भारत में राज्योत्पत्ति का मूल कारण रही है-स्वतंत्रता

राज्योत्पत्ति का भारतीय सिद्घांत
भारत के विषय में पिछले लेख में हम उल्लेख कर रहे थे कि भारत प्राचीनकाल से ही स्वतंत्रता प्रेमी देश रहा है। एक समय ऐसा था जब आर्यावर्त्त में राज्य और राजा नही होते थे। देश का शासIndia-Mapन धर्म से शासित होता था। शनै:-शनै: इस व्यवस्था में विकार उत्पन्न हुआ और समाज में कुछ असामाजिक तत्व उभरने लगे। तब उन असामाजिक तत्वों से समाज के शांति प्रिय लोगों की सुरक्षार्थ तथा उनकी स्वतंत्रता को बनाये रखने के दृष्टिगत राज्य और राजा की खोज की गयी।
डा. उदयशंकर पाण्डेय लिखते हैं-‘….वैवस्वत मनु लोगों द्वारा राजा बनाया गया और रक्षा करने के लिए उन कारण लोगों ने उसको अपनी आय का छठा भाग देना स्वीकार किया। महाभारत शांति पर्व में वर्णन है कि किस प्रकार प्रथम राजा वैन्य ने देवों एवं मुनियों के समक्ष शपथ ली कि वह विश्व की रक्षा करेगा, एवं निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन करेगा।’
इस उद्घरण में ध्यान देने योग्य प्रथम बात है कि मनु लोगों द्वारा राजा बनाया गया। अभिप्राय है कि वह किन्हीं लोगों पर शासन करने के लिए उन्हें दबाकर राजा नही बना अपितु उसे लोगों ने अपनी सहमति और सम्मति से (वोट से) राजा बनाया। राजा बनाने का उद्देश्य पश्चिम की भांति राजैश्वर्यों को भोगना नही था, अपितु लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करना था। लोकतंत्र और स्वतंत्रता का इससे सुंदर उदाहरण कोई और हो नही सकता। ‘लोगों ने राजा को अपनी आय का छठा भाग देना स्वीकार किया’-इस उद्घरण का दूसरा ध्यान देने योग्य वाक्यांश यही है। इसका अभिप्राय है कि जिन लोगों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए राज्य और राजा की खोज की, उसका चयन किया वो लोग इतने विवेकशील भी थे और उन्हें यह भली प्रकार ज्ञात था कि राजा को अपने कार्यांे को पूर्ण करने के लिए धन की आवश्यकता होगी। इसलिए उन्होंने राजा को अपनी आय का छठा भाग देना स्वेच्छा से स्वीकार किया।
सिद्घांत की अनुचित व्याख्या
हॉब्स, लॉक, रूसो ने भारत के इस सिद्घांत को समझने का प्रयास किया, परंतु वह इसे सही अर्थों और संदर्भों में समझ नही पाए और उन्होंने शीघ्रता से इसे ‘सामाजिक समझौते का राज्योत्पत्ति का सिद्घांत’ कह दिया। ‘सामाजिक समझौते’ का यह सिद्घांत यूरोप की उन सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार स्थापित किया गया, जिनमें लोगों को अपने शासक को चुनने की कभी समझ ही नही रही थी। क्योंकि उस समय सारा यूरोप महाभारत युद्घ के पश्चात भारत की राजनीतिक पतन की अवस्था के कारण अशिक्षा के अज्ञानांधकार में भटक रहा था। इसलिए यदि ‘सामाजिक समझौते’ की बात भी किन्हीं लोगों के मस्तिष्क में आयी तो वह कुछ ऐसी ही थी कि समाज के अशिक्षित लोगों पर क्यों न कुछ लोग मिलकर शासन करें। कहने का अभिप्राय है कि उन लोगों ने स्वतंत्रता के हरण के लिए राज्योत्पत्ति की और हमने स्वतंत्रता के रक्षण के लिए राज्योत्पत्ति की।
भारत का मौलिक राजनैतिक संस्कार
यह है पश्चिम और पूर्व के राज्योत्पत्ति के सिद्घांतों में मौलिक अंतर। पश्चिमी जगत इसीलिए स्वतंत्रता का हन्ता रहा और हमने स्वतंत्रता की अन्यत्र जाकर भी रक्षा की। राम ने रावण का वध किया परंतु सिंहासन दिया विभीषण को। कृष्ण ने कंस का वध किया, परंतु सिंहासन दिया उग्रसेन को। भारत का यह मौलिक राजनीतिक संस्कार है कि स्वतंत्रता के हन्ता को हटाओ और लोगों के जीवन में प्रसन्नता भरकर पीछे हट जाओ। जबकि पश्चिमी जगत का उद्देश्य रहा लोगों की स्वतंत्रता का हनन करो और दमन करते हुए उन पर शासन करो। मौलिक संस्कार की इस फलश्रुति पर हमारे राजनीतिक मनीषियों ने पता नही आज तक क्यों नही चिंतन किया?
