भारत के प्राचीन इतिहास पर एक महत्वपूर्ण लेख , क्या प्राचीन आर्य इतिहास के बारे में कुछ जानते थे ,?

यहाँ हम पश्चिमी इतिहासवेताओं के इस कथन की परीक्षा करनी है कि “प्राचीन आर्य ऐतिहासिक विद्या से अनभिज्ञ थे” । वास्तव में यदि यह लांछन ठीक हो तो हमें मानना पड़ेगा कि हमारे पुरुष अर्ध सभ्य थे क्योंकि केवल दो ही अवस्थाओं में कोई नेशन या जाति ऐतिहासिक ज्ञान से शून्य हो सकती
है :-
* कि उस के नेताओं ने कोई ऐसे कार्य न किए हो जिसे उन की सन्तति अभिमान युक्त स्मरण कर
सके।
* कि उस के नेता अपनी सन्तति को ऐतिहासिक शिक्षा के लाभों से अवगत कर उन में देशभक्ति के
भावों को उत्तेजित करने की आवश्यकता से अनभिज्ञ हों।
पहली अवस्था तो हो ही नहीं सकती, क्योंकि यह प्रख्यात है कि प्राचीन आर्यावर्त में रेखागणित, बीजगणित, ज्योतिष, पदार्थ व शिल्प विज्ञान महोन्नति को पहुंचे हुए थे, वैधक संबंधी आश्चर्य जनक अन्वेषण हो चुके थे, अध्यात्म-विद्या उन्नति के शिखर पर विराजमान थी, प्रजा-तंत्र शासन प्रणाली का प्रचार किया गया था तथा चक्रवर्ती साम्राज्य भी संस्थापित हो चुका था। अत: यह सिद्ध नहीं हो सकता कि प्राचीन आर्यों के कार्य ऐसे न थे जो उन के संतान के उच्च भावों को उत्तेजित करते और उन की उन्नति में सहायक हो सकते। वास्तव में उन के कार्य तो केवल भारत ही नहीं अपितु सर्व संसार को उन्नति के मार्ग पर चलने का आदेश करते है।
दूसरी अवस्था भी संघटित नहीं हो होती क्योंकि जब हम प्राचीन संस्कृत साहित्य को देखते है तो उसे इतिहास के गुण वर्णन से भरपूर पाते है। यहाँ पर थोड़े से उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है :-
अथर्ववेद, काण्ड १५, अ० १, सूक्त ६, मंत्र १०, ११ तथा १२ में निम्नलिखित शिक्षा है :-
“महत्वभिलाषी पुरुष जब महत्व की ओर चलता है तब इतिहास, पुराण, गाथा और नाराशंसी उस के अनुगामी बन जाते है” इस बात को जो पुरुष जानता है वह इतिहास, पुराण, गाथा और नाराशंसी का प्रियधाम बन जाता है। (ये मंत्र इतिहास विद्या के बीज है)
गृह्य सूत्र में लिखा है कि ब्राह्मणों ग्रन्थों को इतिहास, पुराण, गाथा और नाराशंसी भी कहते है अर्थात ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ जो ब्राह्मण ग्रन्थों के नाम से प्रसिद्ध है उनमें कई प्रकार के इतिहास विद्यमान है।
छंदोग्योपनिषद के सप्तम प्रपाठक में जहां महर्षि सनत्कुमार और ऋषि नारद का संवाद है वहाँ सनत्कुमार के पूछने पर नारद ने निम्नलिखित प्रकार बतलाया है कि उन्होने क्या-क्या अध्ययन किया है :-
हे भगवन ! मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण, वेदार्थ प्रतिपादकग्रंथ, पितृविद्या, राशि, दैव, निधिवाकोवाक्य, एकायनविद्या, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प देव जनविद्याओं का अध्ययन किया है। (इस उत्तर में इतिहास-पुराण अर्थात पुराकालीन इतिहास का नाम स्पष्ट आया है) ।
इसी प्रकरण में सनत्कुमार ने नारद को उपदेश दिया है :-
“विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहास पुराणं पञ्चमं………….”
अर्थात विज्ञान (सायंस) के द्वारा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण का तत्व ज्ञात होता है। (इस कथन का तात्पर्य तो यह है कि किसी समय इतिहासविद्या भारत में ऐसी उन्नति को प्राप्त थी कि उसके गूढ़ाशय पूर्ण ग्रन्थों को समझने के लिए विद्यार्थी को पहले विज्ञानवित अर्थात सायंस का ज्ञाता बनना पड़ता था।)
चतुषष्ठी (६४) कलाओं की गणना कराता हुआ एक कवि लिखता है :-
“इतिहासागमाद्याश्च काव्यालंकार नाटकम्……………………”
अर्थात इतिहास, वेद, काव्य, अलंकार, नाटक ………… आदि 64 कलाएं हैं।
