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कुरान और हदीस की रोशनी में शाकाहार-1

मुजफ्फर हुसैन
मनुष्य के आचार विचार की पहली सीढ़ी उसका खान-पान का आधार भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। मनुष्य क्या खाता है, उससे उसके स्वभाव की पहचान होती है, लेकिन भूगोल और अर्थव्यवस्था के साथ साथ उसका धर्म, उसके खान पान और स्वभाव को मर्यादित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। आज की दुनिया में संचार और यातायात की व्यवस्था ने भी महत्व की भूमिका दर्ज कराई है। विश्व के किसी भी कोने में रहने वाला व्यक्ति अपनी मनपसंद के भोजन को अपने लिए जुटा सकता है और जिसके लिए मांसाहार वैध है, वह भी चाहे तो शाकाहारी जीवन व्यतीत कर सकता है। चूंकि खान पान से उसका व्यवहार संचालित होता है, इसलिए उसके गुण और धर्म आदतें उसी के अनुसार विकसित होते हैं। इसलाम का उदय जिस भूभाग में हुआ, वहां मांसाहार के वर्जित होने का सवाल ही नही लेकिन इसका यह भी अर्थ नही है कि इसलाम में शाकाहार को स्थान नही है मांसाहार करना ही एकमात्र विकल्प होता तो फिर उसका अनुयायी किसी भी पशु अथवा पक्षी के मांस को बिना झिझक खा लेता लेकिन ऐसा नही है। किसे खाया जाए और किसे नही, इसकी एक लंबी सूची है जिसके नतीजे में बहुत कम पशु पक्षियों को अपना निवाला बनाने के लिए छूट दी गयी है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि मांसाहार में भी मर्यादा है। जिस प्रकार शाकाहारी दुनिया की कोई भी वनस्पति नही खा लेता, उसीप्रकार मांसाहारी भी सभी पशु पक्षियों के मांस को नही आरोगता। यानी कुदरत ने दोनों के लिए ही खाने की मर्यादा तय कर रखी है। एक बात बहुत स्पष्ट है कि जंगल में जितने भी मांसाहारी प्राणी हैं, वे जनम लेते ही मांसाहारी नही बन जाते, बल्कि अपनी मां का दूध उनका प्रथम भोजन होता है। शेर, चीता, तेंदुआ बड़े होने पर शिकार करते हैं और फिर मांस का भक्षण आरंभ करते हैं लेकिन अपनी मां के गर्भ से बाहर आते ही वे मांसाहारी नही बन जाते। यानी दुनिया का कोई कितना ही बड़ा और शक्तिशाली जानवर हो, वह अपनी प्रारंभिक स्थिति में शाकाहारी ही होता है। अरबस्तान से निकले तीनों धर्म इस बात पर विश्वास करते हैं कि आदम स्वर्ग में शाकाहारी थे। उन्होंने ईश्वर के वर्जित करने पर सेब खा लिया। शैतान ने उनको बहका दिया और ईश्वर के आदेश की अवहेलना की, जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें स्वर्ग से धरती पर आ जाना पड़ा। कहीं कहीं गेंह का भी उल्लेख नही किया जाता है। कुल मिलाकर दोनों शाकाहारी वस्तुएं थीं। इनसान से लगाकर पशुओं तक के लिए पहला भोजन मां के दूध के रूप में था। सच बात तो यह है कि जिस मीठी चीज का उसने स्वाद चखा यानी शहद भी फूलों के रस का ही बना हुआ था। यानी ईश्वर ने आदमी और पशु पक्षी को शाहारी के रूप में जन्म दिया। वह मांसाहारी कैसे बन गया, इसकी एक लंबी कहानी है। जब इसलाम भी यह स्वीकार करता है कि ईश्वर ने शाकाहार को ही उदरपूर्ति के लिए चुना था, तब यह नही कहा जा सकता कि इसलाम शाकाहार का समर्थक नही हैं। पवित्र कुरान और पैगंबर साहब के जीवन का जब बहुत निकटता से अध्ययन करते हैं तो स्पष्टï हो जाता है कि इसलाम में भी शाकाहारी बनने की हिदायत की गयी है। ऐसी घटनाएं और उदाहरण मौजूद हैं, जो इस बात की दलील हैं कि इसलाम शाकाहार को प्राथमिकता देता है। अपनी जीभ के स्वाद के लिए चाहे जिस