राजनीतिक मनीषियों ने की उपेक्षा
सत्यकेतु सिद्घांतालंकर जी अपनी पुस्तक ‘विश्व का संक्षिप्त इतिहास’ में पृष्ठ 43 पर लिखते हैं-‘रोम के निवासी (प्रारंभ में) दो श्रेणियों में विभक्त थे। कुलीन (पौट्रिसियन) लोग और जनसाधारण (प्लेबियन) शुरू में रोम के शासन में सब शक्ति कुलीनों के हाथ में थी। ये कुलीन लोग मिलकर अपनी सभा करते थे।’
इस प्रकार राज्योत्पत्ति के विषय में पश्चिमी चिंतन ‘मात्स्य न्याय’ पर आधृत है। मानो सबल को दुर्बल पर शासन करना ही चाहिए और दुर्बल को शासित होना ही चाहिए। इसी भावना से माना ये गया है कि संपूर्ण मानव जाति प्राचीन काल से ही शासित-शोषित, शासक और शासित के मध्य विभाजित रही है। कुछ लोग हैं जो शासक होकर आते हैं और उन्हें शासितों को अपना दास बनाकर रखने का नैसर्गिक अधिकार है। इसलिए वहां राजाओं और कुलीनों ने मनुष्य को बाजार की वस्तु मानकर अपना दास बना बनाकर कितनी ही बार क्रय-विक्रय किया है। जबकि भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण नही मिलते। इस ओर भी राजनीतिक शास्त्रियों का ध्यान कभी नही गया, घोर आश्चर्य की बात है।
ब्रिटेन में आज तक भी ‘हाउस ऑफ लॉर्ड्स’ कार्य कर रहा है। इस सदन में राजकीय परिवार के लोगों को ही रखा जाता है। यह ब्रिटेन और यूरोप की उस प्राचीन शोषण पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का ही स्पष्ट प्रमाण है जिसमें कुछ कुलीनों को जनता के धन का दुरूपयोग करने का या जनता की स्वतंत्रता के मूल्य पर राज्यैश्वर्य के भोगने का विशेषाधिकार होता था। व्यक्ति की स्वतंत्रता के तथाकथित अलंबरदार आज तक व्यक्ति की स्वतंत्रता को पराधीनता में परिवर्तित कर उस पर ऐश करने की प्रतीक अपनी इस संस्था को आज तक पता नही क्यों संजोए हुए हैं?
तब भी भारत पर यह आरोप लगते हैं कि ये देश तो प्राचीन काल से ही पराधीन रहा है, या इसे स्वाधीनता की कोई परिभाषा ज्ञात नही है, तो ऐसा अतार्किक आरोप अतार्किक लोगों के मुंह से सुनकर दुख होता है। जबकि पराधीनता के पैर उखाड़ने वाले और स्वाधीनता की सुरक्षा करने वाले विश्व में केवल हम ही रहे हैं। तब ये कैसे संभव था कि जब इस देश की स्वतंत्रता को मसलने वाले ‘टिड्डीदल’ आकाश से उतरने लगे तो ये सारा देश हाथ पर हाथ धरकर बैठा देखता रहा होगा? ऐसा आरोप लगाने वाले तनिक, तथ्यों, प्रमाणों, साक्ष्यों, परिस्थिति जन्य साक्ष्यों का अवलोकन तो करें। गला फाड़ फाडकर चिल्लाते प्रमाणों, तथ्यों, साक्ष्यों आदि के सामने इनकी बोलती बंद हो जाएगी।
हम ऐसे ही वृहत्तर भारत के स्वर्णिम काल की चर्चा यहां कर रहे हैं, कि कैसे इसने चीन आदि देशों को प्राचीन काल से ही अपने स्वतंत्रता मानवता, दया, करूणा आदि के भावों और विचारों से प्रेरित किया?
