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इतिहास के पन्नों से

हिंदू राष्ट्र स्वप्न दृष्टा बंदा वीर बैरागी के जन्म दिवस 27 अक्टूबर पर विशेष

हिंदूराष्ट्र स्वप्नद्रष्टा : बंदा वीर बैरागी

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अध्याय – 10

बंदा बैरागी बन गया था एक धर्म योद्धा

पृष्ठों के उत्तुंग शिखर पर

स्मृति की है शीतल छाँह ।

इतिहास पुरुष वहां भजते माला,

बदल देते हैं काल प्रवाह ।।

बंकिमचंद्र चटर्जी भारतीय इतिहास के एक अच्छे अध्येता के रूप में जाने जाते रहे हैं । उन्होंने भारतीय इतिहास पर चिंतन करते हुए लिखा है : — ” अरब एक प्रकार से दिग्विजय रहे हैं । उन्होंने जहां आक्रमण किया वहीं जीते । वे केवल 2 देशों से पराजित होकर लौटे हैं । पश्चिम में फ्रांस और पूर्व में भारत ।

मोहम्मद की मृत्यु के 6 वर्षों के भीतर उन्होंने मिस्र और सीरिया , 10 वर्षों के भीतर ईरान , एक वर्ष में अफ़्रीका और स्पेन , 80 वर्षों के भीतर काबुल और 8 वर्षों में तुर्किस्तान पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। परंतु 100 वर्ष में भी भारत पर वे काबिज नहीं हो पाये । मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीता था , पर बाद में राजपूतों द्वारा खदेड़ दिए गए थे। ”

[ ] इतिहास के बारे में बंकिम चंद्र चटर्जी का यह निष्कर्ष पूर्णतया सटीक है । भारत ही वह देश है जो इस्लामिक आक्रांताओं से अपनी संस्कृति की रक्षा करने में सफल रहा । इस्लाम को मानने वाले बादशाहों ने लंबे – चौड़े साम्राज्य भारत के भीतर स्थापित किए , बड़े – बड़े नरसंहारों का आयोजन किया । सवा – सवा मन जनेऊ प्रतिदिन उतरवाकर धड़ाधड़ हिंदुओं का धर्मांतरण करने या उनकी सामूहिक हत्याएं करने के भी बड़े – बड़े नरसंहार किए , संकल्प लिए और उनके अनुसार कार्य भी किया , परंतु इन सबके उपरांत भी वे कभी भारत की आत्मा का धर्मांतरण नहीं कर पाए । भारत की अंतश्चेतना की जिजीविषा बनी रही और भारत को लड़ने के लिए प्रेरित करती रही । बस , भारत की इसी अंतश्चेतना का प्रतिबिंब बनकर पंजाब में बंदा बैरागी काम कर रहे थे अर्थात इतिहास का एक ऐसा दैदीप्यमान नक्षत्र जो भारतीयता को बनाए रखने के लिए संकल्पित था और इस्लाम को भारत में परास्त करना जिसके जीवन का उद्देश्य बन चुका था ।

बंदा बैरागी भारत की उस राष्ट्र परंपरा के ही प्रतिनिधि पुरुष हैं , जिसने इस देश में सदा से एक राष्ट्र होने के स्पष्ट प्रमाण दिए । राष्ट्र निर्माण के लिए केवल व्यक्तियों का समूह मात्र होना ही पर्याप्त नहीं होता , अपितु उस जनसमूह के भीतर एक ऐसी चेतना भी काम कर रही होनी अपेक्षित है जो अपने देश , धर्म , संस्कृति , इतिहास पुरुषों आदि के प्रति समान रूप से श्रद्धाभाव रखती हो और जब इनमें से किसी पर भी कहीं कोई संकट आए तो उस संकट के समाधान के लिए उचित समय आने पर एक साथ , एक स्वर से विरोध में उठ खड़ी हो । भारत के तथाकथित पराधीनता के काल में हमें ऐसे स्पष्ट लक्षण प्रत्येक बादशाह या सुल्तान के शासनकाल में दिखाई देते रहे , जब लोगों ने उत्तर – दक्षिण , पूर्व – पश्चिम का भेद छोड़कर किसी शासक से लड़ने को अपना सर्वोपरि कर्तव्य या राष्ट्रधर्म घोषित किया।