राजकुमार चंद्रापीड़ को कौन-कौन सी विद्याएं पढ़ाई गई थी इसका वर्णन करता हुआ कवि बाण अपने ग्रन्थ कादंबरी में लिखता है :-
“स (चंद्रापीड़:) महाभारत पुरराणेतिहास रामायणेषु परं कौशलमवाप”
अर्थात वह राजकुमार महाभारत, इतिहास, पुराण, तथा रामायण में बड़ा कुशल हो गया।
राजा के वर्णन में कवि बाण ने कादंबरी में लिखा है :-
वह कभी-कभी प्रबन्ध, कहानियां, इतिहास, तथा पुराणों को सुनकर मित्रों के साथ दिन व्यतीत करता था।
महाभारत में लिखा है :-
“इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपवृंहयेत्”
अर्थात इतिहास तथा पुराण से वेदार्थ दृढ़ करना चाहिए।
एक कवि लिखता है :- “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेश समन्वितम् पूर्ववृत कथायुक्तमिति हासप्रचक्षेत”
अर्थात इतिहास वह विद्या है जिस में प्राचीन बातों के वर्णन के साथ-साथ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का उपदेश हो।
इस विषय में विदेशियों की साक्षी :-
* हयूनसेन लिखता है कि जब वह भारत यात्रा को आया था तो राज कि ओर से नीलपत्रियों का निर्माण
होता था।
* मेगस्थनीज लिखते है कि उन्होने अपनी भारतीय यात्रा में देखा कि सुघटनाओं तथा दुर्घटनाओं के
अंकित करने वाले राज कर्मचारी प्रत्येक प्रान्त में काम कर रहे थे।
* महाशय टाड लिखते है कि उन्होने “राजस्थान” के निर्माण करने में पुरानी पुस्तकों तथा सामयिक
चरणों से सहायता ली।
* अबुल फज़ल का भारतीय इतिहास साक्षी देता है कि उनके समय तक भी कुछ ऐतिहासिक सामग्री
भारत में विद्यमान थी।
इन उदाहरणों से भली-भांति विदित होता है कि प्राचीन आर्य इतिहास को एक प्रकार का विज्ञान और धर्मार्थ काम मोक्ष की प्राप्ति में सहायक मानते थे एवं इसकी सहायता से अपने अनेक काव्यों को शिक्षा प्रद तथा मनोरंजक बनाया करते थे।
सोचने की बात है कि महाराज विक्रमादित्य कि 12वीं शताब्दी में जब की भारत का अध: पतन हो रहा था, कल्हन जैसे इतिहासवेता उत्पन्न हो सकते थे तो उस समय जबकि भारत उन्नति के शिखर पर था विराजमान था इस देश में कितने और कैसे-कैसे ऐतिहासिक विज्ञानी उत्पन्न हुए होंगे ! वही कल्हन लिखते है कि राजतरंगिणी लिखने के पूर्व मैंने 11 ऐतिहासिकों के पुस्तकों को पढ़ा था। परंतु शौक ! महाशौक! मुसलमानों के कारण उन में से एक का भी कहीं पता नहीं चलता । संस्कृत भाषा में ऐतिहासिक काव्यों कि विध्यमानता सिद्ध कर रही है कि प्राचीन आर्यावर्त में इतिहास पर कई पुस्तकें लिखी गई थी, यदि नहीं लिखी गई तो कवि कालिदास ने रघुवंश लिखने के लिए ऐतिहासिक सामग्री एकत्र कहाँ से कि थी? कई काव्यों के पढ़ने से पता चलता है कि एक समय इस देश के विद्यालयों में इतिहास भली-भांति पढ़ाया जाता था एवं इतिहास के अनेक ग्रन्थ उपस्थित थे। हर्षचरित में बाणभट्ट लिखता है कि जब महाराज हर्ष का चित्त उदास हुआ करता था तब वह इतिहास सुना करते थे पुन: वही कवि अपनी पुस्तक कादंबरी में कहते है कि राजा ने अपने पुत्र के लिए गुरुकुल खुलवाया और उस में भिन्न-भिन्न विद्याओं के अध्यापकों के साथ-साथ इतिहास का अध्यापक भी नियुक्त किया। यदि इतिहास थे ही नहीं तो अध्यापक इतिहास कैसे पढ़ते थे ? रामायण और महाभारत को महान ऐतिहासिक काव्य इस समय उपस्थित हैं। हालांकि उनमें मिलावट बहुत हैं तथापि उन के विषयों के ऐतिहासिक होने में कोई संदेह नहीं। यदि प्राचीन आर्य इतिहास के लाभों को नहीं समझते थे तो वाल्मीकि और व्यास ने इतनी बड़ी-बड़ी पुस्तकों के लिखने का कष्ट क्यों उठाया?
पूर्वोक्त प्रमाणों से यही परिणाम निकलता है कि प्राचीन आर्य ऐतिहासिक विज्ञान को जाते थे, उन्होने इतिहास की कई पुस्तकें लिखी जिन में से बहुतेरों का मुसल्लमानी राज्य के समय नाश हो गया।

