विद्या ही संसार की प्रथम औषध है

सृष्टि के आदिकाल से ही परमसत्ता ईश्वर ने चार ऋषियों के हृदय में वेद ज्ञान का प्रकाश किया । ये चारों ऋषि (अग्नि ,वायु , आदित्य , अंगिरा) अन्य ऋषियों में श्रेष्ठतम थे। इन चारों ऋषियों ने योनिज सृष्टि में प्रथम मानव, आदिऋषि ब्रह्मा आदि को अपने ज्ञान से उनके हृदय को प्रकाशित किया अर्थात् वेद ज्ञान दिया। यही परंपरा श्रुति के रूप में प्रतिस्थापित हो गई और भावी पीढ़ी वेद ज्ञान को ग्रहण करती चली गई। समयानुसार आलस्य और प्रमाद के कारण आर्य परंपरा में भी कुछ गिरावट आ गई थी। तब तत्कालीन ऋषियों ने परमात्मा के संविधान को लेखनी बद्ध किया ।

जिससे वेद की विशुद्धता बनी रहे। वेद अपौरुषेय है ,अतः स्वत: ही प्रमाण है। अन्य सभी पन्थ ,मत ,मजहबी ग्रन्थ परत: प्रमाण है। वेद ज्ञान से ही हमारी धर्म संस्कृति का एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 122 वर्ष हो चुके हैं। अन्य सब ग्रन्थ 400 से 4 हजार वर्ष की देन हैं , क्योंकि महाभारत के बाद अधिकांशतः विद्वान एवं योद्धा मारे गए एवं कतिपय स्वार्थी तत्वों ने अपने पुजापा के कारण अनेक मत पंथो को जनता पर थोप कर अंधकूप में डाल दिया। अन्य मत पंथों में कुछ -कुछ धर्म व ईश्वर की चर्चा तो होती है परंतु इनमें किसी भी प्रकार से विज्ञान नहीं है।

आप भली-भांति जानते हैं कि बाइबिल में लिखा है कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है। उस काल के ईसाई मिशनरी के वैज्ञानिक गैलीलियो ने बताया कि पृथ्वी सौर परिवार का सदस्य है। तब वहां के पोप ने गैलीलियो को जेल में डालकर कठोर यातनाएं दीं एवं कहा कि बाइबिल में जो लिखा है वही अंतिम सत्य है। इसी प्रकार कुरान के मानने वालों ने जो कहर बरसाया है , वह किसी से अब छिपा नहीं है। सारा संसार कोरोना वायरस का सामना कर रहा है। परंतु अविद्या के कारण वे कह रहे हैं कि कोरोना तो कुरान से निकला है । अतः वह तो हमारा भाई है। अल्लाह ताला ने भेजा है, हमें कुछ नहीं होगा। यदि यह थोड़ा सा भी विद्या से विभूषित होते तो इतने घटिया काम नहीं करते।

महर्षि दयानन्द एवं वैदिकानुसार विद्या – ईश्वर से लेकर पृथ्वी पर्यन्त पदार्थों का सत्य विज्ञान होकर उनसे यथा योग्य उपकार लेना ही विद्या है अर्थात् यथार्थ ज्ञान ही विद्या है। जो इसके विपरीत है उसे अविद्या जानना चाहिए। अतः वेद ही वह आदि धर्म ग्रन्थ है जिसमें पदार्थ विद्या, रसायन, आकाश, अंतरिक्ष, द्युलोक, भूलोक, भूगर्भ, जीव, वनस्पति, विद्युत, तार विद्या, विमान अंतरिक्ष विद्या आदि का सम्पूर्ण ज्ञान है।

महर्षि दयानन्द ने वेदों के भाष्य में विमान विद्या (वायुयान) का वर्णन किया है कि उसमें कितने कील, पेंच और खिड़की लगी होती हैं और आगे लिखते हैं कि राजा भोज के काल तक भी हमारे यहां विमान चलते थे। राजा भोज, प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य के प्रपौत्र के वंशज थे। जबसे आर्य आलस्य और प्रमोद के रोगी हो गए, तभी से आर्यावर्त्त का निरन्तर ऐसा पतन हुआ कि आर्यावर्त्त भी भारत, हिंदुस्तान और अब इंडिया तक का सफर तय कर चुका है। आज के भारत को किसी समय भूमण्डल के सम्राट के नाम से जाना जाता था।