उत्तर हो चाहे दक्षिण हो ,

पूरब हो जाए पश्चिम हो ।

बिखरी सर्वत्र छटा एक ही

अब भारत मेरा स्वाधीन हो।।

कुछ लोगों का मानना होता है कि नेता से जनता का निर्माण होता है । यह बात कदापि सही नही हो सकती है । जनापेक्षाएं शासकों को किसी ऐसे खूंटे से बांधे रखती हैं , जो उसे मर्यादाहीन और असंतुलित नहीं होने देती हैं । शासक को भी अनैतिक कार्यों के करते समय जनता का उतना ही भय होता है जितना जनता को किसी अनैतिक कार्य को करते समय कानून का भय होता है । राष्ट्र के भीतर की वह सामूहिक चेतना किसी भी नेता का निर्माण करती है , जिसे वहां के रहने वाले लोग सामान्यत: स्वाभाविक रूप से और सामूहिक रूप से सब चाहते हैं । जैसे भारतवर्ष में सभी राष्ट्रवासियों की एक सामूहिक चेतना उनकी एक सामूहिक इच्छा के रूप में काम कर रही थी कि विदेशियों को यहां से भगाना है और भारत के धर्म , संस्कृति और इतिहास की या उसके प्रतीकों की रक्षा व सुरक्षा करनी है । इसी भावना ने यहां पर बंदा बैरागी या उनके पूर्ववर्ती या उनके बाद के अनेकों इतिहास पुरुषों का निर्माण किया ।1909 में गांधी जी ने हिंद स्वराज में लिखा था :—- ” अंग्रेजों ने पढ़ाया है कि उन्होंने भारत को एक राष्ट्र बनाया है । यह बात गलत है । भारत अंग्रेजों के आने से पहले भी एक राष्ट्र था । ”

गांधी जी का भारतीय इतिहास के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण मत स्वीकरणीय है । वास्तव में गांधीजी के कई सिद्धांतों की हत्या उनके ही तथाकथित अनुयायी बने कांग्रेसियों ने की है । इतिहास के संदर्भ में जितनी भी गलत धारणाएं बनाई गईं या इतिहास लेखन करते समय जितना उसका विकृतिकरण किया गया है , उसका श्रेय गांधी जी के शिष्य पंडित जवाहरलाल नेहरू को जाता है । यदि भारतीय इतिहास के संदर्भ में गांधीजी के इस सिद्धांत के अनुसार कांग्रेस की सरकारें चलतीं तो इतिहास कुछ दूसरा ही होता ।

गांधी जी की इस धारणा के विपरीत भारत में संघों का स्वरूप प्राचीन काल से देखने की मूर्खता की गई और ऐसा प्रचारित व प्रसारित किया गया कि जैसे भारत न तो कभी राष्ट्र था और न ही कभी एक ईकाई के रूप में काम कर रहा था या संगठित था। जैसा कि पार्थ चटर्जी कहते हैं :- ” देश का इतिहास लिखने के बदले उसके खंडों का इतिहास लिखा जाए । भारत एक इकाई नहीं है । ”

बंकिम चंद्र चटर्जी ही लिखते हैं कि :– ” इतिहास से हमें ज्ञात होता है कि पराधीनता के परिणाम में पराधीन जाति की बौद्धिक रचनाशीलता समाप्त हो जाती है ।” उन्होंने यह भी लिखा है कि : — ” भारत ,इतने समय से पराधीन क्यों है ? यूरोप के लोगों का कहना है कि भारतीय कमजोर होते हैं , लेकिन अंग्रेजों ने भारत पर कैसे राज्य स्थापित किया ? क्या वे भारतीयों की सहायता के बिना यहां जीत सकते थे ? भारत के बाहर उन्होंने साम्राज्य का विस्तार भारतवासियों की सहायता से किया। ”

