आडवाणी को भी अटल बनना होगा

प्रमुख समाचार/संपादकीय

राकेश कुमार आर्य
भाजपा नेता आडवाणी का समय संन्यास का है, पर मन की अभिलाषा पूरी न होते देख इस वृद्घावस्था में आकर ‘खिसियायी बिल्ली खम्भा नोंचे’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। समय उनके हाथ से निकल चुका है, और उसने अपना फोकस भाजपा में मोदी को बना लिया है। आडवाणी इस तथ्य को समझ भी गये हैं, परंतु ‘लागी छूटे ना’ वाली स्थिति भाजपा के इस वयोवृद्घ नेता की हो रही है। सत्ता का मोह छूटे नही छूट रहा। अब देश के जनमानस को तो अपनी ओर मोड़ नही सकते, तो ये ही सही कि मोदी के सामने लाने हेतु पार्टी के एक अन्य मुख्यमंत्री (मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान) की ही पीठ थपथपा दी। समाचार पत्रों ने आडवाणी की इस पीठ थपथपाने की कार्रवाई को उन्हीं अर्थों में छापा जिन अर्थों में आडवाणी जी ने कहा था भाजपा अपने नेता के बयान से सकते में आ गयी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी के विषय में प्रारंभ से ही स्पष्ट हैं, उन्होंने साहस किया और पुन: स्पष्ट कर दिया कि भाजपा में मोदी लोकप्रियता में सबसे आगे हैं। आडवाणी को अपनी बात का संयत भाषा में सटीक जवाब मिल गया। उधर सी.एम. शिवराज सिंह चौहान ने भी कह दिया कि भाजपा मुख्यमंत्रियों में उनका स्थान तीसरा है। पहले पर मोदी हैं तो दूसरे पर रमन साहब हैं। advani
वैसे आडवाणी के दर्द की दास्तां लम्बी है। 1947 में वह पाक से उजड़कर भारत में आए, सीने का दर्द वहीं से शुरू हुआ। भारत ने उन्हें इज्जत दी, शौहरत दी, मान दिया, सम्मान दिया। पर पाक से यहां आने में जो दर्द हुआ था या दर्द झेला था उसकी चुभन बनी रही। दूसरा काम उन्होंने रामरथ यात्रा का किया और राममंदिर निर्माण के नाम पर भाजपा को सत्ता के लिए लम्बी छलांग लगवाई, लेकिन सत्ता में आने पर उनके भीतर का आडवाणी जाग गया और उन्होंने कह दिया कि राममंदिर निर्माण हमारे एजेण्डा में नही है। दूसरी खाल ओढ़े आडवाणी को जब देश की रामभक्त जनता ने असली रूप में देखा तो उन्हें दिल की गद्दी से उतार कर फेंक दिया। गंगा यमुना में पानी बहता रहा और समय गुजरता रहा, पर रामरथ यात्रा में मिले सम्मान को आडवाणी वैसे ही पकड़े रहे जैसे 1947 के संस्मरणों को पकड़े रहे हैं। उन्हें फीलगुड का फीवर हो गया और वह मानने लगे कि देश की जनता तेरे लिए आज भी रामरथ सजाए खड़ी है, जबकि जनता के रामरथ से तो उतर कर वह खुद ही भाग गये थे। अब वह मारे दर्द के चीखते हैं और कहते हैं कि कोई मुझे मेरे बीते दिन लौटा दे।
इस दौरान देश की जनता का ध्यान गुजरात ने अपनी ओर खींचा और देश की जनता ने उसकी ओर देखना आरंभ किया। गुजरात ने जनता का ध्यान अपनी ओर इस कदर केन्द्रित किया कि ‘गुजरात का मोदी’ को ‘देश का मोदी’ बनाकर रख दिया। अब मोदी कल परसों के नेता हैं, और आडवाणी ठहरे 90 वर्ष के राजनीति के कुशल खिलाड़ी। इसलिए एक पुराने खिलाड़ी को आउट होते होते भी नये खिलाड़ी का खेल इसलिए पसंद नही आ रहा है कि इस नये खिलाड़ी की वजह से ही वह आउट हो रहे हैं, और अपने पी.एम. बनने के सपने से उभरने वाले तीसरे दर्द को सीने में छुपाकर उन्हें राजनीति से ही नही अपितु दुनिया से भी गमगीन रूखसत लेनी पड़ रही है। सचमुच राजनीति की दुनिया बड़ी बेरहम है। इसमें जो चेला कभी गुरू के पांव दबाता था,
वक्त आने पर गुरू से अपने पैर दबवाने लगता है। वक्त की हर शै गुलाम। मोदी आडवाणी के प्रति ऐसे भाव तो नही रखते पर वक्त ने साबित कर दिया है कि अब पैर दबाने की बारी किसकी है? अब राजनीति के शिष्य बेटा तो होते नही कि जो सदा ही बेटा रहेंगे, वो तो स्वार्थी परिवेश से पैदा हुए स्वार्थी चेले होते हैं, इसलिए वक्त आने पर फटाफट गुरू के सामने अपने पैर कर देते हैं कि दबाओ। आडवाणी जैसे लोग इसीलिए दुखी होते हैं कि ये क्या हो रहा है, दूसरों के पैर दबा नही सकते और अपने कोई दबा नही रहा। अब मोदी तो पैर आगे नही कर रहे पर जनता उन्हें अपनी ओर से लोकप्रियता के अंक फटाफट ज्यादा दिये जा रही है। बस मोदी की लोकप्रियता के ये बढ़ते अंक ही आडवाणी को ऐसे लगते हैं कि जैसे मोदी ने तेरे सामने अपने पैर कर दिये हैं। जब ऐसी अनुभूतियां होने लगती हैं तो कैसी पीड़ा होती है उसे केवल आडवाणी जी ही बेहतर जानते होंगे। अब वह मोदी का विकल्प तलाश रहे हैं और सोच रहे हैं कि जाते जाते मोदी की थाली में तो लात मारता ही चलूं। पर उन्हें यह पता नही है कि तू जो कुछ भी कर रहा है वह पार्टी हित में तो है ही नही साथ ही राष्ट्रहित में भी नही है। क्योंकि जब पार्टी का कार्यकर्ता मोदी के पीछे लामबंद होता जा रहा है तो देश का मतदाता भी उनके पीछे आता जा रहा है। अत: यदि अगली सरकार मोदी या भाजपा बनाते बनाते रह गये और देश को फिर कोई ‘मनमोहन’ या ‘एच.डी. देवेगौड़ा’ मिल गया तो उसके लिए जिम्मेदारी आडवाणी की होगी। इससे वह निश्चय ही अपयश के भागी होंगे और यह अपयश का दर्द उनके दिल को दुनिया से जाने के बाद भी सालता रहेगा।
इसलिए आडवाणी जी के लिए उचित है कि वो पार्टी हित और देशहित को निजी हित से ऊपर देखें। पार्टी और देश ने उन्हें बहुत कुछ दिया है, वह कांग्रेस के गांधी से और 1977 के जे.पी. नारायण से शिक्षा ले सकते हैं। इन दोनों महानुभावों ने समय आने पर किसी अन्य को आगे कर दिया और स्वयं पीछे खड़े हो गये। परंतु देश की कृतज्ञ जनता ने उन दोनों के बलिदान को व्यर्थ नही जाने दिया, आज भी ये दोनों महानुभाव देश की जनता के दिल में जिंदा हैं और देश उनके प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन करता है। अत: आडवाणी जी को भी बलिदान की इसी परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। क्योंकि पी.एम. तो रोज पैदा होते हैं पर ‘गांधी और जे.पी.’ तो कभी कभी ही पैदा होते हैं। वह मनमोहन सिंह को देश का अब तक का सबसे कमजोर पी.एम. मानते हैं, इस बात को उन्होंने कई बार दोहराया है। पर वह भूल जाते हैं कि सत्ता मोह के चक्कर में फंसे मनमोहन को तो वह कोस रहे हैं, पर वह स्वयं भी तो सत्ता मोह के कारण ही अपनी दुर्बलता का प्रकटन कर रहे हैं। वह कमजोरी दिखा रहे हैं और देश की जनता सब कुछ जान रही है। देश की जनता जब जिन्ना की मजार पर झुके आडवाणी को कभी माफ नही कर पाई तो सत्ता के लिए हाथ पांव मारते आडवाणी को भी कैसे माफ करेगी? आडवाणी जी राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं। उन्हें देश की जनता की नब्ज पहचाननी चाहिए। समय उनसे यही कह रहा है, देश भी कह रहा है, उनकी पार्टी भी कह रही है, और उनकी आत्मा भी कह रही है। कह नही रहा तो वह उनका अहम है। इसी अहम के बहम में वह भाजपा के बनते खेल को बिगाड़ रहे हैं। सचमुच राजनीति में भी बड़ा बनने के लिए बड़ी साधना की आवश्यकता होती है। 1984 की बात है, अटल जी आम चुनावों में ग्वालियर से चुनाव लड़ रहे थे। राजीव गांधी के प्रति बनी सहानुभूति लहर विपक्ष के बड़े बड़े गढ़ गिरा रही थी। विपक्ष के अच्छे-अच्छे नेता अंधड़ में बड़े-2 दरख्तों की तरह भूमिसात हो रहे थे। चुनाव में कई लोग मुंह की खा चुके थे। अटल जी भी चुनाव का नतीजा समझ गये थे। जब एक लाख से अधिक मतों से पीछे हुए तो उन्होंने यह कहकर अपनी हार स्वीकार कर ली थी कि मुझे ग्वालियर की जनता का फैसला स्वीकार है। देश की जनता ने जब अटल जी का फैसला सुना तो हर किसी को ग्वालियर की जनता के फैसले पर अफसोस हुआ, पर अटल जी का कद इससे बढ़ गया। आडवाणी जी के लिए यह अफसोस की बात है कि वो अपने देश की जनता के, अपनी आत्मा के और अपनी पार्टी के फैसले को नजरअंदाज कर रहे हैं। आडवाणी जी को भी अटल बनना होगा।

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