आज संसार जिस दौर से गुजर रहा है यह बहुत ही भयानक मन्जर है। यदि इसी प्रकार समस्त भूमण्डल मत पन्थों, संप्रदायों, मजहब में बंटा रहा और प्रत्येक पन्थ अपने को ही श्रेष्ठ समझता रहा तो वह दिन दूर नहीं, बिना विश्व युद्ध के ही मानवता समाप्त हो जाएगी। यदि सभी लोग वैदिक सिद्धान्त को समझते जो तथ्यपरक एवं निष्कर्ष परख विज्ञान की तर्क तुला पर खरा उतरता है और धर्म व विज्ञान में कोई अंतर नहीं मानता है। वेद में सत्य सिद्धान्त है तो धर्म उसका प्रयोग है। आज वेद ही अभ्युदय और नि:श्रेयस की बात करता है “अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् “। जो किया है, वह प्रत्येक जीव को भोगना पड़ता है। परंतु अन्य मतावलम्बी “या-अल्लाह माफ कर देगा” जैसे उपाय बताएंगे।

‘अवश्यमेव भोक्तव्यं’- में मनुष्य की सत्ता नहीं है, ईश्वर की व्यवस्था में दया, क्षमा ,दंड , न्याय का एक ही अर्थ होता है। इसीलिए स्वाध्याय हीन लोग मजहबी लोगों के जाल में फंसकर अपने जीवन को व्यर्थ ही अनर्थ की ओर ले जाते हैं और अपने अर्थ का भी अनर्थ करते हैं।

अतः संचय की सड़ांध से जो कोरोनावायरस फैला है उससे बड़े-बड़े विकसित देशों की चौधर भी धरी की धरी रह गई है, अन्य देशों के पसीने छूट रहे हैं। कोरोना वायरस आज की देन नहीं है, दीर्घावधि से मनुष्य की पाश्विक वृत्तियां ही इसकी जननी है। इसके मूल में आधुनिक मानव का आहार ही इसका मूल कारण है। किसी कवि ने संकेत किया है

“मात-पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध सात्विक आहार नहीं, इसीलिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं “।

जैसा आहार, वैसा विचार ।

जैसा विचार ,वैसा आचार।।

अतः –

जैसा सोचोगे , वैसा हो जाओगे ।

इसीलिए वैसा सोचो जैसा होना है।।

” Man is where is mind is,

mind determines what man is “.

इसकी पुष्टि वेद में मिलती है “आचार हीनं न पुनन्तु वेदा ” अर्थात् आचारहीन व्यक्ति का उद्धार तो वेद भी नहीं कर सकते।

इसी कारण महर्षि दयानन्द के विश्व शांति के 10 नियम में से एक 8 वां नियम है कि “अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि सदैव करनी चाहिए “।

विद्या की गिरावट भी महाभारत से एक हजार वर्ष पूर्व से प्रारंभ हो गई थी उसी का कारण है कि एक परिवार का युद्ध, विश्व युद्ध में बदल गया और 18 अक्षौहिणी सेना 18 दिन में ही काल के गाल का निवाला बन गई।
महर्षि ने दुर्योधन को गोत्र हत्यारा कहा है। पांच सहस्त्रों के उपरांत कोई भी परिवार जन अपने बच्चे का नाम दुर्योधन और कंस नहीं रखना चाहता। रामायण काल में विद्या से विभूषित रावण ने भी पर-स्त्री हरण कर ऐसा कुकृत्य किया कि लगभग दस लाख वर्ष बाद भी अपने पुत्र का नाम रावण रखना नहीं चाहता। विद्या वह अमोघ अस्त्र है जो विवेक द्वारा नीर-क्षीर की पहचान कराता है।
ऋषि नारद अपने काल के सर्वोत्तम ज्ञाता थे। चौबीस विषयों से परास्नातक नारद ने गुरुकुल से अपने घर पहुंचने पर गर्व से कहा कि पिताश्री मैंने सब विद्याएं पढ़ ली हैं अब मुझसे अधिक कोई व्यक्ति विद्या में निपुण नहीं है। पिता श्री ने बड़े सहज भाव से कहा कि पुत्र

“भूमा के बारे में कितना जानते हो ? नारद चुप हो गए” पुनः अपने गुरु सनत्कुमार के पास पहुंचकर भूमा के बारे में निराकरण किया।
आचार्य सनत्कुमार ने कहा- विद्या को आत्मसात करने का नाम ही भूमा है। ऋषि नारद विश्व के प्रथम पत्रकार एवं संवाददाता थे। आज मीडिया को गर्वित होना चाहिए। आज पूरा विश्व 5 रोगों से ग्रसित है- अविद्या , अस्मिता, राग , द्वेष एवं अभिर्निवेश।
इसमें सबसे बड़ा रोग अविद्या का है। इन पांचों क्लेशों से निजात पाने की औषधि केवल विद्या है।