प्रकार की व्यवस्था कर दी जाए, लेकिन हकीकत यह है कि इसलाम ने शाकाहार बनने के लिए असंख्य स्थानों पर प्रेरित किया है। अधिकांश मुसलिम विद्वान मांसाहार को इसलाम की पहचान बताने के लिए हजरत इब्राहीम द्वारा अपने बेटे की कुरबानी की घटना का विवरण प्रस्तुत करके अपना तर्क मजबूत करने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि इब्राहीम जिसे ओल्ड टेस्टामेंट तथा बाइबिल में अब्राहम शब्द से संबोधित किया गया है उनसे ईश्वर ने कहा कि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु को मेरे लिए कुरबान बलिदान कर दो। इसलामी मान्यता के अनुसार इब्राहीम ने अपने पुत्र इस्माइल को कुरबान करने का मन बना लिया। बेटे ने भी बाप की इस इच्छा की अवहेलना नही की। जब इब्राहीम ने अपने पुत्र इस्माइल के गले पर छुरी चलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तब उसी समय चमत्कार से इब्राहीम के शरीर के स्थान पर एक भेड़ आ गयी। भेड़ को अंग्रेजी में शीप और अरबी में दुंबा कहा जाता है। भेड़ के हलाल होते ही यह परंपरा बन गयी कि ईश्वर के लिए कुरबानी देना अनिवार्य है। आदिकाल से ही बलि का रिवाज है, जिसे इसलामी भाषा में कुरबानी शब्द से संबोधित किया गया है। शाब्दिक रूप से बलि और कुरबानी में कोई अंतर नही है, लेकिन मुसलिमों का यह तर्क है कि कुरबानी केवल ईश्वर के लिए दी जाती है, जबकि बलि देवी देवताओं के लिए। कुरबानी अल्लाह के आदेश से दी गयी, जबकि बलि के पीछे केवल मनुष्य का अपना निर्णय होता है। इस्माइल के स्थान पर भेड़ के हलाल हो जाने का अर्थ यह निकाल लिया गया कि ईश्वर को पशु की कुरबानी प्रिय है, जिसका मांस खाना एक पवित्र संस्कार है। अब्राहम मध्य एशिया से निकले तीनों धर्म यहूदी, ईसाई और इसलाम के पितामह हैं। स्वयं पैगंबर साहब ने अपने को इब्राहीम यानी इब्राहीम की मिल्लत कौम जैसे शब्द का प्रयोग किया गया है।
इसलाम में हज यात्रा को अनिवार्य तत्वों में से एक बताया गया है। हर मुसलिम, जो साधन संपन्न हो, उसके लिए हज करना अनिवार्य घोषित किया गया है। हज के पश्चात भेड़, बकरे, गाय बैल अथवा ऊंट की कुरबानी करने का आदेश दिया गया है। हज यात्रा पर गया हर मुसलिम उस आदेश का पालन करता है तभी अंतिम रूप से हज की प्रक्रिया संपन्न होती है। जो लोग हज पर नही जाते हैं वे भी कुरबानी करने में पुन्याई समझते हैं, लेकिन अब्राहम के मानने वाले दो अन्य धर्मावलंबी यहूदी अथवा ईसाई ऐसा कुछ भी नही करते हैं। मुसलिमों का यह विश्वास है कि वे अपने पैगंबर साहब के आदेश का पालन करते हैं, जिसकी गवाही स्वयं पवित्र कुरान भी देता है। इसलाम और शाकाहार विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इस पर असंख्य परिसंवाद आयोजित किये गये हैं। अपने पाठकों की जानकारी के लिए हम यहां एक ऐसे ही शोधपत्र को उदधृत करना चाहेंगे, जिसे आकिफ मुनाफ जाबिर नामक विद्वान ने प्रस्तुत किया है।
वे इस संबंध में पीएचडी कर चुके हैं। इसी प्रकार विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑगेनाइजेशन) में प्रस्तुत एक रपट का भी उल्लेख करना चाहेंगे, जो इसलाम में खाने के लिए पशुओं के कत्लखानों से संबंधित है। उक्त रपट द वेटेनरी इंस्टीट्यूट फेडरेल डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक हेल्थ वेस्ट बर्लिन के डा. अब्देल अजीज ई खयात ने तैयार की है। क्रमश:

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