व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के रक्षक पतंजलि के यम-नियम
पतंजलि के पांच यम-नियम:महर्षि पतंजलि ने विश्व को योगदर्शन दिया। इस महर्षि पर भारत को गर्व होना चाहिए कि उसने व्यक्ति के व्यक्तित्व को विराट स्वरूप देने और उसकी निजता व स्वतंत्रता की रक्षा का ऐसा विधान किया कि आज तक विश्व उसके चिंतन से आगे नही निकल पाया है। महर्षि पतंजलि ने योग के लिए व्यक्ति को योग्य बनाने हेतु भीतर से बाहर निकलने का रास्ता नही बताया, अपितु उन्होंने बाहर से भीतर जाने का रास्ता बताया। उन्होंने कहा कि बाहरी उछल-कूद और सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण भरी चंचल वृत्ति को त्याग करें और जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाएं। बड़े सहज भाव से महर्षि ने बाहरी चंचलवृत्तियों को लगाम लगाने हेतु योग की आठ सीढ़ियों में पहली दो सीढ़ियों का नाम यम-नियम दिया।
इस भ्रांत धारणा में जीने की आवश्यकता नही है कि इतिहास केवल मरे हुओं का लेखा जोखा प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ है। इतिहास के विषय में इस मिथ्या धारणा को तोड़कर सच के इस प्रकाश को अंगीकार करना होगा कि इतिहास जीवनादर्शों तथा जीवन-ध्येय का भी वर्णन करता है। इसलिए इतिहास एक विज्ञान भी है, क्योंकि बीते काल में हुई विज्ञान की उन्नति को केवल इतिहास ही समेटकर चलता है। इस दृष्टिकोण से महर्षि पतंजलि भी इतिहास के लिए सम्माननीय और विवेचनीय हैं। उन्होंने अपने योगदर्शन में यम-नियम को स्थान देकर इतिहास को ये कहने के लिए प्रेरित किया कि मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसके व्यक्तिगत जीवनादर्श एवं जीवन-ध्येय किस प्रकार समष्टि के कल्याण में सहायक बन जाते हैं।
महर्षि ने यम-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह को बताया है, जबकि नियमों में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान को सम्मिलित किया है। ये दस बातें ऐसी हैं कि जिन्हें अपनाकर मनुष्य मोक्ष की ओर बढ़ सकता है। कहने की आवश्यकता नही है कि इनके अपनाने से संसार से अन्याय, अत्याचार, दमन और शोषण स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। जिसका अंतिम परिणाम मनुष्य की स्वतंत्रता को रक्षित करने में निकलेगा। जो आक्रमणकारी भारत में 712 ई. से आने आरंभ हुए उनका दूर-दूर तक भी इन यम-नियमों से कोई संबंध नही था। इसलिए भारतीयों का उनके साथ सामंजस्य स्थापित करना असंभव था। कारण स्पष्ट था कि उनके साथ सामंजस्य का अर्थ होगा व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता को समाप्त कर देना। इसीलिए हम इस्लाम के आक्रमणों को भारतीय संस्कृति को विनष्ट करने के अनवरत क्रम के रूप में तथा उन आक्रमणों का प्रतिरोध कर रही भारतीय जनता के प्रतिरोध को अपनी निजता और स्वतंत्रता की रक्षा के रूप में देखते हैं। इतिहास का सही मूल्यांकन यही है, क्योंकि इसी इतिहास बोध से भारत की जनता का उचित मार्गदर्शन किया जा सकता है।
वृहत्तर भारत में सांस्कृतिक गूंज
