-बहिष्कार के सिद्धांतों में भी मिलते हैं। इस तरह के काफी साक्ष्य हैं कि सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों का धर्म से बहिष्कार कर दिया जाता था, और वे अछूत घोषित कर दिए जाते थे। ऐसे बहिष्कृत लोगों के पास जीविका का कोई साधन नहीं रह जाने के कारण एक ही रास्ता बचा होगा, कि वे या तो भूखे मर जाएं, या फिर गंदे कामों से अपनी जीविका चलाएं और उन्होंने दूसरा रास्ता ही विवश होकर अपनाया होगा।

एन. प्रसाद के अनुसार बंगाल में हिन्दू शासन के पतन के बाद जो लोग न सनातन धर्म को स्वीकारते थे, और न इस्लाम को, और अपने पुराने धर्म में ही बने रहते थे, वे ही आज के अछूत बनाए गए। इसलिए भंगियों के संदर्भ में मलकानी के मत से सभी सहमत हैं कि भंगी आवश्यक रूप से इस्लामिक नगरीय जीवन का उत्पाद हैं, जिसे पहले मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने निर्मित किया था। यही आज आनुवंशिक बन गया।

भंगी जाति के उद्गम पर आगे बढ़ते हुए प्रोफेसर ने क्रूक के हवाले से एक किंवदंती का जिक्र किया है, जिसके अनुसार एक बार हजरत पैगम्बर और मेहतर इलियास खुदा के दरबार में हाजिर हुए। इलियास को खांसी आई, पर उन्हें वहां थूकने के लिए कोई कमरा नहीं मिला। उन्होंने ऊपर को मुंह करके थूका, तो वह पैगम्बरों के ऊपर गिरा। उन्होंने इसे अपमान महसूस किया, और खुदा से शिकायत की, और खुदा ने तुरंत एलियास को हुक्म दिया कि अब वह दुनिया में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करेंगे। इलियास ने हुकुम कुबूल किया पर प्रार्थना कि उनकी हिफाजत के लिए कुछ पैगम्बर और पैदा कर दिए जाएं। खुदा ने एक पैगम्बर ‘लाल बेगÓ को पैदा कर दिया, जो धरती पर सफाई का काम करने के लिए नियुक्त हुआ।

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