कुछ लोग बड़ी सहजता से यह कह दिया करते हैं कि यदि विदेशी जातियों ने भारत पर शासन किया तो उसमें यहां के लोगों का सहयोग मिला तभी वह इसमें सफल हो पाए । उनका ऐसा कहने का अभिप्राय यह होता है कि भारत के लोगों ने भारत के विरुद्ध ही गद्दारी की तभी वह विदेशी जातियां यहां पर शासन स्थापित करने में सफल हो पाईं । वास्तविकता यह है कि यह बात भ्रम फैलाने के लिए की जाती है । सच यह भी है कि भारत के लोग जिसको अपना मान लेते हैं , उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना उनका स्वाभाविक और परंपरागत गुण है । यद्यपि समाज के जागरूक लोग इन विदेशी जातियों के शासकों को अपना न मानने के लिए भारतवासियों को जगाते रहे । इसके उपरांत भी कुछ मुट्ठी भर लोग ऐसे भी रहे जो जयचंद की भूमिका निभाते रहे। विदेशी जातियां शासन करने में इन ‘जयचंदों ‘ के कारण सफल हुईं । इन जयचंदों का इतिहास भारत का इतिहास नहीं हो सकता। हां , यह भारतीय इतिहास के काले धब्बे अवश्य हो सकते हैं।

जयचंदों के कारने पतन हुआ और क्लेश ।

ईर्ष्या , घृणा बढ़ गए , बढ़ा भयंकर द्वेष ।।

दक्षिण में औरंगजेब के लिए शिवाजी एक भारी चुनौती बन चुके थे । उनसे उलझकर सुलझने का कोई उपाय औरंगजेब निकाल नहीं पा रहा था । इधर पंजाब में बैरागी ने मराठों की ही तर्ज पर क्रांति मचा रखी थी। औरंगजेब बहुत भारी भरकम साधनों का स्वामी होने के उपरांत भी हमारे दो शेरों अर्थात दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज और पंजाब में बंदा वीर बैरागी का उचित प्रतिकार नहीं कर पा रहा था । एक कस्बा साढोरा था , वहाँ के हिंदू इस कस्बे के मुसलमान मुखिया उस्मान खान के दुर्व्यवहार और दुराचार से बहुत दुखी हो चुके थे । उस समय इस राक्षस उस्मान खान का व्यवहार इतना निकृष्ट और अत्याचार पूर्ण हो चुका था कि वह किसी की भी बहू बेटी को नहीं देख रहा था । उसे इस बात का अहंकार था कि वह मुस्लिम है और उसके ऊपर मुगल बादशाहों की पूरी छत्रछाया बनी हुई है । इससे हिंदू अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए बंदा बैरागी की ओर निहार रहे थे । उस्मान खान ने मंदिर विध्वंस करा – कराकर वहां पर अनेकों मस्जिदें बनवा डाली थीं । जब उसकी बारी आई तब उसने निकट के बहुत से मुसलमान अपनी सहायता के लिए एकत्र किए । क्योंकि अब बंदा बैरागी की भृकुटी उस पर तन चुकी थी । उस्मान खान भी समझ गया था कि तेरे पापों का हिसाब अब होने ही वाला है। फलस्वरूप 11 माह संवत 1764 को दिन भर लड़ाई होती रही । विनोद सिंह ने बैरागी से जाकर कहा :- ” लोग तो मर रहे हैं और तुम माला जप रहे हो । ”

ऐसा सुनकर बंदा बैरागी क्रोधित हो उठा । तब उसने स्वयं आकर युद्ध क्षेत्र में बाण वर्षा आरंभ की ।उसके बाणों की वर्षा से मुसलमान भयभीत होकर भागने लगे। कहते हैं कि पति पत्नी को छोड़ गया , मां बेटी को छोड़कर भाग निकली । किसी को भी अपने संबंधी तक को बचाने की सुध नहीं थी । सबको अपने प्राणों की चिंता पड़ी थी । किसी भी प्रकार से स्वयं सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाना ही लोगों के जीवन का तात्कालिक उद्देश्य हो गया । सर्वत्र पापियों और अत्याचारियों का सफाया होने लगा । निरंतर दो दिन तक लूट होती रही । पूरा शहर पूर्णतया सुनसान हो गया। उस्मान खान को एक वृक्ष से बांधकर बैरागी ने मरवा डाला । उस्मान खान युद्ध से पहले बैरागी को मारने की प्रतिज्ञा कर रहा था , परंतु उसकी प्रतिज्ञा उसी के लिए घातक सिद्ध हुई ।

