हर्षप्रद समाचार : सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित शिवपूजन सिंह कुशवाह के 50 से अधिक ग्रंथों का तीन खंडों में प्रकाशन

ओ३म्

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वर्तमान कोरोना काल में आर्यसमाज के सत्संग बन्द हैं। जिन आर्यसमाजों व आर्य-संस्थाओं के वार्षिकोत्सव व समारोह होने थे वह भी मार्च के महीने से बन्द चल रहे हैं। सभी लोग घर पर रहने के लिये विवश हैं। भय है कि कहीं किसी के सम्पर्क में आकर कोरोना रोग न हो जाये और परिवार के एक या अधिक लोग इसके कारण वियोगजन्य दुःख से ग्रस्त न हों। ऐसे समय में आर्यजगत के लिए एक हर्षप्रद समाचार, जो हमारी दृष्टि में मार्च 2020 के बाद से अब तक का सबसे हर्षप्रद समाचार है, वह यह है कि हिण्डोनसिटी-राजस्थान स्थित ‘हितकारी प्रकाशन समिति’ के द्वारा इसके संचालक यशस्वी श्री प्रभाकरदेवआर्य जी ने शीर्ष वैदिक विद्वान पं. शिवपूजनसिंह कुशवाह जी के 50 से अधिक अनुपलब्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थों को तीन जिल्दों में भव्य एवं आकर्षक रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। हमें यह आर्यसमाज के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना लगती है। आर्यसमाज की अनेक संस्थायें मुकदमेंबाजी व गुटबाजी जैसी समस्याओं से ग्रस्त है, ऐसे समय में एक दिवंगत विद्वान के पचास से अधिक ग्रन्थों का भव्य रूप में प्रकाशन और वह भी एक अकेले ऋषिभक्त श्री प्रभाकर देव आर्य जी द्वारा अत्यन्त हर्षप्रद एवं महत्वपूर्ण घटना है। इस महनीय कार्य के लिये हम श्री प्रभाकरदेव आर्य जी को हार्दिक बधाई देते हैं। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखें और वह दीर्घायु हों तथा उनका प्रकाशन दिन प्रतिदिन उन्नति करे, यह हमारी इच्छा व कामना है।

तीन खण्डों में प्रकाशित होने वाली ग्रन्थावली का अग्रिम मूल्य मात्र एक हजार रुपये है। यह धनराशि क्रेता व पाठक महानुभावों को 15 अगस्त तक प्रेषित करनी है। इस प्रकाशन व भुगतान संबंधी जानकारी निम्न हैः

विज्ञप्ति-1

सम्माननीय बन्धु! सादर नमस्ते।

हितकारी प्रकाशन समिति द्वारा प्रकाश्यमान ज्ञानप्रसूत , ऐतिहासिक ग्रन्थमाला ‘‘डा॰ शिवपूजन सिंह कुशवाह ग्रन्थमाला” के ज्ञानवृद्ध लेखक ने अपने अथाह ज्ञान भण्डार से पचास से अधिक छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखीं। सैद्धान्तिक दृष्टि से परिपक्व यह पुस्तकें अध्ययन में रुचि रखनेवाले जनों के लिये बहुत उपयोगी हैं।

आपकी हितकारी प्रकाशन समिति तीन खण्डों में लगभग 2100 पृष्ठों में इन्हें प्रकाशित कर रही है। प्रथम खण्ड अगस्त 2020 में भिजवा देगें। शेष दो खण्ड अगस्त 2021 तक भिजवा देगें।

सभी खण्डों में उत्तम कोटि का कागज, रैक्जिन की मजबूत जिल्द तथा बहुरंगी जैकेट से युक्त यह मनभावन पुस्तकें देखकर आप प्रफुल्लित होंगे।

दिनांक 15 अगस्त 2020 तक जो व्यक्ति, संस्था व पुस्तक विक्रेता प्रति सैट एक हजार रुपये हमें भिजवा देगें उन्हे यह तीनों भाग तथा उपहार में 380 पृष्ठवाली ‘‘दयानन्द दिग्विजय महाकाव्य का समालोचनात्मक अध्ययन” भिजवायेंगे। भेजने का व्यय हम अर्थात् प्रकाशक देंगे।

दिनांक 15 अगस्त 2020 के पश्चात् किसी भी व्यक्ति, संस्था अथवा पुस्तक विक्रेता को यह लाभ प्राप्त नहीं होगा।

