भारत में अल्पसंख्यकों की समस्या, भाग-2

भयानक राजनीतिक षडयंत्र संपादकीय
ऐसी परिस्थितियों में अल्पसंख्यक लोगों की विशेष समस्या बनकर उभरी कि इनके जीवन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए क्या उपाय किया जाए? सामान्यत: देखा गया है कि बाहरी देश नस्ल और संप्रदाय के लोगों को किसी दूसरे देश के निवासी अधिक सम्मान नहीं देते हैं। युगांडा जैसे कई अफ्रीकी देशों से एशियाई मूल के कितने ही अल्पसंख्यकों को भगाया जा चुका है। ऐसी प्रवृत्तियां मानवता के नाम पर कलंक होती हैं।
इन घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिए ही अल्पसंख्यक शब्द को संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘मानवाधिकार आयोग’ की उपसमिति को विशेष रूप से परिभाषित करना पड़ा। अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक तभी माना जाएगा जबकि उनकी संख्या उस राज्य की जनसंख्या की तीस प्रतिशत कम से कम हो, जिसमें वे निवास करते हैं। इसका कारण यह है कि तीस प्रतिशत से कम लोग यदि किसी देश में किसी भिन्न नस्ल, भाषा और संप्रदाय वाले बनकर रह रहे हैं तो उन्हें अपनी नस्ल, भाषा और संप्रदाय को अलग बनाये रखने के प्रति हठ नहीं करनी चाहिए।
वे अपनी इन सब बातों को उस देश की नस्ल, भाषा और संप्रदाय के साथ सहजता से विलीन कर दें। इसमें ही उनका एवं उनके देश का भला है। क्योंकि यदि दस बीस प्रतिशत लोग भी अपनी नस्ल, भाषा और संप्रदाय की पहचान को भिन्न बनाये रखने हेतु हठ करेंगे तो इसी प्रकार की हठ से उस देश में साम्प्रदायिक विद्वेष बढक़र सामाजिक कटुता ही उत्पन्न होगी।
यदि किसी देश में किसी भिन्न नस्ल के तीस प्रतिशत लोग निवास करते हैं तो उनके प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘मानवाधिकार आयोग उपसमिति’ ने विशेष व्यवस्था की है। जिसके अनुसार तीस प्रतिशत लोगों के लिए अलग नस्ल, भाषा और संप्रदाय बना रहना चाहिए। किंतु वह भी इस मूल्य पर कि वे अपनी अलग पहचान बनाकर भी उस राष्ट्र राज्य के प्रति पूर्णत: निष्ठावान रहेंगे जिसमें कि वे निवास कर रहे हैं।
अब देखते हैं कि अल्पसंख्यकों को लेकर भारत में हमारे  राजनीतिज्ञों के क्या विचार रहे हैं? हमारे माननीय नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयोग उपसमिति की भावनाओं के विपरीत जाकर भारत में अल्पसंख्यक शब्द के साथ ही मनमानी करना प्रारंभ कर दिया। इन्होंने मुस्लिमों को, ईसाईयों को, बौद्घों को, जैनियों और सिक्खों को अल्पसंख्यक कहा है। भारतीय कानून जो कि अंग्रेजों ने बनाया  था- वह तो बौद्घ, जैन और सिखों को हिंदू ही मानता है किंतु हमारे नेताओं ने अपने भाषणों में उन्हें एक अलग संप्रदाय मान लिया है। कहने का अभिप्राय है कि जिस कार्य को विदेशी शासक नहीं कर पाये उसे हमारे नेताओं ने पूरा कर दिया। 
सचमुच हमारे इन नेताओं के उपकारों से यह भारत माता युग-युगों तक ‘उऋण’ नहीं हो पाएगी। भारत में चाहे संप्रदाय अलग हों -किंतु हम सबकी नस्ल तो एक है। भाषा भी एक ही स्थापित की जा सकती है। हिंदी को सारे देश में संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं किया गया।

भारत में वैधानिक अल्प-संख्यक कोई नहीं
संयुक्त राष्ट्र संघ की परिभाषा  के अनुसार हमें अपने देश में कोई भी अल्पसंख्यक नहीं मानना चाहिए था। यदि हम ऐसा करते तो इससे राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की भावना बलवती होती। तब हम सब स्वेच्छा से मिल जाते -एक महासागर में। विलीन कर देते इसी में अपना स्वरूप, अपना सर्वस्व। तब इस राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति हमारी आस्था असंदिग्ध होती। लेकिन हमने जितना अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक का ढिंढोरा पीटा, उतनी ही हमारी निष्ठा राष्ट्र के प्रति संदिग्ध होती चली गयी। जिसके दुष्परिणाम आज हम सभी भुगत रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रों की एकता और अखण्डता को सुरक्षित रखने के लिए इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को परिभाषत किया। जिसे भारत में कुछ षडय़ंत्रकारियों ने पूरी निष्ठा से कभी लागू नहीं होने दिया। राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक है कि नस्ल, भाषा, संप्रदाय और विचारधाराओं की जितनी भर भी भिन्नताएं किसी राष्ट्र-राज्य में उपलब्ध हैं, उन्हें शनै:-शनै: समाप्त किया जाए। सबको एक मुख्यधारा में लाकर जोड़ दिया जाए। हम जितना अधिक मुख्यधारा को प्रवाहमान बनाएंगे उतने ही अनुपात में हमारे राष्ट्र की एकता और अखण्डता अक्षुण्ण रहेगी। खेद का विषय है कि हम छोटी-छोटी पहचानों को मुख्यधारा बनाने में लगे हुए हैं।
बिना यह विचारे हम ऐसा कर रहे हैं कि आने वाले कल में यह ऐसी मुख्यधारा हमारे राष्ट्र में विघटन की फसल खड़ी कर देगी और ये ऐसी फसल होगी कि जिसे काटना असंभव हो जाएगा। छोटे-छोटे संप्रदाय, जाति और वर्ग के लोग किसी अपने महान पूर्वज की स्मृति में अवकाश की मांग करते हैं और उसे देर-सवेर हमारी राज्य सरकारें या केन्द्र सरकार राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार कर लेती हैं। यह क्रम हमें किस ओर ले जा रहा है और कहां जाकर रूकेगा? कुछ पता नहीं।
एक मूर्खता को एक शासक कर जाए तो वही मूर्खता अगले आने वाले शासक के लिए उदाहरण बन जाती है। उसके आने पर पुन: वही पुराने वाला दु:खदायक राग अलापा जाता है और वही गलती होती है, या करायी जाती है-जो पहले ने की थी। कल को ये वर्ग (जो आज हिन्दू बहुसंख्यक समाज के ही अंग हैं) हो सकता है स्वयं को अल्पसंख्यक मनवाने के लिए आंदोलन करें। हमारे नेता तब इनकी बात को मानकर इन्हें अल्पसंख्यक घोषित कर सकते हैं। तब इन्हें भी आरक्षण की आवश्यकता होगी और उन सारी विशेष व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी जो आज का अल्पसंख्यक चाह रहा है, अथवा उनका आनंद उठा रहा है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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