बजट पर सरकार व एमसीडी में ठनी

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सियासत में हार-जीत और शह-मात का खेल चलता रहता है, लेकिन दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) चुनाव में भाजपा के हाथों कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त ने दोनों दलों के बीच तल्खी बढ़ा दी है। इसका असर सूबे की कांग्रेसी सरकार व भाजपा के नेतृत्व वाले नगर निगमों के रिश्तों पर भी पडऩे के आसार हैं।एमसीडी को बजट आवंटन जैसे छोटे से मसले पर सरकार का पक्ष रखने के लिए जिस प्रकार सोमवार को दिल्ली सरकार के मंत्रियों की फौज उतर आई, उससे यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों तक सत्ता के इन दोनों केंद्रों के बीच भिड़ंत जारी रहने वाली है।दिल्ली मंत्रिमंडल ने पिछले दिनों एमसीडी के लिए 5326 करोड़ रुपये का बजट जारी किया था। इस बारे में एमसीडी के भाजपा नेताओं ने कह दिया कि इसमें से 1831 करोड़ रुपये तो बतौर ऋण दिए गए हैं। सरकार को यह बात अखर गई। इसीलिए सोमवार को परिवहन मंत्री अरविंदर सिंह, ऊर्जा मंत्री हारून यूसुफ व श्रम मंत्री रमाकांत गोस्वामी ने एक संवाददाता सम्मेलन कर कहा कि भाजपा के नेता हमेशा गलतबयानी कर भ्रम फैलाते हैं। लेकिन अब इसकी इजाजत उनको नहीं दी जाएगी। दिल्ली की जनता को यह मालूम होना चाहिए कि सरकार तीनों नए नगर निगमों के बेहतर संचालन के लिए हरसंभव सहायता दे रही है।परिवहन मंत्री अरविंदर सिंह ने आरोप लगाया कि एमसीडी प्रशासन सरकार द्वारा दिए गए पैसे खर्च नहीं कर पाता। यही आरोप श्रम मंत्री गोस्वामी ने भी लगाया। उन्होंने कि केंद्र सरकार की जेएनएनयूआरएम परियोजना के तहत एमसीडी को 126 करोड़ रुपये दिए गए लेकिन ये लोग वह पैसा खर्च ही नहीं कर पाए।ऊर्जा मंत्री यूसुफ ने कहा कि एमसीडी सही तरीके से संपत्ति-कर की वसूली तक नहीं कर पाती। शहर में करीब 31 लाख संपत्तियां हैं लेकिन संपत्ति कर की वसूली महज नौ लाख संपत्तियों से की जाती है। दिल्ली सरकार के मंत्रियों ने कहा कि राज्य सरकार सकारात्मक सोच के साथ तीनों निगमों को पर्याप्त आर्थिक सहयोग करेगी लेकिन एमसीडी नेताओं को भी चाहिए कि वे जनता को गलत जानकारी देने के बदले ईमानदारी से अपना काम करें।

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