जब अत्याचार एक सीमा से आगे बढ़ जाते हैं तो अत्याचारी का समापन करने के लिए प्रकृति स्वयं कुछ ना कुछ ऐसे उपाय या संसाधन जुटा देती है जिससे वह स्वयं ही अपने पापों के गड्ढे में गिरकर समाप्त हो जाता है । उस्मान खान के लिए भी प्रकृति ने ऐसा ही कर दिया था । श्री कृष्ण जी गीता में उपदेश देते हुए अर्जुन को कहते हैं कि — ” पार्थ ! तू तो निमित्त मात्र है , तेरे शत्रुओं की मृत्यु तो पहले ही हुई पड़ी है । ” बस , यही बात यहां पर लागू हो रही थी । उस्मान खान के पापों ने उसको मार तो पहले ही दिया था, परंतु उसका निमित्त बंदा वीर बैरागी बना।

इसके पश्चात बैरागी ने मुखलिस गढ़ के किले पर अधिकार कर लिया । उसका नाम लोहगढ़ रखा और इसमें बहुत सा गोला बारूद एकत्र कर रख दिया।

जिससे किसी समय उसका अपने लिए प्रयोग किया जा सके। बैरागी के इस प्रकार के प्रारंभिक कार्यों ने ही उसके भविष्य की जानकारी दे दी थी । परिणामस्वरूप हिंदू युवाओं का उसके प्रति आकर्षण बढ़ने लगा। देश भक्ति के भावों से भरे हुए युवा उसके साथ जुड़ने लगे। जिससे उसका सैन्य दल प्रबल होने लगा। हिंदू समाज के लोग उसे अपने लिए भगवान की भेजी हुई दिव्य शक्ति के रूप में देखने लगे। इसी समय कुछ ऐसे मुस्लिम भी बैरागी से आकर मिलने लगे जिनके हृदय में तो कपट था , परंतु ऊपर से वह बैरागी के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर रहे थे और उसके कार्यों की प्रशंसा करते हुए उसके साथ जुड़ने की इच्छा प्रकट कर रहे थे । उनकी योजना थी कि समय आने पर जैसे ही अवसर मिलेगा तुरंत बैरागी का काम तमाम कर दिया जाएगा। ऐसे मुसलमानों में से कई ऐसे भी थे जो बड़ी मूल्यवान भेंट लेकर बैरागी से मिले।

इस प्रकार के कपटी लोगों के बारे में वर्णन करते हुए भाई परमानंद जी लिखते हैं :– ” इनका ( मुस्लिमों का ) हृदय शुद्ध न था , अंदर से इन्होंने साजिश करने का निश्चय किया हुआ था । इन्होंने सूबे को लिखा : — ” हमने इसे हाथों पर डाल दिया है , यह केवल कपट से मारा जाएगा । ” इनके दूत खोखले बांस में यह चिट्ठी डालकर सरहिंद को ले जा रहे थे कि जंगल में एक ऊंट चराने वाले की सांड़नी खेत में जा बड़ी । दैवयोग से चरवाहे ने वह बांस उनके हाथ से लेकर सांडनी को हांका । बांस टूट पड़ा और वह पत्र बाहर निकल आया। बैरागी ने वह चिट्ठी पढ़ी और उन सब मुसलमानों को बुलाया , जिन्होंने उसका आश्रय लिया हुआ था। उनसे प्रश्न किया कि :- ” शरण में आए कपटी के लिए क्या दंड है ? ” सबने कहा :– ” उसे मार देना चाहिए ।”

तब बंदा ने वह पत्र पढ़कर सुनाया । बंदा बैरागी ने फिर पूछा कि :– ” अब मैं क्या करूं ? – बताओ। ” अपनी पोल खुलती देखकर सारे मुसलमान हक्के – बक्के रह गए । अतः अपने कृत्य पर पश्चाताप करते हुए सबने क्षमा के लिए प्रार्थना करनी आरंभ की । बैरागी ने कहा — ” अच्छा जितने मनुष्य इस डेरे के अंदर आ जाएंगे , उनको छोड़ दिया जाएगा । अगणित मुसलमान डेरे के अंदर घुसे और एक दूसरे पर चढ़कर बैठ गए । सबने अपने आप को फंदे में फंसा लिया । सबका बड़ी निर्दयता के साथ वध किया गया । इस स्थान का नाम कतलगढ़ी रखा गया । बैरागी ने अब सदा के लिए यह निश्चय कर लिया था कि आगे से वह मुसलमानों का कभी विश्वास नहीं करेगा ।यह समाचार सुनकर हिंदुओं के घरों में दीए जलने लगे प्रकाश होने लगा। ”