ये है भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति का इतिहास ना कि नीच आक्रांताओं के गुणगान का इतिहास !!
आधुनिक ऐतिहासिक शैली से नहीं है ,इसलिए लोग इतिहासरूप में स्वीकार नहीं करते । किन्तु वैदिक सनातन इतिहास हजार,जो हजार वर्षोंका न था । फिर भला अरबों वर्षोंका इतिहास क्या आजके विकासवादके चश्मेसे पढ़ा जा सकता है ? ऐसी दशामें केवल उपयोगी व्यक्तियोंका इतिहास ही लाभदायक है । इसलिए अपने यहाँ इतिहासकी परिभाषा ही दूसरी की गयी है धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् ।
पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ।। (विष्णुधर्मोत्तर ३/१५/१)
और विस्तृत एवं दीर्घकालिक विश्वका इतिहासतो रामायण-महाभारतकी भाँती ही हो सकता है और धर्म ,अर्थ,लोक-व्यवहार ,परलोक-सुखकी दृष्टिसे वही लाभकार भी सिद्ध होगा ।
भारतीय पुराण वाङ्मय प्राचीन इतिहासकी दिग्दर्शिका है , जिसे पाश्चात्य विद्वानों और तदानुयायी मिथलॉजी कहते हैं अर्थात् मिथक किन्तु पुराण का अर्थ विष्णुधर्मके उपरोक्त श्लोक (३/१५/१) से पुरातन वृत्तांत सिद्ध है ।

सनातन संस्कृतिके इतिहासको लिखना केवल नारायणकी ही सामर्थ्य है जो व्यासजी के रूप में १८ पुराण में ४००००० श्लोकोंमें संक्षिप्त ही परिचय देते हैं ,बृहद् इतिहास तो असम्भव है क्योंकि न जाने कितने कल्प ,और न जाने ब्रह्माजी बदल चुके हैं उन सबका इतिहास लिखना असम्भव है ।
भगवान् वेद व्यासजी की कृपासे मैं इस विषय पर संक्षिप्त का भी संक्षिप्तमें प्रकाश डाल रहा हूँ ।

ये तो प्रसिद्ध ही है कि १२००० दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है अर्थात् ४८०० दिव्य वर्ष का कृतयुग ,३६०० दिव्य वर्षका त्रेतायुग,२४०० दिव्य वर्षका द्वापरयुग और १२०० दिव्य वर्षका कलियुग । १ सौर वर्षका एक दिव्य दिन होता है इस प्रकार ३६० सौर वर्षोंका एक दिव्य वर्ष होता है ।

कृतयुग ४८०० दिव्य वर्ष × ३६०= १७२८००० सौरवर्ष ।
त्रेतायुग ३६०० दिव्यवर्ष ×३६०=१२९६००० सौरवर्ष ।
द्वापरयुग २४०० दिव्य वर्ष ×३६०=८६४००० सौर वर्ष ।
कलियुग १२०० दिव्यवर्ष ×३६०=४३२००० सौरवर्ष ।
एक चतुर्युग १२००० दिव्यवर्ष ×३६०=४३२०००० सौरवर्ष ।

इस प्रकार इकहत्तर (७१) चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता है जिसमें ३०६७२०००० वर्ष होते हैं ,और एक कल्प ब्रह्माजीका एक कल्प होता है जिसमें १००० चुतुर्युग होते हैं । १००० चतुर्यग में १४ मन्वन्तर होते हैं अर्थात् ९९४ चतुर्युग , शेष ६ चतुर्युग सृष्टिके प्रारंभमें सर्गके समय ही व्यतीत हो जाते हैं । १००० चतुर्युग अर्थात् ४३२००००००० वर्ष का ब्रह्माजी का दिन होता है जिसे कल्प कहते हैं ,और १००० चतुर्युगों (४३२०००००००वर्षों ) कीही रात्रि होती है जिसे अहोरात्रि कहते हैं । इस प्रकार कल्प और अहोरात्रि मिलाकर २००० चतुर्युगों (८६४००००००० वर्षों ) की एक दिन रात्रि होती है ।
इसी गणना से ब्रह्माजीकी आयु १०० वर्ष की होती है अर्थात् २ परार्धकी आयु । (३११०४०००००००००० सौर वर्ष )
वर्तमान पद्मगर्भ नामक ब्रह्माजी की उत्पत्ति ब्राह्म कल्प में हुई थी और पिछले कल्प जो कि पदम् नामका कल्प था में ब्रह्माजी ने स्वयं की ५० वर्ष पूर्ण की है । वर्तमान श्रीश्वेतवाराहकल्पमें श्रीब्रह्माजीकी आयु १५५५२१९८६७७३११७ वर्ष सौर वर्ष हो चुकी है ।

