भारतीय क्षत्रिय धर्म और अहिंसा ( है बलिदानी इतिहास हमारा ) अध्याय – 13 (ख )

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हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप और झालाराव मन्नासिंह की वीरता

21 जनवरी 1556 ई0 को बाबर के बेटे हुमायूँ का देहान्त हो गया तो उसके पश्चात 14 फरवरी 1556 को अकबर का राज्यारोहण हुआ । उस समय हमारे एक महान शासक हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया था। जिस समय हुमायूँ की मृत्यु हुई थी उस समय यह महान हिन्दू योद्धा बंगाल की ओर था । उसे जैसे ही हुमायूँ की मृत्यु का समाचार मिला तो वह दिल्ली पर अधिकार करने के लिए वहाँ से चल दिया । 20 अफगान युद्धों में सफलता प्राप्त करने वाले इस महान योद्धा ने जब दिल्ली में आकर राजा के रूप में प्रवेश किया तो दिल्ली की हिन्दू जनता ने उसका पुष्पवर्षा कर के स्वागत किया। बहुत दिनों के पश्चात आज दिल्ली की हिन्दू प्रजा पहली बार किसी हिन्दू शासक को दिल्ली में प्रवेश करते हुए देख रही थी। इसलिए उसने अपने महान शासक का हृदय की गहराइयों से स्वागत सत्कार किया ।

इस हिन्दू योद्धा के भय के कारण ही अकबर और उसके दरबारी दिल्ली छोड़कर भाग गए थे । तब उन्होंने पंजाब में कलानौर के किले में बैठकर केवल भाग्य आजमाइश के लिए अकबर का राज्यारोहण बहुत सादगी के साथ कर दिया था । 21 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु के लगभग 24 दिन बाद अकबर का राज्यारोहण हुआ। जबकि परम्परा के अनुसार जिस दिन बादशाह मरा था उसी दिन अकबर का राज्याभिषेक होना चाहिए था । इतने दिन पश्चात राज्याभिषेक होने का अर्थ ही यह था कि अकबर और उसके साथियों को हिन्दू योद्धा हेमचन्द्र विक्रमादित्य का भय सता रहा था।
जब अकबर ने राज्य प्राप्त कर लिया तो हेमचन्द्र विक्रमादित्य का उसके साथ युद्ध होना निश्चित हो गया । अकबर की ओर से तारदीबेग सेनापति बन कर आया । जब उसने सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य का सामना किया तो कुछ समय पश्चात ही वह युद्ध के मैदान से भाग गया । यह घटना अक्टूबर 1556 की है।
अकबर ने तारदीबेग को हिन्दू योद्धा और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य के सामने मैदान छोड़कर भागने के अपराध में मृत्युदण्ड दिया। 5 नवम्बर 1556 को पानीपत के मैदान में फिर मुगलों और हेमचन्द्र विक्रमादित्य का संघर्ष हुआ। परन्तु इस बार हेमचन्द्र विक्रमादित्य पराजित हो गए । ‘महान’ कहे जाने वाले अकबर ने हमारे इस वीर योद्धा का शव भी उसके घरवालों को नहीं सौंपा था । जिन योद्धाओं ने इस युद्ध में भाग लिया था और वीरगति को प्राप्त हुए थे उनके साथ भी अकबर ने बहुत ही क्रूरता का व्यवहार किया था । उनकी हड्डियां दशकों तक मैदान में यूँ ही पड़ी रही थीं । उन्हें किसी को उठाने भी नहीं दिया गया था । विदेशी पर्यटकों ने भी उन हड्डियों के देखे जाने के संस्मरण दिए हैं।

मेवाड़ और अकबर

1563 ई0 में अकबर ने पहली बार मेवाड़ पर आक्रमण किया । तब वहाँ के शासक राणा उदयसिंह थे । उनकी वीरांगना पत्नी ने स्वयं मैदान में जाकर अकबर से लड़ाई लड़ी थी । रानी एक बार अकबर तक पहुँचने में सफल भी हो गई थी , परन्तु उसे मार नहीं सकी थी । यदि रानी का दांव सीधा पड़ जाता तो उसी दिन हिन्दुस्तान का इतिहास बदल जाता । उसके बाद 1567 में अकबर ने फिर चित्तौड़ पर हमला किया । पहले युद्ध में पराजित होने के घाव वह अभी सहला ही रहा था , इस युद्ध में किला तो अकबर के हाथ आ गया पर जिस शेर को वह पकड़ना चाहता था वह शेर अर्थात राणा उदयसिंह उसे नहीं मिला । राणा उदय सिंह को उनके सरदारों ने पहले ही किले के पीछे के भाग से निकाल दिया था। जहाँ से राणा अपने खजाने को भी साथ लेकर निकलने में सफल हो गया था । उसी धन से राणा उदय सिंह ने उदयपुर को बसाया था । इस युद्ध में ही जयमल – फत्ता का शौर्य भी देखने को मिला। इन दोनों भाइयों ने उस दिन हिन्दुत्व का गौरव बनकर युद्ध किया था और इतिहास में अपनी अमर कीर्ति स्थापित की थी।
जिन हिन्दू राजाओं ने अकबर मुगलों को अपनी कन्याएं सौंप दी थीं उनका भी हिन्दू समाज ने सामाजिक बहिष्कार किया था। अकबर के बारे में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसे हिन्दुस्तान का बादशाह कहा जाना नितान्त भ्रामक है । क्योंकि वह सम्पूर्ण भारत का बादशाह नहीं था।