नीच ना त्यागे नीचता , कड़वाहट नहीं नीम ।

पापी पाप में रत रहे , नहीं इनका कोई हकीम ।।

बैरागी युद्ध के समय पूर्णतया युद्ध के उन्हीं नियमों को लागू करता था जिन्हें उस समय की मुगल सत्ता अपनाए हुए थी । उसके यहां किसी प्रकार की नैतिकता के वशीभूत होकर अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारने की उस नीति के लिए कोई स्थान नहीं था , जिसे हमारे यहां पर मानवतावाद या अहिंसावाद के नाम से जाना जाता है । कुछ लोगों के द्वारा इस प्रकार के मानवतावाद या अहिंसावाद को हमारे ऊपर बलात थोपने का प्रयास किया जाता है ।

मुसलमानों ने भारतवर्ष में आकर युद्ध का प्रत्येक नियम तोड़ दिया था । उनके यहां पर जंगलराज ही काम करता था । उनके यहां युद्धकाल और शांति काल दोनों में ही उपद्रव और सब प्रकार के अनैतिक कार्यों की खुली छूट थी । ” बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है “- उनके यहां जंगलराज का यह नियम काम करता था । स्वाभाविक है कि ऐसे जंगलराज का प्रतिरोध जंगलराज के इसी नियम से दिया जा सकता था कि बलशाली की ही जीत होती है और ” जिसकी लाठी उसकी भैंस । ” अतः बंदा बैरागी के हिंसक कार्यों में किसी प्रकार की अनैतिकता या अमानवीयता खोजने की आवश्यकता नहीं है , अपितु युग-धर्म के अनुसार उसके द्वारा लिए गए इस प्रकार के निर्णय की यह कहकर सराहना करने की आवश्यकता है कि उसने राक्षसवृत्ति का दमन करने के लिए राष्ट्र की रक्षार्थ अहिंसा की रक्षार्थ हिंसा करने में विश्वास किया।

जो लोग भारत के महान योद्धाओं का इतिहास में इस भर्त्सना के साथ वर्णन करते हैं कि उन्होंने मानवीयता का प्रदर्शन करते हुए विपरीत धर्मियों पर अत्याचार किए , वह वास्तव में उस ‘ शल्य -धर्म ‘ का पालन करते हैं , जिसने कर्ण को मरवा दिया था।

यह उस समय की बात है जब महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था । एक ओर अर्जुन थे , जिनके सहारे सारथी के रूप में कृष्ण उनके साथ थे । दूसरी ओर कर्ण थे और उस समय उनके सारथि का कर्तव्य धर्म शल्य निर्वाह कर रहे थे । कृष्ण ने कर्ण के सारथि से कहा : – तुम हमारे विरुद्ध अवश्य लड़ो । पर मेरी एक बात मान लीजिए , जब भी कर्ण प्रहार करे , तब केवल इतना ही कहना कि — यह भी कोई प्रहार होता है ? तुम प्रहार करना जानते ही नहीं ? बस , इन वाक्यों को दोहराते रहना । सारथि शल्य ने कृष्ण की बात स्वीकार कर ली ।

युद्ध आरंभ हो गया। कर्ण के प्रत्येक प्रहार पर शल्य कहता :– ” यह भी कोई प्रहार है , तुम प्रहार करना जानते ही नहीं । उधर अर्जुन के प्रत्येक प्रहार पर कृष्ण कहते :- ” वाह कैसा प्रहार किया है ? – वाह क्या निशाना साधा है ? ” प्रत्येक बार कर्ण हतोत्साहित होते चले गए । उनको इस स्थिति से बाहर निकालना कठिन हो गया । उसकी शक्ति टूट गई , वह शक्तिहीन हो गया । जबकि अर्जुन की शक्ति बढ़ती चली गई और पांडव पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए । सचमुच प्रोत्साहन व्यक्ति के लिए अमृत के समान होता है , जबकि हतोत्साहित पराजय की पहली सीढ़ी है।