श्रीश्वेतवाराहकल्प १९८६७७३११६ सौरवर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ था ।
भगवान् श्रीहरिने वाराह रूप धारणकर १९६०८५३११७ वर्ष पूर्व पृथ्वीको रसातलसे निकालकर अंतरिक्षमें स्थापित किया था । इसी वर्ष महाराज स्वयंभू मनु जो वैराज मनु के नाम से प्रसिद्ध हैं ने ब्रह्मवर्त में राज्य प्रारम्भ किया उनकी राजधानी वरहिष्मति नगरी थी जो आजकी बिठूर है । और वाराह कल्पका प्रथम मन्वन्तर प्रारम्भ किया ।
उनके बाद स्वारोचिष ,उत्तम ,तामस ,रैवत ,चाक्षसु आदि ६ मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं ।

तामस मन्वन्तर के आदि कृतयुगमें १०३८९६५११७ वर्ष पूर्व भगवान् श्रीहरिने नृसिंह रूप धारण करके हिरण्यकश्यपका वध किया था ।

चाक्षसु मन्वन्तर के आदि कृतयुगमें ४२७२५३११७ वर्ष पूर्व भगवान् श्रीहरिने धर्म पुत्र नर-नारायणका अवतार लिया था ।

चाक्षसु मन्वन्तरके आदिकृत युग में ही देवों और दैत्योंने मिलकर ४२५५७९११७ वर्ष पूर्व समुद्र मन्थन किया और इसी वर्ष भगवान् ने कूर्मावतार लिया था ।

चाक्षसु मन्वन्तर के अंतिम कलियुगमें १२०५३३११७ वर्ष पूर्व जल प्लवन हुआ था और भगवान् श्रीहरिने मत्स्यरूप धारण कर भावी मनु सूर्य पुत्र श्राद्धदेवकी रक्षाकी थी ,इसी वर्ष सातवां मन्वन्तर वैवस्वत प्रारंभ हुआ था । मनुने सरयू नदीके किनारे अयोध्या नगरी को वसाया था ।

वैवस्वत मन्वन्तरके आदि त्रेतायुगमें ११८८०५११७ वर्ष पूर्व भगवान् श्रीहरिने अत्रि-अनुसूयाके पुत्र रूपमें भगवान् दत्तात्रेय का अवतार लिया था । इसी वर्ष मनुके ज्येष्ठ पुत्र महाराज इक्ष्वाकु का राज्य प्रारम्भ हुआ था ।

वैवस्वत मनुके चतुर्थ सत्ययुगमें १०७५७३११७ वर्ष पूर्व भगवान् श्रीहरिने अदिति-कश्यपके पुत्र रूपमें भगवान् वामनका अवतार लिया था ।

वैवस्वत मनुके पन्द्रहवे त्रेतायुगमें ५८३२५११७ वर्ष पूर्व अयोध्यामें युवनाश्व पुत्र मांधाता चक्रवर्ती सम्राट हुए ।

वैवस्वत मनुके सोलहवे सत्ययुगमें ५४०३२११७ वर्ष पूर्व प्रतिष्ठान नगरके दुष्यन्त पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए थे ।

वैवस्वत मनुके इक्कीसवे त्रेतायुगमें ३२४०५११७ वर्ष पूर्व रेणुका जगदग्निके पुत्र रूप में श्रीहरिने परशुराम अवतार लिया ।

वैवस्वत मनुके चौबीसवे त्रेतायुगमें १८१६०१५९ वर्ष पूर्व में भगवान् श्रीहरिने अयोध्या नरेश श्रीदशरथ-कौसल्याके पुत्र रूपमें भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामका अवतार लिया ।

१८१६०११८ वर्ष पूर्व श्रीरामने रावण का वध किया और श्रीरामराज्य प्रारम्भ हुआ था।

वैवस्वत मनुके अट्ठाइसवे द्वापरयुगमें भगवान् श्रीहरि मथुरामें देवकी-वसुदेवजीके पुत्र श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए ।