इस ग्रन्थमाला का कुशल सम्पादन उद्भट वैदिक विद्वान् डा॰ ज्वलन्त जी शास्त्री जी कर रहे हैं। शीघ्रता कर प्रतियां सुरक्षित करवायें।

हमारा बैंक – HDFC खाता संख्या-50200027920292, IFS कोड—HDFC0002589

-प्रभाकरदेव आर्य
मोबाइल: 7014248035/9414034072

विज्ञप्ति-2

आर्य जगत् के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य डॉ शिवपूजन सिंह कुशवाह द्वारा लिखित पुस्तकों तथा शोध-निबन्धों का संकलन कर उसे तीन खण्डों में (लगभग 2100 पृष्ठों में) प्रकाशित करने की महत्त्वपूर्ण योजना हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डौन-सिटी, राजस्थान ने बनाई है। इस शोधपूर्ण ग्रन्थमाला का सम्पादन वैदिक वाङ्मय के विद्वान् आदरणीय डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी कर रहे हैं। वैदिक तथा पौराणिक साहित्य एवं प्राचीन भारतीय आर्य संस्कृति पर आधारित इन गवेषणापूर्ण ग्रन्थों तथा निबन्धों का अध्ययन विद्वानों तथा गवेषकों के लिये भी अतीव उपयोगी होगा। ग्रन्थावली में संगृहीत सामग्री का विवरण इस प्रकार है-

“कुशवाह-ग्रन्थावली खण्ड-1”

1. महर्षि दयानन्दजी कृत वेदभाष्यानुशीलन
2. महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में यज्ञ
3. सामवेद का स्वरूप
4. अथर्ववेद की प्राचीनता
5. ऋग्वेद के दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात
6. वामनावतार की कल्पना
7. वैदिक एज (¼Vedic Age½ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
8. ‘भारतीय साहित्य और संस्कृति’ एक मूल्यांकन
9. वैदिक शासन पद्धति
10. उपनिषदों की उत्कृष्टता
11. भारतीय इतिहास और वेद
12. आर्य समाज मे मूर्तिपूजा: ध्वान्तनिवारण
13. बाइबिल में वर्णित बर्बरता तथा अश्लीलता का दिग्दर्शन
14. पाश्चात्यों की दृष्टि में इस्लामी मत प्रवर्तक
15. आर्य शब्द का वास्तविक अर्थ
16. नीर क्षीर विवेक

“कुशवाह-ग्रन्थावली खण्ड-2”

1. वैदिक सिद्धान्त मार्तण्ड
2. पाश्चात्यों की दृष्टि में वेद ईश्वरीय ज्ञान
3. आर्य समाज के द्वितीय नियम की व्याख्या
4. आर्यों का आदि जन्मस्थान निर्णय
5. ‘भारतीय इतिहास की रूपरेखा’ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
6. पद्मपुराण का आलोचनात्मक अध्ययन
7. शिवलिंगपूजा पर्यालोचन
8. क्या वेदों में गोमांसभक्षण का विधान है?
9. गर्ग मुख-महाचपेटिका
10. सतीदाह: एक लोमहर्षक प्रथा

“कुशवाह-ग्रन्थावली खण्ड-3”

1. गायत्री मीमांसा
2. अष्टादश पुराण परिशीलन
3. नारद पुराण का आलोचनात्मक अध्ययन
4. मार्कण्डेय पुराण: सरल समीक्षा
5. हनुमान् का वास्तविक स्वरूप
6. सत्यार्थ प्रकाश-भाष्य (तृतीय समुल्लास)
7. इस्लाम के ‘स्वर्ग-नरक’ पर महर्षि दयानन्द जी की आलोचना का प्रभाव
8. गणित के जादू
9. वेदों में गणित विद्या की चर्चा
10. वेदों में गणितविद्या का विचार
11. आचार्य महीधर और स्वामी दयानन्द के माध्यन्दिन भाष्य का आलोचनात्मक अध्ययन
12. श्रीमद्भागवत पुराण में अपाणिनीय प्रयोग
13. श्रीसत्य साईं बाबा का कच्चा चिट्ठा

हमें जिस दिन इस योजना की जानकारी मिली, उसी समय हमने अग्रिम मूल्य भेजने का निर्णय कर लिया था। हमारी स्वाध्यायशील मित्रों, जो कि सबको होना चाहिये, से विनती है कि इस ग्रन्थ माला के अग्रिम सदस्य बनें और जो समर्थ हों वह अपनी ओर से अतिरिक्त सहयोग भी कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक मित्र इस पर अवश्य विचार करेंगे और उचित निर्णय कर उसे शीघ्र क्रियान्वित करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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