महाराणा प्रताप ने दी कठोर चुनौती

इसी अकबर को हिन्दू हृदय सम्राट महाराणा प्रताप ने ऐसी कठोर चुनौती उस समय प्रस्तुत की थी कि उसका तोड़ अकबर के पास जीवन भर नहीं रहा था। माना कि चित्तौड़ को लेने में महाराणा प्रताप सफल नहीं हुए , परन्तु जून 1576 में लड़े गये हल्दीघाटी के युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का प्रदर्शन कर अकबर जैसे क्रूर बादशाह को यह संकेत अवश्य दे दिया था कि हिन्दुत्व का शौर्य अभी जीवित है । इस युद्ध के पश्चात अकबर निरन्तर 1585 ईस्वी तक हिन्दुत्व के शौर्य के प्रतीक महाराणा प्रताप और उनकी सेना से टकराता रहा । परन्तु हर बार महाराणा की जीत होती रही । महाराणा प्रताप और उनके वीर योद्धा सैनिकों ने माँ भारती के सम्मान की लड़ाई निरन्तर जारी रखी। उनके सारे प्रयास भारत वर्ष के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं । उस समय राजा मानसिंह जैसे दूसरे राजपूत शासक जिस प्रकार अकबर के तलवे चाट रहे थे , उन सबकी भी परवाह न करके महाराणा प्रताप ने अपनी वीरता का परचम लहरा कर माँ भारती की अनुपम सेवा की । शौर्य के उस सूर्य महाराणा प्रताप को आज सारा देश उनकी महान देशभक्ति और उनके वीरता पूर्ण कृत्यों के कारण बहुत ही श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करता है।

झालाराव मन्नासिंह

इसी काल में हमें झालाराव मन्नासिंह जैसे उस महान वीर योद्धा के विषय में भी जानकारी मिलती है । जिसने युद्ध के बीच से महाराणा को निकाल दिया था और उनका छत्र अपने सिर पर रखकर अपना अनुपम बलिदान देश की सेवा में लड़ते-लड़ते दिया था । कहा जाता है कि झालाराव और महाराणा प्रताप की शक्ल मिलती थी , जब वीर झालाराव ने अपने स्वामी के प्राण संकट में देखे तो उन्होंने मुगल सैनिकों को झांसा देने के लिए उनका छत्र अपने सिर पर रखकर महाराणा को हल्दीघाटी के मैदान से निकाल दिया था । इसी प्रकार का देशभक्ति भरा कार्य हमारे महान योद्धा भामाशाह ने किया था । जिन्होंने बड़ी धनराशि महाराणा प्रताप की सेवा में उपस्थित की थी ।
उस समय इन महान योद्धाओं जैसे अनेकों योद्धा माँ भारती को स्वतन्त्र कराने के लिए अपना प्राणोत्सर्ग कर रहे थे और देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन को गति प्रदान कर रहे थे। अकबर के काल में ही ग्वालियर नरेश रामशाह की देशभक्ति और स्वतन्त्रता आन्दोलन में दिया गया योगदान भी हमें याद रखना चाहिए । जिसने महाराणा प्रताप की युद्ध के मैदान में सेवा करते हुए अपना बलिदान दिया था । महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक और भाई शक्तिसिंह को भी हमें याद रखना चाहिए । जिन्होंने अत्यन्त विषम परिस्थितियों में महाराणा प्रताप का साथ देकर अपनी स्वामी भक्ति और राष्ट्र भक्ति का परिचय दिया था।
महाराणा प्रताप के पश्चात राणा अमरसिंह और उनके वंशजों ने जिस प्रकार मुगलों से संघर्ष जारी रखा उसे भी अपने स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक भाग समझकर ही हमें स्वीकार करना चाहिए।

रानी दुर्गावती ने लिए 3000 मुगलों के प्राण

रानी दुर्गावती का आत्म बलिदान हमारे स्वतन्त्रता आन्दोलन की एक महान धरोहर है। जिस पर हर भारतीय को गर्व है । रानी दुर्गावती ने अपने बलिदान से पूर्व राक्षस अकबर को अपना वीरांगना धर्म बता दिया था , जब रानी ने अपने बलिदान से पूर्व 3000 मुगलों की बलि ले ली थी । यह घटना 23 जून 1564 की है । निश्चित ही यह दिन हम भारतवासियों द्वारा ‘वीरांगना दिवस’ के रूप में मनाया जाना चाहिए । रानी ने अपने मन्त्री आधार सिंह से युद्ध के मैदान में कह दिया कि इससे पहले कि मैं शत्रु के हाथों पडूँ , उससे पहले आप मेरी गर्दन काट दो । जब रानी से उनके सैनिक कह रहे थे कि युद्ध भूमि छोड़कर आप चली जाओ तो उस वीरांगना ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कह दिया था – “नहीं जाऊंगी , युद्ध भूमि छोड़कर।” अकबर के एक सेनापति बाज बहादुर को भी इस रानी ने अपनी वीरता से पराजित किया था । इस प्रकार रानी दुर्गावती नारी शक्ति की प्रतीक बन गई थी।
स्वतंत्रता संघर्ष की ज्योति को निरन्तर प्रज्ज्वलित करने वाले अपने इन महान योद्धाओं का निश्चय ही देश महाऋणी है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत
एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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