अपने ही लोग मुसीबत बने केंद्र सरकार के लिए

राजनीति

नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली। एक मशहूर शेर है-हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, मेरी किश्ती थी डूबी वहां जहां पानी कम था। केंद्र की मनमोहन सरकार का भी कुछ ऐसा ही हाल है। सरकार के लिए मुश्किलें उसके अपने ही लोग खड़ी कर रहे हैं जिससे सरकार की छवि तो प्रभावित हो ही रही है साथ ही भ्रष्टाचार मुद्दे पर विपक्ष के भारी विरोध के चलते संसदीय प्रणाली भी ठप पड़ने लगी है। अभी कोलगेट मुद्दे पर कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस्तीफे की मांग पर संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण ठप था ही कि रेल मंत्री पवन कुमार बंसल के भांजे की ओर से रेलवे में प्रोन्नति दिलाने के लिए करोड़ों रुपए की घूसखोरी का मामला सामने आ गया। जाहिर है कांग्रेस और सरकार के लिए यह बड़े संकट का समय है यदि मंत्री का इस्तीफा नैतिकता के आधार पर लिया गया तो विपक्ष इसे अपनी जीत के रूप में प्रचारित करेगा और यदि इस्तीफा नहीं लिया गया तो मीडिया इस मसले को जोर शोर से उठाता रहेगा। प्रधानमंत्री के लिए रेलगेट प्रकरण बड़ा झटका है क्योंकि अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल को वह काफी मानते हैं और दोनों को अपनी इच्छा के अनुसार ही उक्त मंत्रालयों का प्रभार सौंपा था। उनके सामने अब स्थिति यह है कि या तो उन्हें इन दोनों मंत्रियों से हाथ धोना पड़ेगा या फिर सर्वाधिक प्रिय को बचाने के लिए एक का इस्तीफा लेकर ही विपक्ष को शांत करने का प्रयास करना होगा। जिस वर्ष आधे दर्जन से अधिक राज्यों में चुनाव होने हों और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव प्रस्तावित हों ऐसे में एक एक कर मंत्रियों का नाम कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ना सरकार की छवि को खासा प्रभावित कर रहा है। 2009 के लोकसभा चुनावों में मनमोहन सिंह ने अपनी उपलब्धियों को पेश कर चुनावों का सामना किया था लेकिन वैसी स्थिति 2014 में नहीं रहने के आसार हैं। संप्रग-1 सरकार में मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में जहां एक ही मंत्री विवादों में रहा तो संप्रग-2 में कई मंत्रियों के साथ विवाद जुड़े। संप्रग-1 के समय कोयला मंत्री शिबू सोरेन को जब अपने सहायक के अपहरण और हत्या का दोषी ठहराया गया तो प्रधानमंत्री ने उनसे इस्तीफा ले लिया था। लेकिन संप्रग-2 के अब तक के कार्यकाल में कई मंत्रियों ने प्रधानमंत्री और पार्टी आलाकमान के लिए मुश्किलें खड़ी की। संप्रग-2 में शुरुआत ए. राजा ने की। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुए कथित घोटाले में जब उनका नाम आया तो प्रधानमंत्री ने उनका काफी बचाव किया लेकिन जब इस मुद्दे पर संसद ठप हो गई तो उन्होंने राजा से इस्तीफा ले लिया। कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन का नाम भी 2जी स्पेक्ट्रम मामले से जुड़ा तो बचाव के काफी प्रयासों के असफल होने पर इस्तीफा लिया गया। इसी मामले में पी. चिदंबरम पर भी सवाल उठे लेकिन वह अब तक बचे रहे हैं। केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर को अपनी पत्नी को आईपीएल फ्रैंचाइजी के शेयरों में मिले कथित अनुचित लाभ के चलते पद छोड़ना पड़ा। कोलगेट मामले में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल निशाने पर आये लेकिन कांग्रेस उन्हें बचाने में सफल रही। हालांकि इसी कोलगेट मामले की भेंट सुबोध कांत सहाय जरूर चढ़ गये जोकि पर्यटन मंत्री रहते अपने भाई को कोल ब्लॉक अनुचित तरीके से दिलाने के आरोपी थे। केंद्रीय लघु एवं मध्यम श्रेणी उद्योग मंत्री से वीरभद्र सिंह को तब इस्तीफा देना पड़ा जब शिमला हाईकोर्ट ने वीरभद्र पर भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोप तय कर दिये। कानून मंत्री रहे सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी के एनजीओ पर विकलांगों के लिए मिले सरकारी धन में हेरफेर का आरोप लगा तो उनके भी इस्तीफे की मांग हुई। कुछ समय बाद कानून मंत्रालय से खुर्शीद को विदेश मंत्रालय भेज दिया गया। अब कोलगेट मामले में अदालत की मनाही के बावजूद सीबीआई की स्थिति रिपोर्ट देखने के चलते कानून मंत्री अश्विनी कुमार और अपने भांजे की ओर से रेलवे में प्रोन्नति दिलाने के नाम पर रिश्वत लिये जाने के मामले के चलते रेल मंत्री पवन कुमार बंसल पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है।
प्रधानमंत्री और कांग्रेस के भरसक बचाव प्रयासों का अंतिम परिणाम क्या निकलता है यह आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा।

2009 में संप्रग-2 की सरकार बनने के बाद से ही मनमोहन सरकार अपनों की ओर से ही पेश विभिन्न चुनौतियों से जूझ रही है जिसमें मंत्रियों के अलावा पार्टी सांसदों ने भी कई बार मुश्किलें बढ़ाईं जिनमें सुरेश कलमाड़ी सबसे आगे रहे। वह राष्ट्रमंडल खेल घोटाला मामले में कई दिन जेल में रहकर आए और फिलहाल जमानत पर हैं। सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं के क्रियान्वयन में भी काफी खामियां पाई गई हैं। ग्रामीण गरीबों को न्यूनतम दिहाड़ी रोजगार की कानूनी गारंटी देने वाले सरकार के बहु-प्रचारित कार्यक्रम मनरेगा पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट में केंद्र सरकार की खिंचाई की गई है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस योजना में 2,252 करोड़ रुपये की राशि को दूसरे काम के लिए निकाल लिया गया या ऐसे काम पर खर्च किया गया जिसकी योजना के तहत अनुमति नहीं है। संप्रग सरकार की ओर से किसानों की ऋण माफी योजना के क्रियान्वयन में भी खामियां दिखाते हुए कैग की अन्य रिपोर्ट में बताया गया कि अधिकतर वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ ही नहीं मिला। कैग की ही एक अन्य रिपोर्ट में बगैर प्रतिस्पर्धी बोली मंगाए रिलायंस इंडस्ट्रीज से एक गहरा समुद्री ड्रिलिंग रिग किराए पर लेने के सरकारी कंपनी ओएनजीसी के कदम पर भी सवाल खड़ा किया है। इसके अलावा कैग की 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन संबंधी और कोयला खदानों के आवंटन संबंधी रिपोर्टों के चलते सरकार पहले ही परेशानी में है।

इसके अलावा अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर वैश्विक नरमी के चलते घरेलू विकास दर घटने से भी सरकार की छवि प्रभावित हुई, एक समय ऐसा भी आया कि विदेशी मीडिया भी इस बात को लिखने लगा कि ‘नीतिगत अनिर्णय की बीमारी से ग्रस्त है भारत सरकार’। पिछले वर्ष अगस्त में हुए राष्ट्रपति चुनावों के बाद से एकाएक संप्रग सरकार ने तेजी से कई बड़े निर्णय कर अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की कोशिश की लेकिन कुछ ही दिनों में अपनों ने ही फिर उसके लिए चुनौतियां खड़ी कर दीं। पहले बहुब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दिये जाने के विरोध में तृणमूल कांग्रेस ने संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो उसके बाद श्रीलंका में तमिलों पर कथित अत्याचार के मुद्दे पर द्रमुक ने संप्रग से समर्थन वापस ले लिया। सरकार फिर उस स्थिति में गई जब उसे आम सहमति की जरूरत पड़ने लगी। सपा बसपा के सहयोग से सब कुछ ठीक हो ही रहा था कि कोलगेट और अब रेलगेट उसकी राह की अड़चन बन गये हैं।

कांग्रेस के लिए मुश्किल वाली बात यह है कि रेलगेट मसला कर्नाटक विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होने से एक दिन पहले उजागर हुआ। वहां कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए इस बार कड़ी मेहनत की है। वैसे कांग्रेस को उम्मीद है कि राज्य के मुद्दों पर हो रहे इन चुनावों में रेलगेट उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगा। अपने मंत्रियों का बचाव करना कांग्रेस का अधिकार है लेकिन यह बात नैतिकता से परे लगती है जिसमें पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने रेलगेट प्रकरण पर मंत्री के इस्तीफे की मांग पर कहा है कि विपक्ष को इस्तीफा मांगने का रोग हो गया है।

बहरहाल, जहां तक पवन कुमार बंसल की बात है तो वह कह रहे हैं कि अपने भांजे विजय सिंगला के साथ उनके कारोबारी रिश्ते नहीं हैं लेकिन मीडिया रिपोर्टों की मानें तो पिछले लोकसभा चुनावों में सिंगला ने ही बंसल के वित्त प्रबंधन का काम संभाला था। ऐसा भी नहीं है कि बंसल कोई पहली बार विवादों में घिरे हों। वर्ष 2011 में बंसल तब भी विवादों में घिरे थे जब केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में छोटी दुकानों के आवंटन में करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी की उपायुक्त स्तर पर हुई जांच में ‘बूथ माफिया’ का साथ देने के मामले में बंसल के साथ कई वरिष्ठ नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के नाम सामने आए। जहां तक रेलवे की बात है तो इस विभाग में पहले भी भ्रष्टाचार की खबरें आती रही हैं और सारा खेल ठेकेदारी हासिल करने से जुड़ा है। यकीनन इस वर्ष के रेल बजट के जरिए बंसल ने रेलवे की स्थिति सुधारने के प्रयास किये थे लेकिन अब देखना होगा कि वह इस मंत्रालय में कब तक रह पाते हैं।

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