५१५४ वर्ष पूर्व (३१३८ ई पू में ) महाभारतका महायुद्ध हुआ था इसी वर्ष महाराज परीक्षित का जन्म हुआ था ।

१८ फ़रबरी ३१०२ ई पू (५११८ वर्ष पू ) भगवान् श्रीकृष्ण इस धरा-धामको छोड़कर गोलोक धाम चले गए । इसीदिन कलियुग प्रारम्भ हुआ था ।

३०७६ ई पू में युधिष्ठिर स्वर्गारोहण , सप्तर्षि शक् प्रारम्भ

अब कलियुगके राजवंशोंका वर्णन करूँगा ।
श्रीमहाराजा युधिष्ठिरके वंशकी ३० पीढ़ियोंने महाभारत युद्धके बाद १७७१ वर्ष तक राज्य किया ।
युधिष्ठिरवंश ३० पीढ़ी – १७७१ वर्ष – ३१३८ई पू से १३६७ ई पू तक ।
विश्रवावंश -१४ पीढ़ी – ५०० वर्ष १३६७ ई पू से ८६७ ई पू तक
वीरमहा वंश १६ पीढ़ी ४४५ वर्ष ८६७ ई पू से ४२२ ई पू तक ।
धन्धरवंश ९ पीढ़ी ३७५ वर्ष ४२२ ई पू से ४७ ई पू तक ।
महानपाल १ पीढ़ी १४ वर्ष ४७ ई पू से ३३ ई पू तक ।
विक्रमादित्य १ पीढ़ी ९३ वर्ष ३३ ई पू से ६० ई सन् तक ।
समुद्रपालवंश १६ पीढ़ी ३७२ वर्ष ६० ई सन् से ४३२ ई सन् तक ।
मलुखचन्द्रवंश ११ पीढ़ी १९२ वर्ष ४३२ ई सन् से ६२४ ई सन् तक ।
हरिप्रेमवंश ४ पीढ़ी ५० वर्ष ६२४ ई सन् से ६७४ ई सन् तक ।
अधिसेनवंश १२ पीढ़ी १५२ वर्ष ६७४ ई सन् से ८२६ ई सन् तक ।
दीपसिंहवंश ६ पीढ़ी १०७ वर्ष ८२६ ई सन् से ९३३ ई सन् तक ।
पृथ्वीराज चव्हाण ५ पीढ़ी ८६ वर्ष ९३३ ई सन् से १०१९ ई सन् तक ।
: तोमर वंश – १३४ वर्ष १०१९ ई सन् से ११५३ ई सन् तक ।
चौहानवंश ४ पीढ़ी ३९ वर्ष ११५३ ई सन् से ११९२ ई सन् तक ।

११९२ ई सन् में चौहान वंशके अंतिम सम्राट पृथ्वीराज तृतीय की वीरगति प्राप्त होने पर दिल्ली पर तुर्कोंका राज्य हो गया ।
५३ तुर्क ६५२ वर्ष तक राज्य किया ।

महाभारतयुद्धमें मगधका राजा सहदेव मारा गया उसका पुत्र समाधि मगधका राजा बना ।

वृहद्रथवंश २२पीढ़ी १००६ वर्ष ३१३८ ई पू से २१३२ ई पू तक राज्य किया ।
इस वंशके अंतिम राजा रिपुंजय को मारकर उसका मन्त्री प्रद्योत मगधका राजा बन गया उसके वंशमें ।
प्रद्योतवंश ५ पीढ़ी १३८वर्ष २१३२ई पू १९९४ ई पू तक राज्य किया ।
प्रद्योत वंशके अंतिम राजा नन्दीवर्धन को मारकर उसके ही सामन्त शिशुनागने मगध पर राज्य किया ।
शिशुनाग वंश १० पीढ़ी ३६० वर्ष १९९४ ई पू से १६३४ ई पू तक राज्य किया ।

शिशुनाग वंशके अंतिम राजा महानन्दीकी उसीके दासीसे उत्पन्न शूद्रपुत्र महापद्मनन्द ने हत्या कर दी और मगध पर अपना राज्य स्थापित किया । तब से शूद्र राजाओंका राज्य प्रारम्भ हुआ था । महापद्मनन्द वंश ९ राजा १०० वर्ष १६३४ ई पू से १५३४ ई पू तक राज्य किया ।

महापद्मनन्द वंशके अंतिम राजा सुमाल्यकी कौटिल्य नामक मारकर अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य्य को मगधका सम्राट बनाया ।
मौर्य्य। वंश १२ पीढ़ी ३१६ वर्ष १५३४ ई पू से १२१८ ई पू तक राज्य किया ।

मौर्य्य वंशके अंतिम राजा वृहद्रथ को उसीके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग ने मारकर मगध पर शुङ्ग वंश की नीव डाली इस वंशने –

शुङ्ग वंश १० पीढ़ी ३०० वर्ष १२१८ ई पू से ९१८ ई पू तक राज्य किया ।
इस वंश के अंतिम राजा देवभूतिको उसके वासुदेव नामक आमात्यने मारकर मगध पर कण्व वंश की नीव रखी ।

कण्व वंश ४ पीढ़ी ८५ ९१८ ई पू से ८३३ ई पू तक राज्य किया ।
कण्व वंशके अंतिम राजा सुशर्मा कण्व की उसके आंध्र जातीय भृत्य शिमुक (सिंधुक) हत्या कर दी और स्वयं मगध का राजा हुआ ।
आंध्रभृत्यों सातवाहनोंका राज्य
आंध्र ३३ पीढ़ी ५०६ वर्ष ८३३ ई पू से ३२७ ई पू तक राज्य किया ।

२००० ई पू से १९०० ई पू तक १०० वर्षों तक बारिश न हुई जिससे भीषण अकाल पढ़ा नदियों का जलस्तर घटा और कई नदियां लुप्त हो गयीं । यमुना ने अपना मार्ग बदल दिया पश्चिम से उत्तर की और बहने लगी। और सरस्वती नदी भू-गर्भ में समा गयीं , प्रयाग में अदृश्यरूप से एक धारा विद्यमान रही । जिसके परिणाम स्वरूप महान् सिंधु-सरस्वती सभ्यता १८०० ई पू तक विलुप्त हो गयी ।
१९०० ई पू में माँ भगवती दुर्गा ने अपना शताक्षी या शाकम्भरी अवतार धारण किया था ! जिनके १०० नेत्र थे जिनसे निरन्तर जल बरसाया और भारत वासियोंकी रक्षा की ।

पश्चिम में सेनेटिक जातिके असुरोंने इसी समय अपनी शक्ति बढ़ा ली थी जिनके आक्रमण भारत और अन्य देशों पर होते रहे । इन्हीं असुरोंको भ्रमित करने के लिए भगवान् विष्णुने २१०१ ई पू में अजिन पुत्रके रूप में बुद्ध अवतार धारण किया और असुर देश जाकर असुरों को भ्रमित किया । और मिश्र-अरब देश जाकर असुरोंको वैदिक धर्ममें दीक्षित किया । भगवान् बुद्ध २१०० ई पू से १९८० ई पू तक भारत में रहे।

वैदिक यज्ञोंमें असुरोंने हिंसा प्रारम्भ कर दी जिसके परिणाम स्वरुप हर घर कसाईखाना हो गया । जीव हिंसा से आंदोलित पृथ्वीको शांत करने के लिए भगवान् विष्णुने २४वे बुद्धके रूप में अवतरित हुए ।
गौतम बुद्ध २४ वे बुद्ध थे जिनका जन्म १८८७ ई पू में हुआ था ।

गौतम बुद्ध ने असुरोंको वेद-विमुख कर ,वेद उनसे लेकर बद्रिकाश्रममें ऋषियोंको प्रदान किये । १८०७ ई पू में गौतम बुद्ध का निर्वाण हुआ ।

निरन्तर १००० वर्षों तक बोबिलोनियांमें शासन करते हुए असूरोंकी शक्ति बढ़ चुकी थी । उनके अत्याचार भी पराकाष्ठा पर पहुँच चुके थे । असुरोंका साम्राज्य मिश्रसे ईरान तक फैला हुआ था । अब उनके आक्रमण भारत पर होने लगे थे ।

८२४ ई पू में असुर मथुरा तक बढ़ आये थे जिनको चेदि वंशी कलिंगराज खारवेलने पराजित करके भारतसे बाहर खदेड़ दिया ।

७५७ ई पू में पुनः भारत पर आक्रमण किया ,इस बार उज्जैनके वीर महाराज शूद्रकने असुरों को पराजित करके भारतमें टिकने नही दिया । शूद्रक विक्रमादित्य ने ने ७५७ ई पू में शूद्रक सम्वत् प्रारम्भ की ।

७२५ ई पू में मालव सम्वत् प्रारम्भ हुई थी ।

उनके अत्याचारोसे आक्रान्त जातियाँ यवन,शक,मेंद ,किम्पीरियन ,सुमेरियन आदि ने ७०० ई पू में भारतमें भारतमें शरण ली । ये जातियाँ भारतीय मूल की ही थीं ।
६५० ई पू में वसिष्ठ ऋषिने आबू पर्वत पर यज्ञ करके इन व्रात्य हुई जातियोको पुनः सनातन धर्मकी मुख्य धारा में लाकर इन्हें असुरों पर प्रत्याक्रमण हेतु तैयार किया ।

असुरों पर प्रथम आक्रमण ६५० ई पू में राजा प्रतिहारके नेतृत्वमें हुआ था ये आक्रमण प्रतिरक्षात्मक था इसलिए ये वीर राजपूत भारतका प्रतिहार कहलाया ।
६३४ ई पू में पाटणके राजा चालुक्य और ६३० ई पू में आबूधारके राजा परमारके नेतृत्वमें असुर साम्राज्य पर आक्रमण किया किन्तु सफलता नहीं मिली ।

६२६ ई पू में महिष्मती नरेश चौहान के नेतृत्व में जो आक्रमण हुआ उसमे असुर साम्राज्य बिखर गया और बोबिलोनियां को असुरोंसे मुक्त करा लिया था । ६१२ ई पू में राजा चौहान ने असुरोंकी राजधानी निनेवे को नष्ट भ्रष्ट कर दिया ये आक्रमण इतना भयानक था कि न ही असुर साम्राज्य बल्कि समूची असुर जातिका नाम विश्वके राजनैतिक मानचित्र से सर्वदा के लिए मिट गया इस विजय की उपलब्धि में महाराज चौहानने ६१२ चाप शक् (चापहानि) प्रारंभ की ।

शक् राजा साइरस ने ५५० ई पू में शक् सम्वत् प्रारम्भ की जिसका वर्णन वाराह मिहिर ने युधिष्ठिर शक् २५२६ में किया है ।

जब बौद्धोंसे भारतवर्ष आप्लावित हो गया तब ५०७ ई पू में मालावार प्रांतमें माँ आर्यम्बा देवीके गर्भ भगवान् शङ्कर का प्राकट्य हुआ और समस्त भारतवर्ष (तिब्बतसे कन्याकुमारी ,आसामसे कम्बोज-बल्ख़ तक)वैदिक हिन्दू धर्म के ध्वज तले ला दिया था । ४७५ ई पू में मात्र ३२ वर्षकी आयुमें शिवलोक गमन किया ।

उज्जैन के सम्राट श्रीहर्ष विक्रमादित्य द्वारा श्रीहर्ष सम्वत् प्रारम्भ ४५७ ई पू ।

३२६ ई पू में भारत पर ग्रीक् सिकन्दर ने आक्रमण किया किन्तु केकय नरेश वीर पुरूने बुरी तरह पराजित करके भारतसे लौटने को विवश कर दिया । पुरूका साथ देने के लिए भारतके सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम विजयादित्य ने अपने पुत्र वीर समुद्रगुप्त को भेजा था ।

३२७ ई पू में चन्द्रगुप्त प्रथम विज्यादित्यने गुप्त वंशकी स्थापना की और भारतको पुनः अखण्ड बनाया ।

गुप्तवंश ७ पीढ़ी २४५ वर्ष ३२७ ई पू से ८२ ई पू तक राज्य किया ।

३०६ ई पू में ग्रीक सिकन्दरके सेनापति सेल्युकस निकेटर ने भारत पर आक्रमण किया , एक बार पुनः वीर समुद्रगुप्त अशोकादित्यने ग्रीकोंको पराजित करके भारतमें घुसने नही दिया ! इसबार समुद्रगुप्त भारतके सम्राट थे । सेल्युकस अपनी पुत्री हेलेना का विवाह समुद्रगुप्त से करके और
सन्धि करके वापस लौट गया ।

१८७ ई पू में हूणोंने आक्रमण किया , सम्राट स्कन्दगुप्त पराक्रमादित्य ने उसको बुरी तरह पराजित किया था ।

८२ ई पू में महान् विक्रमादित्य े उज्जैन में सिन्हासन् पर बैठे ।
५७ ई पू में शकों को भारतसे बाहर खदेडा और समस्त प्रजा का ऋण क्षमा करके सम्वत् प्रारंभ की । सम्राट विक्रमने १८ ई तक राज्य किया ।
विक्रमके बाद उनके पूत्र देवभक्त ने १८से २८ ई तक १० वर्ष राज्य किया । उनके बाद उनके पुत्र ने ४९ वर्ष २८ ई से ७७ तक राज्य किया । उनके पुत्र शालिवाहन ने ७७ ई से १३७ ई तक ६० वर्ष राज्य किया और ७८ ई में शालिवाहन शक् प्रारम्भ की ।