जो लोग हमारे बंदा बैरागी जैसे महारथियों के विषय में यह कहते हैं कि – ” यह भी कोई प्रहार है , या यह कहां की मानवता हुई कि तुम अपने विपरीत धर्मी को या शत्रु को या देशघातक व्यक्ति को क्रूरता से समाप्त करो ।” वास्तव में ऐसा कहने वाले लोग भारत के इन महारथियों का मनोबल तोड़ने के लिए ही ” शल्य धर्म ” का निर्वाह करते हैं । जब लूटमार के माध्यम से ही बड़े – बड़े साम्राज्य स्थापित किए जा रहे थे , तब लूटमार करने वालों का सामना करने के लिए मानवतावाद की दुहाई देना भी मूर्खता की बात है । निश्चय ही लूटमार करने वालों का सामना करने के लिए उनसे भी अधिक उग्र होना आवश्यक था।

वास्तव में संसार में तीन प्रकार के युद्ध धर्म के नाम पर लड़े जाते रहे हैं । भारत की ओर से लड़े जाने वाले ऐसे युद्धों को ‘धर्म युद्ध ‘ के नाम से ही जाना जाता है । यह युद्ध सत्य और न्याय की स्थापना के लिए लड़े जाते हैं। जो लोग सत्य और न्याय का गला काटते हैं , उनको समाप्त करना और सत्यप्रेमी और न्यायशील लोगों का समाज निर्मित करना इस प्रकार के धर्म युद्ध का उद्देश्य होता है ।

दूसरे , युद्ध क्रूसेड कहलाते हैं । क्रूसेड का अर्थ है क्रूस अर्थात ईसाई मत के प्रचार – प्रसार के लिए युद्ध करना। इसे ईसाई लोगों ने 1095 से 1291 ईस्वी तक लड़ा। ईसाईयों ने ईसाई धर्म की पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उसकी राजधानी यरुशलम में स्थित ईसा की समाधि पर अधिकार करने के लिए 7 बार युद्ध किये । उन्होंने इन युद्धों को ‘ क्रूसेड ‘ कहा । उस समय वहां पर मुस्लिमों का अधिकार था । ईसाई ,यहूदी और मुस्लिम आज भी इस स्थान को अपने नियंत्रण में लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । स्पष्ट है कि इसमें मानवतावाद का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। क्रूसेड सत्य और न्याय के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध नहीं है , अपितु ईसाइयत के प्रचार प्रसार के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध है।

अब तीसरा युद्ध जिहाद है । इसको इस्लाम के प्रचार – प्रसार और विस्तार के लिए लड़ा जाता है । 11 वीं शताब्दी के आरंभ में जैंगी ने पहली बार लोगों को जिहाद के लिए एकत्र किया था । सीरिया को एकजुट कर उसने वहां से ईसाइयों को खदेड़ दिया था और इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की थी । तभी से जिहाद शब्द चल रहा है । यद्यपि इसका प्रारंभ कुछ विद्वानों ने इस्लाम की स्थापना के काल से ही माना है।

स्पष्ट है कि जिहाद में भी मानवतावाद का कहीं दूर – दूर तक स्थान नहीं है । यह भी सत्य और न्याय की रक्षा के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध नहीं है अपितु यह उन लोगों की रक्षा के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध है जो अपने आपको इस्लाम का अनुयायी मानते हैं।

हमने इन तीनों प्रकार के धर्मयुद्धों का उल्लेख यहां पर इसलिए किया है कि यहां पर मुगल बादशाहों के काल में जो युद्ध चल रहा था , वह इस्लाम की ओर से तो जिहाद था , जबकि भारत के छत्रपति शिवाजी महाराज , गुरु गोविंद सिंह और बंदा वीर बैरागी जैसे मानवता के पुजारी लोगों की ओर से यह धर्म युद्ध था। उनका युद्ध पूर्णतया सत्य और न्याय के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध था । अतः उनके युद्ध की पवित्रता पर या इसके योद्धाओं की पवित्रता पर कहीं भी संदेह करना उचित नहीं है।

जिन लोगों ने धर्म युद्ध , क्रूसेड और जिहाद को एक ही माना है , उन लोगों ने इन तीनों प्रकार के योद्धाओं को एक जैसा ही मान लिया है । जबकि सर्वोत्तम योद्धा वही है जो धर्म युद्ध कर रहा होता है । अतः अपने धर्म योद्धा बंदा वीर बैरागी के कार्यों की हमें वंदना ही करनी चाहिए।

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