“विद्या सब धन की नायक है ,
विद्या के सब धन पायक हैं।
जब देव सहाय नहीं होते ,
विद्या होत सहायक है “।।

महर्षि दयानन्द से पूर्व में और बाद में अनेक महान पुरुषों ने अपनी -अपनी सामर्थ्य से हमें दिशा बोध दिया परंतु महर्षि ने कुछ और ही दिया। जब सब महान पुरुष आगे बढ़ो -आगे बढ़ो कह रहे थे , तब महर्षि ने क्रांतिकारी उदघोष किया कि ‘पीछे हटो -पीछे हटो’ अर्थात “वेदों की ओर लौटो”।

“संश्रुतेन गमेमहि “

वेदानुकूल ही यथार्थ विद्या है जो जैसा पदार्थ है , उसे वैसा ही जानना और मानना ही यथार्थ विद्या है।
सभी महापुरुषों ने हमें डूबने से बचाया, परंतु महर्षि दयानन्द ने हमें तैरना सिखाया।
ग्रामीणांचल में भी लोग अपने कथानकों से समझते हुए कहते हैं – ‘भइया पढ़े तो हैं पर गुणे नहीं।’
शिक्षित होना, बड़ी -बड़ी डिग्री प्राप्त करना एक बात है और दीक्षित होना दूसरी बात। इसी कारण दीक्षान्त समारोह में दीक्षित होने का संकल्प दिलाया जाता है। परंतु आज के शास्त्रज्ञ अविद्या बढ़ाने में ही अपनी निपुणता समझते हैं। सामान्य व्यक्ति की बात छोड़ो राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री ,कैबिनेट मंत्री, न्यायाधीश ,अधिवक्ता, शिक्षक, शासक, प्रशासक यहां तक कि वैज्ञानिक भी इनके मकड़जाल में फंसे हुए हैं। चुनाव के दौरान तो इन ज्योतिषाचार्यों को फूलते-फलते देखा जा सकता है। जबकि ज्योतिष एक शास्त्र है , जिसका संबंध आकाश -अंतरिक्ष एवं द्युलोक विज्ञान से है। आकाशीय पिंडों की भौगोलिक स्थिति तापमान ,घनत्व, द्रव्यमान, गुरुत्वाकर्षण, प्रतिमान , तत्व आदि से संबंधित है। आजकल विश्वविद्यालयों में भी गणित ज्योतिष के स्थान पर फलित ज्योतिष पढ़ाया जा रहा है। कोई भी सरकार ‘वोट बैंक’ के संतुलन बिगड़ने के डर से जनता को अंधकूप में ढकेल रही है। सारे टीवी चैनल अंधविश्वास और पाखण्ड की ओर धक्का दे रहे हैं। हद पार तो तब हो गई जब देश के रक्षा मंत्री ने एयरक्राफ्ट (फाइटर प्लेन) का पूजन नींबू ,हरी मिर्च पहिए के नीचे फोड़कर एवं रोली तिलक लगाकर किया और सभी मीडिया वालों ने बड़ी गर्मजोशी से अपने चैनलों पर दिखाते हुए कहा कि बड़े विधि विधान से पूजन कर उदघाटन किया गया। यदि यही विधि विधान है तो वेद ऐसे पूजन करने वालों को धिक्कारता है । भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद बागपत डॉ. सत्यपाल सिंह को सत्य बोलने पर अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी, क्यों ? उन्होंने विद्यावान होने के कारण वेदानुकूल डार्विन के सिद्धांत को चुनौती दी थी और ‘नमामि गंगे’ योजना को अधिक स्वच्छ रखने के लिए हर की पौड़ी(हरिद्वार) पर अस्थियां विसर्जित करने को अवैदिक एवं अवैज्ञानिक बताया। इस पर सारे देश के पण्डे, पुजारी, सनातनी, संन्यासी एवं पेटपाल तनातनी हो गए और विद्वान सांसद को नास्तिक बताकर मंत्री पद से त्यागपत्र दिलाकर ही संतोष हुआ। कैसा समय आ गया है कि अंधकार प्रकाश को ललकार रहा है।

इसी प्रकार मोदी जी के पिछले कार्यकाल में विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आर्यों को विदेशी बता कर कहा कि हम दलित ही यहां के मूल निवासी हैं तब आर्य सन्यासी स्वामी सुमेधानंद सरस्वती सांसद, सीकर ने सदन के अध्यक्ष से विशेष अनुमति लेकर पक्ष और विपक्ष के नेताओं को सावचेत किया कि यदि आपको आर्ष ग्रंथों का अध्ययन होता तब कदापि यह नहीं बोलते। आप महर्षि दयानंद रचित सत्यार्थ-प्रकाश पढ़ेगें तो फिर अनर्गल प्रश्न सदन में नहीं करेंगे।
स्वामी श्रद्धानंद को शुद्धि आंदोलन में लाखों लोगों के घर वापसी (धर्म परिवर्तन) के कारण बलिदान होना पड़ा। अपने अथक प्रयास से कश्मीर के समस्त मुसलमानों को दलील देकर संपूर्ण कश्मीर की घर वापसी (शुद्धि आंदोलन) की तैयारी हो गई थी। तथाकथित विस्थापित कश्मीरी ब्राह्मणों में से सैकड़ों लोगों ने झेलम में डूबने की धमकी दे डाली तो उस समय महाराजा हरि सिंह ब्राह्मण हत्या के कारण भयभीत हो गए और स्वामी श्रद्धानंद की कश्मीर यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। यदि स्वामी श्रद्धानंद जी की यह योजना सिरे चढ़ गई होती तो आज यह समस्या नहीं होती, जो अब नासूर बन गई है। यह सब अविद्या का ही कारण था। शासक वेदों का विद्वान होता है तब यह समय नहीं देखते।
आज भारत सरकार के सुयोग्य प्रधानमंत्री हर समस्या का समाधान आध्यात्म से कर रहे हैं। आध्यात्म की विनम्रता में पूर्ण कठोरता होती है। कोरोना वायरस के निर्णय ने जनता जनार्दन से जोड़कर और अनुशासित एवं जितेन्द्रिय बना दिया है। वह देश के प्रत्येक नागरिक के साथ सावचेत हैं। अपने को प्रधानमंत्री न कहकर ‘प्रधान सेवक’ बोलने में गौरव समझते हैं। वेद को संसार की सबसे प्राचीनतम पुस्तक मानकर संग्रहालय में सुरक्षित रखने का सौभाग्य भी आपके अथक प्रयासों का परिणाम है। साथ ही 21 जून को योग दिवस मनाने का श्रेय भी आपको जाता है। लेकिन विदेश के लोगों की भांति अपनी संस्कृति और वेद का क्रमशः 5 हजार,10 हजार वर्ष पुराना बताने पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। हमारी वैदिक संस्कृति और वेद एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 121 वर्ष पुराने हैं। अतः आप वैदिक विचारधारा से पूर्ण ओतप्रोत होना राजा (शासक) को अपरिहार्य है। साथ ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उद्घोषक महर्षि दयानन्द सरस्वती का सभी सरकारें और दलों को अनुप्रतीक (Icon) बनाना चाहिए।
इस अविद्या के कारण ही कालसर्प दोष, मंगली दोष, बिल्ली का रास्ता काटना, कुत्ते का कान फड़फड़ाना, तेली आगे आना, विधवा का मुंह देखना, छींक आ जाना आदि अनेकानेक बातें समाज को निरन्तर पतन की ओर ले जा रही हैं । अतः विद्या संसार का सबसे बड़ा औषध है और सत्यार्थ-प्रकाश सबसे बड़ा चिकित्सक। सत्यार्थ-प्रकाश वेद की कुंजी भी है एवं शास्त्रार्थ के क्षेत्र में ‘सुदर्शन चक्र।’ जिसके एक ही चक्र से विरोधी धाराशायी हो जाते हैं। आइये, हम सब ऋषि, महर्षि एवं दिव्य आत्माओं की संतान हैं। उन सब का धरातल भी वेद था। वेद विद् धातु से बना है अर्थात् जानना । महर्षि दयानन्द के वैदिक सिद्धांत से ही संसार में शांति स्थापित की जा सकती है। वह केवल ‘मनुर्भव्’ की बात करते हैं। संसार का उपकार करना समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक , आत्मिक , सामाजिक उन्नति ।

“श्वासों का उद्देश्य कर्म है
थक कर क्यों मर जाएं ।
मरने से पहले कुछ कर लें
याद सभी को आएं “।।

  • सादर
    गजेंद्र आर्य
    राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता
    जलालपुर अनूप शहर
    +91-9783897511

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