8वीं से 12वीं शताब्दी तक भारत की सांस्कृतिक विरासत वृहत्तर भारत में भली प्रकार फूल-फल रही थी। रामायण ही विश्व को मानवतावाद का पाठ नही पढ़ा रही थी, अपितु अन्य सांस्कृतिक मूल्य भी शेष विश्व का भली प्रकार मार्ग दर्शन कर रहे थे। इन मूल्यों में भारत के स्वतंत्रता संबंधी विचारों से विश्व का कल्याण हो रहा था, उसे नये विचार नई दिशाओं में बढ़ने और सोचने का अवसर मिल रहा था। इसलिए भारत के एकेश्वरवाद से अभिभूत शेष विश्व पूजा-पद्घति में भी भारत का ही अनुकरण कर रहा था। पौराणिक काल में भारत में मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा तो उसका अनुकरण शेष विश्व भी करने लगा।
प्रजेश गणेश बन गया सबका देव
अनुकरण करते विश्व ने भारत के वेदों के प्रजेश गणेश को अपना पूजनीय देव बना लिया। अफगानिस्तान में काबुल के पीर स्तर नाथ स्थान में आज भी गणेश की सदियों पुरानी मूर्ति स्थापित है। इस पर लिखा है-‘यह महान तथा सुंदर महाविनायक की मूर्तिशाही राजाओं में से शानदार शाही खिनगल ने जो परम भट्टारक महाराजाधिराज था, महाज्येष्ठ मास त्रयोदशी, विशाखा नक्षत्र, सिंह लग्न में स्थापित की।’
यह मूर्ति उस काल का स्मरण दिलाती है जब अफगानिस्तान में शाही हिंदू शासकों का राज्य था और यह देश भारत का ही एक अंग था। उस समय इसे ‘आर्यान’ कहा जाता था।
श्रीलंका में कोलंबो से 150 किलोमीटर कटरगया नामक स्थान है, जहां सुब्रहमण्यम का मंदिर है। इस मंदिर के मुख्य स्थान पर गणेश की प्रतिमा स्थापित है।
नेपाल में गणेश की पूजा 8वीं 9वीं शताब्दी से आरंभ हुई। वहां हिंदू ही नही, अपितु बौद्घ भी गणेश पूजन करते हैं। यहां के विभिन्न मंदिरों में कितने ही स्थानों पर गणेश की प्रतिमा स्थापित है। बर्मा में पगन स्थित मंदिरों के भग्नावेशेषों में गणेश की प्रतिमा प्राप्त हुई है। गणेश की यह प्रतिमा बहुत ही सुंदर है। यह प्रतिमा उसी समय की हो सकती है जब भारतीय व्यापारी जलमार्ग से यहां पहुंचे थे और यह विशाल भूभाग भारत का ही एक अंग हुआ करता था।
खोतान में ऐन डेरे नामक स्थान पर एक स्तूप की खुदाई में गणेश की अनेक प्रतिमाएं प्राप्त की गयी थीं। इनमें से प्रमुख प्रतिमा के गले के मोतियों की माला बाजुओं में केयूर (बाजूबंद) और सिर पर मुकुट है।
थाईलैंड में भारतीय व्यापारी बर्मा से ही गये थे, यहंा पहुंचने पर उन्होंने परिव्राट का कार्य किया और अपनी संस्कृति की धूम मचाई। इसलिए यहां भी यज्ञोपवीतधारी गणेश मिले हैं।
इसी प्रकार मंगोलिया, कम्बोडिया, चम्पा, जावा, बोर्नियो तथा जापान तक गणेश की प्रतिमाएं मिलती हैं। इतने बड़े क्षेत्र में ‘एक देव’ की पूजा होने का अर्थ है कि अफगानिस्तान ईरान से लेकर चीन-मंगोलिया, जापान तक का सारा क्षेत्र कभी एक ही सांस्कृतिक विचारधारा से शासित अनुशासित होता था। इस पूरे भूभाग को कभी जम्बूद्वीप कहा जाता था, जिसे आज तक हमारे संकल्प मंत्र में पंडित लोग हमसे बुलवाते हैं।
बहुत कुछ खोया तो पाया भी बहुत कुछ गया है
इतने विशाल क्षेत्र पर आर्यों के राज्य की या हिंदू शासकों के विजय अभियानों की बात सोचकर जहां प्रसन्नता होती है, वहीं ये दुख भी होता है कि हमने अपना खोया भी बहुत कुछ है।
