बिखरे मोती-भाग 31

बिखरे मोती

ईश भजन से भय मिटै, विनम्रता से अहंकार कसौटी कनक को परख दे,
कितना कनक में दोष।
आचरण से मनुष्य के,
परखे जायें गुण-दोष ।। 454।।

एक ही मां की कोख है,vijender-singh-arya
किंतु भिन्न स्वभाव।
जैसे बेर के वृक्ष पर,
फल में हो अलगाव ।। 455।।

जिसका हृदय साफ हो,
होता न धोखेबाज।
मूरख मृदुभाषी नही,
जग का अटल रिवाज ।। 456।।

दरिद्र द्वेष करें धनिक से,
मूरख करें विद्वान।
सुहागिन से विधवा करें,
कुलीन से विधवा जान ।। 457।।

विद्या नष्ट प्रमाद से,
बीज कटौती खेत।
पर घर नारी नष्ट हों,
चेत सके तो चेत ।। 458।।

धान की रक्षा धर्म से,
कुल की रक्षक नार।
राजा की रक्षक मधुरता,
विद्या दोहरा हर बार ।। 459।।

दरिद्रता नष्टï हो दान से,
दु:खों को सदाचार।
ईश भजन से भय मिटै,
विनम्रता से अहंकार ।। 460।।

जितना हो खामोश रह,
देख जगत की चाल।
‘स्व’ में होना अवस्थित,
निजता का रख ख्याल ।। 461।।

सागर में बरसात हो
पेट भरे पे खिलाय।
धनी व्यक्ति को दान दे,
सारा व्यर्थ ही जाए ।। 462।।

आत्मबल जैसा बल नहीं,
बादल जैसा नीर।
आंख की ज्योति श्रेष्ठ है,
अन्न से पुष्टï शरीर ।। 463।।

वाणी चाहते हैं पशु,
मनुज की इच्छा स्वर्ग।
निर्धन को धन चाहिए,
देवों को अपवर्ग ।। 464।।

चलायमान है लक्ष्मी,
एक दिन प्राण भी जाए।
जीवन जोबन नष्टï हों,
स्थिर धर्म कहाय ।। 465।।

राजा-योगी जो घूमते,
लोग करें सत्कार।
दर-दर घूमती जो फिरै,
भ्रष्टï होय वह नार ।। 466।। क्रमश:

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