सेकुलर संविधान का सारा बोझ किसके ऊपर

झारखण्ड मे एक फल विक्रेता का बोर्ड हटा कर उसपर नफरत फैलाने का केस दर्ज कर दिया। पूरे देश मे कोरोना रक्षको पर पत्थर फेंके गए। पालघर मे संतो की नृशंस हत्या कर दी गई। परन्तु बुद्धिजीवी चुप हैं।

मुसलमानों के लिए1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाकर किया और कांग्रेस नें इसे अधिक स्वायत्त, निरंकुश और संवैधानिक कट्टर प्रारूप प्रदान करके देश को दो हिस्सों में फिर से बांटने की नींव रख ही दी जो फिर से मुस्लिम और गैर मुस्लिम बँटवारे का ही अब प्रत्यक्षदर्शी जेहादी सूत्रधार सिद्ध हो चुका है .

” यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, मेहर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है,,आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान उन स्थानों में सुन्नी कानून से अलग है जहां बाद में सुन्नी कानून से शिया कानून अलग हैं. हालांकि, वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया…जो कि स्पष्टत: इस्लामिक अलगाववादिता की भारतीय नागरिकों में धार्मिक मान्यताओं और धर्मानुसार भेद करने का घृणित उदाहरण है और भारत के संविधान की मूल भावना समेत समानता के अधिकार तक का अपमान है तथा 1947 में धार्मिक आधार पर विभाजित स्वयं भारत व हर बहुसंख्यक का अपमान है…!!

पूर्वी यूरोप ने तो मुस्लिम आव्रजन पर पूरी पांबदी लगा दी है। आरके ओहरी की पुस्तक ‘लांग मार्च ऑफ इस्लाम’ में दुनिया के जेहादी आंदोलनों का लेखा-जोखा है। जब दुनिया में मुस्लिम आबादी 18 प्रतिशत थी तो केवल सात देशों में जेहाद चल रहा था। आज यह आबादी बढ़कर 22 प्रतिशत हो गई है तो तीस देश जेहाद की मार झेल रहे हैं। सीरिया, लेबनान, बोस्निया, कोसोवो इसके उदाहरण हैं।

याद रहे कि भारत विभाजन भी जेहादी सिद्धांत पर हुआ था। मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव में भी जेहाद का उल्लेख था। फिर भारत में कश्मीर या बंगाल को भारत से अलग करने की बात भी केवल मुस्लिम संख्या बल के आधार पर ही की जाती रही है। तब क्या दुनिया के एकमात्र हिंदू देश भारत को फिक्र नहीं करनी चाहिए कि यहां जनसांख्यिकी और न बिगड़े? यहां के मुसलमान पहले ही अपने लिए एक अलग देश तक ले चुके हैं। ये बातें कोई सांप्रदायिकता, असहिष्णुता नहीं, बल्कि अपना धर्म और देश बचाने की चिंता है। इससे आंख चुराने को प्रगतिशीलता कहा जा रहा है। वास्तव में इसी कारण बंगाल और दिल्ली की हिंसा पर चुप्पी साधी जा रही है। यह एक सुनियोजित साजिश ही है कि पहले लोगों को उकसाया गया, फिर जब वे हिंसा पर उतरे तो अराजकता फैलाने वालों के बजाय पुलिस और सरकार को कोसा जा रहा है।

यह दुखद है कि सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिक जिस पीड़ा, अन्याय और भेदभाव की चिंता सारी दुनिया के लोगों के लिए करते हैं, वह सौ वर्षों से हिंदू भी झेल रहे हैं, किंतु हमारे विचित्र बौद्धिक इन्हें अपने हाल पर छोड़ अपना आक्रोश और दुख बाकी हरेक के लिए व्यक्त करते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि व्यक्ति की तरह हर देश की भी अपनी आत्मा और नियति होती है। भारत की आत्मा और नियति हिंदू धर्म से जुड़ी है। इसकी रक्षा और चिंता करना किसी सच्चे भारतीय का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। यह हमारे देश ही नहीं, विश्व के हित के लिए भी जरूरी है, लेकिन उसकी अनदेखी करने को ही बौद्धिकता का पर्याय बना दिया गया है।
लगभग 2 साल पहले मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के उपाध्यक्ष और डिप्टी ग्रैण्ड मुफ्ती नासिर उल इस्लाम का कहना है कि समय आ गया है कि हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमान अपने लिए अलग देश की मांग करें। जो लोग कहते हैं कि यह देश हिन्दुओं के लिए है तो फिर ठीक है। हिन्दुस्तान का एक और हिस्सा कर दीजिए और हिन्दुस्तान के मुसलमानों को एक और मुल्क बनाने दीजिए। मुफ्ती नासिर यही नहीं रुके उन्होंने आगे कहा कि ‘‘जो फैसला उस समय मुसलमानों ने लिया वह सही फैसला था। हिन्दुस्तान में उनके लिए कोई जगह नहीं है किसी भी जगह उनकी नुमाइंदगी नहीं है। उनका कहना था, उस समय सिर्फ 7 करोड़ मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाया। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमानों की हालत ऐसी ही रही तो फिर आज 20 करोड़ मुसलमान दूसरा देश क्यों नहीं बना सकते?

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