संपूर्ण यूरेशिया को ही कभी जम्बूद्वीप कहा जाता था। वह जम्बूद्वीप आजकल हमारे लिए केवल संकल्प मंत्र में किसी पंडित जी द्वारा यज्ञ के अवसर पर सुनने को मिलता है। हम अपने अतीत को और अपने अतीत की सीमाओं को भूल गये और आज जम्बूद्वीप भी कभी के भारत को ही या समुद्र के किसी छोटे से द्वीप को ही मानने लगे हैं। इतिहास से कटने का परिणाम है ये।
क्यों नही मिटी हस्ती
प्रो. सत्यव्रत सिद्घांतालंकार लिखते हैं-‘भारत की यह राजनीतिक विजय नही थी, अपितु सांस्कृतिक विजय थी, यद्यपि इसको भारत के राजाओं की ओर से सांस्कृतिक प्रश्रय प्राप्त था। यहां के व्यापारियों की साख सर्वत्र थी। रैम्जेम्यूर अपनी पुस्तक ‘द लैण्ड्स एण्ड दी फर्स्ट एम्पायर’ के पृष्ठ 76 में लिखते हैं -‘इंग्लैंड में पूरब से जो माल आता था, उसे बेचने वालों ने इंग्लैंड में कुछ व्यापारिक कोठियां बनायी हुई थीं, जिन्हें स्टील माडर््स या ईस्टर्लिंग कहते थे। ईस्टर्लिंग का अर्थ था जो माल ईस्ट अर्थात भारत से आता था। ईस्टर्लिंग शब्द से ही बाद में स्टर्लिंग शब्द बना, जिसका आजकल अंग्रेजी में अर्थ है-शुद्घ। इन कोठियों में माल वजन में पूरा उतरता था क्योंकि यह भारत से आता था, यह साख थी भारत के व्यापारियों के माल की। …तभी उपनिषद में अश्वपति कैकेय अभ्यागत ऋषियों को कहते हैं :-
‘न में स्तेनो जनपदे’ -मेरे राज्य में कोई चोर नही है। यह थी विश्व में भारत की साख किसी समय।
मैगास्थनीज भारत की यात्रा के समय लिखता है कि इस देश में कोई ताला नही लगाता था, घर में रात को केवल चांद की किरणें प्रवेश करती थीं, दूसरा कोई नहीं।’
मैगास्थनीज की इसी बात को दो फरवरी 1835 ई. को लार्ड मैकाले ने ब्रिटेन की संसद में दोहराया था कि भारतवर्ष में कोई चोरी नही करता और यही बात स्वतंत्रता से पूर्व भारत के देहात में मिलती थी कि लेाग अपने घरों में ताला नही डालते थे। यह था धर्म का राज्य। धर्म के इस राज्य को मजहब के उन्माद ने जब मिटाने का बीड़ा 712 ई. के पश्चात उठाया तो भारत का राष्ट्र धर्म सावधान हो उठा, और राष्ट्रीय चेतना के रूप में देश के अंग अंग में प्रविष्ट हो गया। फलस्वरूप चारों ओर विदेशियों के विरूद्घ स्वतंत्रता की लहर दौड़ गयी। जहां जहां विदेशी पहुंचता था वहीं वहीं राष्ट्र की चेतना लोगों को पहले जगाने का काम कर रही थी। यही वह भावना थी जिसके कारण हमारी ‘हस्ती मिटी नही।’
ऋग्वेद और स्वतंत्रता
ऋग्वेद (5/66/6) के मंत्र की व्याख्या करते हुए स्वामी वेदानंद जी तीर्थ अपनी पुस्तक ‘स्वाध्याय सन्दोह’ में लिखते हैं :-संसार में क्षुद्र से क्षुद्र कोई ऐसा प्राणी नही मिलेगा, जो अपनी गतिविधि में प्रतिबंध को पसंद करे। सभी चाहते हैं कि उनकी गति निर्बाध रहे। वेद में मार्ग के संबंध में प्रार्थना है कि वह अनृक्षर अर्थात कांटों से रहित हो। कांटे मार्ग की बाधा हंै। बाधा से रहित मार्ग प्रशस्त माना जाता है और प्रशस्त होता भी है। ऐसी स्थिति में स्वराज्य की कामना अस्वाभाविक नही। अत: अपराध भी नही। जो दूसरे की गतिविधि में प्रतिबंध लगाता है, जब कभी उसकी गतिविधि पर प्रतिबंध लगता है, तब उसे ज्ञात होता है कि स्वाधीनता, स्वतंत्रता-स्वराज्य क्या वस्तु है?
