हरिजनों का अपना दायित्व

  • 2015-08-18 02:00:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत में ऐसी बहुत सी जातियाँ हैं जो अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति में परिगणित की जाती हैं। भारतीय समाज के विषय में यह एक रोचक तथ्य है कि यहाँ जो जातियाँ निम्न मानी जाती हैं, उनसे भी निम्न जातियों को ये अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की जातियाँ हेयभाव से देखती हैं। जैसे जाटव लोग भंगी समाज के लोगों के प्रति अपना दृष्टि कोण रखते हैं।

हमारी सब की एक धारणा अपनी जाति को लेकर ये बनी है कि हम स्वयं समाज में अपनी उच्चता या निम्नता के बारे में स्वयं सावधान रहते हैं कि मैं समाज में अमुक स्थान अथवा पायदान पर खड़ा हूँ। मान लीजिए समाज में कुल 100 जातियाँ है तो हमें अपने आप ही यह ज्ञात होता है कि इस समाज में मेरा स्थान 20 वाँ है या 80 वाँ इत्यादि। यह हमारा एक संस्कार बन गया है, और हम इस संस्कार में जीने के अभ्यासी बन गये हैं। परन्तु इस प्रकार की मानसिकता सबकी भी नही हैं। हरिजनों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में विशेषत: शिक्षित वर्ग में व्यापक परिवर्तन आया है। लोगों की सोच में परिवर्तन आया है और बहुत स्थानों पर अब देश में स्वतंत्रता पूर्व की वह स्थिति नही रही है कि जब हरिजनों को अछूत माना जाता था, तथा उन्हें सार्वजनिक स्थानों यथा मन्दिर, स्कूल आदि पर जाने तक की अनुमति नहीं थी। हमारे हरिजन भाईयों को भी कुछ बातें समझनी चाहिऐ। हमें ज्ञात होना चाहिए कि हम सब इस देश को पुन: ‘विश्व गुरू’ बनाना चाहते हैं। इसके लिए अंग्रेजों द्वारा स्थापित इस मान्यता को बदलना होगा कि हिन्दू केवल ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी, मानसिकता के लोग ही हैं। इन्हें चाहिए कि वह स्वयं को हिन्दू समाज का ही एक अंग समझें और इसी रूप में स्वयं को स्थापित करें।

दूसरे, आर्य विदेशी नही थे, अपितु वह इसी देश के मूल निवासी थे। इस धारणा को स्थापित कर अंग्रेजों की इस भ्रान्त धारणा को समाप्त किया जाये कि यहाँ के मूल निवासी शूद्र लोग थे। हमें मानना चाहिये कि आर्यों की वर्ण व्यवस्था शुद्घ वैज्ञानिक थी, उसमें विकार आने पर जाति व्यवस्था सृजित हुई, जो हमारे पतन का कारण बनी।

तीसरे, इन्हें चाहिए कि ये स्वयं को छोटा समझकर हीन भावना का प्रदर्शन न करें। मैं अपने एक प्रोफैसर साहब को जानता हूँ जो जाति से जाटव थे, और वह अपने नाम के पीछे जाटव ही लिखा करते थे। इसी प्रकार एक दस्तावेज लेखक थे जो अपने नाम के पीछे सीधे-सीधे चमार लिखा करते थे। लोगों को हम देखा करते थे कि वे इन्हें सम्मान से जाटव साहब या चमार साहब कहकर पुकारा करते थे। यह सच ही तो है कि आत्मविश्वास कहीं किसी दुकान से नही मिला करता है, अपितु यह स्वयं ही विकसित करना पड़ता है। आपके आत्मविश्वास को देखकर ही अगला व्यक्ति  आपको सम्मान देता है।

चौथे, अम्बेडकर हों या महात्मा फु ले या ऐसे ही अन्य महापुरूष, उन्हें केवल अपना-अपना बनाकर लिखने या प्रचारित करने की आवश्यकता नही है। जिन लोगों ने इतिहास की पुस्तकों मेें इन महापुरूषों को उपेक्षित किया है उन्हें दण्ड देने का सर्वोत्तम ढंग या उपाय यही है कि इतिहास को अपने ढंग से लिखा जाये। जिसमें इन महापुरूषों को उचित स्थान दिया जाये। यह सोच बदलनी चाहिए कि मेरी जाति के महापुरूष मेरे और तेरी जाति के महापुरूष तेरे। यदि ऐसी सोच हमारी बनी रही तो इसका दण्ड समाज को भुगतना पड़ेगा। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय परिवेश दूषित होगा। हमें चाहिए कि किसी की मूर्खता का प्रतिउत्तर नई मूर्खता करके न दिया जाये। जिन लोगों ने अपना वर्चस्व स्थापित कर स्वयं को सर्वोच्च सिद्घ करने का प्रयास किया समय ने उन्हे वैसा ज्ञानी प्रकाण्ड विद्घान नहीं छोड़ा जैसे वह हुआ करते थे। ये लोग अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट रहे, और उसी के लिए प्रयासरत रहे, परिणामस्वरूप अपनी उन्नतावस्था को ही गँवा बैठे। इसीलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट न रहना चाहिए अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

पाँचवें, सुसभ्य नागरिक बनने के लिए सुशिक्षित बनना आवश्यक है। सारे दायित्व सरकार के लिए ही छोडऩा उचित नही है। शिक्षित हरिजन भाईयों को चाहिए कि वे अपने समाज के लोगों को शिक्षित बनाने का प्रयास करें। ऐसी शिक्षा समितियाँ बनायी जायें जो हरिजन बच्चों को शिक्षित करने के लिए उन्हें विद्यालयों तक लायें। ये शिक्षा समितियाँ सुदूर देहात में कार्य करें और शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित दलित, शोषित समाज के लोगों को शिक्षा केन्द्रों तक लाने और उन्हें सरकार की नीतियों को समझाने का कार्य करें। हमारा कहने का अभिप्राय ये है कि जहाँ बुराई है, वहाँ उस बुराई को झेल रहे लोग यदि सक्रिय न हों तो बुराई का विनाश असम्भव है। वत्र्तमान में हरिजनों द्वारा जो अधिकार लिए जा रहे हैं उन्हें हमारे हरिजन भाई लेते समय और लेने के पश्चात उग्रता का प्रदर्शन करते दिखायी देते हैं। जबकि हमारा मानना है कि अधिकार तो अब मिल ही रहे हैं अब तो उन्हें समझने और पाकर उनका सदुपयोग करने की बात है। जिसके लिए उग्रता नही अपितु विनम्रता की आवश्यकता है। देहात में जहाँ अभी भी हरिजन उत्पीडऩ की बातें देखने में आती हैं वहाँ हरिजन भाई अपनी समितियों के माध्यम से संबंधित जिले के उच्चाधिकारियों तक अपनी बात पहुँचायें और समस्या का निदान करायें। छठे, हरिजन एक्ट का दुरूपयोग कई स्थानों पर जिस प्रकार किया जा रहा है, उसे बन्द किया जाये। छोटी-छोटी बातों को तूल देकर किसी व्यक्ति को हरिजन एक्ट में बन्द कराने की बात की धमकी समाज के परिवेश को विषाक्त कर रही है। इसलिए यह प्रवृत्ति भी परिवत्र्तित होनी चाहिए। ऐसी प्रतिशोध की भावना से समाज में कभी भी समरसता उत्पन्न नही हो सकती। समाज के सभी लोगों को इसके लिए सद्प्रयास करने पड़ते हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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