प्राणशक्ति का रिसाव रोकें

तभी रह पाएगा वजूद

– डॉ. दीपक आचार्य

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प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर द्वारा पर्याप्त प्राणशक्ति और जीवनदायी ऊर्जाओं से भरपूर बना कर भेजा गया है।  इस जीवनीशक्ति का यथोचित उपयोग क्षरण की मात्रा को नियंत्रित रखता है जबकि मनमाना एवं बेजा उपयोग क्षरण अनुपात को तेज कर देता है।

ऊर्जाओं, बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं आदि की कोई कमी कभी नहीं रही है। बात सिर्फ उपयोग की विधि और मात्रा को लेकर ही है।  किसी भी प्राणी की आयु के लिए दिन, माह और वर्ष के रूप मेें किसी भी प्रकार की कोई कालगणना नहीं की गई है। इसके लिए उसे  उन साँसों की सीमा में बाँधा गया है जो उसके लिए निर्धारित हैं।

प्रत्येक प्राणी को उसके कर्म के अनुरूप साँसों की साख सीमा सुनिश्चित की हुई है। जैसे कि एक आम इंसान के लिए दिन-रात में मिलाकर कुल 21 हजार 600 साँस निर्धारित हैं। इसी के अनुसार कुल आयु के साँस विधाता निश्चित करता है। यही साँस जीव की आयु तय करते हैं। इन साँसों को ही जीवन की सीमा माना गया है।

जो लोग इन साँसों के कम समय में पूरी कर लेते हैं वे जल्दी लौट जाते हैं, जबकि जो समझदार लोग आहिस्ता-आहिस्ता इस खजाने को खाली करते हैं वे लम्बे समय तक धरती पर रहा करते हैं। इन साँसों का सीधा संबंध कर्मेन्दि्रयों और ज्ञानेन्दि्रयों की सक्षमता और काम करने की अवधि से होता है।

जीवन के रहस्यों और लक्ष्य को जानने वाले कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर लोगों को साँसों के आयु से संबंध और कालगणना की जानकारी तक नहीं होती। साँसों की गति और आवागमन की तीव्रता उन लोगों में ज्यादा हुआ करती है जो जीवन में अशांत, क्रोधी, शोकमग्न, दुःखी, चिंतित, स्वेच्छाचारी, कामुक, हमेशा भय व अपराध बोध से ग्रस्त, अपराधी, माफिया, उद्विग्न, हर काम में उतावले और हड़बड़िया किस्म के होते हैं।

ऎसे लोगों की साँस सामान्य लोगों के मुकाबले खूब ज्यादा तीव्रतर आवागमन करती है और इस कारण से इन लोगों के साँस का खजाना एकदम खाली हो जाता है और इनकी मौत जल्दी आ जाती है। दूसरी ओर जो लोग धीर-गंभीर, शांतचित्त और मस्त होते हैं उनकी साँसों की तीव्रता काफी कम हो जाती है और इनकी साँसों का खजाना जल्दी खाली नहीं हो पाता। इस कारण ये लोग लंबी आयु प्राप्त करते हैं।

हमारे ऋषि-मुनियों की लम्बी आयु का रहस्य यही था कि वे ध्यान, योग एवं प्राणायाम से अपनी साँसाेंं के आवागमन के बीच आवधिक दूरियाँ बढ़ा लिया करते थे। इस कारण से इनकी साँसों का खर्च बहुत ही कम होता था और इसी कारण इनका यह खजाना मंद गति से खाली होता था। और यही कारण है कि जब तक यह खजाना रहता था,  काल भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता था।

जीवन के लक्ष्योें और शरीर के रहस्यों से अनभिज्ञ लोग आज भागमभाग की जिन्दगी जी रहे हैं जहाँ हर क्षण छीनाझपटी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, बेईमानी, भ्रष्टाचार, पदलोलुपता, लूटखोरी और रिश्वतखोरी से लेकर अपने घर भरने के लिए नाजायज तरीकों से अंधाधुंध कमायी, जमीन-जायदाद पर कब्जा करने और सारी दुनिया का माल हड़प जाने की मनोवृत्ति हावी है।

इस वजह से इंसान हमेशा उद्विग्न, उन्मादी, क्रोधी, अशांत और अस्थिर चित्त रहने लगा है। इन विषम स्थितियों में स्वाभाविक रूप से साँसों के आवागमन का क्रम तेज हो जाता है और साँसों का खर्च हद से ज्यादा बढ़ जाता है। यही कारण है कि उद्विग्न और अशांतचित्त लोग हमें छोड़कर जल्दी-जल्दी ऊपर जा रहे हैं। और जो हैं उनकी भी आयु कम हो रही है।

यही स्थिति अंगों के उपयोग के बारे में भी है। जो जिस अंग का ज्यादा उपयोग करेगा, वह उस अंग की शक्तियों को खो बैठेगा। कई लोग जमाने भर को सुनने के आदी होते हैं जो अपने कान खो देते हैं, कई सारे लोग इतना सारा बोलते रहते हैं कि बुढ़ापा आते-आते उनकी जबान और मुँह जवाब दे जाते हैं, कई लोग भोगविलास और काम में इतने रमे होते हैं जीवनीशक्ति का क्षरण उन्हें इस मामले में नाकाबिल बना देता है। कई खाने के शौकीन पेटूओं के लिए दो रोटी खाना भी दुश्वार हो जाता है। इन सभी स्थितियों में इंसान के लिए जरूरी है कि जीवन व आयु के रहस्य को समझकर जिन्दगी का आनंद प्राप्त करे।

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