यूरोप के देशों को दूसरे देशों की स्वतंत्रता का हनन करना अच्छा लगता था। पर जब उनकी अपनी स्वतंत्रता का हनन हुआ तो आपस में ही लड़ पड़े और दो विश्व युद्घ कर लिये।
भारत के चिंतन का लोहा मानिये
इसलिए भारत के चिंतन का लोहा मानना पड़ेगा कि उसने पहले दिन से ही स्वतंत्रता के हनन के दुष्परिणामों को भांप लिया था। इसलिए पहले दिन से ही स्वतंत्रता के हन्ताओं के विरूद्घ तलवार संभाल ली। लड़ाई चाहे लंबी चली, पर भारत ना तो रूका और ना ही झुका। इस्लामिक आक्रमणों का उद्देश्य विश्व में इस्लामिक राज्य की स्थापना करना था।
ये लोग इस्लामिक राज्य की स्थापना के उपरांत ही ये मान लेते हैं कि जहां इस्लामिक राज्य स्थापित हो गया वहीं शांति और भाईचारा उत्पन्न हो गया। परंतु इतिहास बताता है कि ऐसा हुआ नहीं। इस्लामिक देशों में भी परस्पर संघर्ष, शोषण और दमन अन्य देशों से भी अधिक है। किसी की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करके जब समाप्त किया जाता है तो उसका परिणाम परस्पर की वैर और विरोध की भावना में ही दीखता है, इसीलिए भारत ने परस्पर के वैर विरोध को भी एक दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक माना तभी तो शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर प्रणिधान को नियमों में स्थान दिया गया।
भारत में ग्राम्य स्तर की स्वतंत्रता
भारत में ग्राम्य स्तर की स्वतंत्रता थी
सर चार्ल्स मेटकॉफ का कहना है-‘(भारत में) ग्राम्य-संस्थाएं छोटे-छोटे लोकतंत्र राज्यों का नाम था। जो अपने आप में पूर्ण थीं। उन्हें जो कुछ भी चाहिए था, वह उनके अपने अंदर उपलब्ध था। अपने से बाहर के साथ उनका संबंध बहुत ही कम था।
ऐसा प्रतीत होता है कि जहां अन्य कोई नही बचा, वहां वे बची रहीं। एक राजवंश के पश्चात दूसरा राजवंश आया। एक क्रांति के पश्चात दूसरी क्रांति हुई, पर ग्राम संस्थाएं पूर्ववत वहीं स्थापित रहीं। मेरी सम्मति में ये ग्राम संस्थाएं ही थीं जिनमें से प्रत्येक एक पृथक राज्य की तरह थीं, भारतीय जनता की रक्षा में सबसे अधिक समर्थ रहीं। इन्हीं के कारण सब परिवर्तनों और क्रांतियों में जनता की स्वतंत्रता की रक्षा होती रही। भारतीयों को जो कुछ प्रसन्नता व स्वतंत्रता आदि प्राप्त है : उसमें ये सबसे अधिक सहायक है।’
मेटकॉफ महोदय ने जो कुछ उपरोक्त अंश में कहा है वह उस व्यवस्था की ओर संकेत है जो भारत ने युगों पूर्व निर्मित की थी। 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम में इतिहास लेखन में भारत की ग्राम्य संस्थाओं की पूर्णत: उपेक्षा की गयी है, जबकि ये ग्राम्य संस्थाएं पृथक राज्य की भांति होती थीं, और संकट के समय अपने राजा के साथ भी और यदि साथ न भी मिले तो अकेले भी शत्रुओं से जूझ पड़ती थीं।
इसे क्या राष्ट्रीय भावना नही माना जाएगा? जिस देश की ग्राम्य संस्थाएं ही इतनी देशभक्त हों उसके बड़े राज्यों के शासकों पर (एक दो अंगुली गणेयमात्र शासकों को छोड़कर) आप कैसे उंगुली उठा सकते हैं? देश का जन-जन और जर्रा-जर्रा देशभक्ति से भरा रहा। देशभक्ति इस भावना को इतिहास में स्थान नही मिला तो इसमें दोष किसका है?

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

More Posts

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *