राजनीति को नए आयाम प्रदान करने वाले स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी

22 मई पुण्यतिथि पर विशेष –

दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्रता पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

आज भारतीय राजनीति व देश की संसदीय परंपराओं को नया आयाम प्रदान करने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, निडर राजनेता, स्वत्रंत भारत के सांसद, केन्द्रीय मंत्री व अपनी बेबाक शैली के लिए देश में प्रसिद्ध कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेता महावीर त्यागी की पुण्यतिथि है, आज हम देश की इस अनमोल धरोहर व महान हस्ती के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरणों को याद करते हुए इस महान विभूति को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री आदि के साथ बैठकर देश की हालात पर चर्चा करने वाले और देश के लिए भविष्य की नीतियों का निर्धारण करने वाले कुशल व मिलनसार व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे महावीर त्यागी। देश के महान स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी का देश को अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने में बहुत ही अहम योगदान रहा है। वो देश की आजादी के संघर्ष के दौरान कई बार लम्बे समय तक जेल में रहे हैं।

जीवन परिचय :-
बिजनौर जनपद के नूरपुर क्षेत्र के रतनगढ़ गांव निवासी महावीर त्यागी का जन्म 31 दिसंबर 1899 को मुरादाबाद जनपद के ढबारसी गांव में हुआ था। इनके पिता शिवनाथ सिंह जी गांव रतनगढ़ जिला बिजनौर के एक प्रसिद्ध ज़मीदार थे, इनकी माता जानकी देवी जी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। वो एक अनूठे व्यक्तित्व के बेहतरीन इंसान थे। मेरठ में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान प्रथम विश्व युद्ध के समय वो सेना की इमरजेंसी कमीशन में भर्ती हो गए और उनकी तैनाती पर्सिया यानी ईरान में कर दी गयी। आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी जी के पद चिन्हों पर चलते हुए उनसे प्रभावित होकर, वो कांग्रेस के एक बहुत कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में आजादी के आंदोलन में कई बार जेल गए। महावीर त्यागी का विवाह 26 जुलाई 1925 को बिजनौर जनपद के गांव राजपुर नवादा के ज़मीदार परिवार की बेटी शर्मदा त्यागी से हुआ था, इनकी तीन पुत्रियां है। इनकी पत्नी शर्मदा भी पहले से ही देश सेवा में लगी हुई थी और वो 1937 में देहरादून से संयुक्त प्रांतीय असेंबली के लिए चुनी गयी थी। हालाँकि असेंबली के लिए चुने जाने के एक वर्ष के बाद ही उनका निधन हो गया था। लेकिन पत्नी के निधन के बाद भी महावीर त्यागी जी का देश सेवा का जज्बा पूर्ण जोश के साथ कायम रहा और वो लगातार देश सेवा करते रहे।

महावीर त्यागी जब तक जिंदा रहे हमेशा अपने जीवन में अपने आदर्शों पर दृढतापूर्वक अडिग रहे। चाहें वो लम्बे समय तक अंग्रेजों की जेल में रहे, लेकिन फिर भी कभी उन्होंने अपने जीवन में विकट से विकट परिस्थितियों में भी सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया था। वो देहरादून में बेहद लोकप्रिय थे, महावीर त्यागी को जनता के द्वारा “देहरादून का सुल्तान” की उपाधि से नवाजा गया था, देहरादून उनका अपना कार्यक्षेत्र था। देहरादून, बिजनौर (उत्तर-पश्चिम), सहारनपुर (पश्चिम) लोकसभा क्षेत्र से वर्ष 1952, 57 व 62 में सांसद रहे महावीर त्यागी, वर्ष 1951 से 53 तक वह केन्द्रीय राजस्व मंत्री रहे। वर्ष 1953 से 57 तक त्यागी जी मिनिस्टर फार डिफेंस ऑर्गेनाइजेशन (1956 तक पंडित नेहरू के पास रक्षा मंत्री का कार्यभार भी था) रहे। उनके कार्यकाल के दौरान ही देश में रक्षा सम्बंधी सामान बड़े पैमाने पर बनाने का कार्य शुरू हुआ था। वर्ष 1957 के बाद भी वह विभिन्न कमेटियों और पुनर्वास मंत्रालय आदि में रहकर देश सेवा करते रहे।

जीवन के यादगार संस्मरण :-
वर्ष 1919 में जब देश में जलियांवाला बाग का जघन्य हत्याकांड घटित हुआ था, उस समय देश में हर तरफ अंग्रेजों के खिलाफ नफरत का ऐसा भयानक ज्वार उठा था, कि महावीर त्यागी भी अपनी फौज की नौकरी से इस्तीफा देकर चले आए थे। हालांकि बाद में अंग्रेजी सेना ने सजा के रूप में उनका कोर्ट मार्शल भी कर दिया था। लेकिन जलियांवाला बाग की घटना के बाद वो महात्मा गांधी जी के साथ देश की आजादी के आंदोलन में पूर्ण रूप से कूद गए थे। महावीर त्यागी को आजादी के आंदोलन के समय अंग्रेजों के द्वारा 11 बार गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था। हालांकि वो देश पर सब कुछ कुर्बान करने की मंशा के साथ ही देश की आजादी की इस जंग में उतरे थे।

महावीर त्यागी जी की उस वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में बहुत अच्छी पकड़ थी। महावीर त्यागी जी को एकबार किसान आंदोलन के दौरान बुलंदशहर में चार हजार लोगों की एक सभा को सम्बोधित करते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था, उनको गिरफ्तार करके अंग्रेजों के द्वारा भयानक यातनाएं दी गईं थी। तो अंग्रेजों के इस कृत्य की महात्मा गांधी जी ने यंग इंडिया में लेख लिखकर जबरदस्त आलोचना की थी। हालांकि उस वक्त उन पर इतनी यातनाओं की वजह बुलंदशहर के अंग्रेज मजिस्ट्रेट की उनसे व्यक्तिगत नाराजगी थी, जिसने उन पर देशद्रोह का मामला लगा दिया था और पूरी कोशिश थी कि महावीर त्यागी जी की चौधराहट वाली अकड़ को हमेशा के लिए खत्म कर सके, लेकिन बुलंद हौसले वाले व अपने जीवनकाल में एक सैन्य अधिकारी रहने वाले निड़र महावीर त्यागी जी को ना तो अंग्रेजों के आगे झुकना कुबूल था और ना ही अंग्रेजों से माफी मांगना कुबूल था। अंग्रेज मजिस्ट्रेट के साथ उनकी तनातनी और उन पर होने वाले अत्याचारों के चलते ना केवल देश की जनता की सुहानुभूति उनके साथ हुई बल्कि कांग्रेस के बड़े दिग्गज नेताओं की नजर में अब वो सीधे आ गए थे। वो जेल में मोतीलाल नेहरू के साथ भी बंद रहे थे और उनसे उनके अच्छे संबंध थे।

कांग्रेस में होने के बाद भी महावीर त्यागी के रिश्ते उस समय कांग्रेस के विरोधी रहे क्रांतिकारियों के साथ भी बहुत अच्छे थे, उनके सबसे करीबी थे सचिन्द्र नाथ सान्याल, जिनके संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में ही चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को आगे बढ़ाया था।

लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो आज देश के संसदीय इतिहास में महावीर त्यागी सरीखे व्यक्तित्व वाले नेताओं का पूर्ण रूप से अभाव है, अब तो देश की राजनीति में चाटूकारों का जलवा है, आज के समय में हम देशवासियों को देश की राजनीति में कही भी महावीर त्यागी की तरह के ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी स्पष्टवादी बेबाक शैली वाले तथ्यों के आधार पर अपने ही दल का विरोध करने वाले सच्चे राजनेता नजर नहीं आते हैं। महावीर त्यागी जी को अपने जीवनकाल में सरकार व सामाजिक जो भी दायित्व मिला उन्होंने हमेशा उसका पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी के साथ निर्वाह किया। वो सविधान सभा, लोकसभा, राज्य सभा व मंत्री व अन्य सभी पदों पर रहते हुए भी हमेशा अपने आदर्शों पर दृढसंकल्प के साथ अडिग रहे। देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में त्यागी जी का व्यक्तित्व बड़ा ही आकर्षक था, वो बेहद बेबाक शैली के हाजिरजवाब, सत्य के प्रहरी, ईमानदार, भावुक और निडर व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने जिस तरह से देश की स्वतंत्रता से पूर्व के बहुत सारे जन आंदोलनों में देश सेवा के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश की आजादी के लिए बहुत लम्बा कारावास भी भुगता उसके लिए देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा।

वो देश की पहली नेहरू सरकार में केंद्रीय राजस्व मंत्री रहे थे, महावीर त्यागी जी का उस समय उत्तर प्रदेश के देहरादून इलाके में कोई सानी नहीं था, सारा जिला त्यागी जी का अपना एक घर के समान था, वो आम जनमानस के बीच बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय थे, उन्हें जो अनुचित लगता था उसका वो तर्कसंगत ढंग से जबरदस्त रूप से विरोध भी करते थे, मगर वो कभी भी अपने मन में किसी के प्रति कोई द्वेष भाव ईर्ष्या और दुराग्रह नहीं रखते।

इसी तरह जब संसद में बहस होती थी महावीर त्यागी जी हमेशा अपनी तार्किक बातों से सभी का ध्यान आकर्षित कर लेते थे, सभी उनको बेबाकी से पूर्ण वक्तव्यों को सुनने के लिए आतुर रहते थे। उनकी बेबाकी के बारे में एक वाकया बहुत प्रसिद्ध है कि वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध को लेकर जब संसद में बहस चल रही थी। उन दिनों “अक्साई चिन” के चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने जबरदस्त हंगामा काट रखा था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू जी ने कभी नहीं सोचा होगा कि इस मसले पर विरोध में सबसे बड़ा चेहरा उनके अपने ही मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य महावीर त्यागी के रूप में होगा। इस मसले पर जवाहर लाल नेहरू ने जब संसद में ये बयान दिया था कि “अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है इसलिए हमने छोड़ दिया है,” तो उस समय संसद में महावीर त्यागी जी ने अपनी टोपी उतारकर गंजा सिर नेहरू जी को दिखाया और कहा- यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं। सोचिए इस तार्किक जवाब को सुनकर पूरी संसद व नेहरू जी का क्या हाल हुआ होगा?
क्या आज के समय में कोई राजनेता अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से ऐसा कह सकता है।

लेकिन यह भी सही है कि आज अगर ऐसे लोग सरकार में मंत्री हों तो विपक्ष की किसी को भी जरूरत नहीं पड़े। महावीर त्यागी जी ने हमेशा यह साबित किया कि उनके लिये व्यक्ति पूजा के बजाय देश की पूजा महत्वपूर्ण है। उनको देश की एक इंच जमीन भी किसी को देना गवारा नहीं था, चाहे वो बंजर ही क्यों ना हो। उनके लिए हमेशा देशहित सर्वोपरि था।

महावीर त्यागी जी व्यक्ति पूजा के बहुत खिलाफ रहते थे और वो व्यक्ति पूजा के खिलाफ कांग्रेस पार्टी में बोलने वालों में सबसे आगे थे। उन्होंने ही इंदिरा गांधी जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने का बकायदा पत्र लिखकर विरोध किया था और उस समय की राजनीति के सिद्धांत देखों बाद में उन्हें उसी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही साल 1968 में महावीर त्यागी को पांचवें वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया और सन,1970 में राज्यसभा सदस्य बनाकर संसद भेजा। साल 1976 में महावीर त्यागी ने सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लिया था।

लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में सत्ता पक्ष के नेताओं का किसी भी मुद्दे को लेकर एक हो जाना आम है, अब कोई भी व्यक्ति अपनी सरकार का मुद्दों पर आधारित विरोध करने की भी हिम्मत नहीं रखता है। वही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार में शामिल रहे स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी ऐसे व्यक्ति थे, जो कई मुद्दों पर देश व समाज हित में अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने में पीछे नहीं रहते थे। उनका भारतीय संसद की गरिमा को एक नया आयाम देकर ऊंचाईयों पर पहुंचाने में बहुत अहम अनमोल योगदान रहा है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की सरकार में वित्त, राजस्व और रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभालने वाले महावीर त्यागी जी 1967 का लोकसभा चुनाव एकदम अंजान नए चेहरे और निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह से हार गए थे। उस समय कांग्रेस के इस दिग्गज नेता महावीर त्यागी के लिए यह चुनाव आखिरी चुनाव साबित हुआ था। उसके बाद वो फिर कभी चुनाव नहीं लड़े थे।

महावीर त्यागी जी वर्ष 1962 से 64 तक संसद की लोक लेखा समिति के चेयरमैन रहे। जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते में हाजी पीर दर्रा जैसे कुछ सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्थानों को पाकिस्तान को लौटाने की अनुमति देने पर महावीर त्यागी ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा के मंत्रीमंडल में पुनर्वास मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था, नंदा ताशकंद समझौते के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी के निधन के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने थे। महात्मा गांधी जी का सानिध्य पाने वाले महावीर त्यागी, सरदार पटेल, पंडित जवाहर लाल नेहरू, रफी अहमद किदवई और मदनमोहन मालवीय जी के भी बेहद करीबी रहे। उन्होंने देश में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का जबरदस्त विरोध किया था।

जब वो देश की आजादी के बाद लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें जवाहर लाल नेहरू की केबिनेट में “मिनिस्टर ऑफ रेवेन्यू एंड एक्सपेंडीचर” बनाया गया था। तो उस समय की उनके नाम पर एक दिलचस्प उपलब्धि आज भी इतिहास में दर्ज है, इस पद पर रहते उनकी यह बेहद खास उपलब्धि थी। आज देश की हर सरकार काला धन वापस लाने के लिए समय-समय पर तरह-तरह की “वोलंटरी डिसक्लोजर स्कीम” लेकर आती है, आपको जानकर यह हैरानी होगी कि वो स्कीम पहली बार देश में महावीर त्यागी जी ही लेकर आए थे। त्यागी जी ही वो पहले व्यक्ति थे, जिसने केरल की ईएस नम्बूरापाद की सरकार को धारा 356 लगा कर गिराने का विरोध किया था। बेबाक राय रखने वाले महावीर त्यागी जी को वो बयान भी काफी चर्चित रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “अगर कांग्रेस जाति या संम्प्रदाय की राजनीति में पड़ती है, तो वो अपनी कब्र खुद ही खोद लेगी।” उन्होंने पांचवे फाइनेंस कमीशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए, देश की वित्त और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण कई सुधार किए थे। अपनी जिंदगी के आखिरी समय तक वो राजनीतिक व्यवस्थाओं में लगातार सुधार के लिए काम करते रहे थे, उन्होंने एक कांग्रेसी होने के नाते न केवल जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन पर सवाल उठाए थे, बल्कि इंदिरा गांधी जी द्वारा देश में लगायी गई इमरजेंसी पर भी उन्होंने जमकर निशान साधा।

वैसे उनके देशप्रेम से ओतप्रोत बहुत सारे किस्से बहुत मशहूर है। लेकिन अफसोस यह है कि ऐसी महान शख्सियत के साथ देश के इतिहासकारों व सरकार ने बहुत ज्यादा अन्याय किया है जो व्यक्ति सही मायनों में भारत माता का सच्चा सपूत था और देश के सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” का हकदार था, लेकिन उनको न तो आज तक किसी सरकार ने और न ही भारत के आजादी के इतिहास में उनका तय सम्मान मिला है।

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महावीर त्यागी जी का स्वर्गवास 22 मई 1980 को नई दिल्ली में हो गया था, इस दिन यह महापुरुष हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया था, आज पुण्यतिथि पर हम उनको कोटि-कोटि नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।
।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान।।

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