यह तो अराजकता की निशानी है

  • 2016-03-12 03:30:45.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश की राजनीति की समीक्षा अक्सर होती रहती है। राजनीतिज्ञों की कार्यशैली और आचरण पर भी लोग टीका-टिप्पणी करते रहते हैं, परंतु राजनीति और राजनीतिज्ञ कभी स्वयं अपनी समीक्षा या अवलोकन नही करते। यही कारण है कि देश की राजनीति और राजनीतिज्ञों का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। अराजकता जैसी परिस्थितियां बनती जा रही हैं। उनके विषय में विचार करने पर कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हमारा देश या तो गृहयुद्घ  की ओर बढ़ रहा है या इस अराजकता पूर्ण स्थिति से किसी ‘तानाशाह’ का जन्म हो सकता है। हमारा मानना है कि दोनों प्रकार की परिस्थितियां ही देश व समाज के लिए उचित नही होंगी।

जे.एन.यू. में अब ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया है। जिस पर किसी भी धर्मनिरपेक्ष नेता ने कुछ भी नही कहा है। इसे केवल हिंदू संतों या हिंदूवादी राजनीति करने वालों के लिए छोड़ दिया गया है। यदि यह घटना कुरान को लेकर हो गयी होती तो अब तक आसमान सिर पर उठा लिया गया होता। हमें यह व्यवस्था करनी ही चाहिए कि देश में किसी भी व्यक्ति को किसी संप्रदाय के किसी पवित्र ग्रंथ को जलाने की अनुमति नही होनी चाहिए। यदि गीता या कुरान का या किसी अन्य धर्मग्रंथ का जलाया जाना अनैतिक है तो ‘मनुस्मृति’ के जलाये जाने पर भी यही नियम या सिद्घांत लागू होना चाहिए।
यह तो अराजकता की निशानी है


हम ‘मनुस्मृति’ कुरान या बाईबिल आदि के दोषों की समीक्षा कर सकते हैं। उनमें संशोधन के लिए एक सर्वसम्मत राय बनाने के लिए शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित कर सकते हैं। वैसे ‘मनुस्मृति’ में कहीं भी कोई आपत्तिजनक श्लोक नही है। उसमें कुछ लोगों ने समय-समय पर अपनी सुविधा और स्वार्थ के लिए प्रक्षेप अवश्य किया है। उन प्रक्षिप्तांशों को ढूंढ़-ढूंढकर मिटाने या निकालने का कार्य अवश्य होना चाहिए। उसके लिए किसी अन्य को नही अपितु हिंदू विद्वानों को और व्याकरणाचार्यों को ही पहल करनी होगी। जिन लोगों ने मनुस्मृति को जे.एन.यू. में जलाने की घटना की है उनकी सोच हिंदू घातक है, और यह सत्य है कि जो व्यक्ति हिंदूघाती हो जाता है वह देशघाती होकर ही रूकता है। हिंदूघाती होने का अर्थ है-देश के एक शत्रु को पालना। इन शत्रुओं को आप केवल शब्दों के गोलों से ही नही मिटा सकते, इसके लिए आपको अपने आप में सुधार करना ही पड़ेगा। समय चीख-चीख कर कह रहा है कि शीघ्रता से अपने पूर्णत: वैज्ञानिक और तार्किक ग्रंथों में डाल दिये गये अवैज्ञानिक, अतार्किक और अमानवीय श्लोकों-मंत्रों को दूर करने का प्रयास किया जाए।

दोष कन्हैया का नही है। कन्हैया तो एक षडय़ंत्र का मोहरा मात्र है। यह चोर अवश्य है-पर ‘चोर’ की मां कहीं कोई और है। हर बार की भांति हम फिर चूक कर रहे हैं कि केवल ‘कन्हैया’ को ही निशाना बना रहे हैं। यह प्रमाद और अकर्मण्यता का प्रदर्शन है। जिसमें यह झलकता है कि हमने ना सुधरने की सौगंध ही उठा ली है। जब अधिकांश विद्वान यह मानते हैं कि मनुस्मृति नारी विरोधी नही है, ना ही वर्णन व्यवस्था की जनक  है, ऊंच-नीच को बढ़ावा नही देती है, अस्पृश्यता की विरोधी है। अत: ‘मनुस्मृति’ के जिन-जिन भाष्यों अथवा टीकाओं में ऐसी व्यवस्था की गयी है जिससे मूल मनुस्मृति को अपयश का भागी बनना पड़े, तो ऐसी व्यर्थ की टीकाओं या ऐसे भाष्यों का यथाशीघ्र चिह्नïीकरण कर उन्हें लोगों के पढऩे या पढ़ाने से निषिद्घ किया जाना अपेक्षित है। जहां तक हमारे राजनीतिज्ञों की बात है तो ये स्वयं ही अज्ञानी और धर्मशून्य होते हैं, अपवादों को छोडक़र इनमें से अधिकांश धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में अंतर नही कर सकते, धर्म और संप्रदाय का अंतर इन्हें ज्ञात नही। इन्हें केवल एक दूसरे को गालियां देनी आती हैं, और गालियां देने को ही इन्होंने अपनी योग्यता मान लिया है। जो नेता जितनी अधिक गालियां अपने विरोधियों को दे ले, और गालियां देकर अपने लोगों का काम अधिकारियों से करा ले, हम भी उसी को वास्तविक नेता मानने लगे हैं। नेताओं के लिए शायर ने कितना सुंदर लिखा है :-

‘‘तुमने चाहा ही नही वरना हालात बदल सकते थे,
मेरे आंसू तेरी आंखों से निकल सकते थे।
तुम ठहरे ही रहे झील के पानी की तरह,
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे।।’’

जब नेताओं में ‘झील-धर्म’ विकसित होता है और वे अपने ‘दरिया-धर्म’ को भूल जाते हैं तो उस समय ही राजनीति और राजनीतिज्ञों से लोगों का मोहभंग होता है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं :-

‘‘
दानशीलता, मधुरभाषण, शूरवीरता और उचित अनुचित का ज्ञान अथवा पांडित्य अभ्यास से नही प्राप्त होते, क्योंकि ये चारों गुण स्वाभाविक हैं अर्थात जन्मजात होते हैं। जब कोई शिशु जन्म लेता है तो उसमें ये स्वाभाविक रूप से विद्यमान होते हैं। इन्हें कोई व्यक्ति अभ्यास से प्राप्त नही कर सकता।’’
हमारे देश के नेताओं में स्वाभाविक रूप से दानशीलता (दानशील न होने के कारण ही तो ये भ्रष्टïाचार में लिप्त मिलते हैं) मधुरभाषण (संसद और संसद से बाहर इनकी भाषा अपने विरोधियों पर कटाक्ष करने वाली होती है) शूरवीरता (चोरी करते हैं, इसलिए भयभीत रहते हैं-तभी तो सुरक्षा व्यवस्था के बीच पिंजड़े में बंद पंछी की भांति जीवन व्यतीत करते हैं) और इन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान (देश हित में क्या है-दलगत हित में क्या है, इनका इन्हें ज्ञान ही नही है) नही है। यही कारण है कि कांग्रेस के दिग्विजयसिंह आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ कहकर बोलते थे।

कांग्रेस के शिंदे महोदय यूपीए सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभालते रहे, पर उन्हें यह पता नही रहा कि उन्हें अपने पद की गरिमा के अनुसार क्या बोलना चाहिए क्या नही? एक बार कह गये थे कि पुलिस अल्पसंख्यक वर्ग के युवाओं को बेवजह परेशान ना करे। सोनिया गांधी के विषय में सलमान खुर्शीद ने कहा था कि बाटला हाउस में आतंकवादियों के मरने पर सोनिया जी बहुत रोयी थीं। आतंकवादियों के मरने पर जिस देश के नेताओं की आंखों से आंसू निकलें और सैनिकों या देश के निरपराध लोगों के मरने पर जो मौन साध जाएं उनसे उचित अनुचित का ज्ञान होने की आशा नही की जा सकती।

क्या ही अच्छा हो कि नेताओं को नेता बनाने के लिए भी विधिवत एक ‘सिलेबस’ की व्यवस्था हो। वैसे भी यह बेतुकी बात है कि एक घर को चलाने के लिए नौकरी पाने वाले व्यक्ति को सरकार किन्ही मानकों को पूर्ण कराके ही उसे नौकरी देती है, पर देश चलाने वालों के लिए कोई ‘सिलेबस’ नही, कोई योग्यता नही। वह अपना ‘सिलेबस’ और अपनी ‘योग्यता’ स्वयं निर्धारित करते हैं। अब धीरे-धीरे अपना ‘सिलेबस’ और अपनी ‘योग्यता’ स्वयं निर्धारित करने की यह बीमारी देश में हर व्यक्ति को लगती जा रही है और देश में अराजकता की यही सबसे बड़ी निशानी है।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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