विक्रमादित्य के बाद खण्डित हुए भारतवर्ष को पुनः अखण्ड बनाने का प्रयास कई वंशोंने किया किन्तु पूर्ण रूपसे सफल नही हुए ।

इन्ही वंशो में भारशिववंशके वीरसेनने स्थापना की
पीढ़ी ७ १७५ वर्ष १४० ई से ३१५ ई तक ।

उसके बाद प्रवरसेन प्रथम ने वाकाटक वंशकी स्थापना की
वाकाटक वंश ७ पीढ़ी १८५ वर्ष ३१५ ई से ५०० ई तक ।

सन् ४४१ से ४७७ ई तक कश्मीर के सम्राट ललितादित्य मुक्तापिढ़ ने दिग्विजय की थी और उत्तर कुरु वर्ष (रूस तक ) साम्राज्य स्थापित किया था

इसके बाद १०० वर्षों तक कोई सम्राट नहीं हुआ । दक्षिण में अवश्य चालुक्यों ने दक्षिणको एक सूत्रमें पिरोया ।

६०६ ई से ६५५ ई तक कन्नौज और स्थाणेश्वर के सम्राट हर्षवर्धनने पुनः भारत को एक छत्र किया था । किन्तु ६३४ ई में पुलकेशिन द्वितीय से पराजित हुए इसी समय उज्जैन के विक्रमादित्यके वंशज दिग्विजयी सम्राट भोज परमार हुए । जिन्होंने अरब तक विजय प्राप्तकी थी ।
भोज परमार ५० ६३० ई से ६८० ई तक ।

उनके बाद ४० वर्षों तक कोई सम्राट भारतको एकजुट न कर सका । ७२० ई में यशोवर्मन ने उज्जैन पर राज्य स्थापित किया और सम्पूर्ण उत्तरापथ को एकजुट किया था ।
यशोवर्मन ने ७२० ई से ७५० ई तक ३० वर्ष राज्य किया ।
वीर नागभट्ट प्रथम प्रतिहारने ७३८ ई में बप्पा रावल के साथ मिलकर अरबों को हराया था ।
दूसरी बार पुनः ७५४ ई में अरबों को हराया था उसके बाद अरबो ने कभी आक्रमण नही किया ।
प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट प्रथम ने ७३० ई में की थी
प्रतिहार वंश १० पीढ़ी २१५ वर्ष ७३० ई से ९४५ ई तक राज्य किया ।

प्रतिहार वंशके बाद २०० वर्षों तक कोई भारतका सम्राट नही हुआ , यद्यपि अनेक शक्तिशाली राजा थे किन्तु एकछत्र राज्यकी स्थापना नही कर सके ।
११४२ से ११७२ तक राज्य करने वाले विश्वेश्वर कुमारपाल सोलंकी ने मद्यएशिया तक विजय प्राप्त की थी और भारतके शक्तिशाली सम्राट बने । ११५३ ई से ११७ ई तक अजमेर के विग्रहराज चौहान चतुर्थ ने भारतवर्षको एक बार पुनः एकछत्र किया था । इन्ही के भतीजे पृथ्वीराज चौहान तृतीय ११७७ से ११९२ ई तक सबसे महान् और अंतिम दिग्विजयी सम्राट थे । मोहम्मद शाहबुद्दीन ग़ौरी को १७ बार पराजित करके सम्पूर्ण भारतवर्ष में धाक जमा दी थी । उन्होंने सम्पूर्ण भारतसे कर प्राप्त किया था । अरब और तुर्क उनके नाम से भी काँपते थे । ११९२ ई में छल से मोहम्मद ग़ौरी ने उन्हें बन्दी बना लिया और तब से भारतमें इस्लामी राज्य प्रारम्भ हुआ ।

* ऊपर की सौर गणना ३६० दिन का एक सौर वर्ष बिल्कुल सही है ( ३६५ .१/४ दिन का सौर वर्ष होता है इसलिए लोग ग़लत गणना समझेंगे )
किन्तु ८००० वर्ष पूर्व पुराणोंके संकलन कालमें पृथ्वी अपने अक्ष पर २२.१ डिग्री झुकी हुई थी इसलिए ३६० दिन का सौर वर्ष होता था ।
वर्तमानमें पृथ्वी अपने अक्ष पर २३.५ डिग्री झुकी है इसलिए ३६५.१/४ दिन का सौरवर्ष होता है।

११८०० ई सन् में (९८०० वर्ष बाद) पृथ्वी अपने अक्ष पर २४.५ झुक जाएगी तब ३६८ दिनका सौर वर्ष होगा ।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *