यह कैसा मीडिया धर्म?

  • 2016-03-15 03:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

आरक्षण के मुद्दे पर आरएसएस ने पुन: एक सकारात्मक और राष्ट्रीय सोच को झलकाने वाली सर्वसमन्वयी टिप्पणी की है कि समृद्घ वर्ग आरक्षण छोड़े, और जातीय आधार पर देश में चल रहा भेदभाव समाप्त किया जाए। इस वक्तव्य को पूर्णत: संतुलित और राष्ट्रहित को साधने वाला बयान कहा जाना चाहिए। क्योंकि जातीय आरक्षण ने देश में वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है। लोगों के बीच की दूरियां मिटी नही हैं, अपितु अप्रत्याशित और अनपेक्षित रूप से और बढ़ गयी हैं। आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी संगठन को इस विषय पर सोचना ही चाहिए। आरएसएस का यह मानना उचित ही है कि आरक्षण का लाभ समृद्घ वर्ग को नही लेना चाहिए। हमने पीएम नरेन्द्र मोदी की अपील पर गैस सब्सिडी छोडऩे वालों की संख्या देखी-पढ़ी है। बताया गया है कि प्रधानमंत्री की अपील पर अस्सी लाख से अधिक परिवार या गैस उपभोक्ता गैस सब्सिडी छोड़ चुके हैं। इसका अभिप्राय है कि अब से पूर्व इतने उपभोक्ता अनावश्यक ही देश केे खजाने को लूटने में सहायक हो रहे थे। बिल्कुल यही स्थिति आरक्षण का लाभ लेने वालों की है-यदि समृद्घ लोग और समृद्घ वर्ग आरक्षण को वैसे ही स्वेच्छा से छोड़ दें-जैसे प्रधानमंत्री मोदी के कहने पर गैस सब्सिडी लेना लोगों ने छोड़ा है तो इस आरक्षण का लाभ वास्तविक पात्र व्यक्ति तक पहुंच सकता है। आरक्षण का प्राविधान भी इसीलिए किया गया है कि वास्तविक रूप से वंचित और दलित-शोषित समाज को इसका लाभ दिया जा सके। इस विषय पर ना तो आरएसएस कहीं अस्पष्ट है और ना ही पीएम मोदी अस्पष्ट हैं। इसके उपरांत भी हमारी मीडिया की भूमिका आरएसएस के इस नये वक्तव्य पर असहयोगी रही है। एक बड़े समाचार पत्र ने लिखा है-‘संघ ने फिर छेड़ा मुद्दा-जातिगत आधार पर भेदभाव को गलत बताया।’ इस प्रकार के समाचार शीर्षक से लगता है कि जैसे आरएसएस ने फिर कोई ऐसी गलत पहल कर दी है जो समस्या को उलझाकर देश में आग लगा देगी। ऐसे भ्रामक रूप से समाचार प्रकाशित करना तो मीडिया धर्म नही है। मीडिया धर्म का तकाजा तो यही है कि वह हर उस राष्ट्रवादी चिंतन को सुंदर से सुंदर ढंग से प्रस्तुति दे जो राष्ट्रहित और जनहित में उचित हो। अब प्रश्न आता है कि यदि मीडिया आरएसएस के इस बयान से असहमत और असंतुष्ट है तो उस पर उसका अपना चिंतन क्या है? केवल आरएसएस को गाली देने से तो काम बनने वाला नही है, या उसकी शब्दावली की अनुचित व्याख्या करने से भी कोई लाभ नही होने वाला। उचित यही है कि यदि किसी वक्तव्य से आप असहमत तथा असंतुष्ट हैं तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका का निर्वाह करते हुए उस वक्तव्य को राष्ट्रहित में संशोधित करने की या परिमार्जित करने की क्षमता आपके पास हो। आरक्षण की प्रचलित व्यवस्था पर भी मीडिया आपत्ति करे और इस व्यवस्था पर दिये गये किसी उचित सुझाव को भी मीडिया भ्रामक ढंग से प्रकाशित करे यह दोरंगी बात नही चल सकती। यदि ऐसा ही किया जाता रहेगा तो फिर मानना पड़ेगा कि मीडिया अपने राष्ट्रधर्म से भटक रहा है। हमें नही लगता कि आरएसएस ने इस प्रकार का बयान देकर अंबेडकरजी की भावनाओं को अपमानित किया है। वास्तव में अंबेडकर जी की भावनाएं उन लोगों ने आहत की हैं जिन्होंने पात्र व्यक्ति तक आरक्षण की मंद सुगंध समीर के झोकों को पहुंचने ही नही दिया है।

यह कैसा मीडिया धर्म?

वैसे हमारे मीडिया को ‘सोशल मीडिया’ में इन दिनों बड़े अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। मीडिया को इस ओर सजग और सावधान होने की आवश्यकता है। ‘सोशल मीडिया’ में बड़ी आश्चर्यजनक पोस्ट डाली जा रही हैं। जो बता रही हैं कि हमारा मीडिया बिकाऊ क्यों है और पश्चिमीकरण को क्यों अपना समर्थन देता है? भारत के सारे चैनलों और मीडिया की सच्चाई के बारे में सन 2005 में एक फ्रांसीसी पत्रकार भारत दौरे पर आया। जिसका नाम फ्रैंकोइस था। उसने भारत में हिंदुत्व के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में अध्ययन किया और उसने इस सारे कार्य के लिए भारत की मीडिया को जिम्मेदार ठहराया। उसने भारत के न्यूज चैनलों और अखबारों के विषय में जब अध्ययन किया तो जो तथ्य उसे पता चले उनसे वह भी आश्चर्यचकित रह गया था। उसे पता चला कि ‘द हिंदू’ को जोसुआ सोसायटी, बर्न, स्विटजरलैंड से आर्थिक सहायता मिलती रही है, इसके संपादक एन.राम की पत्नी ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी थीं। एनडीटीवी को गोस्पेल ऑफ चेरिटी, स्पेन और यूरोप से आर्थिक सहायता मिलती थी। इसी प्रकार सीएनएन आईबीएन 7 को 100 प्रतिशत आर्थिक सहयोग सदर्न बैप्टिस्ट चर्च द्वारा दिया जाता है।

ट टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, नाऊ बैनेट एण्ड कोल्मान द्वारा संचालित 80 प्रतिशत फण्ड वल्र्ड क्रिश्चियन काउंसिल द्वारा मिलता है। बचा हुआ 20 प्रतिशत फंड एक अंग्रेज और इटैलियन द्वारा दिया जाता है। इटैलियन व्यक्ति का नाम रोबेर्ट माइन्दो है, जो सोनिया गांधी का निकट संबंधी है। यदि ये सब आरोप सत्य हैं तो स्थिति की भयानकता को सहजता से समझा जा सकता है।

हमनेे ऊपर जिन मीडिया संस्थानों के नाम बताये हैं ऐसे अनेकों समाचार पत्र और पत्रिकाएं या न्यूज चैनल हैं जिन्हें ऐसे लोगों से आर्थिक सहायता मिलती है या ऐसे देश और सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल उन्हें फंडिग करते हैं जिनका भारतीयता से कोई लेना देना नही है और वास्तव में जिनका उद्देश्य भारतीयता को समाप्त कर देने का ही है। ऐसे लोग भारत को मिटाकर इंडिया बसाने की तैयारी में लगे हैं। इस इंडिया की गिरफ्त में वास्तविक भारत (वे 50-60 करोड़ लोग जो भारत के ग्रामीण आंचल में बसते हैं) पूर्णत: आ चुका है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते-करते और विदेशी विचारधारा के दीवाने होकर ये ‘काले अंग्रेज’ देश का सौदा कर रहे हैं, या उसमें सहायक बन रहे हैं।

बहुत बड़ी चुनौतियों से देश को सामना करना पड़ रहा है। देश की वास्तविक विचारधारा और देश का वास्तविक चिंतन इस समय काले अंग्रेजों की जेल में हैं। चंद चांदी के सिक्कों मेें बिक गये मीडिया धर्म से देश को ऐसी अपेक्षा नही थी कि वह देश का सौदा करने की बात करने लगेगा।

जिस प्रकार आरएसएस के आरक्षण संबंधी बयान को मीडिया ने भ्रामक ढंग से प्रकाशित किया है उसी प्रकार श्रीश्री रविशंकर के हाल ही में संपन्न हुए कार्यक्रम को भी एक टीवी चैनल पर इस प्रकार दिखाया जा रहा था कि उसके होने से लोगों को यातायात में कितनी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है? उससे ऐसा लग रहा था कि इस प्रकार के कार्यक्रम राजधानी में होने ही नही चाहिए। जबकि यह सत्य है कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से देश की संस्कृति को विदेशों को समझाने में सहायता मिलती है, और विश्व भारतीयता की वास्तविकता को समझ पाता है। पर जिन लोगों ने भारत की वास्तविकता को ही मिटाने का ठेका ले लिया हो उससे यह आशा नही  की जा सकती कि वे देश के लिए कुछ बेहतर सोच पाएंगे। आवश्यकता इस समय देश की संस्कृति को परोसने की है, और राष्ट्रहित में जो उचित हो उस चिंतन पर गहन विचार-विमर्श कर उसे जनोपयोगी बनाने की है। स्मरण रहे कि यदि हमारा देश है-तो हम हैं और यदि देश ही नही रहेगा तो हम भी नही रहेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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