वैदिक संपत्ति : भारतीय सांस्कृतिक धरोहर

वैदिक संपत्ति

गतांक से आगे…

द्वितीय खंड में हम लिख आए हैं कि आर्यों की उत्पत्ति हिमालय के ‘ मानस ‘ स्थान पर हुई।बहुत दिन तक आर्य लोग हिमालय पर ही रहे। संततिविस्तार के कारण उन्होंने हिमालय से नीचे उतर कर भूमि तलाश की। जिस रास्ते से वे आये उस रास्ते का नाम उन्होंने हरद्वार ( हर= हिमालय और द्वार= दरवाजा)अर्थात् हिमालय का दरवाजा रक्खा। यहां आकर वे कुछ दिन तो रहे, पर जंगली जलवायु के कारण सब रोगी हो गये और फिर अपने पूर्व निवास हिमालय को चले गये। परंतु कुछ समय बाद वे यहां फिर आये। अबकी बार उन्होंने यहां के जंगलों को काटकर देश को बसने योग्य बनाया और हरद्वार, कुरुक्षेत्र अर्थात सरस्वती नदी से लेकर पूर्व की गण्डकी नदी ( जिसको सदानीरा और द्दषद्वती कहते हैं ) तक जंगलों को जलाकर आबादी की और इस आबाद भूमि का नाम ब्रह्मावर्त रक्खा। इसके आगे के देश का नाम विदेह हुआ, जिसका अर्थ शरीर – शून्य अर्थात निर्जन है।
इस इतिहास से ज्ञात होता है कि इसके पूर्व यहां कोई निवास नहीं करता था। यदि आबादी होती,तो जंगल न जलाने पड़ते और देशों का नाम विदेह न रखना पड़ता। जिन दस्युओं को मूलनिवासी कहा जाता है, वे युद्ध करना जानते थे। उनके बड़े-बड़े नगर थे। क्योंकि ‘ असुर:पुरो प्रकुर्वीत ‘ शतपथ में लिखा हुआ है।वे व्यापारी थे और जहाज चलाना भी जानते थे।ऐसे लोगों ने जंगलों में ही निवास रखा हो, यह युक्ति युक्त प्रतीत नहीं होता। क्योंकि कोल, भील तो जंगल काटने में अब तक बड़े प्रबल होते हैं।परंतु आर्यों के उपर्युक्त वर्णन से पाया जाता है कि आर्यों के पूर्व किसी के बसने लायक स्थान ही न था। इस तरह से न तो यहां आर्यों के पूर्व किसी के बसने का पता मिलता है और न यहां कोई पराजित या विजित ही था । पाश्चात्य विद्वानों की इस उल जलूल थ्योरी का तीव्र प्रतिवाद करते हुए प्रसिद्ध विद्वान नैसफील्ड साहब लिखते हैं कि ‘भारतीयों में आर्य विजेता और मूल निवासी जैसे कोई विभाग नहीं है। ये विभाग बिल्कुल आधुनिक है।यहां तो समस्त भारतीय जातियों में अत्यंत एकता है। ब्राह्मणों से लेकर सड़क झाड़ने वाले भंगियों तक का रूप रंग और रक्त एक समान ही है।
हमने यहां तक यह दिखलाने का यत्न किया कि इस देश में न तो आर्यों के पूर्व कोई मूलनिवासी नाम के कोल,द्रविड़ आदि ही रहते थे और न आर्यों के साहित्य से आर्यों का बाहर से आना ही सिद्ध होता है।इस तरह न मूल निवासियों की किसी कथा या नाम से ही सिद्ध होता है कि आर्य बाहर से आये और कोल, भील, द्रविड़ यहाँ के मूल निवासी थे। और न इस बात को आर्यों की किसी अन्य शाखा ने ही स्वीकार किया है कि हमारा एक दल भारत को गया ।जब यह हाल है, तब फिर नहीं मालूम होता कि संसार भर के प्रमाणों के विरुद्ध किस आधार से कहा जाता है कि आर्य लोग कहीं बाहर से आए और यहां के मूलनिवासी कोल और द्रविड़ ही हैं? इसलिए पाश्चात्यों का यह आरोप कि आर्य लोग बाहर से आए बिल्कुल निराधार है।इसी तरह यह भी निराधार है कि आर्यों के पूर्व यहां कोल और द्रविड़ रहते थे। इसके बाद अब हम इस प्रश्न का उत्तर ढूंढते हैं कि दस्युओं के रूप,रंग, भाषा और युद्धों का वेदों में क्या उल्लेख है।
एक शख्स ने प्यार करते-करते अपने बच्चे को कहा कि यह बड़ा शैतान है।इस बात पर पास बैठे हुए उनके दोस्त ने कहा कि जी हां, इसका वर्णन तो बाइबल और कुरान में भी आया है। तो बात इस मजाक में दिखाई पड़ती है, ठीक वही बात वेदों में दस्यु आदि शब्द देखकर कोल,भील के लिए बताई जाती है। किंतु वेदों को गौर से पढ़ने वाले इस बात से इनकार करते हैं।वेदों में आए हुए दस्यु आदि शब्दों पर मिस्टर मूर लिखते हैं कि मैंने ऋग्वेद के दस्यु या असुर आदि नामों को इसलिए पड़ा कि वे अनार्य के हैं,या मूल निवासियों के।परंतु मुझको कोई भी नाम न मिला,जो इस प्रकार’ का हो। इसी तरह प्रोफेसर मैक्समूलर कहते हैं कि दस्यु का अर्थ केवल शत्रु है। ए० रागोजिन कहते हैं कि दस्यु का अर्थ केवल लोग हैं और इरानीयों की अवस्था पुस्तक में उनका दह्य शब्द इसी अर्थ में आया है।जन्दावस्था के इस प्रमाण से रागोजिन ने सिद्ध कर दिया कि ईरानी लोग अपने ईरानी लोगों को ही दह्य अर्थात दस्यु कहते थे। मैक्समूलर ने स्पष्ट कर दिया कि दस्यु दुश्मन को कहते हैं।मतलब यह हुआ कि चाहे अपनी जाति का हो अथवा दूसरी जाति का, जो द्वेष करने योग्य है,वही दस्यु है। यदि ऐसा न होता तो इरानी लोग अपनी ही जाति को दह्य न कहते क्योंकि उनके यहां तो कोई श्याम वर्ण और भिन्न भाषाभाषी था ही नहीं।
क्रमशः

देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन : उगता भारत

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